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इक़बाल ब-हैसियत-ए-शा'इर और फ़लसफ़ी

सय्यद एहतिशाम हुसैन


अनुवाद : Rekhta Editor

सय्यद एहतिशाम हुसैन

इक़बाल ब-हैसियत-ए-शा'इर और फ़लसफ़ी

सय्यद एहतिशाम हुसैन

MORE BYसय्यद एहतिशाम हुसैन

    अगर दर्शन की शुरुआत हैरत (आश्चर्य) से होती है, तो इक़बाल दर्शन की दुनिया के एक खोजी यात्री थे। अगर शायरी रूह की ऊंची उड़ान के पलों में गाया हुआ गीत है, तो इक़बाल हसीन और नायाब, असरदार और जोशीले गीतों के शायर थे। हिंदुस्तानी मुसलमानों के वैचारिक जीवन के उस मोड़ पर इक़बाल सामने आए जब बातें स्पष्ट नहीं थीं। इसलिए मुसलमानों को उनकी शायरी और उनके दर्शन दोनों में नए मूल्यों की झलक और नए विषय का भारीपन नज़र आया। कुछ लोगों का ख़याल है कि इक़बाल में रचनात्मक शक्ति की कमी थी। उनका दर्शन या तो पुराने मुस्लिम विद्वानों से उधार लिया गया था या यूरोप के दार्शनिकों से। उनकी शायरी भी नई नहीं थी, बल्कि ग़ालिब, हाली और अकबर की क़ायम की हुई परंपराओं की निरंतरता थी।

    बहस-मुबाहिसे के लिए इन विचारों में बड़ी जान है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि फ़ारसी और उर्दू शायरी में इस लिहाज़ से उनका कोई सानी नहीं है कि उन्होंने एक जानदार वैचारिक दृष्टिकोण पैदा किया, शायरी को नया विषय दिया, नया विस्तार दिया, भौतिक, नैतिक और आध्यात्मिक मसलों पर ग़ौर करने के नए रास्ते दिखाए, शायरी में नई ताक़त और गहराई, नया लक्ष्य और ज़ोर पैदा किया और उन्हें शैलियों के नए सांचों में ढाला। इक़बाल के यहाँ यथार्थवाद और आदर्शवाद का अजीब संगम है। और जब तक उनके विचारों का पूरी तरह विश्लेषण न किया जाए, कोई बात स्पष्ट नहीं होती।

    इक़बाल जिस घर में पैदा हुए, उसमें धार्मिकता का अच्छा-ख़ासा ज़ोर था। उनके पिता सूफ़ीवाद को पसंद करते थे और सूफ़ियाना शायरी में गहरी दिलचस्पी लेते थे। मौलाना रूम की मसनवी का पहला प्रभाव जो इक़बाल के दिल पर गहरा बैठा, वह उनके पिता की मसनवी के प्रति गहरी श्रद्धा का ही नतीजा था। जब उन्होंने पूरब और पश्चिम के दर्शन का अध्ययन किया, उस वक़्त मौलाना रूम ही उनको संभाले हुए थे और ज़िंदगी की जटिल राहों में उनका मार्गदर्शन कर रहे थे।

    अगर सूफ़ियाना रुझान का कोई तोहफ़ा इंसान इस लिहाज़ से क़ुबूल कर सकता है कि उससे ज़िंदगी की गुत्थियों को सुलझाने में फ़ायदा उठाए, तो वह एक तरह का व्यापक दृष्टिकोण और उदारता है, और इक़बाल को ये बातें शायद सूफ़ीवाद के अध्ययन से ही हासिल हुई थीं। राष्ट्रीयता की वह लहर जो ग़दर (1857 के विद्रोह) के तूफ़ान के पीछे-पीछे उठी, जिसने एक नए मध्यम वर्ग का मानसिक निर्माण किया और बाद में उसका सहारा भी लिया, उसी राष्ट्रीय जागरण के आंदोलन ने इक़बाल की दूरदृष्टि से मिलकर उनमें वह एहसास पैदा कर दिया जो हिंदू-मुस्लिम एकता के ज़रिए देश की तरक़्क़ी की जोशीली ख़्वाहिश का प्रतीक था, और जो हिंदुस्तान की प्राचीन महानता और सफल भविष्य पर यक़ीन रखता था।

