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इज्तेमाई तहज़ीब और अफ़साना

इन्तिज़ार हुसैन


Translated By: Rekhta Editor

इन्तिज़ार हुसैन

इज्तेमाई तहज़ीब और अफ़साना

इन्तिज़ार हुसैन

MORE BYइन्तिज़ार हुसैन

    सामूहिक तहज़ीब और अफ़साना

    इंतज़ार हुसैन

    एक रोज़ का ज़िक्र है कि लाहौर के आसमान पर एक दूधिया धारी खिंचती दिखाई दी। ग़ौर से देखा तो बहुत ऊंचाई पर एक गोल सी चीज़ चलती नज़र आई। यह लंबी दूधिया धारी उसी की दुम थी। शहर में यह ख़बर उड़ गई कि स्पुतनिक गुज़र रहा है, मगर दूसरे दिन अख़बारों में एक खंडन छपा कि वह गोल सी चीज़ स्पुतनिक नहीं, जेट जहाज़ था।

    यह गोल सी चीज़ अगर हमारे डिबाई में दिखाई देती तो वहां लोग इसे मुर्गी के अंडे का निशान बताते और इसे क़यामत की निशानी ठहराते। हम जिस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाया करते थे, वहां कभी-कभी जाने कौन एक इश्तेहार लटका जाता था जिसमें ऐलान होता था कि क़यामत आने वाली है। पहले आसमान पर मुर्गी के अंडे का निशान नज़र आएगा। फिर मुर्गी आदमी की तरह बातें करेगी और उसके बाद क़यामत जाएगी। बस हमारे यहां रोज़ यही रहता था। एक दफ़ा इमली वाली को शिकायत हुई कि उसकी इमली में कटारें (फल) नहीं लगतीं। पड़ोस के घर में नीम था। उसने अपनी इमली का उस नीम से ब्याह कर दिया। इमली को लाल दुपट्टा ओढ़ाया गया। नीम के सेहरा बांधा गया। मोहल्ले वालों की दावत हुई। लीजिए साहब ब्याह हो गया। अगले जाड़ों में इमली में ख़ूब लंबी-लंबी कटारें आईं।

    हमारे मोहल्ले में एक ही इमली थी, इसलिए इमली वाली के घर का पता तो साफ़ था, मगर यह समझिए कि दूसरे घरों की कोई पहचान नहीं थी। जिस घर में इमली या नीम का पेड़ नहीं था, उस घर में कबूतरों की छतरी थी। जिस घर में कबूतरों की छतरी नहीं थी, उस घर में कोई इमामबाड़ा था। एक घर ख़ाली था जिसकी कोई निशानी नहीं थी। फिर भी उस घर को सब जानते थे। उसमें जिन्न जो रहते थे। मानो हमारे मोहल्ले का हर मकान एक व्यक्ति था। यह कि घरों के नंबर भी होते हैं, इससे हम बिल्कुल अनजान थे। वाइटहेड ने एक गिलहरी का हाल लिखा है जो अपने बच्चों का हिसाब नहीं रख सकती थी। वह इंसानी ईजाद (आविष्कार), जिसे गिनती कहते हैं, उनके नज़दीक वह मुक़ाम है जहां से तहज़ीब की सरहद शुरू होती है। गिलहरियों ने तहज़ीब की इस सरहद को पार नहीं किया है।

    तो यूं समझिए कि इस बस्ती के लोगों ने तहज़ीब की सरहद अभी पार नहीं की थी। इस दुनिया में चीज़ों के आपसी रिश्ते टूटे नहीं थे। उनकी हदें आपस में घुली-मिली हुई थीं। उन्हें अलग-अलग करके गिना नहीं जा सकता था। यहां तो जानदार और बेजान के बीच भी कोई अलग करने वाली हद क़ायम नहीं हुई थी। पेड़ आदमी थे और साये घरों के रहने वाले समझे जाते थे। पतंग का कट जाना एक वारदात था और गिलहरी कभी दुम खड़ी करके सीटी जैसी आवाज़ में चिल्लाती थी तो एक हंगामा पैदा होता था।

    मैं सोचता हूं कि अलिफ़ लैला को जिस कल्पना ने जन्म दिया है, उसका विकास और परवरिश कुछ ऐसे ही माहौल में हुई होगी। आज हम उसके रचयिता या रचयिताओं के नाम भी सही तौर पर नहीं बता सकते। बस यूं समझ लीजिए कि सारे अरबों ने या एक पूरी तहज़ीब ने इसे रचा है। जब चीज़ों के रिश्ते आपस में जुड़े हों तो अफ़साना निगार (कथाकार) भी बाक़ी सृष्टि से कैसे रिश्ता तोड़ सकता है, जिस गुज़रे ज़माने का मैं ज़िक्र करता हूं, उस ज़माने में सामाजिक ज़िंदगी के सारे पहलू आपस में जुड़े थे। सामाजिक ज़िंदगी के पहलू और प्रकृति के पहलू। आदमी की पेड़ों से दोस्ती थी और जानवरों से साथ था,

    शबहा ब-हाल-ए-सग में यक उम्र सर्फ़ की है

    उसकी गली के सग ने क्या आदमी-गरी की

    यह उसी शायर का शेर है जिसने अपने मोहल्ले के कुत्तों पर बेजा दख़लंदाज़ी (अनुचित हस्तक्षेप) का इल्ज़ाम लगाया था और मसनवी में उनके ख़िलाफ़ पूरा मुक़दमा तैयार किया था। यह ऐसे ज़माने की बात है जब आदमी की बिरादरी में दूसरे जीव-जंतु भी शामिल थे, गुल, फूल, पेड़-पत्थर, पशु-पक्षी, हमारे मज़हब में, तीज-त्योहारों में, मेलों-ठेलों में, इश्क़ के मामलों में और जंग और अमन के क़िस्सों में दख़ल रखते थे और इतनी बात तो मैं आप-बीती के तौर पर भी कह सकता हूं कि मैंने बचपन में कभी रात के वक़्त मोहल्ले के किसी पेड़ को या घर में लगे हुए किसी फूल-पौधे को हाथ नहीं लगाया। हम बड़ों से यह सुनते चले आए थे कि पेड़ रात को आराम करते हैं। छुओगे तो उनकी नींद उचट जाएगी और वे परेशान होंगे और हालांकि चिड़ियों ने कड़ियों में घोंसले रखकर उन्हें समय से पहले खोखला कर दिया था और छतों से मिट्टी झड़ने लगी थी, मगर कभी किसी चिड़िया के घोंसले को नहीं उजाड़ा गया। पौधे और पेड़ उन दिनों मकानों में सजावटी हैसियत नहीं रखते थे और चिड़ियों ने घरों में ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा नहीं किया था। ये लोग घराने के सम्मानित सदस्य थे।

