फ़न्नी तख़्लीक़ और दर्द
एज़रा पाउंड ने कहा है कि आलोचक को कुछ सवाल ऐसे भी उठाने चाहिए जिनका कोई जवाब न दिया जा सके। इनमें से कुछ सवाल ऐसे भी होने चाहिए जिनसे न तो लेखकों को किसी क़िस्म का कोई फ़ायदा पहुँच सके न साहित्य को। इसी क़िस्म का एक सवाल मैंने पिछली दफ़ा उठाया था, यानी रचनात्मक काम के ज़रिए लिखने वाले को व्यक्तिगत रूप से कितनी संतुष्टि मिल सकती है? असल बात तो यह है कि इस मामले में सिर्फ़ उसी को बोलने का हक़ हासिल है जिसने कोई बड़ी चीज़ रची हो और आज उर्दू साहित्य की दुनिया में ऐसे आदमी सिर्फ़ एक फ़िराक़ साहब हैं। लेकिन चूँकि बड़े लेखक की मानसिक प्रक्रियाएँ आम आदमियों से इतनी अलग नहीं होतीं कि हम जैसे लोग उनके बारे में कुछ सोच ही न सकें। इसलिए मनोविज्ञान की मदद से इस मसले को समझने की कोशिश की जा सकती है।
मुझे मनोविज्ञान के बारे में जो थोड़ी-बहुत जानकारी हासिल है उसके बल पर शायद मैं कुछ कहने की हिम्मत न करता लेकिन इत्तेफ़ाक़ से मुझे इस विषय पर डॉक्टर मोहम्मद अजमल से बातचीत करने का मौक़ा मिल गया। जिन लोगों से सुक़रात ने अक़्लमंदी सीखी थी उनकी तो ख़ैर कहीं भी कमी नहीं होती। लेकिन हमारे यहाँ मुश्किल यह है कि अगर कोई ऐसी बात आ पड़े जिसमें दर्शन, मनोविज्ञान या समाजशास्त्र के किसी विशेषज्ञ से सलाह लिए बिना गुज़ारा न हो सके, तो एक आदमी ऐसा नहीं मिलता जिसकी राय पर भरोसा किया जा सके। ले-देकर अजमल साहब हैं जिनसे मुझे मदद मिलती है और जिनके ज्ञान पर मुझे एतबार भी है। शायद उनकी विद्वता भी मेरे काम न आती, अगर उनकी साहित्यिक समझ पुख़्ता न होती और उन्होंने भी इसी क़िस्म का साहित्य न पढ़ा होता जो मैंने पढ़ा है। इसीलिए मैंने उन्हें अपना उस्ताद बना रखा है।
कुल मिलाकर साहित्य की रचना और कलाकार की व्यक्तिगत संतुष्टि के मसले पर तीन-चार दिन तक बातचीत करने के बाद हम दोनों इसी नतीजे पर पहुँचे कि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस मामले में कोई निश्चित फ़ैसला नामुमकिन है, क्योंकि लेखकों में हर क़िस्म के नमूने और हर क़िस्म के प्रमाण मिलते हैं। अगर हम चाहें तो मनोविज्ञान के अनुसार यह बात बड़ी आसानी से साबित कर सकते हैं कि साहित्य की रचना लिखने वाले के दर्द का इलाज है। बल्कि रचना के ज़रिए लेखक का व्यक्तित्व विकसित होता है। एक ज़माने में कई अंग्रेज़ी आलोचकों को इन दोनों चीज़ों का संबंध दिखाने की धुन सवार हो गई थी, हालाँकि उनका दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि रहस्यवादी था। मसलन हिडलटन मरी और ह्यू आइंस फ़ॉसेट, फिर जब से युंग के मनोविज्ञान को लेखकों में लोकप्रियता हासिल हुई है, यह रुझान आलोचना में और भी स्पष्ट हो गया है। मसलन एलिज़ाबेथ ड्रू ने एलियट के व्यक्तिगत विकास का पूरा ख़ाका बना के रख दिया है।
