ग़ालिब का फ़लसफ़ा
(लखनऊ रेडियो स्टेशन से प्रसारण, 16 फ़रवरी 42 ई. को ग़ालिब की बरसी के मौक़े पर)
फ़लसफ़े (दर्शन) के नाम से घबराइए नहीं। फ़लसफ़ा मोटे-मोटे अनजाने शब्दों और भारी-भरकम, मुश्किल पारिभाषिक शब्दों का नाम नहीं है। फ़लसफ़ा नाम है ख़ुद को पहचानने का। यह ख़ुदा को पहचानने की सीढ़ी है। हम कौन हैं? क्या हैं? हमारे आस-पास क्या है? हमारे जज़्बात क्या हैं? हमारी आदतें और तौर-तरीक़े क्या हैं? ख़ुदा क्या है? उसके सिवा बाक़ी दुनिया क्या है? बस यही रोज़मर्रा के मसले हैं, जिनसे हम को, आप को, सब को दो-चार होना पड़ता है, कभी जान-बूझकर और कभी अनजाने में। इन्हीं को अक़्ल के उसूलों पर एक ख़ास व्यवस्था के तहत तरतीब दे लीजिए (सजा लीजिए), और लीजिए आप फ़लसफ़ी (दार्शनिक) हो गए।
फिर ग़रीब ग़ालिब, कांट और हीगल के सांचे के इंसान तो थे भी नहीं। एक ख़ुशमिज़ाज, ज़िंदादिल, अच्छी सोच वाले, तबीयतदार आदमी। बातें करते तो ज़रा गहरी, नज़र सतह की नहीं, गहराई की आदी, छिलके पर पड़ कर फिसल जाने वाली नहीं, मग्ज़ (गूदे) तक पहुँच जाने की आदी, सूझ-बूझ ग़ज़ब की। अपने इन हकीमाना (दार्शनिक) तजुर्बों और आरिफ़ाना मुशाहिदों (गहरे अवलोकनों) को अदा करते, तो कभी प्यारी नस्र (गद्य) में, कभी दिलकश नज़्म में, कभी शेर का साज़ हाथ में उठा लेते, कभी नस्र के माइक्रोफ़ोन को मुँह लगा लेते। शोहरत शायरी की ज़्यादा हो गई, वरना तहक़ीक़ (शोध) की ज़बान से तो रिवायत यह सुनने में आई है कि नज़्म और नस्र दोनों के माहिर थे, मालिक थे, बादशाह थे। नस्र लिखने बैठे तो क़लम में यह क़ुदरत कि जब चाहा रोतों को हँसा दिया, जब चाहा हँसतों को रुला दिया। शेर कहने पर आए तो ज़बान में यह असर कि सुनने वालों को लोट-पोट कर दिया। मुरझाए दिलों को खिला दिया! इंसानी फ़ितरत के राज़दार ही जो ठहरे और हिकमत (ज्ञान) व मारिफ़त (अध्यात्म) के दीवाने। गहरी अर्थपूर्ण बातों को कोमलता और ज़राफ़त (हँसी-मज़ाक़) के सुरों में अलापते। अभी 'आह' का रंग जमा दिया, अभी 'वाह' का नक़्श बिठा दिया। यही उनकी हिकमत, यही उनका फ़लसफ़ा, यही उनकी शायरी का पैग़ाम, यही उनकी ज़िंदगी का कारनामा।
दिल फ़ितरत से शोख़ लेकर आए थे और दिमाग़ बेदार (जागरूक)। शेर कमउम्री से ही कहने लगे थे, जो रंग तबीयत का शुरू से था आख़िर तक रहा। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई, पुख़्तगी (परिपक्वता) आती गई। दुनिया की नश्वरता और कायनात की अवास्तविकता का नक़्श शुरू से ही दिल पर बैठ गया था। जवानी का ज़माना रिंदी (मस्ती) और सरमस्ती का होता है, झूमते जाते हैं लेकिन इस बेहोशी में इतना होश रखते हैं:
क़त्अ-ए-सफ़र-ए-हस्ती ओ आराम-ए-फ़ना हेच
रफ़्तार-ए-नफ़स बेशतर अज़ लग़्ज़िश-ए-पा हेच
किस बात पर मग़रूर है ऐ इज्ज़-ए-तमन्ना
सामान-ए-दवा वहशत ओ तासीर-ए-दवा हेच
ज़बान की रवानी और तरकीबों की सफ़ाई इस उम्र में कैसे आ सकती थी, लेकिन ख़याल का अनोखापन और तबीयत का नयापन इस नौसिखिएपन में भी कुछ ढका-छिपा नहीं है।