    अगर इक़बाल की शायरी का अध्ययन ऐतिहासिक दौर के लिहाज़ से किया जाए, तो यह बात बहुत जल्द स्पष्ट हो जाएगी कि बीसवीं सदी के शुरुआती सालों तक इस्लामी दुनिया की घटनाओं या अंतर्राष्ट्रीय हालात ने उन्हें परेशान नहीं किया था। उनका ख़ास विषय प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण, इंसान और प्रकृति का संबंध, और बेहद आंतरिक और जज़्बाती अंदाज़ में इस तमन्ना का इज़हार था कि प्रकृति का सौंदर्य शायर को भी अपनी आगोश में समेट ले और वह भी प्रकृति के सौंदर्य का एक हिस्सा बन जाए। सबसे बड़ी बात जो उस वक़्त की शायरी में उभर कर सामने आती है, वह आश्चर्य का वह जज़्बा है जो हर पल बदलती हुई सृष्टि का राज़ जान लेना चाहता है और दिन-रात का अर्थ समझने का इच्छुक है। ये विचार उनकी शुरुआती नज़्मों में बार-बार इतनी दफ़ा दोहराए गए हैं कि ज़िंदगी का मार्गदर्शन करने वाली ताक़त की तलाश की अहमियत पर नज़र पड़े बिना नहीं रह सकती। वह सूरज, चाँद, सितारों और प्रकृति के दूसरे रूपों से ज़िंदगी का मक़सद पूछ लेना चाहते हैं। इन विचारों पर ज़ोर देने की ज़रूरत इसलिए बहुत ज़्यादा है क्योंकि इसी हैरत, प्यास और रहस्य की खोज ने दिन-रात उन पर हावी होकर उन्हें ज़िंदगी के छुपे हुए भेदों को समझने पर मजबूर किया।

    इक़बाल की सारी शुरुआती शायरी में दार्शनिक दृष्टिकोण की कमी नज़र आती है। उनकी ग़ज़लों में सूफ़ियाना परंपरावाद और आंतरिक कल्पनाशीलता से पैदा होने वाले आदर्श नैतिक विचारों का इज़हार होता है। लेकिन थोड़े ही दिनों में वह अचानक जैसे एक नई दुनिया में दाख़िल हो गए जो उनका इंतज़ार कर रही थी। उनका दर्शन और इतिहास का अध्ययन, तथा इस्लाम के उत्थान और पतन के बारे में उनकी जानकारी पुख़्ता हो चुकी थी, जब उन्होंने हिंदुस्तान के तट से यूरोप की तरफ़ रुख़ किया। ऐसा मालूम होता है कि वहाँ जाते ही उनको अपने सवालों का जवाब मिल गया और उनके आश्चर्य की भावना का केंद्र बदल गया। उन्होंने अपने लिए वह रास्ता चुन लिया, जिस पर उन्हें भविष्य में चलना था।

    उन्होंने पहली बार यूरोपीय राजनीति की बाज़ीगरी देखी, वहाँ के सांस्कृतिक जीवन की गहराई और खोखलेपन को क़रीब से देखा, अंग्रेज़ों के जीवन के उसूलों की बाहरी और भीतरी स्थिति पर नज़र डाली, अलग-अलग क़ौमों का वह टकराव देखा जो एक-दूसरे पर क़ाबू पाने के लिए उनके बीच जारी था, राष्ट्रवाद और नस्लवाद का वह बढ़ता हुआ तूफ़ान उनकी आँखों के सामने आया, जो दूसरों का जीना मुहाल कर देना चाहता था, लोकतांत्रिक व्यवस्था की नीलम परी के पर्दे में अत्याचार के राक्षस के नाचने की आवाज़ सुनी, गोरी क़ौमों की दूसरी क़ौमों के प्रति नफ़रत देखी, यूरोपीय देशों का वह विरोधी रवैया इक़बाल पर ज़ाहिर हो गया जो एशियाई ताक़तों को मिटाने पर तुला हुआ था, और उन्होंने तय कर लिया कि इस्लामी देशों की इस बुरी हालत और बेचारगी में वे उनका साथ देंगे और उन्हें यूरोप के क़दमों तले कुचले जाने से बचाएंगे।