ऐसे आलोचकों का ख़याल है कि रचनात्मक काम कलाकार के व्यक्तित्व को सुगठित बनाता है। वैसे भी आज से सवा सौ साल पहले शेली ने कह रखा है कि कवि सबसे अक़्लमंद, सबसे उम्दा और सबसे ज़्यादा ख़ुश आदमी होता है और अगर उसकी अंदरूनी ज़िंदगी पर ग़ौर करें तो सबसे ख़ुशक़िस्मत भी। आई. ए. रिचर्ड्स ने भी इस ख़याल की पुष्टि की है। उन्होंने तो एक स्थायी पैमाना बना रखा है। हर चीज़ को उसी से नापते हैं। मूल प्रवृत्तियों की व्यवस्था और संगठन हो गया या नहीं। इस नज़रिए के पक्ष में बहुत सी बातें मैं तोते की तरह दोहरा सकता हूँ। लेकिन जब कलाकारों की रचनाओं और उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी को मिला कर देखा जाए तो इस ख़याल का समर्थन इतना आसान नहीं रहता। इसलिए फ़िलहाल मैं वे तर्क पेश करूँगा जो इस नज़रिए के ख़िलाफ़ जाते हैं। यूँ तो विकास का नज़रिया फ़्रायड ही से चला है लेकिन उसके आख़िरी दौर के विचारों का समग्र प्रभाव कुछ इसी क़िस्म का होता है,
ग़म-ए-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक
इस शेर में ख़ूबी यह है कि मृत्यु और सुबह एक बात बन गए हैं और इस तरह इसमें फ़्रायड का (AMBIVALENCE) वाला नज़रिया भी आ गया है। आख़िरी ज़माने में तो फ़्रायड यह कहने लगा था कि पूरी संतुष्टि ज़िंदगी में उपलब्ध ही नहीं हो सकती। हर चीज़ महज़ एक विकल्प है, कोई ज़्यादा संतोषजनक, कोई कम संतोषजनक, बल्कि कुछ हालात में तो ज़िंदा रहने के लिए अपने आप को धोखा देना ज़रूरी हो जाता है। इसीलिए कुछ बड़ी सभ्यताओं ने अफ़ीम खाने को ज़िंदगी की ज़रूरतों में गिना है और यह बात उन सभ्यताओं के यथार्थवाद की ओर संकेत करती है। इस नज़रिए के मुताबिक़ तो हम साहित्य और कला को भी अफ़ीम की श्रेणी में शामिल कर सकते हैं। यानी साहित्य की रचना दर्द का इलाज नहीं बल्कि दर्द को भुलाने की कोशिश है।
ख़ैर फ़्रायड के विचारों की व्याख्या इस निश्चितता के साथ नहीं करनी चाहिए। उसका दिमाग़ इतना व्यापक था कि उसके यहाँ कई बार विरोधाभासी विचार भी मिल जाते हैं। इस ख़याल को फ़्रायड से ज़्यादा फ़्रायड के अनुयायियों ने बढ़ावा दिया है कि कला के ज़रिए मूल प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण (sublimation) होता है और जो संतुष्टि ज़िंदगी में हासिल नहीं हो सकती वह साहित्य के ज़रिए मिल जाती है। इस नज़रिए पर राइख़ ने यह आपत्ति की है कि अगर भूख भी मूल प्रवृत्तियों में शामिल है तो उसका उदात्तीकरण किस तरह होता है? भूखा आदमी खाना नहीं खाएगा तो मर जाएगा। खाने का कोई विकल्प नहीं हो सकता। यह मूल प्रवृत्ति नहीं बल्कि जैविक प्रक्रिया है। इसकी संतुष्टि भी सीधे तौर पर होनी चाहिए। इसके बिना जैविक प्रणाली की प्रक्रिया ठीक तरह जारी नहीं रह सकती। यौन प्रवृत्ति के उदात्तीकरण के भी कोई मायने नहीं। उदात्तीकरण तो सिर्फ़ वे मूल प्रवृत्तियाँ पा सकती हैं जिनके रूपों को फ़्रायड ने (SEXUALITY POLYMORPHOUS) कहा है। इस उदात्तीकरण की गुंजाइश भी उस वक़्त निकलती है जब जैविक प्रक्रिया के रूप में यौन की सीधी संतुष्टि हासिल हो चुकी हो, इस संतुष्टि का कोई विकल्प नहीं। मूल प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण इसी संतुष्टि की बुनियाद पर शुरू होता है। इस संतुष्टि के बिना आदमी जो काम भी करेगा, उसकी हैसियत उदात्तीकरण की नहीं बल्कि प्रतिक्रिया (REACTION FORMATION) की होगी।