महीने का नया चाँद हम-आप सब ही देखते हैं, लेकिन हज़रत ग़ालिब का देखना ही कुछ और था। हकीमाना (दार्शनिक) नज़र ने देखा और यह नुक्ता (बारीक बात) पैदा किया कि चौदहवीं का जो इतना बड़ा थाल सा चाँद होता है, वह आख़िर पैदा होता है उसी कमज़ोर, फीके और ख़याल की तरह नाज़ुक व बारीक हिलाल (पहली के चाँद) से। गोया कमाल (पूर्णता) की बुनियाद, कमज़ोरी और पतन से ही पड़ती है।
बद्र है आईना-ए-ताक़-ए-हिलाल
ग़ाफ़िलाँ! नुक़सान से पैदा है कमाल
मज़हब की बहुलता से, बाहरी रस्मों की सख़्तियों से, और गुटबाज़ी की कट्टरता से तंग आकर कहते हैं कि अगर दिली सुकून मंज़ूर है तो बस तौहीद (एकेश्वरवाद) से लौ लगा लीजिए। वहदत (एकता) की ख़ानक़ाह में एकांतवासी हो जाइए और 'यक-दाँ, यक-बीं, यक-गो' (एक को जानने वाले, एक को देखने वाले, एक को बोलने वाले) बनकर रह जाइए।
ता चंद नाज़-ए-मस्जिद-ओ-बुतख़ाना खींचिए
जूं शम्अ दिल ब-ख़ल्वत-ए-जानाना खींचिए
कायनात से इंसान सबक़ लेना चाहे, तो ज़र्रा-ज़र्रा सबक़ देने को तैयार है। इसमें ताजमहल और फ़क़ीर की झोंपड़ी का फ़र्क़ कैसा? हक़ीक़त को पहचानने वाली आँख के लिए बिजली का बल्ब और मिट्टी का दीया दोनों एक हैं। फ़ितरत की मशाता (सिंगार करने वाली) कारीगरी और पालन-पोषण की कंघी क़ुदरत के हाथ में लिए, माँग-चोटी इनकी भी दुरुस्त करती है, उनकी भी। इसी मज़मून (विषय) को कहीं यूँ अदा किया है:
महरम नहीं है तू ही नवाहा-ए-राज़ का
याँ वर्ना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का
और कहीं इन अल्फ़ाज़ में बाँधा है:
ग़ाफ़िल ये वह्म-ए-नाज़-ए-ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
बे-शाना-ए-सबा नहीं तुर्रा गयाह का
मोती की क़द्र और क़ीमत सब जानते हैं, इंसानी फ़ितरत का यह ज्ञानी कहता है कि मोती बनता है पानी के क़तरे (बूँद) से, लेकिन ऐसा ही पानी का एक क़तरा और भी तो है, मोती से कहीं ज़्यादा क़ीमती। उसे हज़रत-ए-इंसान आँखों ही आँखों में रखते हैं और बाहर उसी वक़्त निकालते हैं जब चोट पड़ लेती है, दिल पर न सही कम-अज़-कम जिस्म ही पर सही। सृष्टि के क्रम में जिसका जैसा ज़र्फ़ (क्षमता), वैसा ही उसका मर्तबा:
तौफ़ीक़ ब-अंदाज़ा-ए-हिम्मत है अज़ल से
आँखों में है वो क़तरा जो गौहर न हुआ था
फ़रमाते हैं कि इंसान के गुनाह बेशक बेहद और बेशुमार हैं, लेकिन फ़ितरत में जो पाप करने की क्षमता, बुराई की तरफ़ झुकाव, और गुनाह की ताक़त रख दी गई है, वह तो इससे भी कहीं ज़्यादा है। इंसान गुनाह कहाँ तक करेगा, जितने भी करेगा फिर भी बहुत से छूट ही जाएँगे, कर सकता होगा मगर करेगा नहीं। फिर क्या जब मुकम्मल इंसाफ़ का वक़्त आएगा, तो सच्चे न्यायकर्ता (ख़ुदा) की कृपा बंदे की इस बनावट का लिहाज़ भी न रखेगी? इस मज़मून को कई-कई तरह से अदा किया है, कहीं यूँ:
दरिया-ए-मआसी तुनुक-आबी से हुआ ख़ुश्क
मेरा सर-ए-दामन भी अभी तर न हुआ था
और कहीं यूँ:
ना-कर्दा गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद
या रब अगर इन कर्दा गुनाहों की सज़ा है
और कहीं यूँ भी:
