फ़ंकार और ला-शऊर
फ्रायड लिखते हैं कि आप इस भ्रम के शिकार हैं कि आपको मनोवैज्ञानिक आज़ादी हासिल है और आप इससे पीछे हटना नहीं चाहते। मुझे यह कहते हुए अफ़सोस होता है कि यहाँ पर आपके नज़रिए से मुझे असहमति है। फ्रायड की विचारधारा आज़ादी को ख़ारिज करती है और यह दावा करती है कि उसने मनोवैज्ञानिक नियतिवाद (Psychological Determinism) के सिद्धांत को बहुत यक़ीन के साथ पेश कर दिया है। मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) ने दरअसल जिन चीज़ों की व्याख्या करने की कोशिश की है, वे नाकाम कोशिशें, ख़्वाब और न्यूरोटिक लक्षणों (neurotic symptoms) जैसी चीज़ें हैं। डल्बीज़ (Dalbiez) लिखता है, कौन समझदार इंसान ऐसा है जिसने इस बात से इनकार किया हो कि ज़िक्र किए गए तथ्य तयशुदा हैं और इस सिलसिले में उनका ताल्लुक़ आज़ाद इच्छा (free will) से होता है? यह हक़ीक़त कि किसी न्यूरोटिक मरीज़ की हरकतों का तय होना उसकी किसी ख़ास ग्रंथि (Complex) के ज़रिए होता है, इस बात को साबित नहीं करती कि एक नॉर्मल आदमी को काम करने की आज़ादी नसीब नहीं होती।
ख़ुद फ्रायड यह मानता है कि मनोवैज्ञानिक नियतिवाद की हक़ीक़त को मनोविश्लेषण के नतीजों के ज़रिए तजुर्बे के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता, जैसा कि फ्रायड ने साबित करने की कोशिश की है कि जन्मजात नैतिकता जैसी कोई चीज़ नहीं भी हो सकती है, लेकिन इससे इस बात से इनकार करने की कोई वजह नहीं बनती कि अच्छे और बुरे के बीच फ़र्क़ करने की पैदाइशी और फ़ितरी सलाहियत हमारे पास नहीं है। इस सलाहियत की मौजूदगी को क़बूल न करना अक़्ल खोने के बराबर होता है। डल्बीज़ लिखता है कि, यह अजीबोगरीब है कि कोई इस चीज़ से इनकार कर सकता है कि इंसान महज़ इस वजह से कि वह अपनी समझ का इस्तेमाल करता है, यह महसूस करने के क़ाबिल होता है कि दो अलग-अलग तौर-तरीक़ों की अहमियत अलग-अलग होती है। हम एक मामूली मिसाल लें। यह एहसास करने के लिए कि ख़ुद को धोखा देने से धोखा न देना ज़्यादा बेहतर है, बुनियादी समझ से ज़्यादा किसी और चीज़ की ज़रूरत होती है। और वही बुनियादी समझ यह भी अंदाज़ा लगा सकती है कि ख़ुद को धोखा देने या उससे बचने के लिए हम आज़ाद हैं। मतलब यह कि हम अचेतन (Unconscious) के हाथों में महज़ एक मजबूर शिकार नहीं हैं।
मनोविश्लेषक इसे इस तरह लेते हैं कि सभी इंसान एक मनोवैज्ञानिक नियतिवाद के रहम-ओ-करम पर होते हैं और इस नियतिवाद में प्रेरक (motives) अचेतन में सुरक्षित पड़े रहते हैं। रिचर्ड मार्च लिखता है कि, अगर ऐसा होता तो तमाम मूल्यों और फ़ैसलों को तय करने वाले मनोवैज्ञानिक कारकों के हवाले कर देना पड़ता और इन कारकों की दिशा, मक़सद और लक्ष्य (अगर अचेतन के संदर्भ में मक़सद के बारे में बात करना मुमकिन हो) अजनबी और बज़ाहिर समझ से बाहर हैं? इस तरह हमें एक न सुलझने वाली मुश्किल का सामना करना पड़ता है। इंसान अपने कामों का ज़िम्मेदार होता है। इस ज़िम्मेदारी में यक़ीन करने से इनकार करने का मतलब ज़िंदगी को बेमानी बना देना है। यह मनोवैज्ञानिक नियतिवाद मनोविश्लेषण की एक मान्यता है और इंसानी समझ का साफ़ इनकार और हमारे तजुर्बे का खुला खंडन है।
आम इंसानी ज़िम्मेदारी का यह मसला कलाकार की ज़िम्मेदारी के मसले के साथ जुड़ा हुआ है और इसी से हमारा सीधा वास्ता है। मनोविश्लेषकों के मुताबिक़ यह मनोवैज्ञानिक नियतिवाद कलाकार पर भी असर डालता है। एक इंसान की हैसियत से कलाकार के कामों पर और कलाकार होने के नाते उसके प्रेरकों पर भी यह असर डालता है। इसकी ज़िम्मेदारी कलाकार पर नहीं डाली जा सकती क्योंकि वह अपने मन में काम करने वाली ताक़तों से हक़ीक़ी तौर पर अनजान होता है। अक़्ल से वह यह समझ सकता है कि उसका मक़सद क्या है, लेकिन जज़्बाती तौर पर उसे इसका कोई इल्म नहीं हो सकता कि वह किसी ख़ास दिशा में क्यों जाना चाहता है या यह कि उसके मन में वह क्या चीज़ है जो उसे ऐसा करने पर मजबूर करती है। उसे इसका इल्म हो भी नहीं सकता है क्योंकि यह मज़बूरी उसकी चेतना (Consciousness) की गहराई में छिपी रहती है और इसे उसकी समझ-बूझ से बाहर ही रहना चाहिए। यही वह ख़ुफ़िया अचेतन प्रेरक है जो उसके ख़याल और एहसास को रचते वक़्त और उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के कामों को तय करता है, और इस दलील के मुताबिक़ मनोविश्लेषक को इसी बात का समर्थन करने पर मजबूर होना पड़ता है कि कलाकार अपनी कलात्मक रचना के लिए नैतिक रूप से ज़िम्मेदार नहीं होता और यह कि वह मानो इस रवैये को अपनाने पर मजबूर होता है।