जैविक प्रक्रियाओं के रुक जाने से जो बेचैनी (STASIS ANXIETY) पैदा होती है, वह उन गतिविधियों से ख़त्म नहीं होती जिनकी हैसियत महज़ प्रतिक्रिया की हो। उदात्तीकरण की हालत में आदमी अपने काम से आनंद लेता है। प्रतिक्रिया की हालत में या तो काम बड़ी मुश्किल से होता है या आदमी एक मजबूरी के आलम में काम करता ही चला जाता है। लेकिन काम करने में उसे कोई मज़ा नहीं आता।
राइख़ के इस स्पष्टीकरण की बुनियाद पर कह सकते हैं कि साहित्य दो तरह का होता है। एक तो उदात्तीकरण का, दूसरे प्रतिक्रिया का। लेकिन हमें लेखकों की व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में ऐसे विवरण मालूम नहीं जिनके आधार पर फ़ैसला कर सकें कि फ़लाँ कवि में उदात्तीकरण हो रहा है और फ़लाँ कवि में प्रतिक्रिया। उदात्तीकरण की मिसाल के तौर पर ज़्यादा से ज़्यादा गेटे का नाम लिया जा सकता है क्योंकि वह सुकून और कलात्मक रचना के ज़रिए हासिल होने वाली ख़ुशी का बहुत ज़िक्र करता है, लेकिन सवाल यह है कि गेटे के व्यक्तित्व में ख़ुद को धोखा देने की प्रवृत्ति और आध्यात्मिक 'चार सौ बीसी' कितनी थी? अपने आध्यात्मिक सुकून का ढिंढोरा पीटना उदात्तीकरण की निशानी नहीं बल्कि यह ख़ुद प्रतिक्रिया की स्थिति है।
बड़े शायरों में से एक बोदलेयर ऐसा है जिसने खुद विस्तार से बताया है कि वह कविताएँ किस तरह लिखता था। उसके लिए रचनात्मक काम एक बड़ी मुसीबत था। वह कविताएँ लिखने से पहले पब्लिशर से पैसे ले लेता और उन्हें खर्च कर डालता। दिन-रात कमरे में बंद पड़ा रहता। आख़िर जब कोई चारा न रहता तो कविताएँ लिखता। कुछ इसी तरह का हाल एडगर एलन पो का है। तीसरी मिसाल मार्सेल प्रूस्त की है जो या तो बेकार लेटा रहता या फिर लगातार अड़तालीस-अड़तालीस घंटे सोए बिना लिखता चला जाता। इन लोगों का रचनात्मक काम प्रतिक्रिया (reaction) की किस्म का है। यहाँ एक साहित्यिक सवाल पैदा होता है। क्या इर्तेफ़ा (उदात्तीकरण/sublimation) की शायरी प्रतिक्रिया की शायरी से मूल्य में ज़रूरी तौर पर बेहतर होगी? अगर बोदलेयर को पूरा इर्तेफ़ा हासिल हो जाता तो क्या वह अपने समाज के बारे में ऐसी मूल्यवान बातें कह सकता जिनकी बदौलत उसकी शायरी को पैग़म्बरी का रुतबा हासिल हुआ?
राइख तो कहता है कि ऐसे बीमारों का भी एक सामाजिक मूल्य है, ये लोग सामाजिक सच्चाई की ऐसी गहरी समझ रखते हैं जो देखने में सेहतमंद लोगों को हासिल नहीं होती। अजमल साहब के अनुसार, राइख की किताब पढ़कर तो यह जी चाहता है कि हम भी सिज़ोफ्रेनिक (schizophrenic) होते। तो मतलब यह कि अगर शायरी इर्तेफ़ा की नहीं बल्कि प्रतिक्रिया की है, तो भी पढ़ने वालों के लिए कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। सारी मुसीबत शायर को उठानी पड़ती है। लेकिन मेरा सवाल तो उन लोगों से है जो शायरी को संतुष्टि का साधन या व्यक्तित्व के विकास का ज़रिया समझते हैं। वे प्रतिक्रिया वाली शायरी को साहित्य में क्या दर्जा देंगे?
