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दर बाब-ए-नज़्म और कलाम-ए-मौज़ूं

मोहम्मद हुसैन आज़ाद

दर बाब-ए-नज़्म और कलाम-ए-मौज़ूं

मोहम्मद हुसैन आज़ाद

MORE BYमोहम्मद हुसैन आज़ाद

    (फ़रमाइश के अनुसार)

    मौलवी साहब का यह भाषण 'रिसाला अंजुमन' (पत्रिका) के अगस्त 1868 ई. के अंक से लिया गया है। फ़रमाइश के अनुसार शब्द उन्होंने अपनी कलम से बाद में लिखे हैं। इसी लेख ने नज़र-ए-सानी (पुनरीक्षण) से नया नूर हासिल किया है। कुछ जगहों पर कुछ शब्द बदले गए हैं। उदाहरण के लिए, छपा हुआ वाक्य था, नज़्म दरअसल फ़साहत (वाक्पटुता) की एक फूलों बरसाने वाली डाल है। इसे काटकर लिखा गया, नज़्म दरअसल फ़साहत की एक फूलों भरी शाख़ है। इसके साथ ही दूसरा वाक्य था, फूलों की बू से अलग-अलग ख़ुशबुइयां दिमाग़ को महसूस होती हैं। इसे काटकर लिखा गया है, फूलों की बू से अलग-अलग ख़ुशबुइयां दिमाग़ को महसूस होती हैं। इससे ज़रा आगे लिखा था, किसी की बू तेज़ है, किसी की बू मस्त। किसी बू में नफ़ासत और लताफ़त (कोमलता) है, किसी में सुहानापन है। पुनरीक्षण के करिश्मे से यह वाक्य इस तरह बना, किसी की बू तेज़ है किसी की मीठी, किसी की मस्त है, किसी में लताफ़त है, किसी में सुहानापन है।

    यह लेख बिना किसी बदलाव के 'मजमूआ नज़्म-ए-आज़ाद' (आज़ाद की कविताओं का संग्रह) में छप चुका है। इसे सामने रखकर पढ़ने से बख़ूबी अंदाज़ा हो सकता है कि दोबारा देखने से इस लेख में क्या-क्या ख़ूबियां पैदा हुई हैं। इसके अलावा यह भी अर्ज़ कर देना ज़रूरी समझता हूं कि पत्रिका को कुछ जगहों पर कीड़ों ने खा लिया था। कटे हुए शब्दों को पूरा करने में 'मजमूआ नज़्म-ए-आज़ाद' से मदद ली गई है।

    इस मौक़े पर मैं यह अर्ज़ किए बिना नहीं रह सकता कि एक लंबे अरसे से कुछ लोग यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि नेचर (प्रकृति) की शायरी के जनक मौलाना आज़ाद नहीं थे। यह लेख पढ़ने के बाद साबित हो जाता है कि मौलाना मरहूम के दिल में यह ख़याल बहुत मुद्दत से पनप रहा था। कुछ लोग कहते हैं कि शिक्षा निदेशक कर्नल हॉलरॉयड की तहरीक (प्रेरणा) से नेचर की शायरी की बुनियाद रखी गई थी। इस मामले की असल सूरत यह है कि इस तहरीक में कर्नल साहब भी महज़ एक मददगार की हैसियत से शामिल हुए थे और असल मुहर्रिक (प्रेरक) सिर्फ़ मौलाना और मौलाना का आदरणीय व्यक्तित्व ही था।

