इंसान और आदमी
इस लेख के बारे में एक अहम बात यह है कि इस पर कई हफ़्ते लगे हैं। यह वक़्त मैंने लिखने में नहीं लगाया, सोचने में भी नहीं। अगर मुझमें किसी वैचारिक विषय पर इतनी देर लगातार सोचने की सलाहियत होती, तो भी यह बात संदिग्ध रहती कि इस क़िस्म की सलाहियत किसी कहानीकार के लिए मुनासिब भी है या नहीं। लेखन-कला और सोच-विचार बड़ी रौब डालने वाली चीज़ें हैं। मगर मैं ऐसा दावा करूँ भी तो मेरा लेख इसे झुठला देगा। मैं तो बस काग़ज़ सामने रखे और क़लम हाथ में लिए ऊँघता रहा हूँ। मगर हफ़्तों मेरे पन्ने ने दाग़दार होना मंज़ूर नहीं किया। इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि विषय मेरी पहुँच से बाहर था। मगर मेरे एहसास मेरी पहुँच से बाहर नहीं थे।
यह तो हो सकता है कि मेरी कम जानकारी, ग़लत नज़रिए, आत्ममुग्धता और मानसिक घमंड की वजह से मेरे एहसास शुरू से ही ग़लत रास्तों पर भटक गए हों, मगर ये एहसास जैसे भी हों, मैं इनसे साफ़ तौर पर वाक़िफ़ था। मुझे मालूम था कि मैं 'इंसान' और 'आदमी', इन दो मामूली और आम इस्तेमाल के मुताबिक़ क़रीब-क़रीब समानार्थी शब्दों में एक ख़ास फ़र्क़ महसूस करता हूँ। मुझे इनमें से एक शब्द और उससे जुड़ी चीज़ें और संदर्भ पसंद हैं, और दूसरे के नापसंद। जब एहसास इतने साफ़ हों तो कम से कम आम हालात में तो क़लम बड़ी तेज़ी से चलना चाहिए।
शायद मेरा क़लम इस वजह से रुक रहा था कि मैं जिन एहसासों का इज़हार करना चाहता हूँ, वे फ़ैशन के ख़िलाफ़ हैं और फ़ैशन के ख़िलाफ़ कोई हरकत करते हुए आदमी ज़रूर हिचकिचाता है, ख़ास तौर पर विचारों के मामले में। शायद मुझे फ़िक्र यह थी कि अगर मेरे एहसास फ़ैशन के ख़िलाफ़ हैं तो कम से कम मैं उन्हें विचारों का दर्ज़ा तो दे ही दूँ और उन्हें अकादमिक तर्क की शक्ल में पेश करूँ ताकि इस भटकाव का थोड़ा-बहुत औचित्य तो पैदा हो जाए। इस तरीक़े की ख़ूबियाँ तो बहुत-सी हैं, मगर इसे अपनाना मेरे लिए मुमकिन नहीं। न तो मैं इन दोनों शब्दों के बुनियादी शाब्दिक अर्थों पर बहस कर सकता हूँ, न मुझे नैतिकता, धर्म और तत्वमीमांसा (मेटाफ़िज़िक्स) के इतिहास या इन विषयों से ताल्लुक़ रखने वाली अवधारणाओं के क्रमिक विकास का सही इल्म है। ले-देकर मुझे कुछ आता है तो साहित्य के बारे में। इस क्षेत्र में भी क्लासिकी दौर से मेरी वाक़फ़ियत ऐसी नहीं कि मैं अपनी राय पर भरोसा कर सकूँ या किसी और की राय पढ़ूँ तो उसके ग़लत या सही होने के बारे में कोई ठोस फ़ैसला कर सकूँ। थोड़ी-सी सुनी-सुनाई बातें मैं उर्दू साहित्य के बारे में जानता हूँ। पाँच-छह शायरों और लेखकों की रचनाओं से मैं सीधे तौर पर वाक़िफ़ हूँ।
इसके बाद मेरा परिचय कुल मिलाकर इंग्लैंड और फ़्रांस, इन दो मुल्कों के साहित्य तक सीमित है। यहाँ भी मैं तुलनात्मक रूप से पिछले डेढ़ सौ साल के साहित्य से ज़्यादा परिचित हूँ। मुझे सबसे ज़्यादा गहरा तजुर्बा इसी दौर के साहित्य का है, हालाँकि जिस तरह साहित्य मेरे तजुर्बे में आया है, उसके लिए शब्द 'गहरा' ज़रा अतिशयोक्तिपूर्ण है। मैं इस साहित्य से वाक़फ़ियत बढ़ाने की अपनी-सी कोशिशें करता रहा हूँ, कभी गर्म-जोशी के साथ, कभी बे-दिली के साथ, कभी महज़ ख़ाना-पूरी के लिए। बहरहाल, मुझे ख़याल यह रहा है कि इस साहित्य को किसी दूसरे के एहसासों या विचारों की दख़लंदाज़ी के बग़ैर सीधे तौर पर महसूस करूँ। इस कोशिश में मुझे एक बुरी आदत यह पड़ गई है कि मैं अपने साहित्यिक तजुर्बों को अपने अन्य प्रकार के तजुर्बों से ज़्यादा शुद्ध और मूल्यवान समझने लगा हूँ और ज़िंदगी के बारे में जो कुछ सोचता या महसूस करता हूँ, उसमें इन साहित्यिक तजुर्बों का हाथ ज़रूर होता है। चूँकि मेरे ये तजुर्बे इंसानी रिश्तों से भी ज़्यादा या कम से कम उनके बराबर ठोस हैं, इसलिए ये साहित्यिक तजुर्बे मुझे एक छठी इंद्री का काम देते हैं या यूँ कहिए कि एक अतिरिक्त मूल प्रवृत्ति (इन्स्टिंक्ट) बनकर रह गए हैं। अगर मैं कह दूँ कि मेरे साहित्यिक तजुर्बे मेरी इच्छाशक्ति हैं तो यह अतिशयोक्ति तो ज़रूर होगी मगर सिर्फ़ इस क़िस्म की जिसके बग़ैर कोई गहरी हक़ीक़त बयान नहीं की जा सकती।
इन्हीं तजुर्बों की मदद से मुझे पता चला कि इंसान और आदमी में बहुत बड़ा फ़र्क़ है। इसी के ज़रिए मुझे यह भी अंदाज़ा हुआ है कि अगर लोगों ने जल्दी ही यह फ़र्क़ साफ़ तौर से न समझा तो इंसानी सभ्यता का भविष्य सदियों के लिए धुंधला है। ये मेरे एहसास हैं, अकादमिक तर्क नहीं हैं, और न मैं इन्हें यह शक्ल दे सकता हूँ, लिहाज़ा अगर मेरे लेख में जगह-जगह तर्क की जगह दावा, संतुलन की जगह पूर्वाग्रह, बल्कि ज़िद और हठधर्मी नज़र आए तो मुझे क्षमा योग्य समझिए। ये सब स्पष्ट एहसासों की निशानियाँ हैं। मेरे साहित्यिक तजुर्बे ऐसी चीज़ें हैं जो एक दफ़ा होकर हो चुके। अतीत को, इच्छाशक्ति को (ये दोनों शब्द कुछ हालात में समानार्थी होते हैं) बदलना मेरे बस की बात नहीं।
अपने एहसासों को मैं अकादमिक तर्क तो नहीं बना सका, मगर एक आम आदमी की तरह मुझे यह लेख लिखने में जो हिचकिचाहट होती रही है, उसकी माँग है कि और नहीं तो कम से कम एक और आदमी के एहसासों ही को अपना गवाह बना लूँ। इस काम के लिए मुझे स्पेन के दार्शनिक और शायर उनामुनो (Unamuno) से बेहतर कौन आदमी मिलेगा जिन्हें अपनी प्रोफ़ेसरी का भी लिहाज़ न आया और बड़ी ढिठाई से क़ुबूल लिया कि मुझे मरने से डर लगता है। ज़िंदगी के बारे में उन्होंने जो कुछ सोचा-समझा था, जब वे उसे एक दर्शन की शक्ल में संकलित करने बैठे तो उन्हें सबसे पहले एक अध्याय बिल्कुल फ़ालतू लिखना पड़ा। महज़ यह बताने के लिए कि जो दर्शन इंसान के बारे में हो, वह आदमी के काम नहीं आ सकता। इन दोनों के फ़र्क़ का उन्हें ऐसा गहरा एहसास है कि इस अध्याय में भी पहली बात यही कही है कि मेरे नज़दीक इंसान और इंसानियत बड़ी संदिग्ध चीज़ें हैं।
एक अर्ध-सभ्य देश की पिछड़ी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर की गवाही कुछ ज़्यादा भरोसेमंद तो नहीं होनी चाहिए, मगर एक ऐसा आदमी जो कम से कम पुराने ज्ञान से अच्छी तरह वाक़िफ़ हो और एक विशिष्ट रूह भी रखता हो, इतने सम्मान का तो हक़दार है ही कि अगर वह किसी नई चीज़ के बारे में शक ज़ाहिर करे तो हम यह तो देख लें कि आख़िर उसे यह ज़रूरत क्यों पेश आई।
यह गवाही पेश करने के बाद अब मैं थोड़े इत्मीनान के साथ बता सकता हूँ कि मेरे ज़ेहन में इन दोनों शब्दों का मतलब क्या है। आदमी तो वह है जिसकी भौतिक ज़रूरतें भी हैं और ग़ैर-भौतिक भी। जो खाता है, पीता है, सोता है, जागता है, यौन इच्छा महसूस करता है। जिसके कुछ ग़ैर-भौतिक मूल्य इन भौतिक ज़रूरतों के अधीन हैं और भौतिक ज़रूरतें कुछ भौतिक मूल्यों की पाबंदी क़ुबूल करने पर मजबूर हैं, जो बाहरी माहौल को प्रभावित भी करता है और उससे प्रभावित भी होता है और जिसने साथ ही साथ अपने मूल्यों, अपने पिछले तजुर्बों, अपनी बुद्धि और कल्पना के ज़रिए अपने आस-पास एक अदृश्य माहौल भी पैदा कर लिया है, जो उसके लिए उतनी ही अहमियत रखता है जितना जानवरों के लिए प्राकृतिक माहौल।
इन बातों के अलावा आदमी वह है जो नफ़रत और मुहब्बत, रहमदिली और बेरहमी सब की क्षमता रखता है, जो उच्च और निम्न दोनों क़िस्म के जज़्बात महसूस कर सकता है। उनामुनो के नज़दीक आदमी की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह मर जाता है। मेरे नज़दीक ज़िंदगी में उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह एक ही समय में बिल्कुल विपरीत और विरोधाभासी रुझानों की युद्धभूमि बना रहता है। उसके कामों और कर्मों के बारे में यक़ीनी तौर पर कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। क्योंकि हम यह पता नहीं लगा सकते कि उसके अंदर किस वक़्त कौन-कौन से विपरीत जज़्बे काम कर रहे हैं। आदमी वह है जो इतिहास की शुरुआत से लेकर आज तक एक मसला बना रहा है और जब तक वह बदल कर कुछ और न बन जाए हमेशा मसला बना रहेगा।