    अपनी शायरी में इक़बाल ने मजलूम क़ौमों के साथ आमतौर पर और मुसलमानों के साथ विशेष रूप से हमदर्दी का नारा बुलंद किया, और उन्हें पश्चिम के ख़िलाफ़ संगठित होने पर उकसाया। एकता और संगठन का यह परचम इससे पहले भी कुछ विचारकों, ख़ासकर जमालुद्दीन अफ़ग़ानी ने बुलंद किया था। लेकिन इस विचार को लोकप्रिय और आम बनाने, और मुसलमानों के एक वर्ग के लिए एक ज़िंदा और गतिशील लक्ष्य बना देने का सेहरा इक़बाल के ही सिर है।

    इक़बाल इस्लामी विचारों के इतिहास से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे और इस्लाम के पतन के कारणों और स्थिति को ज़ाहिर करने वाली घटनाओं और विचारों के बारे में नतीजे निकालने में संकोच नहीं करते थे। इक़बाल ख़ुद इस्लाम के इस पतन के दौर की पैदावार थे। इसी वजह से अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता और कुशाग्रता के बावजूद, वे बीते हुए दौर के इस्लाम की शान-ओ-शौकत के प्रभाव से बाहर न निकल सके और भविष्य को सफल बनाने के लिए लगभग पूरी तरह अतीत की तरफ़ लौट जाने में ही समाधान देखने लगे। उनका ख़याल था कि पतन के कारण, इस्लाम के व्यावहारिक और सीधे-सादे उसूलों में अफ़लातून (प्लेटो) के आदर्शवादी दर्शन के तत्वों का शामिल हो जाना, संन्यासी जीवन-शैली के ख़िलाफ़ इस्लाम के स्पष्ट आदेशों की मौजूदगी के बावजूद वैराग्य का ज़ोर पकड़ लेना, और आध्यात्मिक ताक़त के ख़त्म हो जाने की वजह से दुनियावी ताक़त के ख़त्म हो जाने का नतीजा हैं।

    उन्होंने सूफ़ीवाद के इस निष्क्रिय और वैराग्यवादी रवैये का कड़ा विरोध किया क्योंकि इसी ने 'नफ़ी-ए-ख़ुदी' (ख़ुदी को मिटाने) के विचार को जन्म दिया था। 'ख़ुदी' को जड़ से मिटाना सूफ़ीवाद का मुख्य उसूल बन गया था। इक़बाल ने एक जोशीले बुत-शिकन (परंपराओं को तोड़ने वाले) की तरह इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और इसके विरोधी नज़रिए को 'इस्तिहकाम-ए-ख़ुदी' (ख़ुदी की मज़बूती) की शक्ल में पेश किया, जो प्राचीन महानता को वापस लाने और इंसान को 'नियाबत-ए-इलाही' (ईश्वर के प्रतिनिधि) के दर्जे तक पहुँचाने का ज़रिया था।

    इक़बाल के दर्शन में 'ख़ुदी' वह धुरी है जिसके चारों ओर जीवन... अपने सबसे व्यापक अर्थ में... चक्कर लगा रहा है। मुसलमानों ने अपनी ख़ुदी खो दी, इसलिए सब कुछ खो दिया; अगर उनकी ख़ुदी उन्हें फिर वापस मिल जाए, तो यक़ीन है कि सब कुछ मिल जाएगा। हर लफ़्ज़ जो इक़बाल की क़लम से निकला, उसे इसी अक़ीदे (विश्वास) की व्याख्या और स्पष्टीकरण के तौर पर समझा जा सकता है। आइए इसे सबसे आसान शब्दों में समझने की कोशिश करें।

    इक़बाल का ख़याल है कि ख़ुदी की भावना जीवन में पूरी तरह व्याप्त है। इसी से जीवन में गति और तड़प है; इंसान का सबसे बड़ा लक्ष्य यही होना चाहिए कि वह इसके विकास और मज़बूती में लग जाए। ख़ुदी को पूरी तरह हासिल करने के सिलसिले में इंसान को तीन चरणों से गुज़रना पड़ेगा, जिनके नाम उन्होंने इताअत (आज्ञापालन), ज़ब्त-ए-नफ़्स (आत्म-नियंत्रण) और नियाबत-ए-इलाही (ईश्वर का प्रतिनिधित्व) रखे हैं। इताअत इस्लाम की असली रूह से वाक़िफ़ कराती है, जो तौहीद (एकेश्वरवाद), रिसालत (पैग़ंबरी) और क़ुरआन पर ईमान रखने पर आधारित है। ये बातें तर्क और दलील से ज़्यादा उनके असाधारण अंतर्ज्ञान (विजदान) के अनुकूल थीं। इसलिए इनके बयान में इक़बाल ने न सिर्फ़ अपने ज्ञान का ज़ोर, बल्कि अपने बयान का ज़ोर भी लगाया है।