कलाकार की ग़ैर-ज़िम्मेदारी के इस रवैये को क़बूल नहीं किया जा सकता है। कलाकार आला दर्जे की समझ की निशानी होता है, इसलिए वह बहुत ज़्यादा ज़िम्मेदार होता है। फ्रायड इंसानी फ़ितरत में पूर्णता (perfection) की ललक की मौजूदगी से इनकार करता है। हममें से बहुत से लोगों के लिए इस विश्वास से किनारा करना मुश्किल होगा कि ख़ुद इंसान के अंदर पूर्णता के लिए यह ललक मौजूद रहती है जो उसे दिमाग़ी ताक़त और नैतिक उदात्तीकरण (moral sublimation) की मौजूदा बुलंदी पर ले आती है, लेकिन मैं ऐसी किसी भीतरी प्रेरणा के वजूद पर यक़ीन नहीं करता और इस सुखद भ्रम को क़ायम रखने की कोई सूरत नज़र नहीं आती। पूर्णता की तरफ़ ललक की मौजूदगी कोई सुखद भ्रम नहीं होता। यह सुखद ज़रूर है लेकिन भ्रम नहीं। यह ललक कोई भ्रम नहीं है। इसका सुबूत तहज़ीबी हालत के लिए इंसानी ख़्वाहिश से ही मिल जाता है। पूर्णता के लिए हमारी ख़्वाहिश की ठोस शक्ल होती है। वे कलाएँ जो तहज़ीबी हालत में केंद्रीय हैसियत रखती हैं, वे पूर्णता की तरफ़ इस ललक के असली स्वरूप का काफ़ी सुबूत मुहैया कर देती हैं... अच्छी कला में, चाहे वह किसी भी दौर या देश की हो, यह सबसे अहम ख़ूबी होती है कि वह सामग्री (मवाद) को अधूरी हालत से मुकम्मल हालत में बदलने की कलाकार की जद्दोजहद का साफ़ सुबूत होती है। यह इंसानी फ़ितरत में पूर्णता की तरफ़ ललक की मौजूदगी का भी साफ़ सुबूत होता है।
शायरी का अंतर्ज्ञान (intuition) कल्पना की दुनिया यानी अचेतन से आता है। ए. डब्ल्यू. रामसे लिखता है, कोई अज़ीम शायरी उस वक़्त तक नहीं लिखी जा सकती है जब तक कि शायर की ज़िंदगी की काम करने वाली बड़ी ताक़तों में से कुछ, या कम से कम एक, अचेतन हालत में न हो। अचेतन ताक़तों का बाहर निकलना ज़रूरी है और कुछ दिमाग़ों से उनका निकास शायरी की शक्ल में होता है... ज़्यादातर शायरी व्यक्तिगत अचेतन (Individual Unconscious) से पैदा होती है, लेकिन रज़्मिया शायरी (महाकाव्य) नस्ली अचेतन (Racial Unconscious) से पैदा होती है और इनकी तख़्लीक़ के लिए क़रीबी सामूहिक एकता की ज़रूरत होती है। एक अकेला इंसान रज़्मिया नहीं लिख सकता है। होमर जैसे ख़यालात के लिए मैं सामूहिक लेखन की वकालत नहीं कर रहा हूँ। सामूहिक या नस्ली अचेतन का इज़हार किसी एक इंसान के ज़रिए भी हो सकता है, लेकिन यह उसका सामूहिक एहसास होता है जिसका इज़हार होता है, उसकी इन्फ़िरादियत (वैयक्तिकता) का नहीं। नए दौर का आख़िरी रज़्मिया 'पैराडाइज़ लॉस्ट' (Paradise Lost) का ताल्लुक़ इसी ज़ुमरे से है। यह उस सामूहिक मज़हबी जज़्बे का इज़हार था जो उस वक़्त इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की क़ौमी ज़िंदगी में हलचल मचाए हुए था।
कलात्मक रचना में अचेतन और सामूहिक अचेतन का जो किरदार है, उसका सीधे-सादे अंदाज़ में यहाँ पर ज़िक्र मिलता है। अब हमारी ग़रज़ यह है कि कलात्मक रचनाओं में अचेतन और तथाकथित सामूहिक अचेतन के किरदार का जायज़ा लें। मनोविश्लेषकों का यह दस्तूर है कि अपने उसूलों की हिमायत के लिए ख़ुद ऐसे कलाकारों के हवाले (quotes) पेश करते हैं जो कम ज़िम्मेदारी वाले पलों में ऐसी बातें करते हैं जिनसे यह ज़ाहिर होता है मानो कोई ऐसा रहस्यमयी कारिंदा या ज़रिया है जो उनके लिए उनका काम कर देता है। मिसाल के तौर पर, सिरिल बर्ट (Cyril Burt) ने ऐसे कुछ हवालों को जमा किया है,
स्टीवेंसन (Stevenson), मेरा असली काम कुछ अनदेखे सहयोगी करते हैं जिन्हें मैं अपने दिमाग़ में बंद करके रखता हूँ... यानी दिमाग़ के वो छोटे जीव मेरे लिए आधे काम को उस वक़्त कर देते हैं जब मैं सोता रहता हूँ और संभवतः बाक़ी आधा उस वक़्त कर देते हैं जब मैं बिल्कुल जगा रहता हूँ... और बेखबरी में मैं यह समझता हूँ कि मैंने यह काम ख़ुद किया है। अपने लिए... जिसे मैं कहता हूँ, मेरा चेतन ईगो, हैट और बूट वाला आदमी, वो आदमी जिसका ज़मीर और जो ओझल होता हो, संतुलन रखने की मेज़ पर होता है। मेरा यह मान लेने को जी चाहता है कि वो कलाकार बिल्कुल नहीं है बल्कि एक ऐसा जीव है जो ऐसा नीरस है जैसे कि पनीर बेचने वाला या ख़ुद पनीर।
वॉल्टेयर (Voltaire), क्या वो मैं था जिसने इसे लिखा है?
जॉर्ज इलियट (George Eliot), उन्होंने यह इक़रार किया था कि जब वह एडम बीड (Adam Bede) लिख रहे थे तो ऐसा लग रहा था, मानो किसी दूसरे दिमाग़ ने उनके क़लम को ले लिया था और उनका मार्गदर्शन कर रहा था।
ए. ई. हाउसमेन (A. E. Housman), मेरे ख़्याल में शायरी की रचना सक्रिय से ज़्यादा एक निष्क्रिय और अनैच्छिक प्रक्रिया है... लंच में एक पॉट बीयर शराब पीकर... बीयर दिमाग़ के लिए सुकून देने वाली चीज़ है और मेरी दोपहरें मेरी ज़िंदगी का सबसे कम होश-हवास वाला हिस्सा हुआ करती हैं। मैं घूमने चला जाता हूँ, जैसे ही मैं चलता जाता हूँ, किसी ख़ास चीज़ के बारे में सोचे बिना, उस वक़्त मेरे ज़ेहन में अचानक और एक अजीब जज़्बे के साथ, कभी-कभी एक या दो मिसरे और कभी-कभी एक साथ पूरा बंद (छंद) चला आता है, जो कोई पूरी नज़्म नहीं होती। इसके बाद आमतौर पर ख़ामोशी हो जाती है और शायद फिर सोता उबलने लगता है। मैं उबलना इसलिए कहता हूँ क्योंकि प्रेरणाओं का स्रोत जो दिमाग़ में विकसित होता है, वह गहराई में होता है।
ऐसे उद्धरण आसानी के साथ बहुत सारे पेश किए जा सकते हैं। हमें बताया जाता है कि ब्लेक (Blake) ने अपनी सबसे महान तस्वीर जागते हुए ख़्वाब की हालत में बनाई। और गेटे (Goethe) ने अपना बेहतरीन नॉवेल नींद की हालत में लिखा जिसकी तुलना वह नींद में चलने से करता है और कॉलरिज (Coleridge) ने पूरी नज़्म कुबला ख़ान ख़्वाब में देखी वग़ैरह वग़ैरह... इस तथाकथित गवाही पर ग़ौर करने से पहले इस गवाही के मुक़ाबले में दूसरी क़िस्म की गवाही पेश करना दिलचस्प होगा। और वह है इलियट के लेखों से एक इबारत (गद्यांश)। यह बताने की ज़रूरत नहीं कि इलियट महज़ एक कलाकार नहीं है, एक आलोचक भी है। कहने का मतलब यह कि कलात्मक रचना के इस मसले के बारे में उसने सोच-विचार और सावधानी से ग़ौर किया है। यह है वह इबारत जो लंबी तो ज़रूर है लेकिन विस्तार से उद्धृत करने के लायक़ है:
कला की रचना में लेखक की मेहनत शायद आलोचनात्मक मेहनत हुआ करती है। छानबीन करने, मिलाने, क़रीब लाने, दुरुस्त करने, सुधारने और परखने की मेहनत। यह थका देने वाली मेहनत जितनी रचनात्मक होती है, उतनी ही आलोचनात्मक भी हुआ करती है, लेकिन कलाकार की इस आलोचनात्मक मेहनत की निंदा करने और इस नज़रिए को पेश करने का रुझान पाया जाता है कि बड़ा कलाकार वही है जो अचेतन कलाकार हो और जो अचेतन रूप से अपने झंडे पर यह अल्फ़ाज़ 'तीर-तुक्के से काम चलाता' लिख लेता है। हम में से जो अंदरूनी तौर से गूँगे और बहरे होते हैं, उन्हें विनम्र अंतरात्मा के ज़रिए इसका विकल्प मिल जाता है जो इल्हामी महारत (ईश्वरीय प्रेरणा) के बिना हमें वह करने का मशवरा देता है जिसे हम बेहतरीन तौर पर अंजाम दे सकते हैं और हमें याद दिलाता है कि हमारी रचना को जहाँ तक मुमकिन हो कमियों से पाक रहना चाहिए (अंतर्ज्ञान की कमी की भरपाई के लिए) और संक्षेप में यह कि हमारे बहुत सारे वक़्त को बर्बाद करा देता है। हमें इसका इल्म है कि आलोचनात्मक चेतना ने, जो हमें मुश्किल से उपलब्ध होती है, ज़्यादा ख़ुशक़िस्मत लोगों से रचना की गर्मी को अचानक भड़काया है... और हम यह नहीं मान लेते कि रचना में चूँकि ज़ाहिरी आलोचनात्मक कोशिश नहीं की गई है, इसलिए उसमें कोई आलोचनात्मक मेहनत है ही नहीं। हमें नहीं मालूम कि पिछले मेहनत करने वालों ने क्या तैयार किया है या बनाने वाले के ज़ेहन में आलोचना की तरह हर पल क्या होता रहता है।
यहाँ हमें ऐसा प्रमाण मिलता है जो पूरी तरह से दूसरे प्रमाणों का खंडन करता है और चूँकि यह काफ़ी सोच-विचार कर पेश किया गया है, इसलिए दूसरे प्रमाणों के मुक़ाबले में जिन्हें अपेक्षाकृत कम ग़ौर-ओ-फ़िक्र के साथ पेश किया गया है, ज़्यादा मूल्यवान है। कलाकार को मेहनत करनी पड़ती है और सख़्त मेहनत करनी पड़ती है। उसकी सारी थका देने वाली मेहनत चेतन हुआ करती है, अचेतन नहीं। वह हवा से बजने वाला कोई साज़ नहीं होता जिसे अचेतन की हवा बजाती है और अमर गीत पैदा करती है। वह कोई निष्क्रिय माध्यम नहीं जो अचेतन के हुक्म का पालन कर रहा हो। उसका काम चेतन और इरादतन क़िस्म का होता है जिसे कुछ उसूलों के मुताबिक़ अमल में लाया जाता है। उत्तेजना, उपमाओं, जुड़ावों, प्रतीकों, एहसासों और अल्फ़ाज़ के बिखराव को तरतीब में लाया जाता है और इस बे-शक्ल चीज़ को एक सुसंगत शक्ल दी जाती है और यह सिर्फ़ चेतन रूप से किया जा सकता है। जाँच-पड़ताल करने, मिलाने, व्यवस्थित करने, काटने, सुधारने और परखने की मेहनत कलाकार की चेतन मानसिक गतिविधि होती है, जिसका निर्देश उसके काम को सही ढंग से करने की ख़्वाहिश से मिलता है।
काम को सही तौर पर करना ही ज़्यादा अहम और स्पष्ट बात होती है और दूसरे तमाम मामलों की अहमियत ख़त्म हो जाती है... कम से कम वक़्ती तौर पर। जब कलाकार अपना ध्यान काम पर केंद्रित करता है तो उस वक़्त वह दूसरे तमाम मामलों से बेख़बर हो जाता है। गेटे की नींद जैसी बेख़ुदी या ब्लेक की सक्रिय नींद की हालत शायद यही उच्च स्तर की एकाग्रता थी, कोई असली बेख़ुदी या नींद नहीं। यह भी मुमकिन है कि कुछ कलाकारों के लिए ज़ाहिरी कोशिश की मुद्दत लंबी न हो। चेतना की सिर्फ़ एक झलक हो, लेकिन हमें यह नहीं मालूम कि किसी कला की रचना में क्या-क्या पिछली कोशिशें शामिल रही हैं। मनोविश्लेषक भी मुझे कुछ हद तक नीरस दिमाग़ वाले लोग मालूम होते हैं। मुझे यक़ीन है कि स्टीवेंसन, वॉल्टेयर, जॉर्ज इलियट ने यह ख़्वाब भी नहीं देखा होगा कि उनकी रचनाओं को सतही तौर पर लिया जाएगा। यह ज़ाहिर है कि वे लोग लाक्षणिक अंदाज़ में और कुछ हद तक बढ़ा-चढ़ाकर बात कर रहे थे।
वॉल्टेयर के यह कहने का मतलब कि क्या हक़ीक़त में वो मैं था जिसने वो किताब लिखी है, यह नहीं था कि वह समझता था कि वह किताब उसने नहीं, बल्कि किसी अचेतन शक्ति ने लिखी थी। यह महज़ उस इत्मीनान का इज़हार है जिसका एहसास कलाकार को उस वक़्त होता है जब उसकी रचना ख़ास तौर पर अच्छी होती है। यानी एक ऐसा इत्मीनान जिसमें थोड़ी हैरानी के अंश की भी मिलावट होती है। इसमें अपनी तारीफ़ की भी निशानी होती है, यानी एक क़िस्म की आत्म-संतुष्ट बनावटी हँसी या शाबाशी जो यह कहने के बराबर होती है कि मैं एक हैरतअंगेज़ शख़्स हूँ।
हमें अचेतन को इसलिए मानना है क्योंकि व्यावहारिक सबूतों की बुनियाद पर यह एक ज़रूरी मान्यता का काम देता है, जिससे मानसिक क्रियाओं को सुलझाया जाता है।
लेकिन अचेतन बेवजह दखल देने वाला कोई बड़ा ज़ालिम नहीं है जैसा कि मनोविश्लेषकों ने इसे समझ रखा है। अचेतन मिल्टन की 'हयूला' (Chaos) की कल्पना की तरह का कोई भयानक शहंशाह नहीं होता है जो चेतना की छोटी और कमज़ोर सल्तनत पर हमला करने के लिए हर वक़्त तैयार रहता हो ताकि हर तरफ हलचल मच जाए। यह कोई चालाक आदमी भी नहीं है जो पर्दे के पीछे से कठपुतलियों की डोर खींच रहा हो और आज़ाद और अपनी मर्ज़ी से किए गए काम का भ्रम पैदा कर रहा हो जबकि असल में कोई असली आज़ादी न हो। हम कह सकते हैं कि अचेतन की रचना हर इंसान अपने मुताबिक करता है। यह उस चीज़ से बनता है जिसे इंसान चेतन रूप से और पूरी तरह अमल में लाने, बर्ताव करने और तय करने में नाकाम रहा हो।