    यूनान के दार्शनिकों का कथन है कि दुनिया में दो चीज़ें निहायत अजीब और हैरतअंगेज़ हैं। पहली, इंसान की नब्ज़ जो बिना बोले अंदर का हाल बयान कर देती है। दूसरी, शेर (कविता) कि उन्हीं शब्दों के पीछे से कलाम-ए-मौजूं (लयबद्ध वाणी) और उससे दिल पर एक अजीब तासीर (प्रभाव) पैदा होती है। किताबों में अक्सर शेर के मायने कलाम-ए-मौजूं और मुक़फ़्फ़ा (लयबद्ध और तुकबंदी वाली वाणी) लिखे हैं, लेकिन हक़ीक़त में चाहिए कि वह कलाम असरदार भी हो, ऐसा कि उसका मज़मून (विषय) सुनने वाले के दिल पर असर करे। अगर कोई कलाम मंज़ूम (काव्य रूप में) तो हो लेकिन असर से ख़ाली हो, तो वह एक ऐसा खाना है जिसमें कोई मज़ा नहीं, खट्टा मीठा, जैसा कि किसी उस्ताद का शेर है:

    दंदान-ए-तो हबला दर दहान अस्त

    चश्मान-ए-तो ज़ेर-ए-अब्र दानस्त

    जब इंसान के दिल में बोलने की ताक़त और मज़मून का जोश इकट्ठा होते हैं, तो तबीयत से ख़ुद-ब-ख़ुद कलाम-ए-मौजूं पैदा होता है। ज़ाहिर है कि जिस क़दर यह ताक़त और इस ताक़त का जोश ज़्यादा होगा, उसी क़दर कलाम प्रभावशाली होगा। धरती पर पहला ग़म हाबील का था जो क़ाबील के कारण हज़रत आदम के दिल पर छाया। इसे ग़म के जोश का नतीजा समझना चाहिए कि हालांकि उस वक़्त तक शेर-ओ-शायरी का नाम था, मगर तबीयत के जोश से जो कुछ कलाम उस वक़्त उनकी ज़बान से निकले (निकला), मौजूं (लयबद्ध) थे (था), चुनांचे सीरियाई भाषा में (अब तक) मौजूद हैं (है)। जब कलाम-ए-मौजूं की शुरुआत हज़रत आदम से हुई, तो सच्चा सपूत वही लयबद्ध स्वभाव वाला है जो बाप की विरासत से लाभान्वित हुआ। इसमें शक नहीं कि आदमी और जानवर में फ़र्क़ बोलने की क्षमता का है। इसलिए इंसानी ताक़त भी उसी में ज़्यादा पूर्ण समझनी चाहिए जिसमें बोलने की ताक़त ज़्यादा पूर्ण हो।

    चूंकि नज़्म, नस्र (गद्य) के मुक़ाबले में ज़्यादातर तबीयत के ज़ोर से निकलती है। यही कारण है कि नस्र के मुक़ाबले में यह असरदार भी ज़्यादा होती है। कोई मज़मून, कोई मतलब, कोई ख़याल जो इंसान के दिल में आए या वह श्रोता को समझाना चाहे, तो वह बातचीत से अपने मक़सद के नक़्श को तक़रीर (कथन) के रंग में लाता है ताकि वह ज़ाहिर हो। इसलिए शायर गोया (मानो) एक मुसव्विर (चित्रकार) है, लेकिन वह मुसव्विर नहीं जो छोटी चीज़ों, पेड़ और पत्थर की तस्वीर काग़ज़ पर खींचे। बल्कि वह ऐसा मुसव्विर है जो मायनों की तस्वीर दिल के पन्ने पर खींचता है। और कई बार अपनी फ़साहत (वाक्पटुता) की रंगीनी से नक़्श के अक्स (प्रतिबिंब) को असल से भी ज़्यादा सुंदरता देता है। वे चीज़ें जिनकी तस्वीर मुसव्विर की क़लम खींच सके, यह ज़बान से कह देता है। चुनांचे काग़ज़ के हज़ारों पन्ने भीग कर नष्ट हो गए, मगर सैकड़ों सालों से आज तक उनकी तस्वीरें वैसी की वैसी ही हैं। कभी ग़म की तस्वीर दिल के पन्ने पर खींचता है। कभी ख़ुशी और ऐश के विषयों से तबीयत को गुलज़ार (बाग़-बाग़) करता है। दर्जे की चरम सीमा यह है कि जब चाहता है हंसा देता है, जब चाहता है रुला देता है।