    इसके व्याख्यात्मक विवरण बहुत दिलचस्प हैं, लेकिन उनका बयान काफ़ी लंबा है। फिर भी इतनी बात ज़रूर ज़हन में रखनी चाहिए कि इक़बाल ईश्वर के एक होने (तौहीद) के अक़ीदे से मानव एकता के अक़ीदे तक पहुँचते थे, और उनका ख़याल था कि एक ख़ुदा पर ईमान इंसान को बहुत से छोटे-छोटे ख़ुदाओं के सामने सिर झुकाने से बचाता है। इसकी वजह से इंसान मायूसी, डर और ग़म का शिकार होने से बच जाता है, जो ख़ुद बहुत सी बुराइयों की जड़ हैं। इसे सिर्फ़ एक रस्मी अक़ीदे की हैसियत से नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने के लिए इसकी रूह को अपने अंदर जज़्ब कर लेना चाहिए।

    एक सच्चे इंसान (और इक़बाल के नज़दीक ऐसा ही इंसान मुसलमान है) का फ़र्ज़ है कि वह लालच और डर पर क़ाबू पा ले, और यह बात उसी वक़्त पूरी तरह मुमकिन है जब इंसान एक ख़ुदा पर यक़ीन रखता हो। इसी तरह इक़बाल ने रिसालत और क़ुरआन पर ईमान रखने के अक़ीदों को साफ़ तौर पर बयान करके अपनी विचार-प्रणाली को पूरी तरह से पेश किया।

    इताअत (आज्ञापालन) की मंज़िल तय करने के सिलसिले में ऐसे मुक़ाम भी आते हैं, जहाँ ज़ब्त-ए-नफ़्स (आत्म-नियंत्रण) की ज़रूरत पेश आती है। क्योंकि अगर इसे बेरोकटोक छोड़ दिया गया, तो इससे भी ख़तरनाक संभावनाएँ पैदा हो सकती हैं और ख़ुदी का जज़्बा बुरे नतीजों तक पहुँचाता है, या कम से कम पहुँचा सकता है। इसलिए ज़ब्त-ए-नफ़्स ज़रूरी है। जब कोई शख़्स इन दो चरणों... इताअत और ज़ब्त-ए-नफ़्स... से गुज़र लेता है, तो वह 'मर्द-ए-कामिल' (पूर्ण मनुष्य) बन जाता है, और उसकी गिनती ख़ुदा के चुने हुए बंदों में होने लगती है। ख़ुदा उसके ज़रिए से अपने मक़सदों को पूरा करता है और उसकी मदद करता है कि वह अपनी पसंद की दुनिया बना ले।

    अगर इताअत पर ज़ब्त-ए-नफ़्स की निगरानी जारी न रहे, तो ख़ुदी की तलाश करने वाला ख़तरनाक रास्तों पर जा सकता है। इस ख़याल को साफ़ करने के लिए इक़बाल इबलीस (शैतान) को मिसाल के तौर पर पेश करते हैं, जो इताअत में पक्का होने के बावजूद ज़ब्त-ए-नफ़्स की मंज़िल में लड़खड़ा गया और ख़ुदी की असली बुलंदी हासिल न कर सका। इसके उलट, पैग़ंबरों ने ये चरण तय कर लिए, किसी मुक़ाम पर उनसे चूक नहीं हुई; यहाँ तक कि वे ज़मीन पर 'नायब-ए-इलाही' (ईश्वर के प्रतिनिधि) क़रार पाए। कहा जाता है कि इक़बाल ने 'मर्द-ए-कामिल' का यह ख़याल नीत्शे से लिया, जो 'फ़ौक़-उल-बशर' (अतिमानव / Superman) को मानने वाला है, और यहीं से फ़ासीवाद और सत्ता-पूजा की राहें खुलती हैं। इक़बाल ने इसे बार-बार पूरी स्पष्टता के साथ बयान किया है कि उनका 'मर्द-ए-कामिल' नीत्शे के 'फ़ौक़-उल-बशर' से बिल्कुल अलग है।