    ऐसे समाज में पैदा होने वाले अफ़साना निगार के लिए यह मुमकिन था कि वह आदमी को पेड़ के रूप में या जानवर की योनि में दिखाए और बंदर को कभी सुंदर लिखावट लिखते हुए और कभी दुनिया की नश्वरता पर गहरी तक़रीर करते हुए पेश करे और इसके बावजूद यथार्थवादी और वास्तविकता पसंद रहे। दास्तानों में इंसान, जानवर, वनस्पति और निर्जीव वस्तुएं अलग-अलग बिरादरियां नहीं हैं, बल्कि एक बिरादरी के अलग-अलग वर्ग हैं। जितना पीछे जाइए, अफ़साने में यह बिरादरी ज़्यादा जुड़ी और गुंथी हुई नज़र आएगी। इतनी जुड़ी और गुंथी हुई कि ख़ुद अफ़साना निगार दूसरों से अलग नहीं पहचाना जाता। प्राचीन समाज में अफ़साना होता था, अफ़साना निगार नहीं होते थे।

    अलिफ़ लैला में ख़ूबसूरत जादूगरनियां किस सहजता से अपने आशिक़ों पर मंतर फूंक कर उन्हें कभी कुत्ता, कभी हिरन बना देती हैं और शहज़ादे जंगल में चलते-चलते मुड़कर देखते हैं तो पत्थर बन जाते हैं और कोई हिम्मत वाली शहज़ादी सोने का पानी हासिल करके उन पर छिड़क देती है तो वे पत्थर से आदमी बन जाते हैं। 'फ़साना-ए-अजायब' में तोता पेड़ से गिर कर पटखनी खाता है और आदमी बन कर उठ खड़ा होता है। जान-ए-आलम, आदमी से बंदर के रूप में, बंदर के रूप से तोते के रूप में और तोते के रूप से फिर आदमी के रूप में बदल जाता है।

    वह दौर उन्हीं गिलहरियों, पतंगों और ब्याहे-बिन ब्याहे पेड़ों के साथ गुज़र गया। अब हम सताए हुए लोगों की दुनिया इतनी तंग है कि आदमी अपनी योनि में क़ैद है। इस क़ैदख़ाने से अपनी मर्ज़ी से बाहर निकल सकता है किसी दूसरे को अंदर बुला सकता है। अब हम आंकड़ों की दुनिया में रहते हैं। चीज़ों की हदबंदियां हो गई हैं। हमारे इर्द-गिर्द तहज़ीब की सरहद खिंच गई है। रेडियो और अख़बार इस सरहद के निगहबान (रक्षक) हैं, उनका यह काम है कि कोई ख़बर अफ़साना बनने लगे तो खंडन छाप दें।

    तहज़ीब की सरहद को पार करने की दास्तान सिर्फ़ इतनी नहीं है कि मैं पहले एक क़स्बे में रहता था अब शहर में गया हूं। अब आपसे क्या पर्दा, रेडियो और अख़बार हमारी इस छोटी सी बस्ती में भी पहुंच गए हैं। मैं जब पढ़ाई पूरी करके एक दफ़ा घर वापस गया था तो मैंने यह देखा कि जिन गलियों में म्युनिसिपैलिटी की लालटेन जलती छोड़ गया था वे बिजली की रोशनी से जगमगा रही थीं। जिन दुकानों पर कड़वे तेल का चराग़ जलता था, वहां बिजली भी थी और रेडियो भी था और छोटी बजरिया में एक लाइब्रेरी खुल गई थी, जिसमें लाहौर और दिल्ली के अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी के बहुत से अख़बार आते थे और पिछले महीने मैंने ख़्वाब में देखा है कि छोटी बजरिया की कंकरों वाली धूल भरी सड़क अब कोलतार की सड़क बन गई है।

    लाहौर में जहाँ अब रहता हूँ, बसों से लैस साफ़-सुथरी सीधी और चमकदार सड़कें हैं कि उन पर क़दम भटक सकते हैं, कल्पना बहक सकती है। क़दमों को भटकने से बसें और कल्पना को बहकने से इश्तेहार (विज्ञापन) रोकते हैं। इश्तेहार जो बसों के अंदर, बसों से बाहर दीवारों पर, दुकानों के माथों पर, इमारतों की ऊँचाइयों पर, ग़रज़ हर मोर्चे से नज़रों का रास्ता रोकते हैं। मैं सुबह को जब अख़बार पढ़ता हूँ, उसमें ख़बरों के बीच इश्तेहार होते हैं। रात को फ़िल्म देखने जाता हूँ तो फ़िल्म देखने से पहले इश्तेहार पढ़ता हूँ और जब प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'नया दौर' मेरे पास आती है तो सूची में नज़्मों, ग़ज़लों, अफ़सानों और लेखों के बाद एक शीर्षक इश्तेहारात मेरी नज़र को जकड़ लेता है।