एहसास, छवियां, अनुभूतियां, हालात, खयाल, गरज कि वो चीज़ें जो देखी गई हैं, सुनी गई हैं और तजुर्बे में आई हैं, लेकिन जिन्हें चेतना ने पूरी तरह और संतोषजनक ढंग से नहीं निपटाया है, वही वो चीज़ें हैं जिनसे व्यक्तिगत अचेतन की रचना होती है। हमें यह कल्पना करनी है कि चेतना इन चीज़ों के सैलाब में मानो डूब गई है जिन्हें वह अपनी चेतन ज़िंदगी के फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकती है, और इसलिए वह बहुत सी चीज़ों को अचेतन में डाल देने पर मजबूर होती है, जिसकी तुलना हम कबाड़खाने से कर सकते हैं। इनमें से कुछ चीज़ों की ज़रूरत भविष्य में पड़ सकती है; ये चीज़ें, अगर ज़रूरत वाक़ई पड़ी और फौरी हुई, तो वह इस्तेमाल कर सकता है। बाक़ी दूसरी चीज़ें मुमकिन है दोबारा बाहर निकल ही न सकें और हमेशा के लिए इस कबाड़खाने में बेकार पड़ी रहें। और मुमकिन है इनमें से कुछ चीज़ें जिनको उसने पीछे छोड़ दिया है, भड़कने वाली फितरत की हों और उन्हें लापरवाही से पीछे छोड़ दिया गया हो, तो बहरहाल कमोबेश बड़े पैमाने पर आग लगने की संभावना हो सकती है जो चेतना की इमारत को, जिसे इतनी एहतियात के साथ बनाया और सजाया गया है, राख के ढेर में बदल दे। लेकिन यह आगज़नी चाहे वह कितनी ही गंभीर क्यों न हो, और कुछ मौक़ों पर यह बहुत ही गंभीर भी हो सकती है, यह साबित नहीं करती कि कबाड़खाना बाक़ी इमारत से ज़्यादा अहम है।
मेरा मक़सद यह नहीं कि कबाड़खाने से की गई तुलना को असली मायनों में लिया जाए। मैं महज़ यह बता रहा हूं कि वह चीज़ जिसे इंसान की चेतना छोड़ देती है, उसके अचेतन की रचना करती है, लेकिन यह कबाड़खाना उस चीज़ की मुनासिब मिसाल नहीं मालूम होती है जिसे फ्रायड पूर्व-चेतन (Preconscious) कहता है। फ्रायड के मुताबिक अचेतन की दो क़िस्में हैं:
हमारा अचेतन दो तरह का होता है। एक वह जो छिपा होता है लेकिन चेतन बनने की सलाहियत रखता है, और दूसरा वह जो दबा रहता है और आम तौर से चेतन बनने की सलाहियत नहीं रखता... जो छिपा रहता है और महज़ वर्णनात्मक (descriptive) मायनों में अचेतन रहता है, उसे हम पूर्व-चेतन कहते हैं। अचेतन की इस्तिलाह (term) को हम गतिशील (dynamic) रूप से अचेतन के लिए मख़सूस रखते हैं।
कलाकार का ताल्लुक़ पूर्व-चेतन से होता है जो उन खयालों और छवियों के लिए भंडार बन जाता है जिन्होंने उसे उस वक़्त आकर्षित किया होगा, जब उनसे पहला सामना हुआ होगा लेकिन फौरी इस्तेमाल की ज़रूरत पेश नहीं आई। जब वह किसी असरदार उत्तेजना (stimulus) से प्रभावित होता है तो ये छोड़े हुए खयाल और छवियां अंधेरे कोने से बाहर आ जाते हैं और उसकी चेतना को उपलब्ध हो जाते हैं। सारे खयाल और छवियां नहीं जिन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया था, बल्कि सिर्फ वही जो एक दूसरे के साथ किसी असरदार समानता के ज़रिए जुड़े रहते हैं। दूसरी क़िस्म के अचेतन से, यानी असली अचेतन से हमारा कोई काम नहीं है जो कि खयालों का खज़ाना होता है और परिभाषा के लिहाज़ से मनोविश्लेषक की मदद के बिना चेतन बनने की सलाहियत नहीं रखता।
फ्रायड लिखता है कि,
हमने देखा है, यानी हम मानने पर मजबूर हुए हैं कि बहुत सी मज़बूत मानसिक क्रियाएं या खयाल होते हैं जो खुद चेतन हुए बिना दिमाग़ों में ऐसे प्रभाव पैदा कर सकते हैं जो आम खयाल पैदा करते हैं।
अगर यह मान लिया जाए कि ये खयाल मौजूद हैं, तो उनका वजूद हमारे नज़रिए से गैर-मुनासिब है क्योंकि यह मान लिया जाता है कि ये खयाल अचेतन रहते हैं और इसीलिए कलाकार के लिए ये किसी काम के नहीं होते। क्योंकि जैसा कि हमने बार-बार ज़ोर दिया है, कलाकार अपनी सामग्री को चेतन रूप से कुछ चेतन कलात्मक मक़सदों के लिए इस्तेमाल करता है। वह किसी भी ऐसी सामग्री को इस्तेमाल नहीं कर सकता है। वह खयाल या छवि कहां से आती है, इसकी कोई अहमियत नहीं होती। 'The Rime of the Ancient Mariner' इसकी एक सटीक मिसाल है।
लिविंगस्टन लोव्स (Livingston Lowes) ने 'The Road to Xanadu' में यक़ीन के साथ यह दिखाया है कि किस तरह कोलरिज ने नज़्म में पाई जाने वाली अहम चीज़ों को उन किताबों से उधार लिया है जिन्हें वह बहुत गहराई से पढ़ा करता था, और किस तरह अलग-अलग छवियां और खयाल ज़ेहन से बाहर निकलने और नज़्म में इस्तेमाल किए जाने से पहले उसके अचेतन में पड़े रहे। ये खयाल और छवियां पहले चेतन थीं और शायर की ज़रूरत पर दोबारा चेतन शक्ल में आने से पहले अचेतन में डाल दी गई थीं। अचेतन या गहरे कुएं में, जैसा कि लिविंगस्टन लोव्स इसे कहता है, ये चीज़ें महज़ सोई हुई नहीं रहतीं। उसके मुताबिक कुछ क़िस्म की हरकतें होती रहती हैं जिन्हें वह पोंकारे (Poincaré) के अल्फ़ाज़ में इस तरह बयान करता है:
वे मच्छरों के झुंड की तरह, या अगर हम ज़्यादा इल्मी मिसाल पसंद करें तो गैसों के गतिज सिद्धांत (kinetic theory) में गैस के अणुओं (molecules) की तरह, हवा में हर तरफ तैरते फिरते हैं...