आदमी को समझने की कोशिश दो क़िस्म के लोग करते हैं। एक तो हुक्मरान (शासक) और दूसरे फ़नकार (कलाकार)। ये दोनों समझने के अलग-अलग तरीक़े इस्तेमाल करते हैं। इन दो क़िस्मों के अलावा एक तीसरी क़िस्म पैग़ंबरों की भी है... पैग़ंबरों में हुक्मरान की नज़र भी होती है और फ़नकार की भी। उनके अंदर न तो हुक्मरानों जैसा उपयोगितावादी यक़ीन होता है, न फ़नकारों जैसा यथार्थवादी संदेह, उनका व्यक्तित्व इन दोनों से कहीं ज़्यादा संतुलित होता है। मगर इस लेख में हम पैग़ंबरों के बारे में ग़ौर नहीं करेंगे। इंसानियत के पूरे इतिहास में गिने-चुने पैग़ंबर हुए हैं और यहाँ हम आम आदमियों के दृष्टिकोण से सोच रहे हैं। फिर पैग़ंबरों के व्यक्तित्व को समझने के लिए असाधारण सूझबूझ ज़रूरी है जिसका मैं दावा नहीं कर सकता। इसलिए हम सिर्फ़ पहले दोनों समूहों की विशेषताएँ जानने की कोशिश करेंगे।
हुक्मरानों से मेरा मतलब सिर्फ़ बादशाह या तानाशाह नहीं हैं बल्कि लोकतांत्रिक नेता, समाज सुधारक, सामूहिक जीवन के बारे में सोचने वाले दार्शनिक, इन सबको मैंने हुक्मरानों में शामिल किया है। यानी वे तमाम लोग जो चाहते हैं कि आदमी एक ख़ास तरीक़े से ज़िंदगी बिताएं। जब ये लोग आदमियों को समझना चाहते हैं तो उनके सामने एक ख़ास मक़सद होता है। उनकी खोज एक विशेष और स्पष्ट उपयोगिता पर आधारित होती है। इसके विपरीत फ़नकार जब आदमियों को समझने की कोशिश करता है तो उसका कोई स्पष्ट मक़सद नहीं होता। हुक्मरान आदमियों को कच्चा माल समझते हैं। फ़नकार के लिए आदमी बनी-बनाई और मुकम्मल चीज़ होते हैं। हुक्मरान आदमी के व्यक्तित्व में से कुछ चीज़ों का चुनाव कर सकता है और अपने उपयोगितावादी मक़सद के मद्देनज़र कुछ चीज़ों को रद्द कर सकता है। फ़नकार के लिए इस क़िस्म के चुनाव की कोई गुंजाइश नहीं। फ़नकार को आँखें बंद करने की इजाज़त नहीं।
यहाँ एक छोटी सी चेतावनी ज़रूरी मालूम होती है। हुक्मरान और फ़नकार की क्षमताएं ऐसी चीज़ें नहीं जिनका आपस में कोई वास्ता न हो और जो हमेशा एक-दूसरे से अलग रहती हों। हुक्मरान के व्यक्तित्व में थोड़ा-बहुत अंश फ़नकार का भी हो सकता है और इसी तरह फ़नकार में हुक्मरान का। अभी मैं कह चुका हूँ कि जब फ़नकार आदमियों की तरफ़ ध्यान देता है तो उसका कोई ऐसा उपयोगितावादी मक़सद नहीं होता जिससे तुरंत नतीजों की उम्मीद हो, इसलिए उसकी रचना में आदमी हमेशा आदमी रहता है। यह फ़नकार की मजबूरी है। आदमी और हुक्मरान के बीच मक़सद आड़े आ जाता है, इसलिए हुक्मरान को इंसान गढ़ना पड़ता है। यह हुक्मरान की ज़रूरत है। इंसान हाड़-मांस के जीते-जागते आदमी का नाम नहीं है। यह सिर्फ़ आदमी का साया है, एक निरपेक्ष और अमूर्त अवधारणा है जो अलग-अलग हुक्मरानों के साथ बदलती जाती है और जिसकी विशेषताएं हुक्मरानों की ज़रूरतें तय करती हैं। इंसान, हुक्मरानों की उस लालसा भरी ख़्वाहिश का नाम है कि अगर आदमी इस क़िस्म का होता तो हमें उसे व्यवस्थित और संगठित करने में बड़ी आसानी रहती।
उनामुनो ने कई क़िस्म के इंसान गिनवाए हैं, मसलन अरस्तू का बिना पंखों वाला दोपाया, मैनचेस्टर स्कूल का आर्थिक इंसान, लिनियस का अक़्ल रखने वाला इंसान, रूसो का सामाजिक समझौते वाला इंसान।
इन अलग-अलग अवधारणाओं में अलग-अलग क़िस्म की ख़ामियाँ होंगी, मगर मुझे तो इस वक़्त रूसो के इंसान से बहस है जो आज के दौर का प्रचलित सिक्का है। इंसान की यह अवधारणा इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि जो लोग रूसो का मज़ाक़ उड़ाते हैं, उनके यहाँ भी यह अवधारणा किसी न किसी शक्ल में प्रकट हो ही जाती है। रूसो के इंसान का ख़ाका पेश करने से पहले ज़रा सा स्पष्टीकरण ज़रूरी है। मिडलटन मरी साहब ने एक जगह बड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की है कि लोग रूसो को बेवजह बदनाम करते हैं। उसकी कुछ तहरीरों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ करके दूसरी क़िस्म के उद्धरण पेश करते हैं जिनसे उसकी शिक्षाएं विकृत हो जाती हैं। मैं मिडलटन मरी साहब के दावों को झुठलाना नहीं चाहता मगर इसके बावजूद रूसो को बदनाम करना चाहता हूँ। मुमकिन है रूसो ने अपने नज़रियों में ख़ुद सुधार कर लिया हो और कुल मिलाकर उसके विचारों में संतुलन और ठहराव पैदा हो गया हो। मगर रूसो की असल और शुद्ध शिक्षाओं से हमें इतना मतलब नहीं है जितना इस बात से कि उसके नज़रिए किस शक्ल में प्रचलित और लोकप्रिय हुए।
हमारे लिए असल रूसो इतना अहम नहीं है जितना वह रूसो जो कुछ रुझानों का प्रतीक बन गया है और जिसने एक अफ़सानवी शक्ल अख़्तियार कर ली है। कई बार ऐतिहासिक सच्चाइयां इंसानी मामलों पर इतना असर नहीं डालतीं जितना ऐतिहासिक अफ़साने। इसलिए हमें इस वक़्त इंसान की उस अवधारणा से बहस है जो विकृत रूप में ही सही मगर बहरहाल रूसो से ली गई है और जिसे उन्नीसवीं सदी के पश्चिमी साहित्य ने इतने ज़ोर-शोर से फैलाया है कि वह हमारे ज़माने का एक बुनियादी और लोगों की भावनात्मक ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा बन गई है।
यह इंसान एक पवित्र, दोषरहित और मासूम हस्ती है जिसकी मानसिक और भावनात्मक क्षमताएं असीमित हैं, जो असल में तो भलाई की मूरत है लेकिन कभी बिगड़ता है तो माहौल और बाहरी हालात के असर से। ब्रह्मांड में उससे ऊपर कोई ताक़त नहीं है और वह पैदा ही इसलिए हुआ है कि हर क़िस्म की रुकावटों पर क़ाबू पाता चला जाए और अपनी जीतों का दायरा बढ़ाता रहे। उसके इरादों पर, उसकी इच्छाओं पर कोई पाबंदियां नहीं हैं, सिवाय उन पाबंदियों के जो वह ख़ुद अपने ऊपर लगाना चाहे (रूसी साम्यवाद यह हक़ व्यक्ति को नहीं देता, बल्कि व्यक्तियों के समूह यानी जनता को देता है। जनता सर्वोच्च सत्ता की मालिक है। उनकी इच्छाशक्ति किसी बाहरी ताक़त की पाबंद नहीं, सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी के अधीन है)। फिर इन विशेषताओं से युक्त यह इंसान विकासशील है, अपनी अंदरूनी ज़िंदगी को व्यवस्थित किए बिना वह तरक़्क़ी करता जा रहा है। इस तरक़्क़ी में जो बाहरी चीज़ें बाधक हैं, जब वे दूर हो जाएंगी तो इंसान मुकम्मल हो जाएगा।
इंसान की यह अवधारणा हमारे ज़माने की व्यावहारिक राजनीति में न सही तो ज़्यादातर राजनीतिक सिद्धांतों में कमोबेश ज़रूर मिलती है और कुछ साहित्यिक हलकों में भी जिन्होंने राजनीतिक नारों के धोखे में आकर पिछले डेढ़ सौ साल के साहित्यिक इतिहास से कुछ नहीं सीखा। हमारे ज़माने के राजनीतिक सिद्धांतकार ही नहीं बल्कि बहुत से साहित्यकार भी यही मानते हैं कि अगर इस क़िस्म का इंसान मौजूद नहीं है तो बाहरी माहौल को दुरुस्त करने के बाद कम से कम पैदा ज़रूर किया जा सकता है। इस उम्मीद का नाम नया इंसान है। इंसान की इस अवधारणा के आकर्षण का यह आलम है कि जिन लोगों की पूरी ज़िंदगी ही साहित्य थी, वे तक साम्यवादी रूस के वजूद में आने के बाद यह समझते थे कि अब नया इंसान ज़रूर पैदा होगा।
इसलिए 36 ई. में जब पहली प्रगतिशील कॉन्फ्रेंस हुई तो आंद्रे मालरो ने रूसी प्रतिनिधियों से सबसे पहले यही सवाल किया कि रूस में नया इंसान पैदा हो चुका है, हम उसका चेहरा देखने को बेचैन हैं, हमें नए इंसान की तस्वीर दिखाइए। जब नए इंसान ने बार-बार मांगने के बावजूद अपना फोटो न भेजा तो आंद्रे ज़ीद जैसे श्रद्धालु साहित्यकार उसके दर्शन के लिए चल खड़े हुए। मगर रूस पहुंचकर पता चला कि माहौल के बदलाव के बावजूद इंसान वैसा का वैसा ही है जैसा हमेशा था। अलबत्ता कुछ आत्ममुग्ध हो गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि बड़े साहित्यकारों में रूस के जितने प्रशंसक थे, वे एक-एक करके कम होने लगे। सबसे पहले आंद्रे ज़ीद विमुख हुए, फिर आंद्रे मालरो, फिर कोस्टलर, फिर सिलोने, ग़रज़ कि सब दग़ा दे गए।