अच्छा, साहित्य के बारे में एक नज़रिया तो यह हुआ जिसमें रचना को मूल प्रवृत्तियों (instincts) के इर्तेफ़ा का ज़रिया समझा जाता है और साहित्य ज़िंदगी का विकल्प बनकर रह जाता है। दूसरा नज़रिया वह है जिसमें साहित्य को सपने के समान समझा जाता है। अब सवाल यह है कि सपना क्या होता है? सपनों के बारे में एक लोकप्रिय नज़रिया तो यह है कि उनके ज़रिए अधूरेपन या अभावों की भरपाई होती है। यानी सपने में भी इर्तेफ़ा की कोशिश होती है। चाहे यह कोशिश उतनी कामयाब न हो जितनी कलात्मक रचना। इर्तेफ़ा वाले नज़रिए पर तो मैं अभी बात कर ही चुका हूँ। सपनों के बारे में एक दूसरा नज़रिया यह है कि वे अपने बारे में ज्ञान हासिल करने का एक ज़रिया हैं। लेकिन यह ज्ञान हमें सीधे तौर पर हासिल नहीं होता बल्कि प्रतीकों के ज़रिए मिलता है, यानी सपने अवचेतन (unconscious) के रुझानों के बीच समझौते से पैदा होते हैं। एक तो अपने आप को जानने की इच्छा, दूसरी न जानने की इच्छा। फिर इन दोनों इच्छाओं के अंदर दो विपरीत रुझान होते हैं। जानने में आनंद भी है और तकलीफ़ भी। इसी तरह न जानने में भी इन दो बातों से वास्ता पड़ता है। इसलिए सपना हो या साहित्य, दोनों आनंद और तकलीफ़ के टकराव और संघर्ष से पैदा होते हैं।
अगर लिखने वाले के अंदर न जानने की इच्छा हावी है, तो उसे अपने रचनात्मक काम में यक़ीनन ज़्यादा तकलीफ़ होगी। लेकिन चूँकि उसके अंदर स्वीकारोक्ति (confession) की इच्छा भी साथ-साथ काम कर रही है, इसलिए वह लिखने पर भी मजबूर होगा, जैसा मैंने पिछले लेख में कहा था। वर्ड्सवर्थ ने ठीक अंदाज़ा लगाया है। रचना के दौरान वह दर्द पैदा होता है जो पहले कभी नहीं उठा था। साहित्य के ज़रिए लिखने वाले को अपने बारे में ज्ञान तो हासिल होता है, लेकिन उसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है। आर्नल्ड ने कहा है कि देवता गीत की बड़ी भारी क़ीमत वसूल करते हैं। वह क़ीमत यही दर्द है।
सपने (या साहित्य) के बारे में एक और नज़रिया है। सपना स्वीकारोक्ति करने की इच्छा से पैदा होता है। अब सवाल यह है कि आदमी स्वीकारोक्ति क्यों करना चाहता है? इसका एक जवाब यह है कि अपने आप को अपमानित करने या अपने आप को सज़ा देने के लिए। यह आत्म-पीड़न (masochism) का एक रूप हुआ। यानी रचना में आदमी को जो मज़ा आता है, वह बड़ी भयानक किस्म की लज़्ज़त है। यहाँ आकर बात थोड़ी हास्यास्पद सी हो जाती है। इसे छोड़िए। स्वीकारोक्ति की इच्छा को थियोडोर राइख ने एक और तरह से समझा है। स्वीकारोक्ति के ज़रिए आदमी किसी वास्तविक या काल्पनिक घटना को कल्पना में दोहरा कर आनंद लेना चाहता है। इस हद तक तो आप कह सकते हैं कि साहित्य की रचना करने से आदमी को संतुष्टि मिलेगी। लेकिन एक घटना या कुछ घटनाओं से भावनात्मक रूप से ऐसा चिपक कर रह जाना कि उनके वास्तविक या काल्पनिक दोहराव से तीव्र आनंद मिले, यह अपने आप में एक बीमारी है। व्यक्तित्व के विकास का तो मतलब ही यह है कि आदमी वास्तविक या काल्पनिक अतीत पर विजय पाए और आज़ादी हासिल करे। अगर साहित्य स्वीकारोक्ति है और स्वीकारोक्ति का अर्थ है अतीत का दोहराव, तो कलात्मक रचना के ज़रिए व्यक्तित्व का विकास किस हद तक मुमकिन है?