    अरब के लोग जंग के मैदानों में रजज़-ख़्वानी (वीर रस की कविता का पाठ) करते थे। हिंदुस्तान के सुल्तानों के यहां जंग की पंक्ति में शूरवीर, रावत, भाट वह-वह कड़के और कवित्त कहते थे कि लोग अपनी जानें मौत के मुंह में झोंक देते थे। और अब तक यह आलम है कि जब वे सुने जाते हैं, तो बदन पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। महान सिकंदर होमर की किताब को देखता है और सोते में भी उसे ख़ुद से जुदा नहीं करता। शायर अगर चाहे तो आम बातों को भी बिल्कुल नया बनाकर दिखाए। पत्थर को बोलने वाला कर दे। मिट्टी में गड़े पेड़ों को चलने वाला कर दे। अतीत को वर्तमान, वर्तमान को भविष्य कर दे। दूर को नज़दीक कर दे। ज़मीन को आसमान, ख़ाक (धूल) को सोना, अंधेरे को उजाला कर दे। अगर ग़ौर करके देखो तो अक्सीर (रसायन) और पारस इसी को कहना चाहिए कि जिसे छू जाए, वह सोना हो जाए। ज़मीन और आसमान और दोनों जहान शेर के दो मिसरों (पंक्तियों) में हैं। इसकी तराज़ू शायर के हाथ में है, जिधर (चाहे) झुका दे।

    नज़्म दरअसल फ़साहत की एक फूलों भरी शाख़ है। फूलों के रंग और बू से जिस्मानी दिमाग़ तरोताज़ा होता है। शेर से रूह तरोताज़ा होती है। फूलों की बू से अलग-अलग ख़ुशबुइयां दिमाग़ को महसूस होती हैं। किसी की बू तेज़ है, किसी की मीठी, किसी की बू मस्त है, किसी में लताफ़त है, किसी में सुहानापन है, इसी तरह अशआर (शेरों) के विषयों का भी हाल है। जिस तरह फूल की कभी चमन में, कभी हार में, कभी इत्र खींचकर, कभी अर्क़ में जाकर, कभी दूर से, कभी पास से अलग-अलग कैफ़ियतें (अवस्थाएं) मालूम होती हैं, उसी तरह शायरी के मज़ामीन अलग-अलग हालतों और अलग-अलग शैलियों में रंग-बिरंगी कैफ़ियतें ज़ाहिर करते हैं।

    जिस्मानी दुनिया में इंसान के लिए ग़िज़ा (भोजन) ज़िंदगी का आधार है। इसी तरह मायनों की दुनिया में रूह के लिए ग़िज़ा दरकार (ज़रूरी) है। चूंकि अशआर और लतीफ़ (सूक्ष्म) मज़ामीन से रूह कमाल की क़ुव्वत और ऊंची उड़ान की ताक़त पाती है। यही इसकी ग़िज़ा है। रूह की लताफ़त और नफ़ासत तो ख़ुद ज़ाहिर है कि वह ख़ास रूह-उल-क़ुदुस (पवित्र आत्मा) के क़ुदरत के सूरज का प्रतिबिंब है। इसी से शेर की लताफ़त की ख़ूबी का ख़याल करना चाहिए कि वह नफ़ासत में किस ऊंचे दर्जे पर होगा। शायर को आलम-ए-बाला (ऊपर की दुनिया) से एक ख़ास संबंध है कि वह बिना किसी माध्यम और बिना ज़ाहिरी साधनों के उधर से अपना सिलसिला जारी करता है। हक़ीक़त में शेर रूह-उल-क़ुदुस का एक प्रतिबिंब और अल्लाह की रहमत का वरदान है जो सहृदय लोगों की तबीयत पर उतरता है।

