गालियाँ
मुबारक है वह शख्स जो इस वक्त गालियां खाता है। सारी बिरादरी की नज़रें उसकी तरफ उठती हैं। इतने सम्मान के बावजूद वह गरीब अत्यधिक विनम्रता से गर्दन झुकाए हुए है। कहीं-कहीं घर की औरतें यह फ़र्ज़ अदा करती हैं लेकिन ज़्यादातर जगहों पर डोमनियाँ यह पाक रस्म अदा करने के लिए बुलाई जाती हैं। नहीं मालूम यह गीत किसने बनाए हैं। कुछ-कुछ गीतों में शायरी का रंग पाया जाता है। क्या अचरज है कि किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति ने इसी रंग में अपनी कला का कमाल दिखाया हो। इस गाने के लिए गाने वालों को इनाम देना पड़ता है। दुनिया में हिंदुओं के सिवा और कौन ऐसी क़ौम है जो गालियां खाए और अपनी जेब से रुपया खर्च करे।
इस मैदान में कायस्थ लोग सभी वर्गों से बाज़ी ले गए हैं। उनके यहाँ बहुत ज़माना नहीं गुज़रा कि महफ़िलों में गालियां बक-बक कर अपनी विद्वता दिखाई जाती थी। दूसरी क़ौमें शास्त्रार्थ और ज्ञान की बहसें करती हैं, और कायस्थ हज़रात गंदी गालियां बकने में अपनी बुद्धिमत्ता दिखाते हैं। क्या उल्टी अक्ल है। शुक्र है कि यह रिवाज अब कम होता जाता है वरना गाँव में किसी लड़के या लड़की का रिश्ता ठहरा और गाँव भर के नौउम्र और होनहार लड़के गालियों की ग़ज़लें याद करने लगते थे। हफ़्तों और महीनों तक सिवाय गालियों को ज़बान पर रटने के उन्हें और कोई काम न था। घर के बड़े-बूढ़े शाम को दफ़्तर या कचहरी से लौटते तो लड़कों से यह गंदी ग़ज़लें सबक़ की तरह सुनते। और लब-ओ-लहजा दुरुस्त करते। जब बच्चों को गालियां माँ के दूध के साथ पिलाई जाएँ तो क़ौम में नैतिक शक्ति कैसे आ सकती है।
गुस्से में हम गालियां बकें, दिल्लगी में हम गाली बकें, गालियां बक कर अपनी योग्यता का ज़ोर हम दिखाएँ। गीत में गाली हम गाएँ। ज़िंदगी का कोई काम इससे खाली नहीं। यहाँ तक कि मज़हबी मामलों में भी हमारे यहाँ गाली बकने की ज़रूरत है। अन्य प्रांतों का हमें तजुर्बा नहीं मगर संयुक्त प्रांत के कुछ हिस्सों में दीवाली के दो दिन बाद दूज के दिन गाली बकने वाली पूजा होती है। सारे गाँव या मोहल्ले की औरतें नहा-धोकर जमा होती हैं। ज़मीन पर गोबर का एक पुतला बनाया जाता है। इस पुतले के इर्द-गिर्द औरतें बैठती हैं और कुछ पान-फूल चढ़ाने के बाद गाली बकना शुरू करती हैं। यह त्योहार इसीलिए बनाया गया है। आज के दिन हर औरत का फ़र्ज़ है कि वह अपने प्यारों को गालियां दे, जो आज के दिन गालियों से बच जाएगा, उसे साल भर के अंदर ज़रूर यमराज घसीट ले जाएँगे। मानो यमराज से बचने के लिए गालियों की यह दीवार उठाई गई है। हमने काल से लड़ने के लिए कैसा हथियार निकाला है।
कहीं-कहीं यह रिवाज है कि दूज के दिन बजाय अपने परिजनों के दुश्मनों को गालियां दी जाती हैं, और गोबर का पुतला फ़र्ज़ी दुश्मन समझा जाता है। दुश्मन को खूब जी भर कर कोसने के बाद औरतें इस पुतले के सीने पर ईंट का एक टुकड़ा रख देती हैं और फिर उसे मूसल से कूटना शुरू करती हैं। इस तरह दुश्मन का निशान मानो दुनिया के पन्ने से मिटा दिया जाता है। गालियों से सिर्फ़ मज़हब खाली था, वह कसर भी पूरी हो गई।