यहाँ आप छोटी शायरी और बड़ी शायरी के फ़र्क़ की तरफ़ ध्यान दिलाएँगे। छोटा शायर एक वक़्ती तजुर्बे से संतुष्ट हो जाता है। उसके लिए क्षणिक संतुष्टि बहुत होती है। बड़ा शायर अपने अनुभवों को व्यवस्थित करता है। इसलिए बड़ी शायरी के ज़रिए शायर का व्यक्तित्व भी व्यवस्थित होगा और विकास पाएगा। इस बात पर रिचर्ड्स ने बड़ा ज़ोर दिया है। उनके ख़याल में शायरी जितनी ज़्यादा मूल प्रवृत्तियों को व्यवस्थित करेगी और यह व्यवस्था जितनी अच्छी होगी, शायरी भी उतनी ही बड़ी होगी। राइख ने भी कहा है कि वक़्ती आत्म-जागरूकता तो मानसिक बीमारों को भी हासिल हो जाती है। लेकिन इस चीज़ की मौजूदगी, या तीव्रता इतनी ज़रूरी नहीं जितनी आत्म-जागरूकता के इन टुकड़ों की व्यवस्था। इसी व्यवस्था का नाम चेतना है। तो अगर किसी व्यक्ति की शायरी में अनुभवों की व्यवस्था नज़र आए, तो इस दृष्टिकोण के अनुसार हम यह समझने में सही होंगे कि उसका व्यक्तित्व भी इस हद तक व्यवस्थित और विकसित हो चुका है।
शेली का अनुसरण करते हुए रिचर्ड्स ने भी यह चेतावनी दी है कि ऐसे लोगों की बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक ज़िंदगी देखिए, वहाँ आपको पूरी व्यवस्था मिलेगी। यानी अगर इस व्यवस्था का असर बाहरी ज़िंदगी पर न पड़े, तो भी इसकी ख़ूबी में कोई फ़र्क़ नहीं आता। बल्कि रिचर्ड्स ने दबी ज़बान से यह भी कहा है कि अच्छी व्यवस्था वही है जो बाहरी कर्म के लिए न उकसाए। अतः अंदर ही अंदर सारी मूल प्रवृत्तियाँ एक पैटर्न के रूप में व्यवस्थित हो जाएँ। इसके विपरीत राइख ने सारा ज़ोर इसी बात पर लगाया है कि अंदरूनी व्यवस्था उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं हो सकती, जब तक कि वह बाहरी सच्चाई से तालमेल न पैदा कर ले। इस तालमेल में मुश्किल यह पेश आती है कि मौजूदा समाज शोषण और नियंत्रण की बुनियादों पर क़ायम है, उसने चरित्र और कर्म का जो ढाँचा बना रखा है, उसके अलावा किसी और किस्म की व्यवस्था को वह बर्दाश्त नहीं करता। इसलिए अगर आदमी अंदरूनी तौर पर व्यवस्था पैदा करे, तो भी यह व्यवस्था बाहरी दुनिया से टकराते ही टूटने लगती है। इतनी बात तो रिचर्ड्स ने भी मानी है कि दुनिया ऐसे लोगों का सख़्त विरोध करती है, लेकिन उनका ख़याल है कि यह व्यवस्था विरोध के बावजूद बरक़रार रह सकती है।
राइख ने बताया है कि इसे बरक़रार रखना बड़ा मुश्किल काम है। ख़ासकर बड़े साहित्यकारों के लिए, क्योंकि वे ऐसे रुझानों को भी स्वीकार करके अपनी व्यवस्था में शामिल करना चाहते हैं जिनसे समाज भयभीत रहता है। चूँकि बड़े साहित्यकारों को इन दोनों चीज़ों के टकराव का एहसास बहुत तीव्र होता है, इसलिए उनके व्यक्तित्व में बिखराव पैदा होने का ख़तरा हर वक़्त रहता है। यहाँ राइख ने वैग्स, इब्सन, दोस्तोवस्की, नीत्शे वग़ैरह बड़े कलाकारों की मिसालें पेश की हैं जो अपनी ही रचनाओं का शिकार हो गए।