    यही कारण है कि ज़ाहिर तौर पर वह अपने कुल्बा-ए-अहज़ान (दुखों की कुटिया) में पड़ा रहता है, मगर पूरी दुनिया पर इस तरह हुकूमत करता है जैसे कोई घर का मालिक अपने घर में घूमता है। पानी में मछली और आग में समन्दर (आग में रहने वाला जीव) हो जाता है। हवा में परिंदा, बल्कि आसमान में फ़रिश्ते की तरह निकल जाता है। जो मज़ामीन चाहता है, बिना झिझक लेता है और मालिकाना हक़ के साथ अपने काम में लाता है। क्या ही सौभाग्य है उसका, जिसे मायनों के ऐसे मुल्क की सल्तनत नसीब हो।

    शेर फ़साहत (मधुरता) के बाग़ का फूल है, शब्दों के फूलों की ख़ुशबू है। इबारत (लेखन) की रोशनी का अक्स है। इल्म का इत्र है, रूहानी ताक़तों का जौहर (सार) है। अर्थ के प्रभाव का सार है। रूह के लिए अमृत है, ग़म की धूल को दिल से धोता है, हौसला बढ़ाता है। तबीयत को कुशादा करता है। ख़याल को उरूज (ऊंचाई) देता है। दिल को संतोष और बेपरवाही, ज़ेहन को उड़ान की ताक़त देता है, चिंताओं की धूल से दिल के दामन को ऊंचा रखता है। तन्हाई में दिल बहलाता है। अनेकता में एकता और एकता में अनेकता, वतन में सफ़र और महफ़िल में एकांत के यही मायने हैं। हालाँकि शायर हमेशा सोच-विचार और चिंता में डूबा रहता है, लेकिन एक शेर कहकर जैसी उसके दिल को ख़ुशी हासिल होती है, बादशाह को सात देश जीतने से भी नहीं होती।

    यह दिल में दर्द और तड़प और तबीयत में असर क़ुबूल करने की ऐसी सलाहियत पैदा करता है कि बात-बात में एक मज़ा और कैफ़ियत हासिल होती है। और वह मज़ा लिखने और बोलने, दोनों की ताक़त से बाहर है। इसके असर से जो रंग दिल पर छा जाता है, उसे दर्द रखने वाला ही ख़ूब जानता है कि हज़ार ख़ुशियों से ज़्यादा मज़ा हासिल होता है। अफ़सोस यह है कि यह ख़ूबी इंसान के बस में नहीं है। यानी तबीयत की मौज़ूनी (काव्य-प्रतिभा) ख़ुदा का दिया हुआ हुनर है और इसी नेमत को ख़ुदा ने अपने हाथ में रखा है।

    रुबाई

    सरमद ग़म-ए-इश्क़ बुलहवस रा न-दहंद

    सोज़-ए-दिल-ए-परवाना मगस रा न-दहंद

    उम्रे बायद कि यार आयद ब-कनार

    ईं दौलत-ए-सरमद हमा कस रा न-दहंद

    जुनून भी एक तरह से शायरी के लिए ज़रूरी है। कुछ विद्वानों का कहना है कि दीवाने, आशिक़ और शायर के ख़यालात कुछ-कुछ जगहों पर एक हो जाते हैं। शायर के लिए ज़रूरी है कि सब तरफ़ से बेफ़िक्र और सब ख़यालों से कटकर इसी काम में ध्यान लगाए और डूब जाए, और यह बात सिवाय मजनूँ (दीवाने) के या आशिक़ के, जो कि उसका दुनियावी भाई है, हर एक इंसान से नहीं हो सकती। मजनूँ को अपने जुनून और आशिक़ को माशूक़ के सिवा दूसरे से कोई मतलब नहीं। ख़ुदा यह नेमत सबको नसीब करे।

    अक्सर लोग ऐसे हैं कि जिस्मानी मेहनत से मर-खप कर उन्होंने पढ़ना-लिखना सीख लिया है मगर शेर के मज़े से महरूम हैं। अगर तमाम उम्र ज़ाया करें, एक दर्द भरा मिसरा उनकी ज़बान से निकले। उनका ज़िक्र भी इंशा-अल्लाह इसी सिलसिले में आएगा। कुछ ऐसे हैं कि उनसे वज़्न वाली शायरी पढ़ी भी नहीं जाती। बल्कि उन्हें वज़्न वाले और बे-वज़्न कलाम में फ़र्क़ भी नहीं मालूम होता। यह ख़ुदा का क़हर है, ख़ुदा इससे महफ़ूज़ रखे। कुछ शायर मज़मून (विषय) ख़ूब निकालते हैं मगर ज़बान साफ़ नहीं पाई कि साफ़ और मधुर बयान कर सकें। कुछ ऐसे हैं कि ज़बान उनकी साफ़ है मगर ऊंचे मज़मून हाथ नहीं आते। चुनांचे हर एक की जगह पर अपनी-अपनी जगह इशारा किया जाएगा।

