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दुनिया की पहली तहज़ीबें

मोहम्मद मुजीब


Translated By: Rekhta Editor

मोहम्मद मुजीब

दुनिया की पहली तहज़ीबें

मोहम्मद मुजीब

MORE BYमोहम्मद मुजीब

    दुनिया की कहानी में हज़रत आदम का ज़माना वह वक़्त है जब आदमी जानवर से इंसान हुआ। साइंस के पुजारी हज़रत आदम को नहीं मानते। लेकिन यही लोग जब पुरानी क़ौमों के अक़ीदों (मान्यताओं) और धर्म को बयान करते हैं तो हमें हर जगह किसी किसी शक्ल में एक ऐसे बुज़ुर्ग का नाम मिलता है जिन्होंने आदम की तरह नेकी और बदी का फल चख कर, यूनानी सूरमा प्रोमेथियस की तरह आसमान से आग लाकर और आदमी को खेती-बाड़ी का फ़न सिखाकर, यम की तरह स्वर्ग का रास्ता तलाश करके आदमी और जानवर में ऐसा फ़र्क़ पैदा कर दिया कि फिर ये दोनों एक से हो सकें।

    पुरानी क़ौमों की रिवायतों, पुराणों या देवमाला (पौराणिक कथाओं) में यह भी बयान किया जाता है कि आदमी को दुनिया आबाद किए बहुत दिन नहीं हुए थे जब एक तूफ़ान आया, जिसमें थोड़े से लोगों के सिवा सब डूब गए। पुराने वक़्तों में अक़्ल की धार इतनी तेज़ नहीं थी कि जहाँ पर रखी जाए वहीं काट दे। शायद लोग इस धार से काटने के अलावा और काम भी लेना चाहते थे और इसलिए हमें मज़हबी अक़ीदे और क़िस्से-कहानियाँ, इतिहास और ख़याली बातें सब एक में गुंथी हुई मिलती हैं। या यह समझिए कि यह एक बाग़ है जिसे हम इतनी दूर से देख रहे हैं कि चमन में चमन, रंग में रंग, फूल में फूल मिल जाता है। इन क़िस्से-कहानियों में कांट-छांट करना बेअदबी मालूम होती है। यहाँ तो बस देखिए, लुत्फ़ उठाइए और सबक़ हासिल कीजिए।

    तूफ़ान की लहरों और भंवरों में जब दुनिया मथी जा चुकी थी तो ज़िंदगी की उखड़ी हुई जड़ें फिर जमने लगीं और कहीं-कहीं पर ख़ासी मज़बूत जमीं। नील नदी की वादी में, दक्षिणी इराक़ में, हिंदुस्तान में सिंधु नदी के किनारों पर और चीन में ह्वांग हो और यांग्त्ज़ी क्यांग नदियों के मुहानों पर। लेकिन दुनिया की आबादी बस इन्हीं बस्तियों में नहीं थी, ऐसी भी बहुत सी नस्लें थीं जिन्हें कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला। उन्हें ख़ानाबदोश कहते हैं, गोया वह अपना घर कांधों पर लादे, मवेशियों को चराती घूमा करती थीं। जब उनकी तादाद बहुत बढ़ जाती या वह फिरते-फिरते बड़ी बस्तियों के पास पहुँच जातीं तो उनमें और बस्ती वालों में, जिन्हें वह ज़ाहिर है लूटना चाहते थे, ख़ूब लड़ाइयाँ होतीं। इनमें आख़िरकार ख़ानाबदोश ही जीतते थे। वह बस्ती वालों को मार हटाते और ख़ुद उनकी जगह आबाद हो जाते। फिर तीन-चार सौ बरस बाद किसी और क़ौम के हाथों यह नई बस्ती भी उजाड़ कर नए लोगों से बसाई जाती।

    तहज़ीब के पुराने केंद्र घड़े भर पानी में शक्कर के दो-चार ढेले थे। पानी हिला दिया जाता तो वह घुल जाते, फिर जब वह ठहर जाता तो शक्कर बैठ जाती। लेकिन पानी को हिलाने वाले कुछ कुछ मिठास भी अपने साथ लाते थे। घुलने के बाद जो शक्कर जमा होती वह पहले से कुछ ज़्यादा ही होती और घड़े का पानी भी ज़रा और मीठा ही हो जाता। इस तरह तहज़ीब फैलती रही। इराक़, मिस्र, हिंदुस्तान के अलावा भूमध्य सागर, जिसे अंग्रेज़ी में (MEDITERRANEAN SEA) कहते हैं, के तट पर फ़िलिस्तीन में, सीरिया में, क्रीट के द्वीप में, इटली के ज़िले एट्रूरिया में, उत्तरी अफ़्रीका में आजकल के शहर त्यूनिस के क़रीब तहज़ीब के केंद्र क़ायम हुए।