    असल में हमने तहज़ीब की सरहद इन्हीं इश्तेहारों के ज़रिए पार की है। यह बात हमारी बस्ती में सबको मालूम थी कि शीशम की लकड़ी का सामान ख़ूबसूरत और मज़बूत होता है। ख़ुद अपना तजुर्बा भी यही है। आम की लकड़ी की गुलेल ज़्यादा दिन चलती थी, गिल्ली-डंडा ढंग का बनता था। हाँ, बबूल की लकड़ी की गुलेल भी अच्छी होती थी और गिल्ली भी कमाल की बनती थी और शीशम की लकड़ी की गुलेल मिल जाती तो सुभान अल्लाह। शीशम और बबूल के क़ायल हम इश्तेहारों के ज़रिए नहीं हुए थे। इस यक़ीन के पीछे पीढ़ियों का तजुर्बा काम कर रहा था और चूँकि पेड़ों से हमारा सीधा ताल्लुक़ था, इसलिए यह पुश्तैनी तजुर्बा ज़ाती तजुर्बा भी बन गया था, लेकिन यह कि कोका कोला सब शर्बतों से बेहतर चीज़ है, इसके पीछे तो पीढ़ियों का तजुर्बा काम कर रहा है और ख़ुद हमने इसे परखने की कोशिश की है। हमने यह ज्ञान इश्तेहारों से हासिल किया है।

    इश्तेहारों की ताक़त यह है कि आज कोई कंपनी यह ठान ले कि उसे गुलेलों का कारोबार करना है तो वह उसे क्रिकेट के बराबर भी लोकप्रिय बना सकती है। आख़िर जब एक साबुन इस ऐलान की वजह से मक़बूल हो सकता है कि सुरैया इससे मुँह धोती है तो शीशम की गुलेल इस ऐलान से क्यों मक़बूल नहीं हो सकती कि फ़लाँ क्रिकेट के खिलाड़ी ने बचपन में इससे हरियल मारा था।

    इश्तेहार दिल-ओ-दिमाग़ पर हमला करते हैं और अक़्ल के गिर्द घेरा डालते हैं। वे आधुनिक मनोवैज्ञानिक हथियारों से लैस होते हैं जिनके आगे कोई बचाव नहीं चलता और दिल-ओ-दिमाग़ को आख़िरकार पीछे हटना पड़ता है। इसका लाज़िमी नतीजा यह निकलना था कि जिन चीज़ों को हमने पुश्तैनी तजुर्बे के रास्ते से और इंद्रियों की सिफ़ारिश पर क़ुबूल किया था वे हमारी नज़रों से उतर जाएँ और उनकी जगह वे चीज़ें ले लें जिन्हें इश्तेहारों ने मनोवैज्ञानिक ज़ोर-ज़बरदस्ती के साथ हम पर थोप दिया है। इश्तेहारों ने जो काम ज़ोर-ज़बरदस्ती से किया है, वह आधुनिक शिक्षा ने शांतिपूर्ण तरीक़े से अंजाम दिया है। यानी आधुनिक शिक्षा को इश्तेहारों का विकसित और शांतिप्रिय रूप जानिए। पुश्तैनी तजुर्बा और इंद्रियों की सिफ़ारिश यहाँ भी काम नहीं कर रही है। जहाँ से यह तोहफ़ा हमारे लिए आया था, वहाँ एक शख़्स डी. एच. लॉरेंस नाम का गुज़रा है, जो यह कहता था कि आधुनिक शिक्षा महज़ ऊपरी शिक्षा है। इसकी औक़ात उन जूतियों की सी है जो हम पैर में डाल लेते हैं।

    सिर पर हम ख़यालात और विचारों की रद्दी की टोकरी लिए फिरते हैं और अंदर जो अँधेरा महाद्वीप आबाद है, उसकी हमें ख़बर नहीं होती और वाइटहेड ने इन ख़यालात और विचारों को ठिठुरे हुए ख़यालात कहा है। उनका कहना यह है कि कल्चर तो फ़िक्र-ओ-ख़याल की सरगर्मी और एहसास से प्रभावित होने का मामला है। इधर-उधर की जानकारी से इसका क्या वास्ता। ख़ाली-ख़ूली जानकारी रखने वाला शख़्स अल्लाह ताला की ज़मीन पर सबसे फ़ुज़ूल और लीचड़ चीज़ होता है। कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों के मुताल्लिक़ वे यूँ कहते हैं कि पुराने ज़माने की शिक्षण संस्थाओं में दार्शनिकों का मक़सद यह होता था कि छात्रों को हिकमत (ज्ञान) की दौलत बख़्शें। आजकल के कॉलेजों में हमारा मक़सद ले-देकर कुछ विषयों को पढ़ाना रह गया है।

    मैंने विलायत के डी. एच. लॉरेंस और अमेरिका के वाइटहेड के हवालों पर ही संतोष करना मुनासिब समझा है और जान-बूझकर पाकिस्तान के अल्लामा इक़बाल का इस सिलसिले में हवाला नहीं दिया है। क्या फ़ायदा कि कोई तरक़्क़ी-पसंद आलोचक उनकी रूढ़िवादिता का ज़िक्र निकाल बैठे और कोई अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर साहब ऐलान कर डालें कि इक़बाल को तो नए विज्ञानों और आधुनिक तहज़ीब से ख़्वामख़्वाह का बैर था।

    बात यह है कि जानकारी इंद्रियों से बे-ताल्लुक़ रहे और विचार और ख़यालात ख़ून का हिस्सा बनें, यानी फ़िक्र और एहसास का संजोग हो सके तो फिर यह इल्म ख़ुश्क इल्म रहता है, हिकमत नहीं बनता। इसमें वह पैदा करने वाली क़ुव्वत पैदा नहीं होती कि ख़याल से ख़याल पैदा हो और व्यावहारिक ज़िंदगी के साथ इसके मिलन से कुछ नए रंग, कुछ ताज़ा ख़ुशबुएँ जन्म लें। नज़ीर अकबराबादी ऐसा कहाँ का आलिम-फ़ाज़िल था, मगर ज्ञानी और हकीम ज़रूर था। उसकी इल्मी कमी का अंदाज़ा यूँ लगाइए कि जिस ज़माने में वह जीता था, उसमें तो फ्रायड साहब का ज़हूर हुआ था वह ज़माना कार्ल मार्क्स साहब की पूँजी से मालामाल हुआ था, यानी मुहम्मद हसन अस्करी तो मुहम्मद हसन अस्करी, यह शख़्स तो प्रोफ़ेसर मुमताज़ हुसैन तक से कम पढ़ा-लिखा था, लेकिन वह आँखें खोलने वाला घोषणापत्र जिसे 'आदमी नामा' कहते हैं, हमें इसी शायर ने दिया था। मगर यह शायर संयुक्त मख़्लूक़ का प्रवक्ता है। इसलिए इस घोषणापत्र में आदमी नामा और हंस नामा दोनों को शामिल समझिए।