    इसमें ज़रा भी शक नहीं कि इक़बाल के यहाँ शक्ति के प्रतीक की पूजा का विचार पूँजीवादी व्यवस्था के विरोधाभास को सुधारात्मक रोकथाम के ज़रिए सँभाल लेने की कोशिश से पैदा नहीं होता, बल्कि एक ऐसी ताक़त की तलाश में हासिल होता है जो सारी दुनिया के मुसलमानों को नए सिरे से ज़िंदा और ताक़तवर बना दे। फ़ासीवाद के जन्म से बहुत पहले इक़बाल ने अपना ख़ुदी का विचार और 'मर्द-ए-कामिल' का सिद्धांत पूरा कर लिया था। इक़बाल के कुछ ख़यालात और फ़ासीवाद में जो एक क़िस्म की समानता पाई जाती है, उसका कारण दोनों के पेश किए गए सामाजिक व्यवस्था के राजनीतिक और आर्थिक ढाँचे में नहीं ढूँढना चाहिए, बल्कि वह चीज़ पतनशील जीवन-व्यवस्था में रूह फूँक कर उसे ज़िंदा और बरक़रार रखने की कोशिश में मिलेगी। उन्हें ताक़त इसलिए पसंद नहीं थी कि वे फ़ासिस्ट थे, बल्कि इसलिए कि वे मुस्लिम क़ौमों में इतनी ताक़त देखना चाहते थे कि उन्हें आज़ादी के साथ इस्लाम के बताए हुए उसूलों के मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी और अपनी सभ्यता का निर्माण करने की क्षमता हासिल हो।

    इक़बाल इस्लाम के उत्थान और सत्ता के लिए (और इस्लाम उनके ख़याल में सारी दुनिया के इंसानों के लिए सबसे उपयुक्त जीवन-दर्शन है) बेक़रार रहते थे, और इसके पतन का विश्लेषण करते हुए या इसकी तरक़्क़ी के बुनियादी तत्वों पर ग़ौर करते हुए, उन तमाम जगहों से मदद हासिल करना चाहते थे जो शक्ति का प्रतीक हों या जो ताक़त पैदा करने में मददगार हो सकें। इस तरह वे नीत्शे के हमख़याल भी हैं और विरोधी भी; मार्क्स को पसंद भी करते हैं और उस पर एतराज़ भी करते हैं; मुसोलिनी से प्रभावित भी हैं और उसके कामों के आलोचक भी। बर्गसां (Bergson) के 'जीवन के जोश' (Élan vital) में कोई चीज़ थी जिसे इक़बाल पसंद करते हैं; हीगल, गेटे, भर्तृहरि के बहुत से ख़यालात से वे सहमत हैं। आंशिक रूप से वे सबके साथ हैं, पूरी तरह से किसी के साथ नहीं। उन्हें पूरी सहमति सिर्फ़ क़ुरआन से है या फिर मौलाना रूम से।

    इस तरह इस ऊपरी विरोधाभास की व्याख्या की जा सकती है जो पढ़ने वाले को उनके यहाँ नज़र आता है। हक़ीक़त यह है कि इक़बाल ने जीवन के हर क्षेत्र में इस्लाम की सच्चाई का अध्ययन किया था, और इसके अमल करने योग्य होने का यक़ीन सिर्फ़ जज़्बे और मनमानी की मदद से नहीं, बल्कि ग़ौर-ओ-फ़िक्र और दूसरी जीवन-व्यवस्थाओं के तुलनात्मक अध्ययन के बाद किया था। इक़बाल ने जिस तरह इस्लाम को समझा था, वह उनके ख़याल में एक पवित्र लक्ष्य और अंतिम दृष्टिकोण था। और दर्शन की दूसरी विचारधाराएँ सिर्फ़ उस हद तक सही और दुरुस्त थीं, जिस हद तक वे विचार और कर्म में इस्लाम से सहमत और एक थीं; दर्शन का जो हिस्सा इसके अलावा बच रहता था, इक़बाल उसे क़बूल नहीं करते थे।