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझसे मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग
रात को शबनम (ओस) पड़ते हमने-आपने सबने देखा है। चमन की ज़मीन भीगी पड़ी है कि सुबह आफ़ताब (सूरज) निकला और उसकी किरणों के साथ वह सारी नमी रुख़्सत। इस मंज़र पर भी कभी-कभी नज़र पड़ी होगी। ग़ालिब की नज़र इस पर भी गड़ गई। आफ़ताब का काम तो ज़िंदगी देना है, विकास बख़्शना है, और कुछ पुराने दार्शनिकों का कथन है कि शबनम पैदा भी आफ़ताब ही से होती है, लेकिन इधर किरण फूटी, उधर शबनम का वजूद भी रुख़्सत हो गया। पूर्ण (कुल) ने अंश (जुज़्व) को अपनी तरफ़ खींच लिया, अपने में जज़्ब कर लिया। ज़ाहिर में फ़ना (नष्ट) और असल में बक़ा (अमरता) हासिल हो गई। और कहते हैं, 'वहदत-उल-वजूद' (अद्वैतवाद) के फ़लसफ़े के अंदर गुम होकर कहते हैं कि यही हाल इंसान का है। 'मुमकिन-उल-वजूद' (इंसान) की तो ऐन तमन्ना यही है कि 'वाजिब-उल-वजूद' (ईश्वर) उस पर तवज्जो करे। उस पर अपनी रहमत की रौशनी का अक्स डाले और उसे अपने अंदर जज़्ब कर ले। बंदे का वजूद यूँ भी तो मालिक के सामने न होने (शून्य) के बराबर ही रहता है:
परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक
और फिर यही शर्बत एक दूसरे गिलास में:
किया आईना-ख़ाने का वो नक़्शा तेरे जल्वे ने
करे जो परतव-ए-ख़ुर्शीद आलम शबनमिस्ताँ का
मख़्लूक़ (सृष्टि) का वजूद तो ख़ुद उसकी फ़ना (नष्ट होने) की दलील है। वजूद न हो तो फ़ना का अमल हो किस चीज़ पर? मिर्ज़ा फ़रमाते हैं कि बिजली का गिरना तो सबने देखा, यह भी देखा कि बेचारे किसान की की-कराई मेहनत सब पल भर में बर्बाद हो गई और जो अनाज का ढेर था, वह राख का ढेर होकर रह गया। लेकिन किसान ही ने तो आख़िर दौड़-धूप करके इस आफ़त का ठिकाना तैयार किया था। इस आग के लिए मसाला तैयार किया था:
मिरी तामीर में मुज़्मिर है इक सूरत ख़राबी की
हयूला बर्क़-ए-ख़िर्मन का है ख़ून-ए-गर्म दहक़ाँ का
फ़ना का रंग हज़रत ग़ालिब पर शुरू से ग़ालिब (हावी) रहा। शोख़ियों और रंगीनियों के दरमियान ग़ालिब रहा, रिंदी (मस्ती) और आज़ाद-ख़याली के बावजूद ग़ालिब रहा। कहीं-कहीं तो यह लय हल्की है। धीमे सुरों में कहते हैं:
नग़महा-ए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिए
बे-सदा हो जाएगा ये साज़-ए-हस्ती एक दिन
लेकिन अक्सर यह भविष्य का रूप वर्तमान में बदल गया है और साफ़-साफ़ कहने लगे हैं कि यह वजूद (अस्तित्व) अब भी नाबूद (अस्तित्वहीन) है, जीवन के इस कारोबार की मिसाल एक जादुई दिखावे जैसी है, जो हक़ीक़त में ग़ायब है और सिर्फ़ ज़ाहिर तौर पर मौजूद है। कहते हैं:
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो असद
आलम तमाम हल्क़ा-ए-दाम-ए-ख़याल है
ब्रिटेन में एक अरसा पहले बर्कले नाम का एक दार्शनिक गुज़रा है। वह भी कुछ ऐसी ही शिक्षा दे गया है, फिर कहते हैं:
हाँ खाइयो मत फ़रेब-ए-हस्ती
हरचंद कहें कि है, नहीं है
कहते हैं और ख़ूब कहते हैं:
आलम ग़ुबार-ए-वहशत-ए-मजनूँ है सर-ब-सर
कब तक ख़याल-ए-तुर्रा-ए-लैला करे कोई!