हमारी रुचि ऐसी घटिया हो गई है कि हम में से कितने ही शौक़ीन रंगीन मिज़ाज हज़रात ऐसे निकलेंगे जो हसीनों के मुँह से गालियां सुनना बहुत बड़ा सौभाग्य समझते हैं। बदज़बानी भी मानो हसीनों के नखरे में दाख़िल है। आशिकों का यह वर्ग उस हसीना को हरगिज़ माशूक़ न कहेगा जिसकी ज़बान में शोख़ी और तेज़ी नहीं। ज़बान का शोख़ होना माशूक़ियत का सबसे बड़ा हिस्सा समझा जाता है। मगर अफ़सोस है कि ज़बान की शोख़ी का अर्थ कुछ और ही ख़याल किया जाता है। मगर माशूक़ हाज़िर-जवाब हो तब तो मानो चार चाँद लग गए। मगर हमारे यहाँ ज़बान की शोख़ी गाली बकने का दूसरा नाम है। मियाँ मजनूँ लैला से हुस्न का दान तलब करते हैं। लैला तेवर बदल कर गाली दे बैठती है। मियाँ मजनूँ ज़रा और सरगर्म होते हैं तो लैला उनकी मय्यत देखने की तमन्ना ज़ाहिर करने लगती है। इस गाली-गलौज का शुमार माशूकाना शोख़ी में दाख़िल है। जिस आलम में कि ज़बान से प्रेम और अपनेपन में डूबे हुए अल्फ़ाज़ निकलने चाहिए, उस आलम में हमारे यहाँ गाली-गलौज होने लगती है और अक्सर निहायत अश्लील। मगर हमारे स्वर्ग जैसे देश में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें इन गालियों में मुहब्बत की तेज़ शराब का मज़ा आता है और जिनकी महफ़िलें बिना इस ज़बानी तेज़ी के सूनी और बे-रौनक़ रहती हैं।
हमारी तहज़ीब का बावा आदम निराला है। इसी नैतिक पतन ने हिंदुस्तान को आज ऐसी बे-ग़ैरत और अपमानित क़ौम बना रखा है। विलायत में बिलिंग्सगेट नाम का एक बाज़ार है, वहाँ की बदज़बानी सारे इंग्लैंड में मशहूर है और किताबों में उसकी मिसाल दी जाती है। मगर हमारे हिंदुस्तान की मामूली बोलचाल भी बिलिंग्सगेट के तीखेपन पर शर्मिंदगी की सुर्खी पैदा कर देगी।
गाली हमारा क़ौमी ख़मीर हो गई है। किसी इक्के पर बैठ जाइए और सुनिए कि इक्केबान अपने घोड़े को कैसी गालियां देता है। ऐसी अश्लील कि तबीयत मिचलाने लगे। उस गरीब घोड़े की अपनी ज़ात और उसकी मेहरबान माता और उसके आदरणीय पिता और उसके दुष्ट पूर्वज सब इस भाग्यशाली औलाद की बदौलत गालियां पाते हैं। हिंदुस्तान ही तो है। यहाँ के जानवरों को भी गालियों से लगाव था ही। कृपालु सरकार ने आजकल गालियां बकने के लिए एक महकमा क़ायम कर रखा है। इस महकमे में शरीफ़ज़ादे और रईसज़ादे लिए जाते हैं। उन्हें भारी वेतन दिए जाते हैं और जनता की शांति का भार उन पर रखा जाता है। इस महकमे के लोग गालियों से बात करते हैं। उनके मुँह से जो बात निकलती है, वह गंदी नजासत में डूबी हुई होती है, ये लोग गालियां बकना हुकूमत की निशानी और अपने पद की शान समझते हैं।
यह भी हमारी नासमझी की एक मिसाल है कि हम गाली बकने को अमीरी की शान ख़याल करते हैं। और मुल्कों में ज़बान की पाकीज़गी और मीठी बोली, चेहरे की गंभीरता और सहनशीलता, शराफ़त और अमीरी के स्तंभ समझे जाते हैं। और भारतवर्ष में ज़बान की गंदगी और चेहरे का झुंझलापन हुकूमत का हिस्सा ख़याल किया जाता है। देखिए मोटे-ताज़े ज़मींदार अपने आसामी को कैसी गालियां देता है। जनाब तहसीलदार साहब अपने बावर्ची को कैसी गालियां सुना रहे हैं, और सेठ जी अपने कहार पर किन गंदे अल्फ़ाज़ में गर्म होते हैं। गुस्से से नहीं सिर्फ़ हुक्म चलाने की शान जताने के लिए। गाली बकना हमारे यहाँ रियासत और शराफ़त में दाख़िल है। वाह रे हम!