उनके आपसी टकराव से नए संयोजन (combinations) पैदा हो सकते हैं।
लेकिन इस अचेतन काम का नतीजा कोई कलाकृति नहीं हो सकता है। कलाकृति में अच्छी तरतीब, ध्यान, इच्छाशक्ति और आख़िरकार चेतना की ज़रूरत होती है। 'The Ancient Mariner' के तफ़सीली विश्लेषण के बाद लिविंगस्टन लोव्स हमारे सामने अपने नतीजे पेश करता है: 'The Rime of the Ancient Mariner' के पीछे प्रभावों (impressions) की इतनी बहुतायत है जिनकी बारीकी और विविधता पर यक़ीन नहीं होता। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन यह नज़्म प्रभावों का वैसा समूह नहीं है जिस तरह कि हीरे के कणों का समूह उन चमकते कणों का समूह हुआ करता है, और न ही शायर महज़ इन प्रभावों को ग्रहण करने और आगे पहुंचाने का कोई संवेदनशील माध्यम होता है। इस नज़्म की तह में प्रभावों के मिश्रण और मिलावट के अनगिनत रूप भी हैं जिन्हें चेतन मानसिक क्रियाओं की सतह के नीचे लाया गया है। इसमें भी एतराज़ की गुंजाइश नहीं है, लेकिन यह नज़्म अचेतन रूप से ज़ाहिर होने वाली छवियों का संगम नहीं है, जैसा कि पानी का तालाब बिखरी हुई बूंदों के मिलने से बनता है, और न ही शायर किसी छिपी हुई दुनिया में नींद में चलने वाला (sleepwalker) है। न तो चेतन प्रभाव और न ही उनकी अचेतन व्याख्याएं नज़्म की रचना करती हैं। वे इससे अलग नहीं हैं, लेकिन यह एक ऐसी हस्ती है जिसकी रचना वे नहीं करते।
इसके विपरीत हर प्रभाव एक समग्र का हिस्सा है जिसे हर अहम हिस्से में एक समग्र के रूप में पहले से दिखाया गया है... ऐसा समग्र जो प्रभावशाली कल्पनाशील खाके से बना है। इस नज़्म का बेहतरीन तत्व इसका रूप (फ़ॉर्म) है और वह रूप चुनाव की कारीगरी, मार्गदर्शक मानसिकता और रचनात्मक दिमाग की कड़ी मेहनत होती है। मेरे ज़ेहन में जो चीज़ है वह है इस अस्पष्ट लेकिन शक्तिशाली प्रभाव को कम से कम करना, लेकिन जिस ऊर्जा ने इस नज़्म को चमकदार उपमाओं के जमावड़े के बजाय नज़्म बनाया है, वह अव्यवस्था के बीच सोचने की इंसानी दिमाग की क्षमता और इसके पीछे अव्यवस्था को स्पष्टता देने की ज़ोरदार ताक़त थी, और उज्ज्वल प्रभावों और उनके छिपे हुए संगम पर पर्दा दिन की तरह छा जाती है, जैसे कि एक आका अपने गुलाम पर छा जाता है।
बनावट की ज़बरदस्त ताक़त, मिश्रित उपमाओं को, चाहे उनका स्रोत जो भी हो, एक ऐसे क्रम के अनुसार बना देती है जो उस विचार द्वारा तय होता है जो नज़्म की रचना करता है। वे उपमाएं जो नज़्म में सितारे भर देती हैं, उनका अर्थ और सौंदर्य उस रूप की वजह से होता है जो किसी योजना के विकास के आधार पर उसके अपने होते हैं। आर्नल्ड के अनुसार, कोलरिज ने बयान के अंदाज़ को अपने उद्देश्य के अधीन कर दिया है।
यह लगभग सच्चाई है। कला में बयान के अंदाज़ को हमेशा जानबूझकर उस चीज़ के अधीन कर दिया जाता है जिसे व्यक्त करना उद्देश्य होता है, जैसा कि हमने कहा कि कलाकार अव्यवस्था को एक क्रम देता है। वह बेमेल तत्वों के बीच तालमेल पैदा करता है और वह ऐसा इसलिए कर सकता है क्योंकि वह अपनी कला का मालिक होता है। कोई बेबस और लाचार गुलाम नहीं, लेकिन मनोविश्लेषकों के पास 'कुबला खान' यानी ख़्वाब की नज़्म, जिसकी रचना कोलरिज ने ख़्वाब में की, तुरुप का एक पत्ता है। लिविंगस्टन भी यह मानता है कि यह नज़्म एक अपवाद लगती है। वह लिखता है कि कुबला खान में जुड़ी हुई और आपस में संबंधित उपमाएं ऐसी बेपरवाही और शान के साथ लहराती हैं जैसे हिलते हुए और लड़खड़ाते हुए इंग्लैंड के झंडे, और उनके जुलूस जितने बेमकसद हैं उतने ही शानदार भी हैं। एंशिएंट मैरिनर में सोच अपनी शानो-शौकत के साथ मौजूद है। कुबला खान में इसका नियंत्रण ख़त्म हो गया है।
यहाँ हमारे पास कला का एक ऐसा नमूना है जिसकी रचना बिना किसी सचेत नियंत्रण के की गई थी, जबकि सोच ने अपनी सिद्धांतवादी ताक़त छोड़ दी थी और जब ध्यान का नियंत्रण और इच्छा यानी कि चेतना मौजूद नहीं थी, लेकिन यह नज़्म कोई अपवाद नहीं है। जब हम सोते हैं तो ऐसा शायद ही कभी होता है कि हम एक क़दम में चेतना से अवचेतन में चले जाते हैं। सोने और जागने के बीच धुंधलके जैसी एक स्थिति होती है, जब हम सोए हुए नज़र आ सकते हैं लेकिन सचेत दिमाग अपनी ताक़तों को नहीं छोड़ता। सोने के बाद पूरी तरह से जागने से पहले हम ऐसे ही धुंधलके जैसी स्थिति में रहते हैं।
मेरे ख़्याल में यह हर आदमी के अनुभव में आता है कि इस धुंधलके जैसी स्थिति में दिमाग काम करता रहता है। ख़ासकर सोने से पहले अगर हम कुछ चीज़ों के ख़्याल में मग्न रहे हों या अगर कोई चीज़ हमें गहराई से प्रभावित कर गई हो या पसंद आ गई हो, और मैंने देखा है कि धुंधलके की इस स्थिति में दिमाग बहुत तेज़ी के साथ काम करता है, बहुत बेचैनी के साथ, मानो हमारी ज़िंदगी का दारोमदार ही इस गतिविधि पर हो। दिमाग पर नन्ही हथौड़ी की आवाज़ को कोई भी तेज़ी से चलते हुए सुन सकता है। दिमाग काम कर सकता है और एकरूपता के साथ काम करता है, लेकिन मानसिक प्रक्रिया की ज़बरदस्त और ज़ाहिरी तीव्रता के मुक़ाबले में नतीजा बहुत ही थोड़ा निकलता है।
इस हालत में एक आदमी किसी समस्या का हल निकालने की कोशिश करता है, भाषण तैयार कर सकता है या किसी कलाकृति की रचना भी कर सकता है, लेकिन पूरी तरह जागने के बाद जो कुछ होता रहा है उसका महज़ एक अस्पष्ट खाका बाक़ी रह जाता है, लेकिन प्रभाव जो कि बहुत स्पष्ट होता है, बहुत जल्द फीका पड़ जाता है। शायद वह अपनी स्पष्टता इतने समय के लिए भी क़ायम नहीं रख सकेगा कि कोई विस्तार से लिखना शुरू करे, और जो काम परिणाम के रूप में सामने आएगा वह मानसिक प्रक्रिया की ज़ाहिरी तीव्रता के बावजूद, अनियमित, बेतरतीब और अधूरा होगा। कोलरिज के साथ जो हुआ वह यह था। वह नींद की दवा के असर में सो गया था और जब दवा का असर ख़त्म हो गया तो वह चेतना और अवचेतन के बीच धुंधलके जैसी स्थिति में पड़ा था और उसके दिमाग ने तेज़ी के साथ काम करना शुरू कर दिया। उसका दिमाग परचेस पिलग्रिमेज के इस वाक्य से सक्रिय हो गया।