    हमारे विद्वान अभी यह नहीं तय कर पाए कि मिस्र की तहज़ीब सबसे ज़्यादा पुरानी है या दक्षिणी इराक़ की सुमेरी तहज़ीब। लेकिन ये दोनों बहरहाल आठ-दस हज़ार बरस पुरानी मानी जाती हैं। और हिंदुस्तान के अंदर हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो में जिन बस्तियों के निशान मिले हैं, उनमें सबसे पुरानी इनसे कुछ कम होंगी। मिस्र के पुराने शहर थीब्स, मेम्फ़िस और हेलियोपोलिस, दक्षिणी इराक़ में बाबिल और उत्तर में नैनवा, क्रीट में शहर क्नोसोस तहज़ीब के इस दौर में आबाद हुए और सैकड़ों बरस आबाद रहे।

    अब से कोई साढ़े चार हज़ार बरस पहले एक नई नस्ल, जिसका हमें नाम तक मालूम नहीं है और जो अपने आप को आर्य यानी पाक या पवित्र कहती थी, ख़ुदा जाने कहाँ से निकल पड़ी। इसने दक्षिणी यूरोप, इराक़, ईरान और हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा किया। पुरानी तहज़ीब को कुछ मिटाया, बहुत कुछ अपनाकर अपने रंग में रंग दिया। हिंदुस्तानी, ईरानी, यूनानी और रोमन आर्य थे तो सब एक ही ख़ानदान के लोग, मगर सबने अलग-अलग तबीयत और मिज़ाज पाया था और सबने दुनिया में विभिन्न यादगारें छोड़ीं। आर्यों का सबसे पहला साम्राज्य ईरान में क़ायम हुआ और सीरिया से लेकर हमारी सिंधु नदी तक फैला। फिर इसे यूनानी आर्यों के मशहूर बादशाह सिकंदर ने मिटाया और इसी के थोड़े दिन के बाद हिंदुस्तान में मौर्य साम्राज्य की बुनियाद पड़ी।

    यह इधर ख़त्म हुआ था कि पश्चिम में रोमन सल्तनत का सितारा चमका। इसी ज़माने में नई ख़ानाबदोश नस्लों ने मंगोलिया की चरागाहों से निकल कर ज़रा सी मुद्दत में हिंदुस्तान, ईरान, तुर्की और पूर्वी यूरोप को बर्बाद और फिर आबाद किया। यह हैं शुरू से हज़रत ईसा के ज़माने तक के इतिहास की मोटी-मोटी बातें। अब आइए इसी ज़माने पर दूसरे पहलू से नज़र डालें और देखें कि इन छह-सात हज़ार बरस में इंसान ने कितनी तरक़्क़ी की।

    नया पत्थर का ज़माना (नवपाषाण काल) 8000 ई.पू.

    पहले मकान बने 7000 ई.पू.

    सुमेरी तहज़ीब की शुरुआत 6000 ई.पू.

    सुमेरियों ने लिखना शुरू किया। मिस्र का पहला शाही ख़ानदान 5000 ई.पू.

    मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा के पहले शहर बने। फ़ोनीशियाई (Phoenician) तहज़ीब की शुरुआत

    पहले जहाज़ बने 3000 ई.पू.

    इराक़, मिस्र, हिंदुस्तान और भूमध्य सागर के तट पर शहरी ज़िंदगी, फ़ोनीशियाई व्यापार के साथ वह वर्णमाला फैली जो उन्होंने इराक़ी, मिस्री लेखन शैली को मिलाकर तैयार की थी।

    आर्य ज़बानें फैलीं 2000 ई.पू.

    ईरान, हिंदुस्तान और यूनान में आर्य मज़हब और तहज़ीब की बुनियाद। फ़ोनीशियाई तहज़ीब का ख़ात्मा। ईरानियों और यूनानियों की जंग 500 ई.पू.

    सिकंदर-ए-आज़म 320 ई.पू.