जो सबक़ इन लोगों ने बाहरी दुनिया से निराश होने के बाद सीखा, वह साहित्य से भी हासिल हो सकता था। जिन शायरों ने 'प्राकृतिक इंसान' की अवधारणा के प्रसार में हिस्सा लिया है, ख़ुद उन्हीं की शायरी बताती है कि यह अवधारणा कैसी खोखली है। प्राकृतिक इंसान की सबसे पहली ख़्वाहिश यह होती है कि मेरी ख़ुशी अमर और असीमित हो, मगर इन शायरों को छह-छह महीने के अंदर ही पता चल गया कि यह ख़्वाहिश कितनी बेमानी है और आदमी के आनंददायक लम्हे कितने संक्षिप्त और अस्थायी होते हैं। प्राकृतिक इंसान को एक और लगन यह होती है कि मैं पूरी कायनात पर छा जाऊं। तो इस ख़ुशफ़हमी का दूर होना भी कोई मुश्किल बात नहीं, ज़िंदगी की छोटी-छोटी महरूमियां (अभाव) आदमी का मिज़ाज दुरुस्त कर देती हैं। वे क़ौमें जो कायनात पर असीमित विजय के इरादे लेकर उठती हैं और इस यक़ीन के साथ कि सारी कायनात में इंसान से ऊपर या उसके मुक़ाबले की कोई ताक़त है ही नहीं, तो ख़ैर उन्हें भी दस-पांच साल सुहाने ख़्वाबों के मज़े ले लेने दीजिए। यह वक़्फ़ा क़ौमों के लिए महीने भर के बराबर होता है। सौ-पचास साल गुज़रेंगे तो अपने आप हक़ीक़त खुल जाएगी।
इसी तरह इंसान के हर क़िस्म की पाबंदियों से आज़ाद होने का सवाल है। इंसान के अमल पर एक छोटी-सी पाबंदी तो यही है कि उसकी जिस्मानी ताक़त बहुत सीमित है और इस ताक़त से भी वह जी भर के काम नहीं ले सकता। एक ख़ास उम्र को पहुंचने के बाद कमज़ोर होना शुरू हो जाता है और आख़िरकार मर जाता है। और कुछ नहीं तो कम से कम यही चीज़ इंसान के अमल और कल्पना दोनों पर पाबंदी लगा देती है। अगर इंसान अपनी कल्पना को आज़ाद छोड़ देगा तो उसका लाज़िमी नतीजा असाधारण मायूसी और कड़वाहट होगा। रूमानी साहित्य से हमें सबसे बड़ा सबक़ यही मिलता है। रूमानी शायर बड़ी-बड़ी ज़बरदस्त उम्मीदें लेकर चले थे और ये उम्मीदें एक-एक करके झूठी साबित होती चली गईं। नतीजा यह हुआ कि उनके लिए काव्यात्मकता और दुख बिल्कुल समानार्थी अवधारणाएं बन गए। चले तो थे इंसानी ज़िंदगी के हुस्न और ताक़त के राग गाने, मगर तान टूटी मौत की आरज़ू पर। इस हार की असल वजह यही है कि इन लोगों ने इंसान और आदमी को एक ही बात समझा था और एक अमूर्त अवधारणा की ख़ातिर ठोस अनुभवों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया था।
इंसान की इस अवधारणा का साहित्य पर सबसे पहला असर यही हुआ कि शायरी रोना-झींकना बन गई। ख़ैर यहां तक भी ग़नीमत था, रूसो के इंसान ने तो और बड़े-बड़े गुल खिलाए हैं। जब शायरों को यह पता चल गया कि इंसान की असीमित ख़्वाहिशें और क्षमताएं सिर्फ़ कल्पना ही में काम आ सकती हैं, हक़ीक़ी ज़िंदगी में नहीं, तो उन्होंने सोचा कि ज़िंदगी को कल्पना तक ही क्यों न सीमित कर लिया जाए। इसलिए विलियर्स लिसलेडम (Villiers Lisleadam) के ड्रामे 'एक्सल' (Axel) में हीरोइन यह प्रस्ताव पेश करती है कि हमें इतना ज़बरदस्त ख़ज़ाना मिल गया है, आओ चलो, हिंदुस्तान चलें, वहां किसी नए मज़हब की बुनियाद डालेंगे। चीन चलें, वहां हीरे-जवाहरात की नलियों में अफ़ीम पिया करेंगे। ग़रज़ वह दुनिया के तमाम मुल्कों और वहां हासिल होने वाले आनंद के नाम गिना जाती है। एक्सल जवाब देता है कि हमारे ख़्वाब इतने हसीन हैं तो उन्हें हक़ीक़त बनाने की कोशिश क्यों करें? इस वक़्त हमें एक-दूसरे के साथ बातें करके जो सुख हासिल हुआ है, वह कल तक फ़ना हो जाएगा और इसके मुक़ाबले में असली ज़िंदगी बिल्कुल फीकी मालूम होगी। इसलिए अब जीने से फ़ायदा? इतना काम तो हमारे नौकर भी कर लेंगे। इसलिए ये दोनों अत्यधिक दूरदर्शिता बरतते हुए ज़हर खा लेते हैं।
असीमित ख़ुशियों पर इंसान का हक़ और उसके अंदर इसकी क्षमता स्वीकार कर लेने का आख़िरी नतीजा यह हुआ कि असली ज़िंदगी ही ठप होकर रह गई है। इसीलिए उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी उपन्यासों में ख़ुदकुशी और मौत की इतनी भरमार है।
फिर यह अक़ीदा आदमी को ख़ुदग़रज़ और संगदिल भी बनाता है। चूंकि असीमित ख़ुशी सिर्फ़ कल्पना की मदद से और सिर्फ़ कल्पना में हासिल हो सकती है। इसलिए आदमी को दूसरे आदमियों की ज़रूरत सिर्फ़ इतनी देर के लिए पड़ती है कि उसकी कल्पना हरकत में आ जाए। इसके बाद वह दूसरों से बिल्कुल बेपरवाह हो जाता है। फिर उसे दूसरों की ख़्वाहिशों और जज़्बातों का एहसास तक नहीं रहता। अपने काल्पनिक आनंद से उसे इतनी फ़ुर्सत नहीं मिलती। इस रस्म के मुताबिक़ आदमी अपनी महबूबा तक से कितनी बेरहमी बरतने पर मजबूर हो जाता है। इसका अंदाज़ा करना हो तो बेंजामिन कॉन्स्टेंट (Benjamin Constant) का उपन्यास 'एडोल्फ' (Adalphe) पढ़िए। वैसे यही विषय संक्षेप में लोनियो बुइले (Lonio Bouilhet) ने अपनी एक नज़्म में बयान कर दिया है। वह अपनी महबूबा से कहता है,
तेरी शक्ल में, मैं जिस चीज़ से मुहब्बत कर रहा था वह ख़ुद मेरी मस्ती थी। तू चली भी जाए तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ता, हमने अत्यधिक ख़ुशियों के दिन ज़रूर एक साथ गुज़ारे हैं। मगर तू तो एक मामूली साज़ थी। जिस मिज़राब (तार छेड़ने का छल्ला) से नग़्मे पैदा होते हैं, वह मैं था। अब तेरा जहां जी चाहे जा, मैंने अपना प्याला पी लिया तो दावत भी ख़त्म हो गई। अगर अभी थोड़ी-सी शराब बाक़ी है तो उसे नौकर पी लेंगे।
चूंकि रूसो का इंसान मासूम और पवित्र आत्मा भी है। इसलिए इस संगदिली के बावजूद उसे शक तक नहीं होता कि मैं बेरहमी से काम ले रहा हूं। मीर ने मुहब्बत की थी तो उन्होंने आम आदमियों की ज़िंदगी और उनकी मजबूरियों को भुलाया नहीं था,
जिगर-कावी, नाकामी, दुनिया है आख़िर
नहीं आए गर, मीर, कुछ काम होगा
अगर मीर तू यूं ही रोता रहेगा
तो हमसाया काहे को सोता रहेगा
इस क़िस्म के एहसासों से वे शायर अनजान हैं जिनकी शायरी का केंद्र रूसो का इंसान है।
इस अक़ीदे से जितनी बीमारियां पैदा होती हैं, उनमें सबसे बड़ी बीमारी उकताहट है। इंसान की जज़्बाती क्षमताएं असीमित ही सही, मगर हक़ीक़ी ज़िंदगी उन्हें काम में लाने का पूरा मौक़ा नहीं देती। काल्पनिक ज़िंदगी और असली ज़िंदगी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। मगर जिन लोगों को यह सिखाया गया है कि तुम कायनात की सबसे बड़ी ताक़त हो, तुम हर क़िस्म की पाबंदियों से परे हो, और ज़िंदगी से अपनी उम्मीदें पूरी करने की मांग कर सकते हो। उनके लिए दो ही बातें रह जाती हैं। या तो असली ज़िंदगी को आज़माएं ही नहीं और एक्सल की तरह ख़ुदकुशी कर लें, या सारी ज़िंदगी बेज़ारी और उकताहट में गुज़ारें, मगर आदमी स्वभाव से ज़्यादा देर उकताहट बर्दाश्त नहीं कर सकता। वह उकताहट से छुटकारा पाने के लिए नई-नई दिलचस्पियां ईजाद करनी शुरू कर देता है।
HUYSMANS के एक नॉवेल का हीरो अपने पास से पैसे खर्च करके एक गरीब नौजवान को तवायफ़ों की लत लगाता है। जब उस नौजवान की आदत पक्की हो जाती है तो वह पैसे देना बंद कर देता है। यहाँ तक कि नौजवान चोरी और क़त्ल तक करने पर मजबूर हो जाता है। इससे हीरो को बड़ी तसल्ली होती है कि मेरा तजुर्बा कामयाब रहा। गेटे के एक किरदार का ख़्वाब यह है कि मैं किसी पूर्वी देश का सुल्तान बन जाऊँ। नरम-नरम गद्दों पर बिल्कुल बेसुध पड़ा हुक़्क़ा पिया करूँ और पैर किसी कनीज़ के नंगे सीने पर रखे हों। उकताहट जितने भी खेल खेल सकती है, वे सब बोदलेयर ने थोड़े से लफ़्ज़ों में बयान कर दिए हैं।
लेकिन गीदड़ों, भेड़ों, जुओं
बंदरों, बिच्छुओं, गिद्धों, साँपों... भौंकते, गुर्राते,
दहाड़ते राक्षसों के दरमियान
हमारे बुरे कामों के शर्मनाक चिड़ियाघर हैं
एक राक्षस सबसे घिनौना, भद्दा और दुष्ट है!