    यह ख़याल इस बात से और ज़्यादा साफ़ हो जाता है कि मौलाना रूम शुरुआत से लेकर आख़िरी वक़्त तक इक़बाल के रहनुमा और दार्शनिक रहे। दूसरे लोग उस वक़्त तक के लिए ज़हन पर हावी रहते थे, जब तक उनसे तरक़्क़ी और ताक़त हासिल करने के साधनों में मदद मिलती थी। मानो उनका लक्ष्य उनके ज़हन में तय हो चुका था, लेकिन इसे हासिल करने के साधन उनके ज्ञान और जीवन की समस्याओं के अध्ययन के साथ-साथ नए प्रभाव क़बूल करते रहते थे।

    इक़बाल ज़िंदगी की संभावनाओं पर लगातार ग़ौर करते रहते थे। अपनी शायरी में उन्होंने ख़ुद को एक यथार्थवादी ज़ाहिर किया है, लेकिन अगर दार्शनिक हक़ीक़त से देखा जाए तो वह विचार को पहली जगह देते हैं और यह नतीजा निकालते हैं कि ज़मीर और रूह की क्रांति भौतिक ज़िंदगी में क्रांति लाती है। पयाम-ए-मशरिक़ की भूमिका में इक़बाल ने इसे बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में लिख दिया है कि पहले अंदरूनी क्रांति होनी चाहिए, फिर बाहर की दुनिया भी बदल जाएगी। यह वह बुनियादी ख़याल है जो उन्हें यथार्थवादियों की सफ़ से निकालकर आदर्शवादियों के घेरे में ला डालता है। हालाँकि उनका आदर्शवाद आंतरिक होने के बजाय ज़्यादातर बाहरी होता है। हक़ीक़तों का विश्लेषण करते हुए इक़बाल बार-बार ख़याल की दुनिया में पहुँच गए हैं और उनकी चेतना आंतरिकता की गिरफ़्त में आ गई है। उन्होंने हक़ीक़तों को समाज के वास्तविक तत्वों के विश्लेषण से नहीं बल्कि कल्पना शक्ति की मदद से समझा है, नतीजा सिद्धांत और कर्म के अलगाव की शक्ल में ज़ाहिर हुआ और गुफ़्तार का ग़ाज़ी (बातों का वीर) किरदार का ग़ाज़ी (कर्म का वीर) न बन सका।

    इक़बाल एक दार्शनिक की हैसियत से द्वैतवाद के सख़्त दुश्मन हैं। लेकिन उनकी शायरी एहसास, आंतरिकता, नज़र और जज़्बे के मुक़ाबले में ज्ञान, साइंस, भौतिक हक़ीक़तों और ख़बर के ख़िलाफ़ जानलेवा तीर बरसाती है। इक़बाल को साम्राज्यवाद और पूँजीवाद से नफ़रत है लेकिन वह उन ताक़तों के साथ कभी मिलकर काम न कर सके जो इन्हें मिटाने के पीछे पड़ी थीं। वह हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में कभी बहुत स्पष्ट ख़यालात का इज़हार न कर सके। उन्होंने विचारों की आज़ादी और औरतों की आज़ादी को कुछ ऐसी नैतिक पाबंदियों के साथ शर्त-बद्ध कर दिया था जो मौजूदा वर्गीय समाज की आर्थिक और सामाजिक ज़िंदगी से ताल्लुक़ नहीं रखती थीं। वह कोड़े लगा-लगाकर लोगों को गंदे और नीच मक़सदों से जंग करने पर उकसाते थे और उनमें कर्म का जोश पैदा करते थे, लेकिन कोई व्यवस्थित व्यावहारिक ख़ाका पेश नहीं करते थे।