    वाइटहेड ऐसे भलेमानसों ने यह सवाल उठाया है कि आख़िर तालीम और तहज़ीब को पढ़ने-लिखने ही से क्यों ख़ास समझा जाए। वैसे यह पूछने को मेरा भी जी चाहता है कि सभ्य वह कॉलेजिएट है जो कोका कोला का अंग्रेज़ी में छपा हुआ इश्तेहार पढ़ सकता है या वह किसान का बेटा है जो भैंस की पीठ पर बैठकर उसे चराता भी है और बाँसुरी भी बजाता है। मुमकिन है इस सवाल पर यह गुमान हो कि मैं कोका कोला को आधुनिक तहज़ीब की चिढ़ बनाना चाहता हूँ। यक़ीन जानिए मेरा हरगिज़ यह मक़सद नहीं कि जिस तरह मुहल्ले के किसी दक़ियानूसी बूढ़े को मसूर की दाल या बैंगन का नाम लेकर चिढ़ाते हैं, उसी तरह मैं कोका कोला का नाम लेकर आज के सभ्य आदमी को छेड़ूँ।

    चलिए इस सवाल को यह शक्ल दे लेते हैं कि तालीम-याफ़्ता वह डिग्रीधारी नौजवान है, जिसने जेम्स जीन्स की तमाम रचनाएँ पढ़ी हैं मगर आसमान पर खिले हुए तारों को देखकर यह नहीं बता सकता कि बृहस्पति (मुश्तरी) कौन-सा सितारा है, या तालीम-याफ़्ता वह अनपढ़ किसान है जो तारों को देखकर यह बता सकता है कि कितनी रात बीत गई है। जिस ज़माने में तारों को देखकर ज़मीन की दिशा और रात का समय मालूम किया जाता था, उस ज़माने में सफ़र शायद तालीम का सबसे बड़ा ज़रिया था। अलिफ़ लैला के शहज़ादे और सौदागर-ज़ादे इस हक़ीक़त के गवाह हैं। सफ़र के वक़्त वे ज़हनी तौर पर कितने कच्चे होते हैं। मगर सफ़र में नित-नए जोखिमों और लगातार जिस्मानी और रूहानी वारदातों से गुज़रने के बाद वे क्या से क्या बन जाते हैं। फिर वे हिकमत की बातें करते हैं और अनजानी सरज़मीनों के सुराग़ और कायनात के छुपे हुए राज़ बताते हैं।

    उस ज़माने में सफ़र और ठहराव दोनों के ही शैक्षिक पहलू होते थे। बस्ती में रहकर आदमी जो मेहनत-मज़दूरी करता था, उसमें भी तालीम का पहलू मौजूद रहता था। जब एक कारीगर दर्ज़ी का काम करता था और एक बाग़बान दो पौधों को मिलाकर एक नई क़लम लगाता था और एक कुम्हार घूमते हुए चाक पर गीली मिट्टी को उंगलियों से एक आकार देता था और एक वरक़ बनाने वाला चांदी और सोने के वरक़ कूटता था, तो इस मेहनत से उसका पेट भी भरता था और एफ़. आर. लुईस की ज़बान में उसकी नैतिक और सौंदर्यपरक तरबियत (विकास) भी होती थी। उसकी मेहनत, मज़दूरी के साथ-साथ उसकी रचनात्मक गतिविधि भी बन जाती थी। यह वह ज़माना था जब मज़दूरी आर्ट थी और कलाम (बातचीत) अदब (साहित्य) था। उन दिनों बूढ़ी नानियां, दादियां रातों को लंबी कहानियां सुनाती थीं और कहानी सुनने वाले उस तजुर्बे से गुज़रते थे जिससे आज हम 'इलियड' और 'ओडिसी' को पढ़ लेने के बावजूद महरूम रहते हैं। उन दिनों महान साहित्य प्रोफ़ेसर के लेक्चरों और आलोचकों की रायों से दूषित होकर लोगों तक नहीं पहुंचता था। वह आवाज़ की गर्माहट के साथ कहानी सुनाने वाले की अपनी रचनात्मक उमंगों के साथ शामिल होकर प्रसारित होता था। शायरी और अफ़साना उस ज़माने में किताब नहीं, आवाज़ की गर्माहट थे।

    मगर यह उस ज़माने की बात है जब चीज़ों के रिश्ते जुड़े हुए थे और ज़िंदगी ख़ानों में बंटी हुई नहीं थी। पेट पालने का काम मशक़्क़त नहीं था और मनोरंजन के वक़्त काम-काज के वक़्त से ऐसे अलग नहीं थे। यूं समझिए कि वह एक जुड़ा हुआ समाज था। मशीन ने इस समाज के कल-पुर्ज़े ढीले कर दिए और आधुनिक शिक्षा ने इसके रिश्तों को इतना तितर-बितर कर दिया कि अब हर चीज़ हर चीज़ से जुदा है। अब समाज का काम रचनात्मक कम और मशीनी ज़्यादा है। यहां से कल्चर के पतन की शुरुआत होती है। जब रोज़मर्रा के कामों में रचनात्मक प्रक्रिया रुक जाए या धीमी पड़ जाए तो इसे कल्चर के पतन की निशानी समझना चाहिए। टी. एस. इलियट ने इंग्लैंड में कल्चर के पतन की एक निशानी यह क़रार दी है कि वहां खाना बनाने के हुनर से लापरवाही बरती जाने लगी है। हमारा ख़ुद यही हाल है।