यूँ तो वह न उछलता-कूदता है न चिंघाड़ता है
मगर उसका बस चले तो सारी ज़मीन को खंडहर बनाकर रख दे,
और एक जम्हाई में दुनिया को निगल जाए
उस राक्षस का नाम बेमज़गी है...! आँसू अपने आप उसकी आँखों में ढलक आए हैं।
वह बैठा हुक़्क़ा पी रहा है और लोगों को सूली चढ़ाने के ख़्वाब देख रहा है।
बोदलेयर के नाम के साथ मसले का एक नया रुख़ हमारे सामने आता है। रूमानी तहरीक के शायरों मसलन De musset और Aevigny को पता चला कि इंसान के अंदर असीमित क्षमताएँ बताई जाती हैं मगर असल में ऐसा नहीं है। इसलिए इस एहसास के साथ वे बहुत भावुक हो गए, मगर वे रो-धोकर बैठ गए। इसके आगे कुछ नहीं किया। बोदलेयर ने इससे आगे बढ़कर पूछा कि आख़िर ऐसा क्यों है। उसके यहाँ इंसान ने चुपचाप हक़ीक़त से हार नहीं मान ली, बल्कि पिट-पिट कर हर दफ़ा उठता रहा। इंसान तो बोदलेयर को अपने से पहले के दार्शनिकों, साहित्यकारों और शायरों से विरासत में मिला था और आदमी ख़ुद उसके अंदर मौजूद था... और आदमी भी बड़ा जानदार और चौकन्ना।
इसलिए उसके अंदर इंसान और आदमी दोनों एक-दूसरे से भिड़ गए। बोदलेयर की शायरी इसी जंग की युद्ध-कथा है। इंसान को बाहरी माहौल से भी मदद मिल रही थी। जब आदमी उसे चित कर लेता था तो माहौल इंजेक्शन देकर इंसान को फिर उठा बिठाता था। बोदलेयर के अंदर रूसो का प्राकृतिक इंसान मर तो नहीं सका, मगर आदमी ने अपनी ताक़त ज़रूर दिखा दी। बीसवीं सदी की सभ्यता के लिए बोदलेयर की शायरी, एपस्टाइन के अनुसार, बाइबल की हैसियत रखती है तो इसीलिए कि उसकी शायरी ने सबसे ज़्यादा शिद्दत के साथ हमें बताया कि मौजूदा पश्चिमी सभ्यता का ख़ुदा 'प्राकृतिक इंसान' दरअसल झूठा ख़ुदा है।
गद्य में यही काम फ़्लोबेयर ने किया है। उसका व्यक्तित्व भी इंसान और आदमी की युद्धभूमि था। इंसान किस तरह हार खाता है, इसके क्रमिक चरण उसने 'मादाम बोवारी' में दिखाए हैं। इस कशमकश का ज़्यादा स्पष्ट बयान फ़्लोबेयर के ख़तों में मिलता है। जिन मान्यताओं की बुनियाद पर उसका व्यक्तित्व बना था, उनकी माँग थी कि वह अपनी हर आरज़ू और हर जज़्बे को असीमित बनाने की कोशिश करे, मगर उसे अपने चारों तरफ़ दीवारें खड़ी नज़र आती थीं, इसी घुटन के एहसास से वह तकलीफ़ के मारे चीख़-चीख़ उठता था। एक तरह देखिए तो फ़्लोबेयर को अंदाज़ा हो गया था कि जिस सभ्यता में प्राकृतिक इंसान की पूजा हो, वहाँ महान हस्तियाँ पैदा ही नहीं हो सकतीं। वह इस तरह कि वह अपने ज़माने के मिज़ाज को ध्यान में रखकर महान कला की विशेषताएँ और शर्तें तय करता था और आख़िर में यह भी स्वीकार करने पर मजबूर हो जाता था कि सबसे बड़े कलाकार इन शर्तों की पाबंदी नहीं करते, बल्कि इन शर्तों से बेपरवाही बरतने की वजह से बड़े बने हैं।
जिस शिद्दत और दीवानगी भरी तल्लीनता के साथ प्राकृतिक इंसान अपना सारा ध्यान किसी ख़ास तरह की ख़ुशी पाने के लिए समर्पित कर देता है, उसी चरम सीमा तक फ़्लोबेयर ने अपने-आप को अपनी कला के लिए समर्पित कर दिया था और एक आम आदमी की ज़िंदगी की जितनी माँगें और ज़रूरतें होती हैं, वे सब इसी वेदी पर चढ़ा देता था। यहाँ तक कि जब उसकी महबूबा ने उसकी उपेक्षा की शिकायत की और उसे टोका कि शायद तुम्हारे दिल में मुझसे ज़्यादा अपनी कला की मुहब्बत है, तो फ़्लोबेयर ने बड़ी सफ़ाई से और उसके जज़्बात का ख़याल किए बग़ैर क़ुबूल कर लिया कि हाँ! तुम ठीक कहती हो।
आख़िरी उम्र में जाकर उसकी समझ में आने लगा था कि मेरा व्यक्तित्व और कला पूरी तरह फली-फूली नहीं तो इसकी यही वजह थी कि मेरे अंदर का जो आदमी था, मैं हमेशा उसका गला घोंटता रहा। अपने आख़िरी नॉवेल 'बोदार-ए-पकुशे' में, जो मेरे नज़दीक उसका सबसे महान नॉवेल है, फ़्लोबेयर ने इंसान की इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है कि वह अपनी योग्यताओं की हद से आगे बढ़ना चाहता है और ज़िंदगी के हर क्षेत्र में पूर्ण बनने की आरज़ू करता है और आख़िर में रहता है वही मोची का मोची, बल्कि अगर उसे अपनी अनुचित ख़्वाहिशों की सज़ा न मिले तो इसी को ग़नीमत समझिए।
ग़रज़, उन्नीसवीं सदी के आख़िर तक साहित्यकारों और शायरों ने अपने ठोस अनुभवों के ज़रिए साबित कर दिया था कि इंसान का यह विचार अपने आप में इंसानियत को बर्बाद कर देने के लिए काफ़ी है। इसके बाद साहित्य में एक नया दौर शुरू होता है। इस दौर में यह मान्यता ख़त्म तो नहीं हुई और साहित्यकारों के ख़त्म किए ख़त्म हो भी कैसे सकती थी जबकि इसका समर्थन दुनिया के सारे शासक कर रहे हों। जो साहित्यकार मेरे ज़ेहन में हैं, उनके अंदर इंसान और आदमी की कशमकश उसी तरह जारी है, मगर वे इंसान की हार दिखाकर चुप नहीं हो जाते बल्कि स्पष्ट रूप से आदमी की जीत साबित करते हैं। फ़्लोबेयर सारी उम्र मध्यम वर्ग के लोगों से नफ़रत करता रहा था। मगर आख़िर-आख़िर में जब वह छोटे-मोटे दुकानदारों को अपने पूरे ख़ानदान समेत सैर के लिए जाते हुए देखता तो बड़े अफ़सोस के साथ कहा करता था कि शायद यही लोग सही रास्ते पर हैं।
मार्सल प्रूस्त, जेम्स जॉयस और टॉमस मान ने, शायद का लफ़्ज़ हटा दिया है बल्कि जॉयस ने तो साफ़-साफ़ कहा है कि मेरे नॉवेलों के आख़िर में आम आदमी की जीत होगी। ये साहित्यकार आम ज़िंदगी की माँगों को और उसकी सीमाओं को क़ुबूल करते हैं, मजबूरन नहीं, बल्कि इसे जैविक ज़रूरत और आदमी की ज़िंदगी की ज़रूरी शर्त समझकर। इन लोगों का रवैया पूरी तरह से सकारात्मक है।
इन दो-चार साहित्यकारों ने तो ज़रूर आदमी को क़ुबूल कर लिया है, मगर हमारे ज़माने के ज़्यादातर साहित्यकारों और ख़ासकर शासकों के दिमाग़ पर अभी तक इंसान हावी है और इस विचार से सभ्यता और इंसानियत को जो ख़तरे पैदा हो सकते हैं, वे वैसे के वैसे ही मौजूद हैं। कुछ लोग यह ज़रूर दावा करते हैं कि रूस में एक नई सामूहिकता की बुनियाद रखी गई है, वहाँ इस क़िस्म का कोई ख़तरा नहीं है, वहाँ व्यक्ति समाज की मर्ज़ी का पाबंद है, उसे ख़ास क़िस्म के नैतिक सिद्धांतों पर अमल करना पड़ता है, मगर यह दलील सिर्फ़ पहली नज़र में ही सही है। रूस में व्यक्ति पर जो पाबंदियाँ लगाई गई हैं, वे सिर्फ़ बाहरी क़िस्म की हैं। वहाँ व्यक्ति के कामों और कर्मों की सीमा ज़रूर तय हो गई है, मगर उसकी आंतरिक ज़िंदगी पर कोई पाबंदी नहीं है। समाजवादी नैतिकता का दख़ल सिर्फ़ बाहरी कर्मों तक है, आंतरिक ज़िंदगी तक इसकी पहुँच सीधे तौर पर नहीं है।
कुत्ते की दुम को नली में बंद करके रूसी साम्यवाद संतुष्ट हो जाता है कि अब कुत्ते के दिल में अपनी दुम ऊपर उठाकर हिलाने की इच्छा कभी पैदा नहीं होगी। रहा आंतरिक मूल्यों का मामला, तो इंसान की जो धारणा अब तक व्यक्ति से जुड़ी रही थी, उसे जनता की तरफ़ मोड़ दिया गया है। इससे ज़्यादा और कुछ नहीं हुआ। दुनिया में जनता से बड़ी और कोई ताक़त नहीं है, जनता मासूम और साफ़ नीयत वाली है, जनता की इच्छाओं पर कोई पाबंदी नहीं है, जनता की ताक़तें असीमित हैं। इस नई नैतिकता के मानने वाले इस बात को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि इन धारणाओं की बदौलत व्यक्तियों को जिन कड़वे अनुभवों से गुज़रना पड़ा है, वही एक पूरी की पूरी क़ौम के सामने भी आ सकते हैं, क्योंकि जिस तरह एक व्यक्ति की क्षमताएँ असीमित नहीं होतीं, उसी तरह व्यक्तियों के एक समूह की क्षमताएँ भी असीमित नहीं होतीं।