इस बहस का नतीजा यह निकलता है कि कलाकृति में तो ज़रूर व्यवस्था होगी लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि यह व्यवस्था कलाकार के व्यक्तित्व का एक स्थायी हिस्सा बन जाए, बल्कि ज़्यादा संभावना तो इस बात की है कि रचना के दौरान अंदरूनी व्यवस्था का इतना ज़बरदस्त अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद उसका व्यक्तित्व और बिखर जाए। जो लोग कलात्मक रचना को व्यक्तित्व के विकास का ज़रिया समझते हैं, वे कला और कलाकार को अलग करके नहीं देख सकते या फिर जो खूबियां कलाकृति में हैं, उन्हें कलाकार को देना शुरू कर देते हैं। दूसरी कमज़ोरी इन लोगों में यह है कि वे कला की इज़्ज़त तो करते हैं मगर किसी और मक़सद को हासिल करने का ज़रिया समझकर। वे कला को नहीं देखते बल्कि कला की उपयोगिता को देखते हैं। वे राइख की तरह यह कह सकते हैं कि आत्म-जागरूकता किसी और मक़सद को हासिल करने का ज़रिया नहीं बल्कि हमारे शारीरिक तंत्र की एक जैविक प्रक्रिया है। यानी हम साहित्य की रचना करते हैं तो किसी फ़ायदे के लिए नहीं, बल्कि साहित्य की रचना एक जैविक मजबूरी है।
रिचर्ड्स ने साहित्य का एक फ़ायदा और बताया है। एक तरफ़ तो साहित्य के ज़रिए मूल प्रवृत्तियां व्यवस्थित होती हैं, दूसरी तरफ़ साहित्यकार का व्यक्तित्व किसी मूल प्रवृत्ति से नहीं डरता। उसे दबाने की कोशिश नहीं करता। हर नई मूल प्रवृत्ति को क़ुबूल करता है और उसकी ख़ातिर अपनी अंदरूनी व्यवस्था को बदल देता है। चूंकि साहित्यकार के अंदर इस व्यवस्था का सिलसिला बराबर चलता रहता है, इसलिए नसों का तनाव दूर होता रहता है और इस प्रक्रिया से एक आराम की स्थिति पैदा होती है। साहित्य की रचना का यह जैविक फ़ायदा है, जो साहित्यकार के व्यक्तित्व को ही नहीं बल्कि उसके शरीर को भी पहुंचता है। राइख ने अपने मनोविज्ञान की बुनियाद नसों की प्रक्रिया पर नहीं बल्कि एक भौतिक शक्ति पर रखी है जिसका नाम है ओरगोन। उसके अनुसार सेहतमंद आदमी वह है जो अपने अंदर ओरगोन की लहरों के बहाव को रोके नहीं, बीमार वह है जिसके अंदर इन लहरों के प्रवाह में कमी आ जाए। कलात्मक रचना तो इस बात की निशानी है कि आदमी किसी न किसी हद तक इन लहरों को प्रवाहित होने की आज़ादी दे रहा है। यहां तक राइख भी रिचर्ड्स के ख़याल का समर्थन करेगा। लेकिन इससे आगे बढ़कर उसने यह भी बताया है कि हर आदमी ओरगोन की सिर्फ़ एक ख़ास मात्रा को ही सह सकता है, यह मात्रा ज़्यादा हुई और उसके मानसिक और शारीरिक तंत्र में ख़लल आया।
बड़े कलाकार चूंकि ओरगोन को पूरी हिम्मत के साथ क़ुबूल करते हैं, इसलिए उन्हें अपनी इस हिम्मत से नुक़सान पहुंचने का अंदेशा भी ज़्यादा होता है। यहां फिर राइख ने इब्सन और नीत्शे वग़ैरह की मिसालें पेश की हैं जिन्हें ओरगोन के एहसास की शिद्दत ने पागल कर दिया। ग़रज़ ख़ालिस जैविक नज़रिए से भी कलात्मक रचना को हमेशा और हर हालत में सुकून देने वाली नहीं कह सकते। यहां बड़े साहित्यकार और छोटे साहित्यकार का फ़र्क़ भी कोई मायने नहीं रखता। कलात्मक रचना से जितना फ़ायदा या नुक़सान छोटे साहित्यकार को पहुंच सकता है, उतना ही बड़े साहित्यकार को भी।