    'क़िस्सा चहार दरवेश' पढ़ने के बाद एहसास होता है कि हमारा दस्तरख़्वान कितना सिमट गया है और कैसा बेरंग हो गया है। कितने ऐसे खाने हैं जिनके नाम बस पुरानी दास्तानों में बाक़ी रह गए हैं। कुछ खाने हमने कभी बचपन में किसी बड़े घर की शादी में, मुहर्रम की किसी हाज़िरी में या कूंडों के आयोजन में खाए थे और अब उनका ज़ायक़ा भी भूल चुके हैं। इसकी वजह सिर्फ़ आर्थिक बदहाली नहीं हो सकती। बड़े दस्तरख़्वानों पर एहतमाम (प्रबंध) अब भी होता है मगर खाने की क़िस्में कितनी होती हैं। महज़ मुर्ग़-ए-मुसल्लम तो दस्तरख़्वान की शोभा नहीं है। मुर्ग़-ए-मुसल्लम का तो बिल्लियों को भी शौक़ होता है और शाहजहां से बुरा वक़्त किस पर आया होगा जिसे क़ैदख़ाने में सिर्फ़ एक अनाज चुनने की इजाज़त दी गई थी। शाहजहां के बावर्ची ने चने को चुना। इस चुनाव के हक़ में तर्क यह था कि वह इस एक चीज़ से साठ क़िस्म के खाने तैयार कर सकता है। ताजमहल उसी बावर्ची के ज़माने में तामीर हुआ था। अगर इजाज़त हो तो यहां मैं ज़रा अपनी बस्ती के उस बेसन के हलवे वाले को याद कर लूं जो दंगों के दिनों में बेसन का हलवा इस बोली के साथ बेचा करता था कि,

    मुसलमानो घबराओ शफ़ाअत बरमला होगी

    पढ़ो कलमा मुहम्मद का ख़रीदो हलवा बेसन का

    मुझे इस हक़ीक़त पर तब शक हुआ था और अब शक है। मगर अफ़सोस कि यह हलवे वाला हलवे में शक्कर ज़्यादा डालता था और बेसन में मिलावट होती थी। इसलिए हमें ताजमहल आख़िरकार छोड़ना पड़ा।

    ताजमहल उसी बावर्ची के ज़माने में तैयार हो सकता था, जो एक चने से साठ खाने तैयार कर सकता था। वह दौर हमारे कल्चर का चरम बिंदु था। उसी दौर में हम एक नई ज़बान गढ़ रहे थे। रचनात्मक प्रक्रिया एक सर्वव्यापी गतिविधि है। इसकी शुरुआत दुकानों और बावर्चीख़ानों से होती है और प्रयोगशालाओं और आर्ट गैलरियों में इसका अंत होता है। वह रोज़मर्रा की बोलचाल और उठने-बैठने के तौर-तरीक़ों से शुरू होकर अफ़साना और शायरी में अपने चरम को पहुंचती है। अगर समाज का काम सामूहिक रूप से रचनात्मक नहीं है तो अदब में भी रचनात्मक गतिविधि नहीं हो सकती और अफ़साने की मैं कल्पना ही यूं करता हूं जैसे वह फुलवारी है जो ज़मीन से उगती है। अफ़साना बेशक 'अलिफ़ लैला' हो मगर उसकी जड़ें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में और आम एहसास में होती हैं। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रचनात्मक प्रक्रिया की धारा धीमी पड़ गई है। बात सिर्फ़ दस्तरख़्वान तक सीमित नहीं, हमारा लिबास, हमारे खेल, हमारी दस्तकारियां, हमारे पेशे यानी हमारी हर गतिविधि में रचनात्मक प्रक्रिया की धारा कुछ सुस्त पड़ गई है। जब यह सूरत हो तो किसी ग़ैर कल्चर के लिए इस पर हमला करना आसान हो जाता है।

    क़ौम की रचनात्मक क्षमताएं सलामत हों तो दूसरे कल्चर के तत्त्व अगर दख़ल भी पाएं तो क़ौमी कल्चर का हिस्सा बन जाते हैं। हमारी सांस्कृतिक अखंडता के ज़माने में क्रिकेट हमारे यहां राह पाती तो हमारे खेलों में एक खेल का इज़ाफ़ा हो जाता। लेकिन यह वह ज़माना है जब चाट हरे पत्ते से जुदा होकर प्लेटों में बिकने लगी है और मिठाई और दोने की जुदाई हो चुकी है, शहरों से कच्ची सुराहियां और खस की टट्टियां रुख़्सत हो गईं और उनकी जगह थर्मस और कूलर गए। वे अलाव बुझ गए जिनके कांपते शोलों से काली रातों में रौशन कहानियों ने जन्म लिया था। अब हम हीटर की दुनिया में रहते हैं जिससे चिंगारियां निकलती हैं धुआं उठता है।

    ऐसे दौर में क्रिकेट का फैलाव यह रंग ला सकता था कि रुस्तम-ए-ज़मां गामा पहलवान ज़माने से कुश्ती हार कर रावी के पार खजूरों के झुंड में जा छिपे और पतंगबाज़ शहर में रहकर ताने और सज़ाएं सहें। ऐसे दौर में फ़ज़ल महमूद और कारदार तो पैदा हो सकते हैं, मीर अम्मन और नज़ीर पैदा नहीं हो सकते यानी हम एम.सी.सी. को तो हरा सकते हैं, डी. एच. लॉरेंस से टक्कर नहीं ले सकते। यूं ख़ुदफ़रेबी का क्या है, अक्सर हमारे शरीफ़ लोग अज्ञानता के युग के इस ऐलान को अब तक अपने ईमान का हिस्सा बनाए हुए हैं कि उर्दू का मुख़्तसर अफ़साना (लघु कथा) पश्चिम के मुख़्तसर अफ़साने के बराबर है।