    कोई शख़्स आज़ादी के अलंबरदार (ध्वजवाहक) की हैसियत से उनकी निष्ठा में शक नहीं कर सकता, उनकी सच्ची लोकतंत्र-पसंदी पर उँगली नहीं उठा सकता, तरक़्क़ी की ख़्वाहिश और इंसानी महानता के इज़हार के ख़िलाफ़ ज़बान नहीं हिला सकता, लेकिन उन्होंने इन वैचारिक हक़ीक़तों के लिए कर्म की कसौटी नहीं तैयार की। वह अपने ख़यालात को उनके तार्किक नतीजों तक नहीं पहुँचाते थे, वरना उनका विरोधाभास उन पर ख़ुद ज़ाहिर हो जाता। अपनी कुछ नज़्मों में इक़बाल समाजवादी जीवन-दर्शन के बहुत क़रीब पहुँच जाते हैं लेकिन उन्होंने पूँजीवाद की अलग-अलग शक्लों और वर्गीय समाज से पैदा होने वाली पेचीदगियों पर गहरी नज़र नहीं डाली। जज़्बाती हैसियत से वह आज़ादी, समानता और भाईचारे के जोशीले समर्थक थे लेकिन यूरोप के तथाकथित लोकतंत्रों की नाकामी देखकर इक़बाल ने यह नतीजा निकाला कि किसी क़िस्म के लोकतंत्र में उन मक़सदों को हासिल करने की ताक़त नहीं है जो नेक हैं।

    इक़बाल में असाधारण जीवन-उत्साह की झलक थी और बेहतर से बेहतर की तलाश में हर पल नई तमन्नाएँ पैदा करने के क़ायल थे। वह मख़्लूक़ (सृष्टि) होते हुए भी ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) के साथ सृजन के अमल में शरीक होना चाहते और ज़िंदगी को कर्म का प्रतीक देखना चाहते थे। वह हादसों से बेख़ौफ़ होकर प्रकृति पर विजय को इंसानी महानता के लिए ज़रूरी समझते थे। इक़बाल वह तरीक़े नहीं बताते जिनकी मदद से ये ऊँचे मक़सद हासिल किए जा सकते हैं। सिर्फ़ एक तरीक़ा जिसका ज़िक्र बार-बार आता है, वह एक ख़ास तरीक़े से 'ख़ुदी' (आत्म-चेतना) की तरक़्क़ी और मज़बूती का है। इक़बाल के यहाँ यह बात साफ़ नहीं है कि ख़ुदी की यह तरक़्क़ी क्या उन सामाजिक क़ानूनों को, जो ख़ास हालात में इंसान को जकड़े रहते हैं, नज़रअंदाज़ करके भी मुमकिन है? अगर ऐसा नहीं है तो इंसानों का पहला फ़र्ज़ यही होना चाहिए कि वे एक ऐसी दुनिया बनाएँ जहाँ लोगों को अपनी ख़ुदी को तरक़्क़ी देने और रूहानी हैसियत से बुलंद करने की आज़ादी हासिल हो।

    जहाँ तक प्रकृति के ख़िलाफ़ इंसान के संघर्ष का ताल्लुक़ है, इक़बाल के ख़यालात और ख़्वाहिशें स्पष्ट हैं। उनका ख़याल है कि इंसान कभी न कभी ब्रह्मांड पर विजय पाकर उसे अपने काम में लाएगा, लेकिन समाज की टकराने वाली और विरोधी ताक़तों का जायज़ा इक़बाल ने नहीं लिया। व्यक्ति का ताल्लुक़ समाज से और अवाम का ताल्लुक़ हुकूमत से, ये ऐसे मसले हैं जिनकी पर्याप्त व्याख्या इक़बाल के यहाँ नहीं पाई जाती। और इसी का नतीजा है कि उनके बारे में अलग-अलग राय क़ायम की जा सकती हैं। वह एक हुकूमत और एक मिल्लत (समुदाय) के क़ायल थे, जिसके बारे में उनका ख़याल था कि वह ठीक तौर पर एक 'मर्दे-कामिल' (पूर्ण पुरुष) की रहनुमाई में ही क़ायम रह सकती है और ज़माना इस मर्दे-कामिल के इंतज़ार में है। इक़बाल की शासन-व्यवस्था में हाकिम (शासक) भी है और महकूम (शासित) भी। महकूम आवाज़ नहीं उठा सकता और हाकिम सिर्फ़ उस क़ानून को लागू करने और बरक़रार रखने के लिए है जो ख़ुदा ने उसके लिए उतारा है।