    हम जिसे तहज़ीब कहते हैं उसके मायने हैं दीन-ईमान के, धर्म, क़ानून और ज्ञान के साये में अपनी ज़िंदगी बसर करना, अपनी मेहनत से इस ज़िंदगी को हरा-भरा रखना, नेक हौसलों से इसको रौनक़ देना और उद्योग और व्यापार के ज़रिए से वह चीज़ें हासिल करना जिनसे आराम पहुँचता है या जिनकी ख़ूबसूरती दिल को ख़ुश करती है। हर क़ौम अपनी ज़िंदगी अपनी तबीयत और रुचि के ढंग पर बनाती है और संवारती है, मगर फिर भी आदमी तो हर जगह रहता है और अगर नाम और चंद विशेषताओं का पर्दा हटा दिया जाए तो हमें हर जगह क़रीब-क़रीब एक ही सी ज़िंदगी नज़र आएगी। मिस्र, सुमेरिया, बाबिल, प्राचीन हिंदुस्तान और ईरान में मज़हब उम्मीद और ख़ौफ़ की वही दो-तरफ़ा तस्वीर थी, इसमें उन शक्तियों से लगाव बढ़ाया जाता था जो ज़िंदगी को क़ायम रखतीं और उसे परवान चढ़ाती हैं।

    उन शक्तियों को राम करने की फ़िक्र की जाती थी, जिनसे नुक़सान और मौत का अंदेशा होता है लेकिन आदमी इन शक्तियों को पूरी तरह जानता-पहचानता नहीं। वह इतनी बड़ी हैं और उसे हर तरफ़ से इस तरह घेरे हुए हैं कि उसकी अक़्ल हैरान रहती है। वह उन्हें तरह-तरह की शक्लों में तसव्वुर (कल्पना) करता है, तरह-तरह के नाम देता है और जिस बात को वह साफ़-साफ़ कह नहीं सकता इसलिए कि वह साफ़-साफ़ समझता नहीं, उसे वह एक कहानी बना देता है। पुरानी क़ौमों की देवमाला में हज़ारों ऐसी कहानियाँ हैं और ऐसी मिलती-जुलती कि मालूम होता है कि वह सब एक ही हक़ीक़त को बयान करने की अलग-अलग कोशिशें हैं।

    मज़हब के इस शायराना पहलू के साथ हमें हर जगह धर्म और क़ानून भी शुरू ही से मिलते हैं और उन्हें आप देखिए तो वे आज-कल के क़ानून से बहुत अलग नहीं, बल्कि कुछ बातों में आज-कल से बेहतर भी हैं। मिस्र में ओसीरिस और उसके बाद कई बादशाहों ने, बाबिल में शाह हम्मुराबी ने, यहूदियों के लिए हज़रत मूसा ने, क्रीट के द्वीप में मिनोस ने मज़हबी, नैतिक और मुआशरती यानी समाजी क़ानून बनाए।

    शाह हम्मुराबी का क़ानून एक पत्थर पर खुदा हुआ मिला है। इसमें कुछ जुर्म जैसे चोरी, ऐसे हैं जिनकी सज़ा आज-कल बहुत सख़्त मालूम होती है। कुछ बातें ऐसी हैं कि हम तरक़्क़ी करके भी उन तक नहीं पहुँच सके हैं। मिसाल के तौर पर यह कि शहर में किसी के यहाँ डाका पड़े तो हुकूमत का फ़र्ज़ है कि मुजरिम को पकड़ कर माल वापस पहुँचाए या अपने पास से नुक़सान पूरा करे। हम यह भी देखते हैं कि औरतों को बहुत आज़ादी थी, उनके हक़ मर्दों से किसी तरह कम थे। उनको जायदाद और विरासत में हिस्सा मिलता था। वे कारोबार कर सकती थीं और करती थीं। और मिस्र की मलिका हत्शेप्सुत और मलिका तिये और बाबिल की मलिका सेमिरामिस के हालात पढ़कर मालूम होता है कि इन मुल्कों में औरतें राज-पाट के क़ाबिल मानी जाती थीं।

    मिस्री क़िस्सों से पता चलता है कि ये लोग अपनी औरतों से डरते और दबते थे, और यह ख़याल सही हो तब भी हम यह तो जानते हैं कि मिस्र और बाबिल में औरतें शादी के बाद शौहर की ज़ात या उसके ख़ानदान में गुम नहीं हो जाती थीं, बल्कि उनका असल रिश्ता अपने माँ-बाप ही से रहता था और वे आसानी से तलाक़ ले सकती थीं।

