इमला और सेहत-ए-अल्फ़ाज़
एक सम्मानित और आदरणीय बुज़ुर्ग ने, जो हिंदुस्तान के मशहूर लेखक हैं और देश के मामलों की अच्छी समझ रखते हैं, हमें एक बहुत लंबा खत लिखा है। इसमें उन्होंने बड़े अफ़सोस के साथ इस बात की शिकायत की है कि अयोग्य लोगों की वजह से उर्दू ज़बान दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है, और अगर इसका कोई उपाय नहीं किया गया तो हमारी क़ौमी ज़बान बर्बाद हो जाएगी। उनके ख़ास शब्द ये हैं, आजकल मैं देखता हूँ कि उर्दू के अख़बार और पत्रिकाएँ जो अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे लेखक निकाल रहे हैं, या अख़बारों वगैरह में लेख लिखते हैं, इन बेचारों के हाथों बेचारी उर्दू की ऐसी दुर्दशा होनी शुरू हुई है कि तौबा!
लेखों का बेहतरीन होना दूसरी बात है, मगर ज़बान यानी शब्दों और इमला (वर्तनी) की ग़लतियाँ ऐसी होती हैं कि मेरा तो अक्सर उन्हें पढ़ने तक से दिल नफ़रत करता है। यह हालत ख़ुद उन्हीं के लिए अफ़सोस की बात नहीं है, बल्कि ऐसी ग़लत इबारतों और शब्दों के चलन से भविष्य में बहुत ही बुरे नतीजे पैदा होंगे। लाहौर के एक पुराने पत्रकार ने, जो अंग्रेज़ी नहीं जानते थे और बेचारे अरबी के सिवा सिर्फ़ मामूली सी फ़ारसी पढ़े हुए थे, शब्द 'जनाब' का मुअन्नस (स्त्रीलिंग) 'जनाबा' बनाया। अब मैं देखता हूँ कि उनकी बदौलत यह 'जनाबत' ऐसी बुरी तरह फैलती जा रही है कि तौबा।
शब्द 'नज़र' (भेंट) और 'नज़र' (दृष्टि) में फ़र्क़ नहीं किया जाता। 'नाफ़िया' की जगह 'मनफ़ी' (नकारात्मक), मेरे ख़याल में ग़लत है, इसका इस्तेमाल लगातार हो रहा है। 'मुवाफ़िक़त' (सहमति) के मुक़ाबले में शब्द 'निफ़ाक़' लिखा जा रहा है, और जो कोई किसी मामले में ख़िलाफ़ राय रखता हो, उसे इस तरह ख़्वाह-मख़्वाह 'मुनाफ़िक़' (पाखंडी) कहा जाता है। 'आप फ़लाँ काम के लिए मजाज़ (अधिकृत) नहीं हैं', इसकी जगह लिखते हैं कि 'आपको इस बात का क्या मजाज़ है'। 'मुहाज़ी' की जगह 'मुहाज़', और एक बड़ी भारी-भरकम किताब के लेखक साहब ने शब्द 'मुनादी' यानी उपदेशक की जगह 'क़न्नाद' और 'शद्दाद' के वज़न पर 'मुनाद' गढ़ लिया है, वगैरह-वगैरह। आपकी सेवा में यह शिकायत इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आपकी देखरेख में (जो शायद नाम-मात्र की है) पत्रिका 'कॉलेज मैगज़ीन' छपती है। उसमें ऐसी-ऐसी भारी ग़लतियाँ होती हैं जिन्हें देखकर बहुत दुख होता है। और ग़ज़ब यह है कि जब उस पर लिखा जाता है कि 'मौलाना मोहम्मद शिबली साहब की देखरेख में प्रकाशित हुआ', तो ग़ौर फ़रमाइए कि बेचारे अंग्रेज़ी पढ़ने वाले उर्दू लेखकों के गुमराह हो जाने के लिए तो यह एक बड़ी दलील हो जाएगी। जब कोई उन्हें समझाना चाहेगा तो वे यही जवाब देंगे कि फ़लाँ जगह पर हमने ऐसा ही लिखा देखा है, और चूँकि वह पत्रिका जनाब मौलाना जैसे भरोसेमंद व्यक्ति की देखरेख में छपती है, तो यह शब्द या इमला वगैरह ग़लत कैसे हो सकता है। इसी तरह हमारे एक मेहरबान लेखक ने कहीं हमारे उरफ़ी का यह शेर पढ़ लिया होगा:
अज़ नक़्श ओ निगार-ए-दर ओ दीवार-ए-शिकस्ता
आसार पदीद अस्त सनादीद-ए-अजम रा
या जनाब सैयद साहब की किताब का नाम 'आसार-उस-सनादीद' सुन लिया होगा, अब बेझिझक आसार-ए-क़दीमा (प्राचीन स्मारकों) के लिए शब्द 'सनादीद' लिखना शुरू कर दिया और उनकी देखा-देखी और लोग भी ग़लती में पड़ते जा रहे हैं। आजकल बिहार से 'इस्लाह' (सुधार) नाम की एक पत्रिका शुरू हुई है, उसके टाइटल पेज पर जो एक अरबी का हिस्सा है, वह देखने लायक़ है।
अगर आप 'अख़बार अलीगढ़' का एक हिस्सा ऐसी ग़लतियों के सुधार के लिए ख़ास कर दें और ग़लत शब्दों, इमला और ग़लत मुहावरों को सही किया करें, तो दुनिया पर, ख़ासकर हमारी ज़बान उर्दू पर बड़ा एहसान होगा। वरना कुछ ही सालों में एक ऐसी 'गड्डामी' उर्दू पैदा होगी कि बायद ओ शायद (जिसका कोई ठिकाना न होगा)। फ़नज़ुर इलल इबिलि कैफ़ा ख़ुलिक़त। यह ज़रूरी नहीं कि लेख लिखने वाले का नाम लेकर अख़बार में नुक्ताचीनी की जाए, बल्कि सिर्फ़ इशारे के तौर पर लिखा जा सकता है। और जब एक-आध कॉलम इसी काम के लिए तय किया जाएगा, तो लोग ख़्वाह-मख़्वाह नाराज़ भी न होंगे, क्योंकि इस आम तरीक़े से किसी का मज़ाक़ उड़ाना या अपमान करना मक़सद नहीं होगा, बल्कि सिर्फ़ ज़बान का सुधार होगा। ज़्यादा कहाँ तक आपके कान खाऊँ।
सबसे पहले मैं अपने आदरणीय बुज़ुर्ग की सेवा में यह गुज़ारिश करता हूँ कि मैं साल भर से 'कॉलेज मैगज़ीन' का एडिटर नहीं हूँ, इसलिए उसकी ग़लतियों का (अगर वाक़ई हैं) मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ। असल बहस के बारे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उर्दू ज़बान में बहुत से ऐसे शब्द शामिल हो गए हैं और होते जा रहे हैं, जो लुग़त (शब्दकोश) और बनावट के लिहाज़ से ग़लत हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आम नियम माना जा सकता है या नहीं कि जो शब्द असल लुग़त के लिहाज़ से ग़लत है, उसका इस्तेमाल भी आमतौर पर ग़लत है? फ़ारसी ज़बान में जब अरबी का मेल हुआ तो अरबी के सैकड़ों शब्द और वाक्य शामिल हो गए। फ़ारसी के कवि और गद्यकार आमतौर पर अरबी के इल्म में बहुत महारत रखते थे, लेकिन अरबी के शब्द जो उन्होंने इस्तेमाल किए, इस क़दर ग़लत इस्तेमाल किए कि आज मामूली उर्दू जानने वाले भी उससे ज़्यादा ग़लती नहीं करते। फिर भी वही फ़ारसी आज तक प्रामाणिक, शुद्ध (फ़सीह) और मीठी समझी जाती है।
ब सुखन हाय दरोग़-ए-तो तसल्ली शुद ओ रफ़्त
मैली
ब-नशिस्त ओ क़ुराँ ख़्वांद ओ ब-जुंबान्दही सर
क़ाआनी
हम्माम-ए-शरीफ़ शुद मुज़य्यब
वलह
शाख़-ए-बनफ़्शा चूँ बरोज़ लफ़ैन-ए-दोस्त गश्त
मनूचेहरी
क़ौम इशरब-उस-सबूह या अय्युहन-नाइमीन
मनूचेहरी
दर ओ ब-सैर ओ ब-अंदेश क-ईं ख़ुजिस्ता निहाद
उरफ़ी
सर ओ मन तरह-ए-नौ अंदाख़्ता यानी चे