    यह भी देखा जाता है कि विषयों के जोश और तबीयत की ताज़गी के लिए कुछ-कुछ मौसम ख़ास हैं। चुनांचे बहार के मौसम और बरसात में मौज़ूं तबीयतें (काव्य-प्रतिभा वाले लोग) ज़्यादातर खिली रहती हैं। बल्कि बे-वज़्न और मुर्दा दिलों की तबीयत में भी एक हलचल पैदा होती है। यह भी मालूम होता है कि शायर के लिए वक़्त और जगहें ख़ास हैं। पहला एकांत, कि जहाँ ज़ेहन और तरफ़ बंटे। चाहे घर में सुकून का कोना हो, चाहे बाग़, चाहे रेगिस्तान, चाहे नदी का किनारा और दिल पूरी तरह उसी में लगा हो। वक़्त अक्सर रात का, कि जब दुनिया के लोग अपने-अपने कामों से थक कर सो जाते हैं, तब शायर अपने काम में मसरूफ़ होता है। जब सारी दुनिया सुनसान हो जाती है, तब उसकी तबीयत में शोर पैदा होता है। ज्यों-ज्यों रात ढलती जाती है, ख़याल ज़्यादातर बुलंद होता है और मज़मून में तैरता जाता है। ख़ासकर पिछली रात और सुबह के क़रीब कि दुनिया चुपचाप और दिल मुतमइन, तबीयत साफ़, हवा सुहानी होती है, दिल खिला होता है। मज़मून की खोज से दिल को एक मज़ा हासिल होता है। ऊंचे मज़मून तबीयत से और अर्थपूर्ण शब्द ज़बान से टपकते हैं।

    शायर को चाहिए कि उसकी तबीयत ज़्यादातर क़ाबिल, असर क़ुबूल करने वाली और संवेदनशील हो। जिस हालत को बयान करे, उसका असर पहले उसके दिल पर छा जाए। बहते पानी की तरह कि जो रंग उसमें पड़ जाता है, वही उसका रंग हो जाता है और जिस चीज़ पर पड़े उसे वैसा ही रंग देता है। जब दूसरों के दिल को नर्म करेगा, अगर लोगों की तबीयत ख़ुशी की हालत में लानी चाहे तो चाहिए कि पहले ख़ुद ख़ुशी के मारे बाग़-बाग़ हो जाए। जो कुछ कहना है, जब उसका अपने दिल पर असर नहीं तो दूसरों पर क्या होगा। माइल की रुबाई इस जगह पर मुझे याद आई, चुनांचे लिखता हूँ।