और फिर कहते हैं, और दर्शन के रूखेपन में शायरी की रंगीनी पैदा करके कहते हैं:
शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम
लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं
तलाश किया जाए तो पूरे दीवान में शायद यही विषय सबसे ज़्यादा निकले। ख़ुदा जाने कितने अलग-अलग तरीक़ों से इसे पेश किया है। ताज्जुब नहीं कि यह महज़ 'क़ाल' (कही हुई बात) न हो, बल्कि 'हाल' (बीती हुई स्थिति) हो।
ज़िंदगी की कड़वाहटों के तजुर्बे ने उन्हें इस बात का भी विश्वासी बना दिया था कि ज़िंदगी भर इस बंधन से रिहाई पाने की कोई सूरत ही नहीं। जब तक इंसान इस मिट्टी और पानी की दुनिया में है, कुछ भी करे, ये झगड़े बहरहाल उसका साथ छोड़ने वाले नहीं। मिर्ज़ा की आपबीती उनकी निजी नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति की आपबीती है। लेकिन शेर के सधे हुए साँचे में, नाज़ुक रूप में अदा तो उन्हीं की ज़बान से हो रही है:
क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यों
यही भाव, रदीफ़, क़ाफ़िया और वज़न (छंद) के बदलाव के साथ:
ग़म-ए-हस्ती का असद किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक
और यह वजूद जैसा दिखने वाला जो कुछ और जैसा कुछ भी मौजूद है, उसकी भी बिसात (औक़ात) क्या और पायदारी (मज़बूती) कितनी?
एक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है बस रक़्स-ए-शरर होने तक
कुछ मामूली दार्शनिकों और अधूरे क़िस्म के संन्यासियों को देखा होगा, जो दुनिया से अपने-आपको मानो बिल्कुल अलग कर लेते हैं और त्याग व वैराग्य का मतलब यह समझने लगते हैं कि माँ और बाप, भाई और बहन, पड़ोसी और देशवासियों के अधिकारों की तरफ़ से आँखें बंद कर ली जाएँ। ग़ालिब की शब्दावली में इसका नाम वहशत (पागलपन) है और उनका फ़रमाना है कि इस वहशत का हक़दार तो ख़ुद अपना मन है, न कि दूसरे:
वारस्तगी बहाना-ए-बेगानगी नहीं
अपने से कर न ग़ैर से वहशत ही क्यों न हो
ईर्ष्या (जलन) का इलाज अक्सर नैतिक विचारकों ने लिखा है। मिर्ज़ा साहब की पहचान है कि यह बीमारी पैदा होती है तंग-नज़री (संकीर्णता) से और इसलिए उनके दवाख़ाने में इसका इलाज नज़र की व्यापकता है:
हसद से दिल है गर अफ़्सुर्दा सरगर्म-ए-तमाशा हो
कि चश्म-ए-तंग शायद कसरत-ए-नज़्ज़ारा से वा हो
नैतिकता के धर्म की असल और बुनियाद बहुत से ज्ञानियों और सूफ़ियों के नज़दीक इख़्लास (सच्चाई/निष्ठा) है। ग़ालिब भी इसी रास्ते के पैरोकार हैं। उनकी शायरी की शरीयत का फ़तवा है कि वज़ादारी (अपने उसूलों पर क़ायम रहना) अपने आप में सौ गुना क़द्र के लायक़ और हज़ार गुना दाद की हक़दार है:
वफ़ादारी ब-शर्त-ए-उस्तुवारी अस्ल-ए-ईमाँ है
मरे बुतख़ाना में तो काबा में गाड़ो बरहमन को
कुछ रहस्यवादियों का कथन है कि जब ईश्वरीय इच्छा को यही मंज़ूर हुआ कि बंदा फ़लाँ-फ़लाँ हदों को तोड़ दे, तो अब बंदे का उससे झिझकना और रुके रहना ख़ुद एक पाप और अहंकार है। यह बात अब मिर्ज़ा साहब की ज़बान से सुनिए:
जब करम रुख़्सत-ए-बेबाकी ओ गुस्ताख़ी दे
कोई तक़्सीर ब-जुज़ ख़िज्लत-ए-तक़्सीर नहीं
यही भाव एक दूसरे दिलकश और असरदार अंदाज़ में:
कर रहा हूँ मैं उसे नामा-ए-आमाल में नक़्ल
कुछ न कुछ रोज़-ए-अज़ल तुम ने लिखा है तो सही
ज्ञानी और बुद्धिमान सब यही कहते आए हैं कि असीमित का पूरा पता सीमित कैसे लगा सकते हैं और जो परम (स्वतंत्र) है, उसे कोई बंधा हुआ इंसान अपनी अक़्ल और समझ की गिरफ़्त में कब ला सकता है? हर एक की प्राप्ति बस उसके अपने रुतबे के लायक़ होती है। ग़ालिब ने भी इस हक़ीक़त को पाया है और ज़रा देखिएगा कि किस शायराना बाँकपन (अंदाज़) से इसे अपने तरीक़े से दोहराया है:
थक थक के हर मक़ाम पर दो चार रह गए
तेरा पता न पाएँ तो नाचार क्या करें
ईश्वर के मूल रूप को चाहने वाले को भला उसके गुणों की झलक से कब तसल्ली हो सकती है? ग़ालिब सूफ़ियों की बताई हुई, ज्ञानियों की सुझाई हुई इस हक़ीक़त को दोहराते हैं और बयान में शोख़-ज़बानी (चुलबुलेपन) का तड़का लगाते जाते हैं, शायद इसलिए कि सुनने वाले कहीं भूल न जाएँ कि ग़ालिब ख़ानक़ाह (आश्रम) की चटाई पर नहीं, मुशायरे की मसनद (गद्दी) पर बैठे हुए हैं:
दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
याँ आ पड़ी ये शर्म कि तकरार क्या करें!
इबरत (सबक़ या चेतावनी) का रंग उनके कलाम में हमेशा से मौजूद था। उम्र बढ़ती गई, और यह रंग पक्का और पक्का होता गया। यहाँ तक कि यह क़ितआ (छंद) कहा गया, जो पूरी तरह से सजा हुआ है, उम्र भर के तजुर्बों का निचोड़ है, जीवन के सारे दर्शन का ख़ुलासा है, और ज़िंदगी की कहानी का सार है:
ऐ ताज़ा-वारिदान-ए-बिसात-ए-हवा-ए-दिल
ज़िन्हार गर तुम्हें हवस-ए-नाय-ओ-नोश है
देखो मुझे जो दीदा-ए-इबरत-निगाह हो
मेरी सुनो जो गोश-ए-हक़ीक़त-नियोश है
साक़ी ब-जल्वा दुश्मन-ए-ईमान-ए-आगही
मुतरिब ब-नग़्मा रहज़न-ए-तमकीन-ओ-होश है
या शब को देखते थे कि हर गोशा-ए-बिसात
दामान-ए-बाग़बाँ ओ कफ़-ए-गुल-फ़रोश है
लुत्फ़-ए-ख़िराम-ए-साक़ी ओ ज़ौक़-ए-सदा-ए-चंग
ये जन्नत-ए-निगाह ओ फ़िरदौस-ए-गोश है
या सुब्ह-दम जो देखिए आकर तो बज़्म में
नै वो सुरूद-ओ-सोज़ न जोश-ओ-ख़रोश है
दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई
इक शम्अ रह गई है सो वो भी ख़मोश है