    क़ानून के बाद हम उस ज़माने की ज़िंदगी और दूसरे पहलुओं को देखें तो बड़ी हैरत होती है। मिस्र और बाबिल में हुकूमत की तरफ़ से सिंचाई का पूरा इंतज़ाम था। नदियों से नहरें काट-काट कर दूर तक पानी पहुँचाया गया था और बाढ़ और बारिश के पानी को जमा रखने के लिए बड़े-बड़े तालाब बने थे। जान-माल की हिफ़ाज़त के लिए हर बस्ती में पुलिस और शहरों में फ़ौज थी। और हम तक मिस्र और बाबिल के कई ऐसे क़िस्से पहुँचे हैं जिनसे मालूम होता है कि बादशाह ख़ुद क़ायदे और क़ानून का बहुत लिहाज़ करते थे और सरकारी मुलाज़िमों को ज़ुल्म और ज़्यादती से रोकते रहते थे। मुक़दमों का फ़ैसला करने के लिए अदालतें मौजूद थीं और उनका दर्जा ऐसा था कि वे अपना फ़र्ज़ ख़ूबी से अंजाम दे सकती थीं।

    क़ानून और मुल्की इंतज़ाम की तरह उस इल्म की, जिस पर हम नाज़ करते हैं, उसी ज़माने में बुनियाद रखी गई। मिस्र और बाबिल में लिखने का तरीक़ा ईजाद किया गया। बाबिल वाले मिट्टी की तख़्तियाँ बनाकर जब वे गीली होतीं उसी वक़्त उन पर एक नुकीले औज़ार से गड़ा-गड़ा कर लिखते थे, फिर उन तख़्तियों को सुखा लेते। जैसा उनका काग़ज़-क़लम था वैसी ही उनकी लिखावट भी थी, और बाबिल में तो चिट्ठी-पत्री का चलन भी जारी था और लोग इन्हीं तख़्तियों को मिट्टी के डिब्बों में बंद करके डाकियों के ज़रिए एक-दूसरे के पास भेजते थे। लिखने के इस तरीक़े में बहुत वक़्त लगता था।

    मिस्र में एक क़िस्म की नर्म तने वाली बांसी होती थी जिसे पपाइरस कहते हैं, उसकी छाल से आसानी के साथ एक तरह का काग़ज़ तैयार किया जा सकता था। मिस्री शुरू में तो जिस चीज़ का ज़िक्र करना होता उसकी तस्वीर बनाते थे। मगर आहिस्ता-आहिस्ता इन्हीं तस्वीरों से एक ऐसा लिखने का तरीक़ा निकाला गया जिसमें आदमी जल्दी और सफ़ाई से अपना मतलब अदा कर सकता था। बाबिल और मिस्र की कोशिशों से फ़ायदा उठाकर एक क़ौम ने जो फ़ोनीक़ी (Phoenician) कहलाती है, पूरे-पूरे लफ़्ज़ों की जगह अलग-अलग अक्षर बनाए जिनमें से हर एक किसी ख़ास आवाज़ की निशानी थी। फ़ोनीक़ी व्यापारी थे, उन्होंने व्यापार के साथ लिखने के अपने ख़ास तरीक़े को फैलाया और चीनी और जापानी के सिवा दुनिया में जितनी ज़बानें हैं उन सब में यही अक्षर शक्लें बदल कर और कुछ कमी-बेशी के साथ प्रचलित हुए।

    लिखने-पढ़ने के अलावा और इल्म भी थे जो उस ज़माने में हासिल किए गए। वक़्त को सालों में, साल को महीने और हफ़्ते, दिन को पहरों में सबसे पहले बाबिल वालों ने बाँटा और धूप-घड़ी सबसे पहले उन्हीं ने बनाई। सितारों और राशियों के नाम उन्हीं ने रखे और शुभ घड़ी निकालने और सितारों से भविष्य देखने की रस्म उन्होंने शुरू की। मिस्रियों ने जंत्री (कैलेंडर) बनाई, और हिसाब और उक़लीदस या (GEOMETRY) में उन्होंने जो कमाल हासिल किया उसके सुबूत के लिए मिस्र के अहराम यानी PYRAMIDS मौजूद हैं। उनमें जो सबसे बड़ा है वह सैकड़ों मन वज़नी पत्थरों से बना है जिनकी कुल तादाद 20 लाख के क़रीब होगी।