जनता का व्यक्तित्व भी सीधा-सादा नहीं है। इसके अंदर भी विरोधी और विरोधाभासी रुझान मौजूद हैं। दुनिया की जो ताक़तें व्यक्ति के काम में बाधा डाल सकती हैं, वही जनता को भी परेशान कर सकती हैं। बहरहाल, ये बातें ऐसी नहीं हैं जो किसी ज़बरदस्त राष्ट्रीय हादसे से गुज़रे बिना समझ में आ जाएँ। अभी रूसी सभ्यता की उम्र ही क्या है। यह तो रूसी क़ौम को धीरे-धीरे ही पता चलेगा कि दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त होने के क्या मायने हैं।
मगर पूत के पैर पालने में दिखाई दे जाते हैं। चूँकि साहित्य हर विचार की संभावनाओं की तरफ़ सौ साल पहले ही इशारा कर देता है, इसलिए रूसी सभ्यता के बारे में हमें वहाँ के साहित्य से कई काम की बातें मालूम हो सकती हैं। जनता केवल एक अमूर्त और निरपेक्ष धारणा नहीं है, बल्कि इसके भौतिक संबंध भी होते हैं, इसलिए जनता का अर्थ व्यक्तियों का समूह ही हो सकता है। अब अगर जनता या व्यक्तियों के समूह की कुछ विशेषताएँ बताई जाती हैं, तो व्यक्ति का यह समझना बिल्कुल सही है कि ये सारी विशेषताएँ मुझमें न सही, मगर इनका थोड़ा-बहुत हिस्सा तो मुझे भी मिला होगा। चुनाँचे वे सारी धारणाएँ एक-एक करके वापस आने लगती हैं जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है, और उनके प्रभाव भी लाज़िमी तौर पर कमोबेश वही होंगे जो पूँजीवादी समाज में हुए थे।
रूस की नई सामूहिकता ने सिर्फ़ बाहरी हालात बदले हैं। सिर्फ़ एक नया आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक माहौल दिया है। आत्म-संस्कार की कोई नई आंतरिक व्यवस्था तैयार नहीं की है, बल्कि इंसान के बारे में इसका विश्वास कमोबेश वही है जो रूमानी जीवन-दर्शन का है, और जो ज़रा सी ढील मिलते ही आदमी को व्यक्तिवाद की तरफ़ ले जाता है और जब इस व्यक्तिवाद के लक्षण व्यक्ति में प्रकट होने लगते हैं, तो सामूहिकता फिर व्यक्ति को सज़ा देती है। कई अच्छे कलाकारों के साथ रूस में यही हो चुका है। आदमियों के आंतरिक जीवन को क़ाबू में रखने के लिए रूस की सामूहिकता के पास सिर्फ़ एक ही हथियार है— ज़ोर-ज़बरदस्ती और कड़ी निगरानी। आख़िर मानव इतिहास में सामूहिकता की और भी तो मिसालें हैं। कम से कम ऐसी सभ्यताएँ तो बहुत सी हो चुकी हैं जिनके लिए बीमार व्यक्तिवाद उतना ही घातक था जितना रूस के लिए, मगर उन्होंने ज़बरदस्ती का इस्तेमाल इतनी बहुतायत से क्यों नहीं किया?
बहुत ही खुली बग़ावत को तो ख़ैर कोई भी संगठित समाज स्वीकार नहीं कर सकता। मगर जहाँ तक साहित्य और कला में सामूहिक भावनाओं से थोड़े-बहुत भटकाव का संबंध है, उसे नापसंदगी की नज़र से तो ज़रूर देखा गया होगा, मगर यह कभी नहीं हुआ होगा कि सरकार तक घबरा उठे, उसे ग़द्दारी के बराबर समझे और फ़ौरन कुचल देने की कोशिश करे। यह बिल्कुल वही बात है कि कुम्हार पर बस न चला, गधे के कान ऐंठे। अगर रूसी सरकार ऐसा साहित्य चाहती है जो बीमार तत्वों से ख़ाली हो, जिसमें ऊर्जा और संतुलन हो, जो पूरी क़ौम के लिए हो, तो उसे सबसे पहले आंतरिक जीवन के ऊर्जावान और संतुलित मूल्य तय करने चाहिए। सरकार की इच्छाओं से भटकने वालों को पकड़ने-धकड़ने से नया इंसान पैदा होने की ज़्यादा उम्मीद नहीं है। जिन सभ्यताओं ने ऊर्जावान सामूहिक साहित्य पैदा किया है, उनकी बुनियाद आदमियों के ठोस अनुभव और दुनिया व जीवन की संतुलित और यथार्थवादी धारणा पर थी; वे सभ्यताएँ आदमी के पूरे व्यक्तित्व के लिए एक संतोषजनक व्यवस्था तैयार करती थीं। इसलिए लोग ज़बरदस्ती के बिना भी इस सामूहिकता को स्वीकार करते थे, और वह भी इस तरह कि 'मन तू शुदम, तू मन शुदी' (मैं तू हो गया, तू मैं हो गया) की स्थिति पैदा हो जाए।
एक ख़ास क़िस्म की सामूहिक ज़िंदगी को लोगों ने स्वीकार कर लिया है या नहीं, वह उनकी रग-रग में बस गई है या नहीं, इसकी सबसे अच्छी कसौटी यही है कि ज़ोर-ज़बरदस्ती, बल्कि ज़िद और ताकीद के बिना वहाँ महान कलाकृतियाँ पैदा हों। रूसी सभ्यता इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती, हालाँकि साल में एक बार हम यह ऐलान ज़रूर सुन लेते हैं कि रूस में मानव इतिहास का सबसे महान साहित्य पैदा होगा। ऐसा साहित्य पैदा होना तो दूर की बात, जो लोग ढंग का साहित्य पेश करने की कोशिश करते हैं, वे या तो थोड़े दिन बाद ख़ुदकुशी कर लेते हैं या उनकी रचनाओं का प्रकाशन सरकारी आदेश से बंद कर दिया जाता है। यह बड़ी अजीबोग़रीब स्थिति है।
अगर रूस में एक नई सभ्यता पैदा हो चुकी है और देश की भारी बहुसंख्या इन मूल्यों से पूरी तरह संतुष्ट है, तो दो-चार आदमियों के भटक जाने पर इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है? अगर इस बात का अंदेशा है कि ये दो-चार आदमी बहुसंख्या को बहका कर ग़लत रास्ते पर डाल देंगे, तो इसका मतलब यह है कि बहुसंख्या इस सभ्यता के मूल्यों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है और इसमें कमी महसूस करती है। अगर बहुसंख्या इस सभ्यता से संतुष्ट भी है... और उसे बहकाया भी जा सकता है, तो इसका मतलब यह हुआ कि रोटी का मसला आदमी की ज़िंदगी का सबसे बड़ा मसला नहीं है, बल्कि उसकी ज़िंदगी में उतनी ही अहमियत रखने वाले और भी एक-दो मसले हैं जिनका नाम लेकर आदमी को ऐसा धोखा दिया जा सकता है कि वह रोटी की फ़िक्र छोड़कर किसी और धुन में लग जाए। इस गुत्थी को न तो रूसी सरकार सुलझाती है और न रूस के प्रशंसक, बल्कि जो आदमी अपनी तसल्ली के लिए यह बात समझना चाहे, उसे लाज़िमी तौर पर रूस का दुश्मन समझ लिया जाता है।
रूस के बारे में एक बात और ग़ौर करने लायक़ है। फ़र्ज़ कीजिए कि रूस में प्राकृतिक इंसान की विशेषताओं को जनता की तरफ़ इस अंदाज़ से मोड़ दिया गया है कि व्यक्तिवादी रुझानों के लिए कोई गुंजाइश नहीं रही, और एक मामूली व्यक्ति को इसकी इजाज़त नहीं कि वह अपने अंदर जनता की क्षमताओं का अक्स देखे। चलिए, हम थोड़ी देर के लिए यह बात मान लेते हैं, मगर जनता हर मामले में अपनी मर्ज़ी का सीधे तौर पर इज़हार नहीं कर सकती। व्यावहारिक ज़रूरतों का तक़ाज़ा यह है कि जनता अपने प्रतिनिधि चुने, जिनके ज़रिए उनकी मर्ज़ी अमल में आती रहे।
ये नुमाइंदे जितनी देर जनता के नुमाइंदों की हैसियत से काम करेंगे, उतनी देर के लिए जनता के सभी गुणों और अधिकारों के मालिक होंगे। अगर जनता मासूम और बेगुनाह है तो उतनी देर के लिए ये भी बेगुनाह हो जाएंगे। कम से कम उन्हें अपने आप को मासूम समझने का थोड़ा सा हक़ ज़रूर हासिल होगा, मगर ये नुमाइंदे बहरहाल व्यक्ति होंगे और उनमें आम आदमियों जैसी कमज़ोरियां होंगी। किसी नैतिक व्यवस्था की गैर-मौजूदगी में इन अवामी नुमाइंदों की हुकूमत इंतिहाई तानाशाही होगी। क्योंकि ये लोग आम आदमियों की तरह पत्थरदिली और बेरहमी से भी काम लेंगे और अवामी नुमाइंदों की हैसियत से अपने आप को गलती से परे भी समझते जाएंगे। जनता के रूप में इंसान को ब्रह्मांड की सबसे बड़ी ताक़त और परम भलाई (ख़ैर-ए-मुतलक़) समझने का और कोई नतीजा हो ही नहीं सकता।
इंसान-परस्ती व्यक्ति और क़ौम दोनों के मामले में बड़ी जल्दी ख़ुद-परस्ती (अहंकार) और शेख़ी बन जाती है। वह इस तरह कि इंसान अपने आप में पूर्ण (मुतलक़) है। सिर्फ़ माहौल उसे बिगाड़ता है। अगर माहौल को ख़राबियों से पाक कर दिया जाए तो इंसान मुकम्मल हो जाएगा। चूंकि कम से कम सैद्धांतिक तौर पर माहौल की ख़राबियां रूस में दूर की जा चुकी हैं, इसलिए रूसी अपने आप को हर तरह से मुकम्मल इंसान समझने का हक़दार मानते हैं और स्कूलों के बच्चे विदेशियों से पूछते हैं कि साहब, क्या आपके देश में रेलगाड़ी होती है?