रिचर्ड्स साहब को आजकल के उपयोगितावादी ज़माने में साहित्य की अहमियत साबित करनी थी। इसलिए उन्होंने लिखने वालों और पढ़ने वालों दोनों को यह लालच दिया है कि मियां इसमें बड़े मनोवैज्ञानिक और जैविक फ़ायदे हैं। लेकिन नुक़सान और जीव विज्ञान के हिसाब से आप रचना की प्रक्रिया में ख़ौफ़नाक बातें भी जितनी चाहें निकाल सकते हैं। कलात्मक रचना को ताक़त की दवा समझने वालों पर मुझे एतराज़ यह है कि उन्हें यह प्रक्रिया उस वक़्त क़ीमती मालूम होती है जब इसमें किसी और क़िस्म के फ़ायदे का पहलू निकलता हो। इस नज़रिए ने आजकल की बहुत सी पश्चिमी सभ्यता को ख़राब कर रखा है। इस लिहाज़ से साहित्यिक आलोचना पर युंग के प्रभाव अच्छे नहीं साबित हुए। हालांकि इन लोगों का दावा है कि हम उन्नीसवीं सदी के उपयोगितावाद से बहुत आगे निकल आए हैं। लेकिन बुनियादी तौर पर उनका रवैया भी यही है कि एक चीज़ के वजूद का औचित्य किसी और चीज़ के नज़रिए से साबित किया जाए। मसलन यौन मूल प्रवृत्ति का औचित्य यह है कि बच्चे पैदा हों। बच्चे पैदा होने का औचित्य यह है कि इंसानी नस्ल क़ायम रहे। राइख पूछता है कि इंसानी नस्ल क्यों क़ायम रहे? इसका औचित्य क्या है? हां, यहां आकर मामला ठप हो जाता है। यही घपला ऐसे लोगों ने साहित्यिक आलोचना में किया है। साहित्य का औचित्य यह है कि इससे हमें फ़लां-फ़लां क़िस्म के फ़ायदे पहुंचते हैं। इससे अच्छा रवैया तो मध्यकाल में सेंट थॉमस एक्विनास (St. Thomas Aquinas) का था। उनके नज़दीक कलात्मक रचना की क्षमता एक ईश्वरीय क्षमता है। कलाकार के अंदर ख़ुदा का रचनात्मक गुण काम करता है। इसलिए कला अपना औचित्य ख़ुद है।
कला से आदमी को क्या फ़ायदा पहुंचता है, इसका पक्का फ़ैसला तो उसी वक़्त हो सकता है, जब हम दो बातें तय कर लें। एक तो यह कि कलात्मक रचना और इंसानी चेतना का आपस में क्या रिश्ता है। दूसरे यह कि चेतना इंसानी विकास के किस स्तर पर पैदा हुई, और इसकी जैविक ज़रूरत क्या है। मैं तो जीव विज्ञान जानता नहीं लेकिन राइख और हर्बर्ट रीड दोनों के यहां मैंने यही पढ़ा है कि वैज्ञानिक इस सवाल का अभी तक कोई जवाब नहीं दे सके हैं। अलबत्ता राइख ने इतना ज़रूर कहा है कि इंसानी चेतना तो अलग रही, आत्म-जागरूकता सजीव शरीर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यहां नुक़सान और फ़ायदे का कोई सवाल नहीं पैदा होता, यह चीज़ तो खाने-पीने की तरह एक जैविक कार्य है। यानी अगर हम कलात्मक रचना को बौद्धिक रूप से बिल्कुल नुक़सानदेह समझने लगें, तो भी कलात्मक रचना का काम हमसे जैविक मजबूरी के तहत सरज़द होता रहेगा। जो आदमी सुकून हासिल करने के ख़याल से शेर कहता है, उसकी ज़हनियत ब्लैक मार्केट करने वालों की है। दर्द उठाने की ज़िम्मेदारी से भागकर सच्चा साहित्य नहीं रचा जाता। क्या शेक्सपियर ने अपने नाटक इस लालच में लिखे थे कि अगर मैंने दस-बीस साल यही काम जारी रखा तो मेरा व्यक्तित्व बहुत व्यवस्थित और सुसंगत बन जाएगा? आलोचक और वैज्ञानिक जो चाहें सो कहा करें, कलाकार को कुछ पता नहीं होता कि मुझे सुकून मिल रहा है या तकलीफ़ पहुंच रही है। वह साहित्य की रचना नहीं करता, साहित्य तो उसके अंदर से रिसता है। सौ बातों की एक बात फ़िराक़ साहब ने कह दी है:
मियां रो-पीट कर बैठे हैं सौ बार इन फ़रेबों को
यह हमसे पूछने आए हो ग़म क्या था ख़ुशी क्या थी
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