    ये पत्थर बिना चूने-मसाले के ऐसी सफ़ाई से बिठाए गए हैं कि उनके जोड़ मुश्किल से दिखाई देते हैं और हज़ारों बरस में अपनी जगह से रत्ती भर भी नहीं सरके हैं। यह इमारत नीचे 748 फ़ुट वर्गाकार है और ऊँचाई में 440 फ़ुट यानी क़ुतुब मीनार से कोई दो सौ फ़ुट ज़्यादा है। जिन लोगों ने इन वज़नी पत्थरों को काट कर और तराश कर इतनी बुलंदी पर पहुँचाया वे अनाड़ी नहीं थे और उनकी इस यादगार को देखकर हमें अपने इल्म पर ज़्यादा घमंड नहीं करना चाहिए। कहते हैं कि बाबिल में भी ऐसी ही एक ऊँची और आलीशान इमारत थी, मगर आसमान ने उसकी बुलंदी पर रश्क खाकर (जलकर) उसे ज़मीन में मिला दिया।

    जहाँ ऐसी इमारतें बनाई जा सकती थीं वहाँ समझिए ख़ूबसूरत शहर और मकान बनाना बाएँ हाथ का खेल था। मिस्र, इराक़, क्रीट और हमारे हिंदुस्तान के अंदर मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में शहर के शहर ज़मीन से खोद कर निकाले गए हैं। उनके खंडहरों से हम उस रौनक़ का कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकते जो ज़िंदगी और आबादी के साथ आती और जाती है, मगर हम यह देखते हैं कि ये शहर फैलाव में आज-कल के क़स्बों से कुछ कम नहीं, मकान ईंट और चूने के बने हुए और तीन-तीन चार-चार मंज़िल ऊँचे हैं। सड़कें चौड़ी हैं और गंदे पानी के निकास का अच्छा इंतज़ाम है।

    अब इसमें क्या शक हो सकता है कि जो लोग यहाँ रहते थे वे निहायत ही सभ्य थे। इन खंडहरों में हमें बहुत ही सुंदर बर्तन और ज़ेवर मिले हैं और जिस तरह आज-कल एक मुल्क की बनी हुई चीज़ें दूसरे मुल्कों में पहुँचती हैं वैसे ही उस वक़्त भी एक जगह की चीज़ें दूसरी जगह जाती थीं और एक जगह के फ़ैशन और रस्म की दूसरी जगह नक़ल की जाती थी। रेल और हवाई जहाज़ होने पर भी उस ज़माने की दुनिया तंग या छोटी नहीं थी।

    सबसे ज़्यादा ताज्जुब तो उस वक़्त होता है जब हम मूर्तियों और तस्वीरों में उस ज़माने के लोगों की सूरतें देखते हैं और उनकी महफ़िलों और दिलचस्पियों का नक़्शा हमारे सामने पेश किया जाता है। इराक़, मिस्र और क्रीट के लोगों ने बस यही नहीं किया कि ऐसे क़ानून और ज़िंदगी के ऐसे उसूल बनाए जिनसे उनकी तहज़ीब मुद्दतों क़ायम रही या इल्म और फ़न को ऐसे दर्जे पर पहुँचाया कि उनके कारनामे देखने वालों को हैरत में डाल दें।

    ज़िंदगी की तमाम ज़रूरतों को पूरा करने का उन्होंने ऐसा इंतज़ाम कर लिया था कि उन्हें अपने रहन-सहन को तरह-तरह की नफ़ासत से संवारने का मौक़ा मिल गया था, उनके चेहरों से शालीनता झलकती थी, वे सभ्य मेल-जोल के आदाब से वाक़िफ़ थे, उनकी औरतों ने वे तमाम तरकीबें जान ली थीं जिनसे नाक-नक़्शे या डील-डौल की कमी पूरी की जाती है और सजावट की इस कला के क़दरदान भी कम थे। नदी और बाग़ों की सैर, दावतें, महफ़िलें, ये सब रोज़मर्रा की बातें थीं। कलाकारों की क़दर, परदेसियों की मेहमाननवाज़ी, ज़रूरतमंदों की मदद—इनमें हम आज तक कोई ऐसा ढंग नहीं निकाल सके हैं जिसकी उन्हें ख़बर थी। तहज़ीब का उजाला जैसा अब है, वैसा ही कुछ तब भी था।

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