ज़ाती तौर पर मैं इंसान-परस्ती से इसलिए डरता हूं कि इंसान की एक अमूर्त और पूर्ण (मुजर्रद और मुतलक़) धारणा पर यक़ीन कर लेने के बाद आदमी बेरहम हो जाता है। व्यक्तिगत मामलों में भी और सामूहिक मामलों में भी, बल्कि सामूहिक मामलों में ज़्यादा। क्योंकि सामूहिक फ़ायदे के लिए हराम चीज़ को भी हलाल कर देने का रुझान हर आदमी में होता है। इंसान-परस्ती पत्थरदिली कैसे बन जाती है, इसे चेखव ने एक कहानी में बड़ी अच्छी तरह समझाया है।
एक दाई को किसी वकील के यहां बुलाया जाता है। वह वहां जाकर देखती है कि वकील बड़ा ईमानदार, बड़ा शरीफ़ और उसूलों वाला है। मगर फिर भी उसके बीवी-बच्चे उससे नफ़रत करते हैं। बात यह थी कि वकील के ज़ेहन में इंसान के मुताल्लिक़ कुछ धारणाएं थीं कि उसे फ़लां-फ़लां उसूलों का पालन करना चाहिए। चुनांचे उसे बस वे उसूल ही याद रह गए थे और हाड़-मांस के आदमियों को वह बिल्कुल ही भूल गया था।
दूसरे, मैं इंसान-परस्ती से इसलिए डरता हूं कि इसके बाद आदमी के ज़ेहन में सूक्ष्म, व्यापक और गहरे तजुर्बों की क़ाबिलियत बाक़ी नहीं रहती और आदमी कई लिहाज़ से ठुस्स (जड़) बनकर रह जाता है। जब इंसान के गुण पहले ही से तय हैं तो उसके बारे में नए तजुर्बे ही क्या हो सकते हैं? जो चीज़ पहले ही से मुकम्मल है, उसमें कोई इज़ाफ़ा नहीं हो सकता।
इसीलिए मुझे अंदेशा होता है कि इंसान और इंसानियत की मौजूदा धारणाओं से बड़ा साहित्य नहीं पैदा हो सकता। यहां एक बात का फ़र्क़ ध्यान में रखना ज़रूरी है; एक तो मरे हुए और ज़िंदा सब आदमियों और उनके अगले-पिछले सारे तजुर्बों के समूह को भी इंसान या इंसानियत कह सकते हैं। ऐसे लम्हे हर आदमी की ज़िंदगी में आते हैं जब वह अपने ज़ाती तजुर्बों का दूसरों के तजुर्बों से मुक़ाबला करता है। अपने तजुर्बों को थोड़ी-बहुत व्यापकता (सामान्यीकरण) देता है, अपने आप से पूछता है कि इन तजुर्बों का मतलब क्या है, मैं और मुझ जैसे दूसरे आदमी कौन हैं, कहां से आए हैं, किधर जा रहे हैं। इस क़िस्म का चिंतन आदमी के अंदर हज़ार क़िस्म की ख़ुशियां, हज़ार क़िस्म की मायूसियां, हज़ार क़िस्म की हैरत पैदा कर सकता है। जब आदमी इस अंदाज़ से सोच रहा हो तो हम बड़े ठोस मायनों में कह सकते हैं कि वह इंसान या इंसानियत के बारे में सोच रहा है। इस क़िस्म के चिंतन से दामन बचाकर साहित्य कभी बड़ा या क़द्दावर नहीं बन सकता।
दूसरी क़िस्म का इंसान या इंसानियत वह है जिसकी व्याख्या मैं ऊपर कर आया हूं। चूंकि इसके सारे गुण पहले ही से तय हो चुके हैं, इसलिए इसके बारे में सोचने की क़तई ज़रूरत नहीं, ख़ुसूसन नए अंदाज़ से सोचने के मायने तो ठेठ बग़ावत (धर्मत्याग) हैं। यह इंसान ऐसी बेरंग और फुसफुसी चीज़ है कि इसकी हार के बारे में तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है और डेढ़ सौ साल से लिखा ही जा रहा है। मगर इसकी तारीफ़ में कोई ऐसी चीज़ नहीं लिखी जा सकती जिसे बाज़ौक़ (अच्छी रुचि वाले) आदमी तीन-चार दफ़ा दिलचस्पी से पढ़ लें। मैंने बहुत सोचने की कोशिश की कि बड़े साहित्य की कोई ऐसी मिसाल मिल जाए जिसका ताल्लुक़ इंसान की ऐसी धारणा से हो, मगर मैं कामयाब नहीं हो सका।
ले-देकर बस हैमलेट की वह छोटी-सी तक़रीर ज़रूर याद आती है जिसमें वह इंसान की असीमित क्षमताओं का ज़िक्र करता है। अव्वल तो मैं कहूंगा कि यह तक़रीर उस क़िस्म का चिंतन है जिसका ज़िक्र मैंने अभी एक मिनट पहले किया था, मगर शेक्सपियर के अक्सर आलोचकों की राय है कि पुनर्जागरण (रेनेसां) के बाद इंसान के अंदर जो आज़ादी और ख़ुद-मुख़्तारी आ गई थी, यह तक़रीर उसकी प्रतीक है। ख़ैर, यह अपनी-अपनी साहित्यिक रुचि (मज़ाक़-ए-सुख़न) है। इस तक़रीर का रंग तो उस वक़्त खुलता है जब इसे हैमलेट के पूरे किरदार के सामने रखकर देखा जाए। हैमलेट जैसे आदमी के मुंह से यह तक़रीर वाक़ई बड़ा मज़ा देती है।
इक़बाल के कलाम को इंसान-परस्ती के समर्थन में पेश करने से भी ज़्यादा मदद नहीं मिलती। इक़बाल इंसान की असीमित क्षमताओं के क़ायल हैं भी तो बड़ी स्पष्ट और तय हदों के अंदर... यानी मज़हब की मुक़र्रर की हुई हदों के अंदर। आप कह सकते हैं कि इक़बाल के अक़ीदे (मान्यताएं) और चीज़ हैं, उनके शायराना एहसास और चीज़ हैं। मगर ख़ुदा पर विश्वास उनके एहसास का ऐसा ज़रूरी और बुनियादी हिस्सा है कि इंसान के मुताल्लिक़ बड़े से बड़े दावे करते हुए भी उनका अंदाज़ ऐसा रहता है जैसे अपने से बड़ी किसी ताक़त को ललकार रहे हों या उसे चिढ़ा रहे हों। उनके शेरों में यह एहसास हमेशा झलकता है कि अगर तू यूं है तो मैं भी यूं हूं। यह बात उस पूर्ण इंसान-परस्ती से बुनियादी तौर पर अलग है जो इंसान से आगे किसी हस्ती की कल्पना कर ही नहीं सकती।
जब इक़बाल पूर्ण इंसान-परस्ती की तरफ़ माइल होते हैं तो उन्हें मौत और वे दूसरे कारण फ़ौरन याद आ जाते हैं जो आदमी को उसकी सतह पर खींच लाते हैं। मगर यह भी हक़ीक़त है कि ख़ुदा के हुज़ूर में शोख़ बातें कहने के शौक़ में इक़बाल एक-आध जगह संतुलन क़ायम नहीं रख सके हैं। मसलन, एक बड़े सुख़न-फ़हम (काव्य-मर्मज्ञ) और सम्माननीय बुज़ुर्ग ने इक़बाल के मशहूर और मक़बूल मिसरे 'तू शब आफ़रीदी चराग़ आफ़रीदम' पर यह एतराज़ किया है कि रात जैसी विश्वव्यापी और रहस्यमयी धारणा के मुक़ाबले में मिट्टी का चराग़ लाना ज़रा हल्की-सी बात है। यह अच्छी ख़िताबत (भाषणबाज़ी) है, बड़ा शेर नहीं है।
इंसान-परस्ती पर मुझे सबसे बड़ा एतराज़ यह है कि इंसान बनने के बाद आदमी नैतिक पैमानों से आज़ाद हो जाता है। नैतिक पैमानों की ज़रूरत तो उसके लिए होती है जिसकी शख़्सियत में विरोधाभासी और विपरीत रुझान मौजूद हों और उन रुझानों में से कुछ को उभारना और कुछ को दबाना ज़रूरी हो। जो हस्ती अपने आप में नेक हो, महज़ माहौल की बुराई से मजबूर होकर बुरी हो जाती हो, उसके लिए नैतिकता की ज़रूरत नहीं है, माहौल को बदल देना काफ़ी है। माहौल बदल गया तो फिर उसकी नेकी प्रमाणित है। ऐसी ही मजबूरी हो तो क़ानून उसकी निगरानी करता रहे, ऐसे उसूलों की मौजूदगी ज़रूरी नहीं जो अंदरूनी तौर पर काम करते हों।
इंसान-परस्त तहज़ीब का एकमात्र नैतिक उसूल यह है कि जो इंसान क़ानून के मुताबिक़ चलता है, वह नेक है। इसलिए इंसान की पूजा करने वाला आदमी आत्ममुग्ध और ख़ुदग़रज़ हो जाता है। वह बोदलेयर की तरह अपने आप को कभी ढोंगी नहीं कह सकता। अगर उसके फ़ायदे पर सीधी चोट न पड़ती हो, तो कोई नैतिक गुनाह उसे नहीं चौंका सकता। व्यावहारिक रूप से इंसान-परस्ती नैतिक संवेदनहीनता का दूसरा नाम है। अगर पूरी क़ौम इंसान-परस्त हो जाए, तो उसकी सियासत भी नैतिक पाबंदियों से आज़ाद हो जाती है। यही वजह है कि अमन का जितना प्रचार आजकल होता है, उतना कभी नहीं हुआ होगा। अंतर्राष्ट्रीय सुलह के लिए इतनी सभाएं भी कभी मौजूद नहीं थीं, मगर जंग रोज़ सिर पर खड़ी रहती है।
यह तो मैं बड़ी तफ़सील से बता चुका हूं कि मुझे इंसान क्यों नापसंद है। अब यह सवाल रह जाता है कि आदमी क्यों पसंद है। तो यह बिल्कुल सीधी बात है। आदमी इंसान नहीं बन सकता, बल्कि आदमी रहने पर मजबूर है। यह एक ऐसी एहतियाती मजबूरी है जिसमें आदमी का कोई वश नहीं। इसलिए आदमी को तरजीह देना भी एक जैविक (biological) ज़रूरत है।
अब मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरे ज़हन में आदमी की ज़िंदगी और उसकी मांगों की क्या अवधारणा है। यह बात साफ़ करने के लिए मिसाल के तौर पर एक बातचीत पेश करता हूं जो मैंने यह लेख शुरू करने से चंद दिन पहले अंधेरी रात में एक उजाड़-सी सड़क पर चलते हुए सुनी थी। मेरे आगे-आगे तीन लोग जा रहे थे, एक मर्द, एक बुर्क़ा पहने हुए औरत और एक आठ-नौ साल का लड़का। जब मैं उन लोगों के क़रीब आया तो औरत सहारनपुरी लहज़े में कह रही थी,
पेंशन मिल जागी तो हम तो भूखों मरेंगे।
लड़के ने बड़ी चिंता के साथ पूछा, क्यों, अम्मां, क्यों? भूखों क्यों मरेंगे?