यहाँ कुबला खान ने एक क़िला बनाने और उसके अंदर एक शानदार बाग़ लगाने का हुक्म दिया और इस तरह दस मील लंबी उपजाऊ ज़मीन को चारदीवारी से घेर दिया गया। और इसका नतीजा एक नज़्म के रूप में निकला। यह समझना आसान है कि कोई उत्तेजना या कोशिश का एहसास क्यों नहीं है। इस हालत में मानसिक गतिविधि लगभग स्वचालित, बिना किसी कोशिश, नियंत्रण या इच्छाशक्ति के मालूम होती है। नज़्म की स्पष्टता: छवियां उसके सामने चीज़ों की तरह उभरीं। याददाश्त की स्पष्टता और उसका जल्द धुंधला हो जाना, यह सब चीज़ें वैसी ही हैं जैसा कि होना चाहिए, और यह जोड़ा जा सकता है कि अगर कोलरिज को पोरलॉक का वह व्यक्ति न भी टोकता, तो वह पूरी नज़्म लिखने के क़ाबिल न होता। आख़िर में कुछ फीका पड़ने की प्रक्रिया ज़रूर हुई होगी, जो स्थिति मैंने अभी बयान की है वह इस टुकड़े की ख़ूबियों से मेल खाती है। टुकड़े से अधूरेपन का ख़्याल पैदा होता है, लेकिन यह अधूरापन किसी हादसे का नतीजा नहीं है। पोरलॉक का वह आदमी उतना दोष देने लायक़ नहीं था जैसा कि आलोचक कहते हैं। यह अधूरापन नज़्म में स्वाभाविक है। एक निष्पक्ष पाठक को नज़्म बिखरी हुई मालूम होती है। अलग-अलग हिस्से ढीले-ढाले तौर पर जुड़े हुए हैं और कलात्मक ढंग से नज़्म का आगे बढ़ना नामुमकिन नज़र आता है।
एक समग्र नज़्म होने के बजाय, यह नज़्म तस्वीरों, ढीले-ढाले तौर पर जुड़ी तस्वीरों का एक सिलसिला है, और आख़िरी हिस्से में प्रवाह की तीव्रता में साफ़ कमी है जो यह ज़ाहिर करती है कि मानसिक प्रक्रिया आहिस्ता-आहिस्ता कम होती गई। उपमाओं की ख़ास क़िस्म: उनकी गहरी स्पष्टता और जिस तरह उनमें से हर एक अलग नज़र आती है और पाठकों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचती है, अलग-अलग वर्णनात्मक वाक्यांशों की ध्यान खींचने वाली और याद रखने के क़ाबिल विशेषता— आनंद का रोशन गुंबद, बर्फ़ की गुफाएं, रूमानी ग़ार, असीम खाई, अंधेरा समंदर, लहरदार चश्मों के बाग़, ख़ुशबू पैदा करने वाले पेड़, पहाड़ों जैसे प्राचीन जंगल, हरियाली के सूरज से रोशन इलाक़े। उपमाएं और प्रवाह, अपने बहते हुए और कभी-कभी बेचैन प्रभाव के साथ ऐसा ज़ाहिर करते हैं कि इस नज़्म की रचना उस अर्ध-चेतन हालत में की गई थी जब ज़ाहिरी तौर पर तीव्र गतिविधि और तनाव के वास्तविक धीमेपन का विरोधाभास मौजूद होता है।
द एंशिएंट मैरिनर के संशोधित संस्करण में कोलरिज ने एक उपशीर्षक जोड़ा एक कवि की तल्लीनता (अ पोएट्स रेवरी)। इस उपशीर्षक को देने में कोलरिज ने हक़ीक़तों को नज़रअंदाज़ कर दिया था। लिविंगस्टन लोव्स ज़ोर देकर कहता है कि अगर द एंशिएंट मैरिनर में कोई ऐसी चीज़ है जो बिल्कुल नहीं है, तो वह है तल्लीनता, लेकिन यह उपशीर्षक कुबला खान की बहुत ही अच्छी परिभाषा होगा। लॉक कहता है कि जब हमारे ज़ेहन में ख़्याल बिना किसी सोच-विचार के उमड़ने लगते हैं, तो यही वह चीज़ होती है जिसे फ़्रांसीसी में रेवरी कहते हैं।
ख्यालों का सैलाब तो हर शायर के ज़ेहन में होता है लेकिन शायरी में वह उमड़ना ख़त्म हो जाता है। कुबला ख़ां में वे ख़ुशी के गुंबद के साये की तरह तैरते हैं। चलते-फिरते और जमे हुए ख्यालों और छवियों के बीच यही फ़र्क़ उन कारणों में से एक है, जिससे साबित होता है कि उधेड़बुन और कल्पना किसी कलाकृति या उसकी असल की सही परिभाषा नहीं हो सकती है। कलाकृति में ख्यालों और छवियों की अस्थिर और विरोधी धारा के बीच एक नियंत्रण करने वाली चेतन ऊर्जा काम करती रहती है, जो उन्हें क़बूल करते, रद्द करते हुए एक-दूसरे से तालमेल बिठाती है और एक साफ़ शक्ल में ढाल देती है। इनमें उधेड़बुन से अलग न सिर्फ़ मिलावट होती है बल्कि अलग-अलग तत्वों का मेल होता है।
मैं समझता हूँ कि यह ठीक तरह से साबित किया जा चुका है कि कुबला ख़ां तुरुप का पत्ता उस क़दर नहीं है जितना कि इसे समझा गया है। सही मायनों में यह ख़्वाबों की नज़्म भी नहीं है और किसी भी सूरत में यह इसका सुबूत भी नहीं हो सकती कि कलात्मक प्रक्रिया एक अचेतन प्रक्रिया होती है और यह कि फ़नकार अपनी सामग्री पर कोई चेतन नियंत्रण नहीं रखता है।
व्यक्तिगत अचेतन का वजूद हमारे लिए एक उपयोगी मान्यता की हैसियत से क़बूल करने लायक़ है। यह उपयोगी इसलिए है कि मानसिक विकार के शिकार लोगों के सिलसिले में यह कुछ अस्पष्ट मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं की व्याख्या करता है और इसलिए भी कि यह किसी कलाकृति की कुछ विशेषताओं की व्याख्या में मददगार साबित होता है। लेकिन इसमें वह ताक़त नहीं होती जो मनोविश्लेषक इससे जोड़ते हैं... कम से कम कलाकृति की रचना में तो इसका असर ही नहीं होता है, चाहे मानसिक विकार के शिकार लोगों में इसका असर कितना ही मज़बूत क्यों न कहा जाए, और मानसिक विकार में मुब्तिला लोगों के साथ भी इसका असर इसलिए होता है कि वे लोग अपनी चेतना और अपनी फ़ितरत से हासिल की गई सामग्री का इस्तेमाल संतोषजनक रूप से करने में नाकाम रहते हैं। उनके मानसिक जीवन में जो पेचीदगियां पैदा होती हैं, वे इस नाकामी के सीधे नतीजे होते हैं। कुछ नाख़ुशगवार हालात से उनका मुक़ाबला होता है, यानी कि कुछ ऐसी ख़्वाहिशें जो व्यक्तिगत या सामाजिक तौर पर अस्वीकार्य होती हैं... और इन हक़ीक़तों को ख़ुद से स्वीकार करने और उन्हें हिम्मत के साथ सुलझाने के बजाय वे नैतिक रूप से कायरतापूर्ण हरकत करने लगते हैं, यह मानने से इनकार कर देते हैं कि उनका वजूद भी है। बाद में उन पर इंतक़ाम सवार हो जाता है और वे उन्हें गुनाह की तरह पकड़ने की कोशिश करते हैं।