    ख़ैर मैं तो यह कह रहा था कि तहज़ीबी ज़िंदगी की अखंडता सलामत रहे और जुड़ा हुआ समाज बाक़ी रहे तो इसका असर अफ़साने पर भी पड़ता है। फिर अफ़साना सामूहिक एहसास का वाहक नहीं रहता और उसकी अपील इतनी सर्वव्यापी नहीं होती कि उसे आम स्वीकृति की सनद हासिल हो जाए। हमारी तारीख़ में इस ख़ूबी के अफ़साने ने उन ज़मानों में जन्म लिया है जब हमारा समाज जुड़ा हुआ था। जिन ज़मानों में दास्तानों ने जन्म लिया था, उन ज़मानों में समाज इस हद तक जुड़ा हुआ था कि आदमी और आदमी के दरमियान ही नहीं, आदमी और बाहरी प्रकृति के दरमियान भी रिश्ता मज़बूत था। अब से पचास साल पहले जब सरशार 'फ़साना-ए-आज़ाद' लिख रहे थे तो उस वक़्त भी हालांकि ये रिश्ते बिखरते जा रहे थे, समाज किसी हद तक जुड़ा हुआ था।

    'फ़साना-ए-आज़ाद' में नवाब से लेकर घसियारे तक और बेगमात से लेकर भटियारनों तक अलग-अलग सामाजिक हैसियत रखने वाले किरदार आते हैं, मगर सामाजिक हैसियतों के फ़र्क़ के बावजूद उनके बीच एक रिश्ता मौजूद है। वे सब एक ही माहौल के पले-बढ़े हैं। बुद्धिवाद की परछाइयां पड़ रही हैं, मगर अभी उनकी मान्यताओं और अंधविश्वासों में साझापन बाक़ी है। उनकी बेवक़ूफ़ियों तक में एकरूपता नज़र आती है। इस तरह यह नॉवेल एक सामूहिक तहज़ीबी ज़िंदगी का और उसके ज़रिए एक सामूहिक एहसास का प्रतिनिधि है। 'मेरे भी सनम ख़ाने' तक पहुँचते-पहुँचते यह तहज़ीबी अखंडता और एकता ख़त्म हो चुकी है। यहाँ पूरा समाज नहीं, समाज का एक समूह नज़र आता है। इस समूह का बाक़ी समाज से रिश्ता इस हद तक कटा हुआ है कि नॉवेल-निगार (उपन्यासकार) के लिए यह मुमकिन हो गया है कि वह इसे बाक़ी समाज से अलग करके इतनी ख़ूबसूरती से पेश कर दे कि वह अपने आप में पूर्णता का एहसास पैदा करे।

    जब तहज़ीबी अखंडता विदा हो चुकी हो तो सामूहिक एहसास का प्रतिनिधि बनने के लिए अफ़साना-निगार को बहुत जतन करने पड़ते हैं। उसे आंतरिक ज़िंदगी की गहराइयों में यह खोजना पड़ता है कि वे कौन से एहसास, आदर्श, तमन्नाएँ और विरासत की शक्लें हैं जो तहज़ीबी ज़िंदगी और जज़्बाती चलन में दरार पड़ जाने के बावजूद साझा हैं और समाज के एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से रिश्ता जोड़ती हैं। इन साझा चीज़ों में एक तो अतीत की विरासत होती है। वर्तमान में बेशक बिखराव की स्थिति पैदा हो जाए मगर यह विरासत तो यादों की शक्ल में सामूहिक स्मृति में महफ़ूज़ रहे। अतीत पर ज़ोर देने से अफ़साना-निगार का यह मतलब नहीं होता या कम-अज़-कम नहीं होना चाहिए कि गुज़रे हुए दिनों को वापस लाया जाए। गुज़रे दिन कहाँ वापस आते हैं। जो गुम हो चुका है उसे पाया नहीं जा सकता मगर उसे याद तो रखा जा सकता है।

    डी. एच. लॉरेंस जो पुरानी ज़िंदगी पर इतना ज़ोर देते हैं, ऐसे सीधे तो थे कि इस बात को जानते हों कि गुज़रा हुआ ज़माना वापस नहीं सकता। बात वही है जो एफ़. आर. लीविस ने इस सिलसिले में लिखी है कि जो कुछ गुम हो गया है उस पर ज़ोर देना ज़रूरी है ताकि वह भुला दिया जाए। अगर हमें कोई नई व्यवस्था बनानी है तो पुरानी व्यवस्था को याद रखना चाहिए। अगर हमने पुरानी व्यवस्था को भुला दिया तो फिर हमें यह भी पता नहीं चलेगा कि किस क़िस्म की बातों के लिए संघर्ष करना चाहिए, और एक दिन नौबत यह आएगी कि हम संघर्ष से भी थक जाएँगे और मशीन के सामने हथियार डाल देंगे। मतलब यह है कि 'सर-ए-अंगुश्त-ए-हिनाई' (मेहंदी लगी उँगलियों के पोरों) का तसव्वुर भी अच्छा है कि इस तरह दिल में लहू की बूँद भी नज़र आती है और दिमाग़ में हुस्न का तसव्वुर भी क़ायम रहता है।

    मगर इस तरीक़े से अफ़साना-निगार सामूहिक एहसास को पा भी ले तो उसका अफ़साना सामूहिक अपील रखने वाला तो नहीं बन सकता। बिल्कुल मुमकिन है कि इस राह पर चलकर एक नॉवेल सामूहिक एहसास का प्रतिनिधि बन जाए, मगर 'अलिफ़ लैला' या कम-अज़-कम 'फ़साना-ए-आज़ाद' जैसी मक़बूलियत (लोकप्रियता) भी हासिल कर सके। बात यह है कि ऐसी मक़बूलियत के लिए समाज में उस प्रक्रिया का जारी रहना भी तो ज़रूरी है जिसे नैतिक और सौंदर्यपरक तरबियत (प्रशिक्षण) कहा गया है। हमारे यहाँ यह प्रक्रिया रुक चुकी है। इसके रुक जाने का नतीजा है कि चीज़ों को परखने, अच्छे और बुरे में तमीज़ करने और ख़ूबसूरती और बदसूरती में फ़र्क़ करने के हमारे अपने पैमाने नहीं रहे हैं, या यह कि अपने पैमानों पर एतबार नहीं रहा है। अब जिसे आज़ाद लोग ज़ेबा (सुंदर) कह देते हैं उसे हम ज़ेबा कहते हैं। मसलन अगर पश्चिमी देशों की औरतें ज़ुल्फ़ें तराशती (कटवाती) हैं तो हमारे यहाँ की महिलाएँ भी अपनी लंबी ज़ुल्फ़ें कटवाकर अपने हिसाब से अपनी सज-धज बढ़ाएँगी। इस सूरत में आज का शायर इस क़िस्म का शेर कहकर कि,