फिर हमें मिलेगा ही क्या?
बाप ने भी सहमति जताई कि हां! आधे पैसे रह जाएंगे।
बेटे ने पूछा, अब्बा, तुम्हें अब क्या मिल रहा है?
बाप ने बताया, अस्सी रुपये!
जब पेंशन हो जाएगी तो फिर कित्ते मिलेंगे?
चालीस रुपये मिलेंगे, बेटे!
बेटे को यह सुनकर बड़ी फ़िक्र हुई, चालीस रुपये में हम कैसे करेंगे?
एक लम्हा ग़ौर करने के बाद वह फिर बोला, क्यों, अब्बा, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मैं लगूंगा!
जब इस लड़के ने यह आख़िरी जुमला कहा, तो उसका लहज़ा सुनने के क़ाबिल था। उसकी आवाज़ में ख़ुशी थी जैसे उसने मुश्किल हल कर ली हो। अपने अंदर ऐसी क्षमता की मौजूदगी पर हैरानी थी, ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियां क़बूल करने की उमंग थी। उन ज़िम्मेदारियों को पूरा करने का हौसला था। एक आम आदमी की ज़िंदगी से जो कुछ मुराद है, उसकी ज़िंदगी का सारा आनंद और सारा दुख इस छोटे से संवाद में आ जाता है। आदमी की ज़िंदगी और उसके फ़र्ज़ बिल्कुल मामूली, बे-रंग और ग़ैर-शायराना हैं। मगर आदमियों की आपस की निस्वार्थ, बे-मक़सद और आमतौर पर बे-वजह मुहब्बत इस ज़िंदगी में रंग भरती है। सदियों से आदमी इसी चक्कर में फंसा हुआ है और उसके अंदर जो भी थोड़ी-बहुत क्षमताएं हैं, वे इन्हीं धंधों में खर्च होती हैं, मगर आदमी अभी तक इन ज़िम्मेदारियों से नहीं उकताया है।
आदमी अपनी पैदाइश के दिन से लेकर आज तक जैविक ज़िंदगी से जद्दोजहद में मसरूफ़ रहा है, उसने ख़ून थूक-थूक दिया है मगर हिम्मत नहीं हारी। उसकी ज़्यादातर योग्यताएं इसी फ़ुज़ूल कशमकश में खर्च होती हैं, मगर इसके बावजूद और अपनी अत्यंत सीमित क्षमताओं के बल पर ही उसने अपने लिए एक ग़ैर-जैविक ज़िंदगी भी रच ली है। अपने इस कारनामे से उसे ऐसी अक़ीदत (श्रद्धा) और मुहब्बत है कि कभी-कभी उसकी ख़ातिर अपनी जैविक ज़िंदगी क़ुर्बान करने को भी तैयार हो जाता है। यह है वह हस्ती जो असल में हमारे सम्मान की हक़दार है, न कि वह कल्पना जो साकार काव्यात्मकता है, साकार सफलता है। यहां मुझे अपनी एक जज़्बाती कमज़ोरी क़बूल करना मंज़ूर है। पेंशन पाने वाले लोगों के सामने मैंने अक्सर अपने आप को बड़ा हक़ीर (तुच्छ) महसूस किया है। ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियां पूरी कर लेने से आदमी के अंदर अनुभवों की जो पुख़्तगी आ जाती है, उसके सामने हर दूसरा अनुभव कुछ बेजान और बे-हक़ीक़त-सा मालूम होता है।
जो तहज़ीब आदमियों के ठोस अनुभवों से बेपरवाह होकर मूल्यों का निर्माण करती है, उसके मुक़द्दर में हार और हसरतें लिखी हैं। ख़ासकर साहित्य तो आदमियों से संबंध तोड़कर दो क़दम नहीं चल सकता। इस दावे की दलील पेश करने की ज़रूरत नहीं। उर्दू के नए साहित्य, ख़ासकर नए अफ़साने (कहानी) की मिसाल हमारी आंखों के सामने है। हमारे अफ़साना-निगारों ने अपनी रचना का केंद्र इंसान को बनाया था। इसलिए दस-बारह साल के अंदर-अंदर सब बैठ गए हैं। रचनात्मक लिहाज़ से बस एक मंटो ज़िंदा है, जिसकी पकड़ ज़िंदा आदमियों के अनुभवों पर इतनी मज़बूत थी कि प्रचलित मान्यताएं भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकीं। या अब कुछ अज़ीज़ अहमद के अफ़सानों में जान आती जा रही है, क्योंकि वह आहिस्ता-आहिस्ता इंसान से आदमी की तरफ़ हिजरत (प्रस्थान) कर रहे हैं।
यह स्थिति कुछ उर्दू साहित्य तक ही सीमित नहीं है। सारी दुनिया का इंसान-परस्त साहित्य थक कर चूर हो गया है, अब तक जो कुछ लिखा जा चुका है उसे दोहराते रहने के सिवा इस साहित्य के सामने और कोई भविष्य नहीं है। हर देश के लेखक यही कह रहे हैं कि अब क्या करें? अगर रूस के लेखकों को इजाज़त होती तो वे भी यही कहते। दो-एक आदमियों ने यह बात कहने की हिम्मत की तो फ़ौरन उनकी मरम्मत कर दी गई।
साहित्य में दोबारा जान किस तरह आ सकती है, यह तो फिर भी छोटा मसला है। अब तो मानव जाति के पूरे भविष्य का दारोमदार इस पर है कि बीसवीं सदी की तहज़ीब अपनी आंतरिक ज़िंदगी में बुनियादी बदलाव करे और इंसानी सोच-विचार, कर्म और बुनियादी अवधारणाओं की हदबंदी नए सिरे से हो। इस पुनर्निर्माण की सबसे पहली शर्त यह है कि मूल्यों की यह नई व्यवस्था आदमी के लिए हो, इंसान के लिए नहीं, और आदमी के पूरे व्यक्तित्व और उसकी वास्तविक क्षमताओं को ज़हन में रखकर बनाई गई हो। इसके बिना सारी कॉन्फ़्रेंसें, प्रस्ताव और समझौते बेकार हैं। अगर सारी दुनिया में साम्यवादी व्यवस्था लागू हो गई और आदमी की आंतरिक ज़िंदगी इसी तरह आज़ाद रही, तो इससे कोई बुनियादी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
आंतरिक ज़िंदगी के इस पुनर्निर्माण में मानव जाति और उसके भविष्य की अवधारणा क्या होगी, इसके बारे में आंद्रे मालरो ने एक बड़ा गहरा इशारा किया है। जो लोग बिना सोचे-समझे हर वक़्त आशावादी बने रहते हैं, उनको ज़हन में रखकर मालरो ने कहा है कि हमारे लिए ज़िंदगी की त्रासद (tragic) अवधारणा बहुत ज़रूरी है, क्योंकि हमें यह तो मालूम है कि इंसान कहां से चला है, मगर यह पता नहीं कि वह जा कहां रहा है। इस बात का एक दूसरा पहलू भी है जिसे उन लोगों के सामने पेश करना चाहिए जो प्राकृतिक इंसान की हार से ऐसे मायूस हुए हैं कि अब उन्होंने निराशावाद को ही अपना तरीक़ा बना लिया है। उन लोगों से हम कह सकते हैं कि हमारे लिए ज़िंदगी की सुखांत (आनंदमय) अवधारणा भी ज़रूरी है। क्योंकि यह तो पता नहीं कि इंसान जा कहां रहा है, मगर हम यह ज़रूर जानते हैं कि वह चला कहां से है। त्रासद और सुखांत, इन दोनों अवधारणाओं की मदद से हम एक संतुलित और सेहतमंद जीवन-व्यवस्था तैयार कर सकते हैं।
आख़िर में किसी पक्षपात या तरफ़दारी के बिना यह कहना ग़लत न होगा कि आम आदमी की शख़्सियत, उसकी सलाहियतों (क्षमताओं) और उसकी ज़िंदगी की अलग-अलग ज़रूरतों का जितना ख़याल इस्लाम ने रखा है, उतना किसी और धर्म या जीवन-व्यवस्था ने नहीं रखा। इस्लाम ने दिल ख़ुश करने वाली बातों से कहीं ज़्यादा असली ज़िंदगी की हक़ीक़तों की तरफ़ ध्यान दिया है। इस्लाम आदमी की शख़्सियत की विरोधी और आपस में टकराने वाली माँगों से घबराया नहीं। उसने कभी आँख चुराने की कोशिश नहीं की, बल्कि हर ज़रूरत को उसकी सही जगह दी है। जिस तरह आदमी की ज़िंदगी में दुख और सुख दोनों की जगह है, दोनों का जायज़ होना माना गया है, उसी तरह इस्लाम ने भी दोनों तसव्वुरों (विचारों) की गुंजाइश रखी है। इंसान को ज़ालिम और जाहिल भी कहा है और उसकी ख़ूबियों को सराहा भी है। इसलिए इस्लाम के जीवन-दर्शन में शुरू से आख़िर तक अलग-अलग ताक़तों और रुझानों के बीच एक संतुलन मौजूद है।