सामूहिक अचेतन की दूसरी मान्यता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक इसके समर्थन में जो गवाही या सुबूत पेश करते हैं, वह बहुत माक़ूल नहीं है। मैलिनोव्स्की (Malinowski) इस मान्यता पर एतराज़ करता है और इसे ग़लत ठहराता है। और मैलिनोव्स्की, युंग (Jung) के मुक़ाबले में ज़्यादा माक़ूल है और हर हालत में यह मान्यता हम लोगों के मक़सद के लिए ग़ैर-मुनासिब है। यह बताया जा चुका है कि फ़नकार अपने अचेतन का मजबूर ग़ुलाम नहीं होता है। वह एक निष्क्रिय साधन (बेजान औज़ार) नहीं हो सकता है महज़ इसलिए कि वह एक फ़नकार है।
किसी कलाकृति में, ख़ास तौर पर महान कलाकृति में, हमें ज़िंदगी के प्रत्यक्ष अनुभव यानी फ़नकार के व्यक्तिगत चेतन अनुभव नहीं मिलते बल्कि वे आदिम (जन्मजात) अनुभव होते हैं जैसा कि हमें बताया जाता है। युंग लिखता है कि वह अनुभव जो कलात्मक इज़हार के लिए सामग्री मुहैया करता है, वह एक अजीब चीज़ होता है, जो इंसानी दिमाग़ के पिछले हिस्से में पैदा होता है। यह वक़्त की उस गहराई का ख़याल दिलाता है जो हमें मानव-पूर्व युगों से अलग करता है या रोशनी और अंधेरे के मिश्रण से पैदा हुई अतिमानवीय दुनिया पेश करता है। यह आदिम अनुभव है जो इंसानी समझ से आगे निकल जाता है। यह अनंत गहराई से पैदा होता है। यह बाहरी, उदासीन, विविध, डरावना और बेतुका होता है।
आदिम अनुभव उस परदे को फाड़ या चीर देते हैं जिस पर एक सुलझी हुई और सजी-संवरी दुनिया का नक़्शा खींचा जाता है और जो कुछ भी होने वाला है, उसकी असीमित गहराई में झांकने की इजाज़त देते हैं। क्या यह दूसरी दुनियाओं का, या आत्मा के धुंधलेपन का, या इंसानी दौर से पहले की चीज़ों की शुरुआत का, या भविष्य की नई नस्लों का ख़्वाब होता है? हम यह नहीं कह सकते हैं कि वह इनमें से कोई है या कोई भी नहीं है। आदिम अनुभव ही फ़नकार की रचनात्मकता का स्रोत होता है। इसकी पैमाइश नहीं हो सकती है, इसलिए इसे कोई शक्ल देने के लिए मिथकीय धारणाओं की ज़रूरत पड़ती है। यह ख़ुद कोई शब्द या छवि पेश नहीं करता क्योंकि इसकी शक्ल धुंधली होती है। यह महज़ एक पूर्वाभास होता है जो अपने इज़हार की कोशिश करता है। यह उस बवंडर की तरह होता है जो हर उस चीज़ को जो पहुँच में होती है, पकड़ लेता है और उसे ऊपर ले जाकर एक दिखाई देने वाली शक्ल अख़्तियार कर लेता है... जो चीज़ नज़र में आती है, वही सामूहिक अचेतन है।
ये हवाले युंग के नज़रिए का ख़ासा साफ़ नक़्शा पेश करते हैं। यह सामूहिक अचेतन होता है जो फ़नकार की रचनात्मकता का स्रोत होता है और फ़नकार को ऐसे अनुभव मुहैया करता है जो ख़ुद कलाकृति में शामिल हो जाते हैं, क्योंकि यह सामूहिक अचेतन एक सक्रिय चीज़ है, एक बवंडर है जो इज़हार चाहता है और इसमें कामयाब होता है और फ़नकार को मजबूर करता है कि वह इसे एक भौतिक शक्ल दे। फ़नकार इस आदिम अनुभव को समझ नहीं सकता है क्योंकि इसकी गहराई तक पहुँचना मुश्किल है, लेकिन इसकी फ़ितरत और अहमियत को समझे बग़ैर फ़नकार इसको एक कामयाब कलात्मक शक्ल दे देता है और चूँकि यह उसके आम अनुभव से अलग होता है, यानी उन अनुभवों से जो ज़िंदगी में प्रत्यक्ष होते हैं, इसलिए फ़नकार इसे एक शक्ल देने के लिए मिथकीय रूपकों को अपनाने पर मजबूर होता है।
युंग इस मामले में फ़नकार की मजबूरी पर बार-बार ज़ोर देता है कि वह एक एजेंट, एक औज़ार, सामूहिक अचेतन का ग़ुलाम बन जाता है। वह लिखता है कि जब कभी रचनात्मक ताक़त हावी होती है, तो इंसानी ज़िंदगी पर सक्रिय ख़्वाहिश के मुक़ाबले में अचेतन की हुक्मरानी हो जाती है और वह उसी तरह ढल जाती है और चेतन ईगो (अहंकार) एक छुपी हुई धारा में बह जाता है और घटनाओं का मुशाहिदा करने वाले (दर्शक) के अलावा कुछ नहीं रहता। चल रहा काम शायर का मुक़द्दर बन जाता है और उसके मनोवैज्ञानिक विकास को तय करता है।
फ़ाउस्ट (Faust) की रचना गेटे (Goethe) नहीं करता बल्कि गेटे की रचना फ़ाउस्ट करता है। यह कहना कि गेटे ने फ़ाउस्ट की रचना नहीं की बल्कि फ़ाउस्ट ने गेटे की रचना की है, और इसे एक संजीदा और वैज्ञानिक दावे के तौर पर पेश करना महज़ बेवक़ूफ़ी है। यह यक़ीनी तौर पर गेटे है जिसने फ़ाउस्ट की रचना की है। इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकता। नियंत्रण, तवज्जो और इरादे के बग़ैर कोई कला या कोई भी रचनात्मक काम मुमकिन नहीं है और ये ख़ूबियां—यानी नियंत्रण, तवज्जो और इरादा—शायर की चेतना से आते हैं।
युंग हमें आगे बताता है कि फ़नकार सामूहिक मानस की शिफ़ा देने वाली और निजात दिलाने वाली ताक़त से प्रेरणा लेता है जो चेतना की बुनियाद होती है, और वह ज़िंदगी की उस मंशा को ताड़ लेता है जो हर आदमी में मौजूद है और हर इंसानी वजूद को एक साझा संतुलन अता करता है। वह इस नतीजे पर पहुँचता है कि कलात्मक रचना और कलात्मक प्रभाव का राज़ अनुभव की उस सतह पर वापस आकर मिलेगा जहाँ व्यक्ति नहीं बल्कि पूरी मानव जाति रहती है और जहाँ किसी एक शख़्स का दुख-सुख नहीं बल्कि इंसानी वजूद की अहमियत होती है।