    नींद उसकी है दिमाग़ उसका है रातें उसकी हैं

    जिस के बाज़ू पर तेरी ज़ुल्फ़ें परेशाँ हो गईं

    आम स्वीकृति की सनद हासिल नहीं कर सकता। स्त्री-सौंदर्य के जिस तसव्वुर (कल्पना) पर इस शेर की बुनियाद है उस पर अब हमारे पूरे समाज को एतबार नहीं रहा है और उसकी जगह स्त्री-सौंदर्य का जो तसव्वुर आयात हुआ है, उस पर अभी पूरी तरह एतबार नहीं हुआ है। वह अभी फ़ैशन की मंज़िल में है, दिल-ओ-दिमाग़ में रचा-बसा नहीं है। कटी हुई ज़ुल्फ़ का सिलसिला सामूहिक कल्पना में अभी इतना लंबा नहीं हुआ है कि इसके इर्द-गिर्द तश्बीहों (उपमाओं), तल्मीहों (दृष्टांतों), इस्तआरों (रूपकों) और कहानियों का ताना-बाना बुन गया हो। इसका ज़िक्र अर्थ का पेचीदा सिलसिला पैदा नहीं कर सकता और आंतरिक ज़िंदगी के कोनों को नहीं छू सकता। जब विदेशी तौर-तरीक़े और सोचने और महसूस करने के विदेशी साँचे फ़ैशन के तौर पर जगह पाते हैं, तो पेचीदा और परत-दर-परत इज़हार (अभिव्यक्ति) के वे तरीक़े भी बेअसर हो जाते हैं जिनकी बुनियाद राष्ट्रीय तहज़ीब के पैदा किए हुए तौर-तरीक़ों और सोचने और महसूस करने के साँचों पर होती है और जिनके ज़रिए अफ़साना-निगार और शायर अपने समाज की आंतरिक ज़िंदगी तक पहुँच हासिल कर सकते हैं। फिर इस्तआरा (रूपक) गुम हो जाता है और 'रिसाला दर मारिफ़त-ए-इस्तआरा' (रूपक को समझाने वाला लेख) रह जाता है।

    फ़ैशनेबल शायर और अफ़साना-निगार अपनी आवाज़ में आम अपील पैदा करने के लिए इज़हार (अभिव्यक्ति) के उस ढंग की तरफ़ आते हैं जिसे विज्ञापनों की परंपरा ने जन्म दिया है। लफ़्ज़ों को बस इस हद तक इस्तेमाल में लाया जाता है जिस हद तक वे ऊपरी ज़िंदगी की नुमाइंदगी करते हैं। वे जज़्बाती ज़िंदगी की सतह को तुरंत थोड़ी देर के लिए ज़रूर छेड़ते हैं मगर उनमें इतनी ताक़त नहीं होती कि वे भीतर एक गूँज पैदा करें और तह में दबे हुए ख़्वाबों, तश्बीहों, यादों और विरासत की शक्लों के पेचीदा सिलसिले में कोई हरकत पैदा करें।

    ज़बान के साथ यह सुलूक ज़बान का तो सत्यानाश करता ही है मगर साथ में जज़्बाती ज़िंदगी को भी कुंद (मंद) कर देता है। ज़बान में पेचीदा रूहानी वारदातों (आध्यात्मिक अनुभवों) का इज़हार करने की सलाहियत (क्षमता) बाक़ी नहीं रहती। इधर जज़्बाती ज़िंदगी की तरबियत और तहज़ीब का सिलसिला रुक जाता है। बस फ़ालतू जज़्बात का शोर-शराबा रहता है। इसलिए जब कोई अफ़साना-निगार या शायर संजीदगी से अफ़साना या शेर लिखना चाहता है तो उसे ज़बान ही से नहीं, प्रचलित साहित्यिक रुचि और समझ से भी कुश्ती लड़नी पड़ती है।

    ज़बान के साथ यह सुलूक चीज़ों को एक ख़ास अंदाज़ से देखने पर मजबूर करता है। इस क़िस्म के नज़रिए ने उर्दू को इस्लामी ऐतिहासिक नॉवेल और रूमानी अफ़साना अता किया है। जब इतिहास को इस नज़रिए से देखा गया तो इस्लामी ऐतिहासिक नॉवेल लिखा गया। जब समकालीन ज़िंदगी के लिए इसे बरता गया तो रूमानी यथार्थवाद ने जन्म लिया और विज्ञापन की एक तकनीक यह है कि प्रचलित नज़रिए और लोकप्रिय विचारधारा को नकारो और कोई ऐसा जुमला लिखो कि राहगीर चलते-चलते रुक जाए और पोस्टर को पढ़कर चौंक पड़े। अफ़साने की एक शैली इस तरह भी पैदा हुई।

    चलिए मैं इस अफ़साने को इश्तेहारी फ़िक्शन नहीं कहता, किसी सभ्य ख़ातून की तराशी हुई ज़ुल्फ़ें कहे लेता हूँ। नए फ़िक्शन को पुराने फ़िक्शन पर यही तो बढ़त हासिल है कि इसमें नई तकनीकें बरती गई हैं। मीर अम्मन क्रिकेट खेलना जानते थे अफ़साने की नई तकनीकों से परिचित थे और 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' तो सचमुच माशूक़ की लंबी ज़ुल्फ़ है जो जुदाई की रात से भी ज़्यादा लंबी है, हालाँकि मुहम्मद हसन अस्करी ने इसे भी फ्रेंच कट बनाने की कोशिश की है। ये अफ़साना निगार अफ़साने की नई तकनीकों से वाक़िफ़ नहीं थे। हाँ, अपने समाज के तौर-तरीक़ों से, मुहब्बत और नफ़रत की रस्मों, अंधविश्वासों और मान्यताओं से, मज़हब से यानी पूरी बाहरी और भीतरी ज़िंदगी से वाक़िफ़ थे और इसी वाक़फ़ियत के बल पर दास्तानें लिखते थे।