हज़ीं
असल हक़ीक़त यह है कि ज़बान की शुरुआत आम लोगों (अवाम) से होती है और यह वर्ग शब्दों की शुद्धता से बिल्कुल बेख़बर होता है। ख़ास लोग (विद्वान) इसी ज़बान को लेकर काँट-छाँट कर सुधार करते हैं। सुधार में वे बहुत से शब्दों को उसी तरह छोड़ देते हैं, जिसकी वजह कभी तो यह होती है कि वे ग़लत शब्द आम इस्तेमाल में इस क़दर चलन में आ चुके होते हैं कि अगर शुद्धता के साथ बोले जाएँ, तो आम लोगों की समझ में न आएँ। और कभी यह बात ज़बान की इज़्ज़त और आज़ादी की दलील समझी जाती है कि दूसरी ज़बान के शब्द इसमें आएँ तो इसी के साँचे में ढल कर आएँ।
यह बात सिर्फ़ फ़ारसी और उर्दू तक सीमित नहीं है, हर ज़बान में दूसरी ज़बान के शब्द आकर अपनी असली हालत पर नहीं रहते। अलबत्ता, चूँकि उर्दू कोई स्वतंत्र ज़बान नहीं है, बल्कि अरबी, फ़ारसी और हिंदी का मिश्रण है, इसलिए इसे अरबी, फ़ारसी वगैरह के शब्दों में बदलाव (तसर्रुफ़) करने का बहुत कम हक़ हासिल है। इसलिए जहाँ तक हो सके, इस बात का ध्यान रखना ज़्यादा मुनासिब है कि दूसरी ज़बानों के शब्द सही उच्चारण और बनावट के साथ क़ायम रखे जाएँ। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पुराने और नए उस्तादों ने अरबी और फ़ारसी के बहुत से शब्दों को उर्दू ज़बान में ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल किया, और आज वही ग़लत इस्तेमाल शुद्ध (फ़सीह) और मुहावरेदार माने जाते हैं।
बहरहाल, इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल करने या न करने के लिए जो पक्का नियम तय किया जा सकता है, वह यह है कि जो शब्द भाषा के जानकारों (फ़ुसहा) और प्रामाणिक اہلِ ज़बान के आम इस्तेमाल में आ जाएँ, तो वे इस्तेमाल के लिए सही हैं। और जिन्हें اہلِ ज़बान ने आमतौर पर क़बूल न किया हो, उनका इस्तेमाल सही नहीं है। इसी आधार पर जब मशहूर उस्तादों, मसलन अनीस, दबीर, आतिश वगैरह ने ग़लत शब्द इस्तेमाल किए, तो लोगों ने उसी वक़्त एतराज़ किया, क्योंकि वे शब्द भाषा के जानकारों के नज़दीक आम इस्तेमाल की सनद (प्रमाण) नहीं पा चुके थे। इसलिए सिर्फ़ एक-दो बुज़ुर्गों का इस्तेमाल, भले ही वे कैसे भी प्रामाणिक उस्ताद हों, शुद्धता की दलील नहीं माना जा सकता था।
हमारे मोहतरम बुज़ुर्ग ने जिन अल्फ़ाज़ का ज़िक्र किया है, वे यक़ीनन अहल-ए-ज़बान (भाषा के माहिरों) के यहाँ इस्तेमाल नहीं होते, इसलिए उनके ग़लत होने में कोई शक नहीं हो सकता। बेशक ऐसे अल्फ़ाज़ को बहुत सख़्ती से रोकना चाहिए वरना ज़बान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। क्योंकि अगर इस तरह के अल्फ़ाज़ लिखने और बोलने में बहुत ज़्यादा फैल गए, तो हर इंसान कहाँ तक यह जाँच-पड़ताल करता फिरेगा कि इनमें से कौन से अल्फ़ाज़ माहिरों के नज़दीक मक़बूल हो चुके हैं और कौन से ग़ैर-मक़बूल।
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