यह क़ितआ क्या है, मानो शायर का वसीयतनामा है। 'ग़ालिब नामा' के लेखक की तहक़ीक़ (शोध) के अनुसार इस क़ितए का ज़माना 1820 ई. है, यानी ग़ालिब की उम्र उस वक़्त कुल 30 साल की थी। अगर यह सही है तो कहना चाहिए कि ग़ालिब भरी जवानी में ही बूढ़ों की उम्र के हो चुके थे।
आख़िरी उम्र के ख़त, इबरत (सबक़) और फ़ना (नश्वरता) के विषयों से पटे पड़े हैं। 19 जून 1863 ई. को, यानी अपनी मौत से कोई छह साल पहले एक ख़त में लिखते हैं:
मेरी रूह अब जिस्म से इस तरह घबराती है जिस तरह पिंजरे में परिंदा। कोई काम, कोई मेल-जोल, कोई जलसा, कोई भीड़ पसंद नहीं। किताब से नफ़रत, शेर से नफ़रत, जिस्म से नफ़रत। यह जो कुछ लिखा है, बिना किसी अतिशयोक्ति के है और बिल्कुल हक़ीक़त का बयान है।
ख़ुर्रम आँ रोज़ कज़ीं मंज़िल-ए-वीराँ बिरवम [वह दिन मुबारक होगा जब मैं इस वीरान मंज़िल से जाऊँगा]
इस वीरान मंज़िल की वीरानी का एहसास रोज़-ब-रोज़ बढ़ता गया। एक दूसरे ख़त में, मौत से साढ़े तीन-चार साल पहले नवंबर 1865 ई. में लिखते हैं:
बरेली की नुमाइश (प्रदर्शनी) की सैर कहाँ और मैं कहाँ! ख़ुद इस नुमाइश की सैर से जिसे दुनिया कहते हैं, दिल भर गया। अब बेरंग दुनिया (आध्यात्मिक लोक) का चाहने वाला होकर, ला-इलाहा इल्लल्लाह, ला-मौजूद इल्लल्लाह, ला-मुअस्सिर फ़िल-वजूद इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, अल्लाह के सिवा कोई मौजूद नहीं, अस्तित्व में अल्लाह के सिवा किसी का प्रभाव नहीं)।
आख़िरी ज़माने के ख़तों में आमतौर पर अपना नाम अंत में यूँ लिखते हैं: नजात (मुक्ति) का चाहने वाला, ग़ालिब।, अचानक मौत का चाहने वाला, ग़ालिब। और एक आख़िरी ख़त की बिल्कुल आख़िरी लाइनें ये हैं:
ज़िंदा हूँ, मुर्दा नहीं, बीमार भी नहीं, बूढ़ा, कमज़ोर, ग़रीब, क़र्ज़दार, कानों का बहरा, क़िस्मत का मारा, ज़िंदगी से बेज़ार (तंग), मौत का उम्मीदवार ग़ालिब।
जवानी में कभी यह शेर कहा था, जो ज़बानों पर आज तक चढ़ा हुआ है और इसके मायने ख़ुदा मालूम क्या-क्या निकाले जा रहे हैं:
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त ग़ालिब
दिल के ख़ुश रखने को लेकिन ये ख़याल अच्छा है
उर्दू के इस बेहतरीन ग़ज़ल कहने वाले की ज़िंदगी अपने आप में एक ग़ज़ल थी, और इस ग़ज़ल का मतला (पहला शेर) आपने अभी सुन लिया है। अब मक़्ता (आख़िरी शेर) भी सुनकर उनकी मग़फ़िरत (शांति) की दुआ के लिए हाथ उठा दीजिए। हाली का कहना है कि आख़िरी वक़्त में वह बार-बार अपने इस शेर को पढ़ा करते थे।
दम-ए-वापसीं बर सर-ए-राह है
अज़ीज़ो अब अल्लाह ही अल्लाह है
हाशिया
(1) यह क़ुरआन पाक के 'मक़ामन महमूद' की तरफ़ तल्मीह (इशारा) है।
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