    रہی नई तकनीकों की बात तो अपने यहाँ की नई तकनीकें वो हैं जो पश्चिमी अफ़साने में घिसी-पिटी हो चुकी हैं। मंटो साहब की तकनीक अगर मुख़्तसर अफ़साने (लघु कथा) की नई तकनीक है तो मुख़्तसर अफ़साने की पुरानी तकनीक कौन सी है। बात यह है कि पश्चिमी अफ़साने की तकनीक के ककहरे को हम तकनीक की चरम सीमा समझ रहे हैं। मगर मैं यह कहता हूँ कि अगर मैंने 'यूलिसिस' की तकनीक को भी जान लिया है तो वह मेरे किस काम की, जब तक मैं उसे अपनी क़ौम की तहज़ीबी ज़िंदगी से तालमेल में नहीं लाता हूँ और इसके ज़रिए इस क़ौम के भीतर तक, इसकी रूह तक पहुँच हासिल नहीं करता हूँ। जॉयस ने नॉवेल लिखा था, नट का तमाशा तो नहीं दिखाया था। अफ़साने का संबंध इज्तिमाई तहज़ीब और उसके स्रोतों से टूट जाए तो वह अपनी नई तकनीकों के साथ नट का तमाशा होता है या फिर इश्तेहार होता है।

    तो आज जो अफ़साना निगार सचमुच अफ़साना लिखना चाहता है, उसे यह हक़ीक़त समझने के साथ-साथ कि अफ़साने की जड़ें इज्तिमाई तहज़ीब में होती हैं, यह हक़ीक़त भी समझनी होगी कि तहज़ीबी अखंडता सलामत रहे तो सच्चे अफ़साने को सार्वजनिक स्वीकृति की सनद (प्रमाण) हासिल नहीं होती। अख़बार कहते हैं कि जापान के कुछ सिपाही जो दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त से जंगलों में छिपे हुए हैं और समझ रहे हैं कि जंग जारी है और वे मोर्चे पर हैं। जब दो तहज़ीबें आपस में टकराती हैं तो हारी हुई तहज़ीब के अफ़साना निगारों की हैसियत भी जापान के उन सिपाहियों जैसी हो जाती है। वर्तमान से उनका रिश्ता कट जाता है, वे अतीत में जीते हैं। मुझे उन सिपाहियों की अदा पसंद है मगर मैं इसमें एक सुधार ज़रूर चाहूँगा। वह यह कि आदमी अतीत में जिए, मगर वर्तमान में रहकर। यानी मैं जापान के सिपाहियों के रवैये को डी. एच. लॉरेंस या अल्लामा इक़बाल के रवैये में तब्दील करना चाहता हूँ।

    अगर बात साफ़ करने की ख़ातिर मैं इस बात को निजी मसला बनाकर पेश करूँ तो यूँ कहूँगा कि जनाब-ए-वाला मैं अफ़साना निगार कहाँ से आया, मैं तो सन सत्तावन के हारे हुए लश्कर का सिपाही हूँ। मगर यह कि मैं नेपाल के जंगल में जाकर रूपोश (ग़ायब) नहीं हुआ हूँ। अफ़साना निगार बनकर शहर में रहता हूँ। मुझे मालूम है कि सन सत्तावन की लड़ाई ख़त्म हो गई, इसलिए मैं धुआँ-गाड़ी से नहीं लड़ता। हाँ, इस हंगामे में जो सवारियाँ गुम हो गई हैं, उनकी खोज लगाता फिरता हूँ। यानी मैं अफ़साना क्या लिखता हूँ, खोए हुओं की तलाश करता हूँ और आतिश-ए-रफ़्ता (अतीत की आग) का सुराग़ लेता फिरता हूँ। लेकिन आतिश-ए-रफ़्ता के सुराग़ का सिलसिला शुरू हो जाए तो बात सन सत्तावन तक सीमित तो नहीं रह सकती। पहुँचने वाला मैदान-ए-कर्बला तक भी पहुँच सकता है और उससे पीछे जंग-ए-बद्र तक भी जा सकता है क्योंकि यह हमारे इतिहास की पहली आग है। इसी आग से तो हमारे सारे अलाव गर्म हुए हैं।

    अतीत से इसी क़िस्म का संबंध अफ़साना निगार को जापान के रूपोश सिपाही से और इस्लामी ऐतिहासिक नॉवेल लिखने वाले से अलग करता है। जापान के रूपोश सिपाही को जंग के ख़त्म होने की ख़बर नहीं है, इसलिए वह एक ज़माने में क़ैद होकर रह गया है। वह वर्तमान की तरफ़ क़दम बढ़ा सकता है अतीत में पीछे की तरफ़ सफ़र कर सकता है। अफ़साना निगार को जंग के ख़त्म होने की ख़बर होती है, इसलिए अतीत से उसका संबंध किसी एक दौर से नहीं बल्कि पूरे इतिहास से संपर्क का रूप ले लेता है और इस संपर्क का मक़सद यह होता है कि नए एहसास में पीढ़ियों का तजुर्बा और ज़मानों की चेतना भी शामिल हो।

    यानी अगर पाकिस्तान का अफ़साना निगार सन सत्तावन, मारका-ए-कर्बला और जंग-ए-बद्र से अपना रिश्ता जोड़े तो इसका मतलब यह होगा कि इस क़ौम का जो नया एहसास तामीर हो रहा है, उसमें वह एक हज़ार साला हिन्द-इस्लामी तहज़ीबी तजुर्बे को और पौने चौदह सौ साला ऐतिहासिक चेतना को भी शामिल करने के लिए प्रयासरत है और यह रिश्ता वह है जहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य एक जुड़ी हुई बिरादरी होते हैं। यूँ भी वर्तमान कोई बीर-बहूटी क़िस्म की चीज़ तो है नहीं जिसे चुटकी से पकड़ कर हथेली पर रख लिया जाए। वह तो आगे-पीछे अतीत और भविष्य का जुलूस लेकर ज़ाहिर होता है।

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