    इक़बाल हालाँकि सूफ़ी न थे बल्कि औपचारिक सूफीवाद के सख़्त ख़िलाफ़ थे, लेकिन सूफ़ी रुझान ज़रूर रखते थे। अगर अंतर्ज्ञान को अक़्ल पर तरजीह देना तसव्वुफ़ का काम है तो इक़बाल के यहाँ यह बात क़दम-क़दम पर मिलती है और इक़बाल ने इस पर परदा भी नहीं डाला है। इक़बाल के आदर्शवाद ने ख़ुद उनको उनके ख़िलाफ़ कर दिया था जिसका नतीजा यह था कि वह वर्तमान से बेपरवाह होकर भविष्य को अतीत के ज़रिए सँवारना चाहते थे। वह पश्चिमी जीवन-शैली की नक़ल से नफ़रत करते थे, वह मौजूदा दौर के भौतिकवाद के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान करते थे, लेकिन पश्चिमी क़ौमों के कर्म-शौक़ के प्रशंसक भी थे। इक़बाल जब भौतिकवाद का ख़याल करते थे तो उनके ज़ेहन में भौतिकवाद का वह तसव्वुर न होता था जो सिद्धांत और कर्म के मेल से सामाजिक विकास का दर्शन माना जाता है, बल्कि वह इससे महज़ नास्तिकता और धर्महीनता का दर्शन मुराद लेते थे जो इंसान के विकास को नकारता है।

    उन्होंने अठारहवीं सदी के भौतिकवाद और उन्नीसवीं सदी के उस भौतिकवाद में जो साइंस की पैदा की हुई थी, कोई फ़र्क़ न किया। इक़बाल के दिल में मध्यम वर्ग का एक ऐसा पक्षपात था जिसे वह असाधारण इंसान-दोस्ती के बावजूद दबा न सके और यह चीज़ उनके यहाँ सिद्धांत और कर्म के अलगाव की शक्ल में बार-बार सामने आती है।

    इस तरह का विवादित दर्शन रखने के बावजूद इक़बाल एक बड़े विचारक और शायर हैं और जब उनके बारे में यह सब कुछ कहा जा चुका है, वह एक अज़ीम-ओ-शान (महान) शख़्सियत की हैसियत से उभरते हैं जो अपनी नस्ल के दिमाग़ को अपने जोश की शिद्दत, अपने इंसान-दोस्ती के नज़रिए और इंसान के शानदार मुस्तक़बिल की उम्मीद से गतिशील करती है। अगर उनके दर्शन की बारीकियों से अलग होकर दुनिया की प्रगतिशील ताक़तों के ख़ास रुझानों के बारे में उनके योगदान का जायज़ा लें तो यह मालूम होगा कि उनके विचार उन्हें हर ज़माने के बड़े शायरों के झुरमुट में जगह दिलाएँगे। 'जीवन के लिए कला' के बारे में इक़बाल के जो एतराज़ और ख़यालात हैं, उन्हें देखकर कोई उनको लफ़्ज़ों का बाज़ीगर नहीं कह सकता, हालाँकि उन्हें अल्फ़ाज़ पर असाधारण महारत हासिल थी।

    उनकी कलात्मक महानता उनके उस शायराना मिज़ाज से ज़ाहिर होती है जिसमें रिवायत (परंपरा) और बग़ावत का संगम होता है। उन्होंने उर्दू-फ़ारसी के बेहतरीन शायरों से बेहतरीन विरासत पाई थी और इसमें अपने इज़हार के नएपन और एहसास की ताज़गी से, अपनी कल्पना शक्ति और अपनी शख़्सियत के ज़ोर से रंगारंगी और विस्तार पैदा करते थे। इक़बाल का अमल (कर्म) का जज़्बा, इंसान की महानता पर उनका अक़ीदा और इंसान की बेपनाह ताक़त में यक़ीन, जिस्म और रूह की ग़ुलामी से उनकी नफ़रत और उनका आशावादी नज़रिया—यह सब मिलकर मौजूदा ज़िंदगी के लिए कर्मठता का निशान और एक बड़ी ताक़त बन जाते हैं।

    इक़बाल सिर्फ़ मुसलमानों की बेदारी और हक़-ए-ख़ुद-इरादियत (आत्मनिर्णय के अधिकार) की बुनियाद पर उनकी आज़ादी के विचारक और फ़लसफ़ी की हैसियत से ही नहीं सराहे जाएँगे, बल्कि एक ऐसे अव्वल दर्जे के शायर की हैसियत से भी ज़िंदा रहेंगे जो ग़ैर-मामूली हुस्न और ताक़त से भरे हुए गीत गाता था और जिसकी शायरी सहर-ए-हलाल (जायज़ जादू) थी।

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