चूँकि पाकिस्तान इस्लामी जीवन-दर्शन की नुमाइंदगी का दावा करता है, इसलिए बीसवीं सदी के मौजूदा हालात में हमारा एक ख़ास फ़र्ज़ है, वह यह कि हमारे जीवन-दर्शन में जो संभावनाएँ हैं, उन्हें हम अपनी सोच और काम तथा अपनी शख़्सियत में उतारें। इस्लामी किरदार की तख़्लीक़ (रचना) बीसवीं सदी की इंसानी तहज़ीब में एक इंक़लाबी (क्रांतिकारी) घटना होगी। यह बात हमारे लिए एक और लिहाज़ से भी अहम है। दूसरी क़ौमें शायद अपना जीवन-दर्शन छोड़कर भी किसी न किसी तरह ज़िंदा रह सकती हैं, लेकिन हमारा जीवन-दर्शन इतना साफ़, निश्चित और स्पष्ट है कि मुसलमान सिर्फ़ अपने जीवन-दर्शन पर अमल करके ही ज़िंदा रह सकता है, इसके बिना मुसलमान की ज़िंदगी नामुमकिन है। हमारी क़ौमी ज़िंदगी का विकास इसी जीवन-दर्शन से जुड़ा है। हमारे साहित्य में भी सिर्फ़ इसी तरीक़े से जान आ सकती है, वरना यह इसी तरह बेअसर होने और कमज़ोरी के ख़ालीपन में टामक-टोइयाँ मारता रहेगा।
नोट: यह मज़मून (लेख) मैंने 'हल्क़ा-ए-अहबाब-ए-ज़ौक़' लाहौर में पढ़ा तो कुछ हज़रात ने हल्क़े की रिवायती संजीदगी, ख़ुलूस (सच्चाई) और ईमानदारी से काम लेते हुए मुझे बताया कि मैंने आख़िर में जिस अंदाज़ से इस्लाम का ज़िक्र किया है, उससे अंदाज़ा होता है कि मैं दूसरी तहज़ीबों या व्यवस्थाओं को ग़ौर करने लायक़ नहीं समझता। इसलिए मुझे दूसरे धर्मों, ख़ासकर बुद्ध और कन्फ्यूशियस के धर्मों के बारे में कुछ ज़रूर कहना चाहिए था। चूँकि यह एतराज़ (आपत्ति) नेक नीयत पर आधारित था, इसलिए इस नोट को जोड़ना ज़रूरी मालूम हुआ।
जहाँ तक दुनिया के लिए जीवन-व्यवस्था सुझाने का ताल्लुक़ है, वह न तो इस मज़मून का विषय है और न मुझमें इसकी सलाहियत (क्षमता) है। इसलिए मैंने अलग-अलग व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन पेश करने की कोई कोशिश नहीं की। लेकिन चूँकि इंसान और आदमी की बहस का ताल्लुक़ पाकिस्तान के निवासियों से भी है, इसलिए अपने देश के हालात को ध्यान में रखते हुए मैंने आख़िर में यह इशारा भी कर दिया कि हमारे पास इस वक़्त भी एक ऐसी जीवन-व्यवस्था मौजूद है जो बहुत संतुलित और हक़ीक़त से भरी है। इसका यह मतलब नहीं कि दूसरी तहज़ीबों में जो ख़ूबियाँ हैं, उनसे मैं अनजान हूँ। इस्लाम ने 'अहल-ए-किताब' (किताब वाले) का तसव्वुर पेश करके मुसलमानों को यही हिदायत दी है कि दूसरी तहज़ीबों का भी एहतराम (सम्मान) करो। अगर मैं दूसरी तहज़ीबों को बेमानी या बेकार समझने लगूँ, तो यह बात इस्लाम की रूह (आत्मा) के ख़िलाफ़ होगी।
बुद्ध और कन्फ्यूशियस की व्यवस्थाओं को भी मैं इज़्ज़त और मुहब्बत की नज़र से देखता हूँ, मगर उनके बारे में भी ज़रा-सा स्पष्टीकरण ज़रूरी है। बीसवीं सदी के बाद पश्चिमी विचारकों और अदीबों (साहित्यकारों) ने इन दोनों धर्मों का ज़िक्र ग़ैर-मामूली अक़ीदत (श्रद्धा) के साथ किया है। इस अक़ीदत की एक ख़ास वजह है और इसके पीछे ख़ास क़िस्म के मनोवैज्ञानिक कारण काम कर रहे हैं। ला-मज़हबियत (धर्महीनता), आज़ाद-ख़याली और इंसान-परस्ती (मानवतावादी) के विचारों से पश्चिमी तहज़ीब को जो नुक़सान पहुँचे हैं, उनका विचारकों को गहरा एहसास है। वे चाहते हैं कि इन विचारों को छोड़कर कोई नई जीवन-व्यवस्था अपनाई जाए। मगर पिछली सदी में विज्ञान और धर्म का जो टकराव हुआ था और जिस तरह लोगों के स्वभाव में शक और संदेह ने ग़लबा (दबदबा) हासिल कर लिया था, उसके असर इन विचारकों के दिमाग़ से अभी ख़त्म नहीं हुए हैं। इसलिए वे क़दरों (मूल्यों) की नई व्यवस्था भी तैयार करना चाहते हैं और साथ ही यह भी चाहते हैं कि इस व्यवस्था में किसी अलौकिक (सुपरनैचुरल) ताक़त का तसव्वुर ज़रूरी न हो।
इस क़िस्म की व्यवस्था बुद्ध और कन्फ्यूशियस के यहाँ मिलती है। इन दोनों ने नेक ज़िंदगी को ज़्यादा अहमियत दी है और ख़ुदा या परम सत्य के ज्ञान पर ज़ोर नहीं दिया। दोनों धर्मों में व्यावहारिकता और शुद्ध सांसारिकता की रूह बहुत गहरी है। इसलिए ऊपर बताए गए पश्चिमी विचारकों के लिए इन धर्मों में बड़ी कशिश (आकर्षण) है। लेकिन हमारी ज़हनी (मानसिक) ज़रूरतें बिल्कुल दूसरी क़िस्म की हैं। हमारे देश के निवासी अभी तक ख़ुदा के तसव्वुर से बेज़ार (ऊबे हुए) नहीं हैं और न ही इसे छोड़ने की ख़्वाहिश रखते हैं। इसके अलावा जितनी व्यावहारिकता बुद्ध और कन्फ्यूशियस के यहाँ है, वह हमें इस्लाम के अंदर रहते हुए भी मयस्सर (उपलब्ध) है।
दूसरी तरफ़ यह भी ख़याल रखना चाहिए कि पश्चिमी लोग बुद्ध और कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं का अध्ययन असली और ख़ालिस (शुद्ध) शक्ल में करते हैं, मगर चीन में ये धर्म ख़ालिस शक्ल में प्रचलित नहीं हैं। दूसरे दर्शनों को पूरक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है और कुछ चीनी क़ौम के मिज़ाज ने इन शिक्षाओं में फेरबदल किया है। चीनी कला और बौद्ध धर्म को एक-दूसरे का पर्याय (समानार्थी) नहीं समझना चाहिए। अगर यूरोप बौद्ध धर्म अपना ले, तो बहुत मुमकिन है कि वहाँ से कला ही ग़ायब हो जाए। थॉमस मान ने साफ़ तौर पर कहा है कि बुद्ध के उसूलों के अंदर रहते हुए कला का तसव्वुर नहीं किया जा सकता और 'बौद्ध कला' एक ऐसी इस्तलाह (पारिभाषिक शब्द) है जिसके कोई मायने नहीं।
कन्फ्यूशियस ने कला की उपयोगिता को कुछ जगह बिल्कुल हास्यास्पद (मज़ाकिया) बना दिया है। मसलन, उन्होंने अपने पोतों को नसीहत की है कि शायरों का कलाम पढ़ा करो। इससे तुम्हें चिड़ियों और फूलों के नाम याद आ जाएँगे। तो हमें चीनी कला पर आशिक़ होने के बाद इसे कन्फ्यूशियस के धर्म का लाज़िमी (अनिवार्य) असर समझने का हक़ नहीं पहुँचता। अलबत्ता, पश्चिमी विचारकों को यह हक़ हासिल है कि वे अपनी मनोवैज्ञानिक ज़रूरतों की बिना (आधार) पर बुद्ध और कन्फ्यूशियस के धर्मों को अन्य धर्मों पर तरजीह (प्राथमिकता) दें। इन्हीं मनोवैज्ञानिक ज़रूरतों की वजह से यही पश्चिमी विचारक इस्लाम से बेरुख़ी (उपेक्षा) बरतते रहे हैं। मध्यकाल की दुश्मनी अभी तक उनके ज़ेहनों से दूर नहीं हुई है। पश्चिम के आज़ाद-ख़याल आदमी अपनी संजीदगी के बावजूद इस्लाम के बारे में ग़ौर करना ज़रूरी नहीं समझते। इसी पक्षपात का असर हमारे आज़ाद-ख़याल तबक़ों (वर्गों) पर पड़ा है और हमें दूसरी व्यवस्थाएँ ख़्वाह-मख़्वाह ग़ैर-ज़रूरी तौर पर दिलकश नज़र आने लगी हैं।
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