इन फुटकर गालियों से तबीयत संतुष्ट न होती देख कर हमारे बुज़ुर्गों ने होली नाम का एक त्योहार निकाला कि एक हफ़्ते तक हर ख़ास-ओ-आम खूब दिल खोल कर गालियां देते हैं। यह त्योहार हमारी ज़िंदादिली का त्योहार है। होली के दिनों में हमारी तबीयतें खूब उमंग पर होती हैं और हफ़्ते भर तक ज़बानी गंदगी का एक ग़ुबार सा हमारे दिल-ओ-दिमाग़ पर छाया रहता है। जिसने होली के दिन दो-चार कबीर न गाए और दो-चार दर्जन गंदी गालियां ज़बान से न निकालीं वह कहेगा कि हम आदमी हैं। ज़िंदगी तो ज़िंदादिली का नाम है। लखनऊ में एक ज़िंदादिल अख़बार है। वह भी होली में मस्त हो जाता है और मोटे अक्षरों में पुकारता है:
आई होली आई होली, हमने अपनी धोती खोली।
यह उस ज़िंदादिल अख़बार की ज़िंदादिली है। वह सभ्य और साफ़-सुथरे मज़ाक़ का हिमायती समझा जाता है। लेकिन जिस देश में गालियों का ऐसा रिवाज़ हो, वहाँ इसकी गिनती साफ़-सुथरे मज़ाक़ में होती है। कुछ हिंदी अख़बारों की ज़िंदादिली इन दिनों अथाह हो जाती है। लगातार कबीरें छपती हैं और अक्सर कबीरें शब्दों की कारीगरी के परदे में गालियों से भरी होती हैं। अगर किसी दूसरी क़ौम का आदमी इन दो हफ़्तों के हिंदी अख़बार उठाकर देखे, तो शायद दोबारा उनकी सूरत देखने का नाम न ले। हमारे राष्ट्रीय अख़बारों की यह हालत हो जाती है।
तकियाकलाम के तौर पर भी गालियाँ बकने का रिवाज़ है। और इस बीमारी में ज़्यादातर कम पढ़े-लिखे लोग फँसे पाए जाते हैं। ये लोग कोई ख़ास गाली चुन लेते हैं और बातचीत के दौरान उसका इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक कि वह उनका तकियाकलाम हो जाती है। कई बार उनके मुँह से बेसाख़्ता (बिना सोचे-समझे) निकल पड़ती है। यह निहायत शर्मनाक आदत है। इससे नैतिक कमज़ोरी का पता चलता है और इससे बातचीत की संजीदगी बिल्कुल ख़ाक में मिल जाती है। जिन लोगों को ऐसी आदत पड़ गई हो, उन्हें अपने आप पर ज़ोर डालकर ज़बान में पाकीज़गी पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए।
ग़रज़, हम चाहे किसी और बात में शेर न हों, बदज़बानी में हम बेमिसाल हैं। कोई क़ौम इस मैदान में हमें नीचा नहीं दिखा सकती। यह हम मानते हैं कि हम में से कितने ही ऐसे लोग हैं जिनकी ज़बान की पाकीज़गी पर कोई उँगली नहीं उठाई जा सकती। मगर राष्ट्रीय हैसियत से हम इस ज़बरदस्त कमज़ोरी का शिकार हो रहे हैं। क़ौम की गिरावट या तरक़्क़ी क़ौम के चंद चुने हुए लोगों के ज़ाती कमाल पर निर्भर नहीं हो सकती।
सच तो यह है कि अभी तक हमारे नेताओं ने इस फैली हुई बीमारी को जड़ से उखाड़ने की कोई सरगर्म कोशिश नहीं की। शिक्षा की सुस्त रफ़्तार पर इसका सुधार छोड़ दिया और आम शिक्षा जैसी कुछ तरक़्क़ी कर रही है, वह जगज़ाहिर है। इस बात को दोहराने की ज़रूरत नहीं कि गालियों का असर हमारे अख़लाक़ (चरित्र) पर बहुत ख़राब पड़ता है। गालियाँ हमारे मन को भड़काती हैं। और ख़ुद्दारी और इज़्ज़त का एहसास दिलों से कम करती हैं, जो हमें दूसरी क़ौमों की निगाहों में इज़्ज़तदार बनाने के लिए ज़रूरी हैं।
हाशिये
(१) फ़रिश्ता-ए-अजल (मौत का फ़रिश्ता)
(२) मुराद मौत, यमराज का दूसरा नाम
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.