मैंने युंग के सिद्धांत का विस्तार से ज़िक्र किया है क्योंकि यह एक लिहाज़ से दिलचस्प सिद्धांत है लेकिन पूरी तरह से अस्वीकार्य है। 'सामूहिक अचेतन', 'सामूहिक मन', 'सामूहिक याददाश्त', 'सामूहिक इंसान', 'प्रारंभिक छवि', 'प्रारंभिक निरर्थकता'! डॉक्टर जॉनसन तिरस्कार से चिल्ला उठता। शुरुआती तजुर्बा। यह और ऐसी दूसरी परिकल्पनाएं नाकाफ़ी सबूतों पर गढ़ ली जाती हैं। इनमें हमें कोई नए तथ्य नहीं मिलते, सिर्फ़ शब्दावली नई है। इल्हाम (ईश्वरीय प्रेरणा) के पुराने सिद्धांत को ज़ाहिर तौर पर वैज्ञानिक शक्ल में दोबारा बयान कर देते हैं। हमें पहले बताया गया था कि शायर को क़ुदरत की तरफ़ से इल्हाम होता था। शायर एक हवाई साज़ (वाद्ययंत्र) हुआ करता था जिसको इल्हाम की हवा छेड़ कर सुरीले नग़्मे पैदा करती थी।
और जैसा कि हम जानते हैं कि इल्हाम की हवा वहीं चलती है जहां उसका जी चाहता है। शायर ख़्वाब देखने वाला, ईश्वरीय दूत और सुनहरे भविष्य का अग्रदूत होता था। पुराने और नए के बीच समानता स्पष्ट है। सिर्फ़ अब सामूहिक अचेतन ने देवत्व की जगह हथिया ली है। यह आसानी से साबित किया जा सकता है कि मैं मनोविश्लेषक को लेकर वहमी नहीं हो रहा हूं और न उसके साथ नाइंसाफ़ी कर रहा हूं। मनोविश्लेषण का प्रशंसक रीड लिखता है कि कलाकृति अपनी ऊर्जा तर्कहीनता और रहस्यमयी शक्ति इड (Id) से हासिल करती है जिसे इल्हाम का स्रोत समझा जाना चाहिए। लफ़्ज़ इल्हाम के पीछे जो पुराना रूपक है वह इस हद तक साबित हो जाता है कि दिमाग़ के उस अंधेरे हिस्से से जिसे हम Id कहते हैं, शब्दों, आवाज़ों और छवियों की प्रेरणा उठती है जिससे फ़नकार अपनी कला की रचना करता है। इस पर कोई टिप्पणी ज़रूरी नहीं है।
यह कभी-कभी मान लिया जाता है कि बहुत से तथाकथित वैज्ञानिक खुलासे असल में नए नहीं होते, जिन चीज़ों को पहले अवैज्ञानिक तौर पर पेश किया गया था, उन्हें सिर्फ़ वैज्ञानिक अंदाज़ में दोहरा देते हैं या जिस चीज़ को अंतर्ज्ञान के तौर पर समझा गया था, उसकी व्याख्या वैज्ञानिक डाटा (Data) की बुनियाद पर कर दी जाती है, फिर भी सिर्फ़ यह सच्चाई कि ये खुलासे इतने नए नहीं हैं जितना कि उन्हें समझा जाता है, उन्हें ग़लत साबित नहीं करती और न उनकी अहमियत को किसी तरह कम करती है। सामूहिक अचेतन और दूसरे संबंधित मामलों के बारे में मनोविश्लेषण के खुलासे बिल्कुल अलग हैं। वे अकाट्य वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं होते बल्कि वे अनुमान होते हैं, दिलचस्प और अनोखी परिकल्पनाएं होते हैं जो नाकाफ़ी डाटा पर आधारित होते हैं और इसीलिए उन्हें ईश्वरीय इल्हाम के सिद्धांत से ज़्यादा मूल्यवान या साइंटिफ़िक नहीं समझा जा सकता है।
फ़नकार का संबंध मानव जाति से होता है और इसीलिए उसमें इस जाति की तमाम प्रतिनिधि विशेषताएं मौजूद रहती हैं। उसकी मूल प्रवृत्तियां, प्रेरणा, एहसास, बोध, ख़यालात, जज़्बात और सभी मानसिक क्रियाएं आदतन इंसानी हैं और यही चीज़ें उसकी रचना में सार्वभौमिक आकर्षण का कारण होती हैं और यह ख़ास तौर पर इसलिए होता है कि वह अपने अनुभवों से उन निजी तत्वों को हटा सकता है जो दूसरों को बुरे लगें।
युंग के अनुसार इसमें Participation mystique की हालत की तरफ़ वापसी नहीं होती। कला में इस निर्वैयक्तिकता की वजह कहीं और ढूंढनी होती है। अगर फ़नकार सामूहिक व्यक्ति होता है तो इसी अर्थ में कि वह अपनी जाति का सबसे बुद्धिमान और संवेदनशील प्रतिनिधि होता है और इसलिए वह अधिक सूक्ष्म व्यवस्था और ज़्यादा जटिल बुद्धिमत्ता का स्वामी होता है और दूसरे आदमियों के मुक़ाबले में ज़्यादा प्रभावी तरीक़े से महसूस कर सकता है और गहरी नज़र से देख सकता है लेकिन उसके तजुर्बे व्यक्तिगत होते हैं, सामूहिक नहीं और कला की रचना में वह इन अनुभवों का इस्तेमाल सचेत रूप से करता है।
इस बात से इंकार नहीं कि कला की रचना में अचेतन क्रियाएं भी सक्रिय रहती हैं लेकिन इन अचेतन क्रियाओं से किसी परिष्कृत कला की रचना नहीं होती है। वे सिर्फ़ कच्चा माल प्रदान करती हैं जिन पर फ़नकार सचेत रूप से काम करता है। कला के पीछे काम करने वाली अचेतन क्रियाएं आलोचक की नज़र में बहुत अहमियत नहीं रखतीं क्योंकि आलोचक का सरोकार पूर्ण हो चुकी कला से होता है।
रिचर्ड्स लिखता है कि, मनोविश्लेषकों का दावा जो भी हो, शायर की मानसिक क्रियाएं जांच का बहुत फ़ायदेमंद मैदान नहीं होतीं। वे अनियंत्रित अनुमानित व्याख्याओं का अखाड़ा बन जाती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस नज़्म की रचना में जो चीज़ सबसे ज़्यादा काम आती है, वह अचेतन है। शायद अचेतन क्रियाएं सचेत क्रियाओं के मुक़ाबले में ज़्यादा अहम होती हैं (हम लोगों का बहरहाल यह ख़याल नहीं है) ज़ेहन किस तरह काम करता है और इसके बारे में हम जो कुछ जानते हैं अगर उससे कहीं ज़्यादा भी जान लें, तो भी फ़नकार के दिमाग़ की आंतरिक क्रियाओं को सिर्फ़ उसकी कला के सबूत पर दिखाने की कोशिश बहुत संगीन ख़तरों का कारण बन सकती है और लियोनार्डो दा विंची पर फ्रायड या गेटे पर युंग की प्रकाशित रचनाओं पर राय क़ायम करने से मनोविश्लेषक विशेष रूप से निरर्थक आलोचक मालूम होते हैं।
हाशिए
1. Introductory lectures on Psycho-analysis
2. Psycho-analytical method and the doctrine of Fraud
3. Ibid
4. Scrutiny June 1936
5. Ibid
6. Beyond the pleasure Principle
7. Scrutiny June 1936
8. Psychology and Criticism
9. How the mind works
10. Selected Essays
11. Richard March Scrutiny June-1936
12. The Ego and the Id
13. Ibid
14. Road of xanadu
15. Ibid
16. Road to xanadu
17. Ibid
18. Modern Man in searchof Soul
19. Ibid
20. Ibid
21. Collected Essays
22. The Prinicples of Literary Criticism
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