    रुबाई

    काबा में भी हमने उसे जाते देखा

    और दैर में नाक़ूस बजाते देखा

    शामिल है ब-हफ़्ताद-ओ-दौलत माइल

    हर रंग में पानी सा समाते देखा

    यह उसकी अपनी ही तबीयत का असर होता है कि मज़मून ख़ुशी या ग़म, जंग या महफ़िल का बांधता है, जितनी उसकी तबीयत उससे मुतास्सिर (प्रभावित) होती है, उतना ही असर सुनने वाले के दिल पर होता है। दुनिया में कुछ लोग ऐसे हैं कि जब वे शेर सुनते हैं तो दिल बेक़रार और तबीयत बेक़ाबू हो जाती है। इसका कारण यह है कि उनका दिल आईने की तरह साफ़ और तबीयत साफ़ पानी की तरह असर क़ुबूल करने वाली है, और कुछ ऐसे हैं कि उनके सामने अगर अर्थ के जादू के दरिया को शीशे में बंद करके रख दो, तो भी उन्हें ख़बर हो। इसका कारण दिल का मैल है कि अर्थ और मज़मून का नूर उसमें असर नहीं कर सकता। साफ़ दिल वाले दर्दमंदों के नज़दीक सूरज का निकलना और डूबना, और सुबह-शाम का बदलना, ख़ुदा की क़ुदरत के हज़ारों नई बहार के बाग़ खिलाता है। और काले दिल वाले मन के अंधों के नज़दीक दुनिया का कारख़ाना एक कोल्हू या रहट है कि दिन-रात चक्कर में चलता रहता है।

    संगीत के इल्म का मज़ा और रंग-बिरंगे बाग़ की कैफ़ियत ज़ाहिर है कि बयान से बाहर है, लेकिन जो लोग आँखों की रौशनी से महरूम या कानों से लाचार हैं, वे बेचारे इनके मज़े नहीं ले सकते। इसी तरह जो लोग तबीयत के मज़े और दिल की सफ़ाई से महरूम हैं, वे शेर की कैफ़ियत और कलाम की मधुरता से महरूम हैं। इससे बढ़कर यह है कि कुछ तबीयतें शेर से नफ़रत करने वाली पाई जाती हैं और इसकी दलील यह पेश करती हैं कि इससे कुछ हासिल नहीं। अगर फ़ायदे से यही मतलब है कि जिसके करने से चार पैसे हाथ आएँ, तो बेशक शेर बिल्कुल बेफ़ायदा काम है, और इसमें भी शक नहीं कि ज़माने के लोगों ने आजकल शेर को एक ऐसी हालत में डाल दिया है। लेकिन इसके बावजूद भी जो लोग मौज़ूं तबीयत (काव्य-प्रतिभा) रखते हैं, अगर तबीयत के ज़ोर को इल्म और इतिहास क़िस्सों में ख़र्च करें, तो दुनियावी फ़ायदा और कमाई भी मन-मुताबिक़ दे। इससे बढ़कर यह है कि अक्सर लोग आम तौर पर शायरी के फ़न को गुमराही समझते हैं। और हक़ीक़त में हाल ऐसा ही है, लेकिन जो लोग अर्थ के रहस्य और शायरी की असलियत तक पहुँचे हुए हैं, वे जानते हैं कि अगर कारीगर अपनी बुरी नीयत से कारीगरी को बुरी तरह काम में लाए, तो असल कारीगरी पर इल्ज़ाम नहीं सकता। शैतान ने फ़रिश्तों का उस्ताद होकर गुमराही अपनाई। इसलिए इसके लिए हरगिज़ इल्म को गुमराही नहीं कह सकते।

    फ़लसफ़े (दर्शन) और हिकमत (ज्ञान) के मसले जिनसे सही रास्ते वाले लोग ख़ुदा के होने का सुबूत और उसकी एकता की तस्दीक़ करते हैं, उसी से गुमराह लोग नास्तिकता और धर्म-विरोध पर तर्क देते हैं। इसलिए जिस तरह उनकी गुमराही से फ़लसफ़े और हिकमत पर इल्ज़ाम नहीं सकता, उसी तरह शायरों की बदज़बानी और बुरे ख़यालों से शेर भी कुफ़्र के इल्ज़ाम से बदनाम नहीं हो सकता। हक़ीक़त में ऐसे कलाम को शेर कहना ही नहीं चाहिए क्योंकि शेर से वह कलाम मुराद है जो संजीदा ख़यालात के जोश-ओ-ख़रोश से पैदा हुआ है और उसका ख़ुदा की पवित्र ताक़त से एक ख़ास नाता है। पाक ख़यालात ज्यों-ज्यों बुलंद होते जाते हैं, शायरी के मर्तबे को पहुँचते जाते हैं।

    शुरुआत में शायरी करना ज्ञानियों और बड़े-बड़े विद्वानों की खूबियों में गिना जाता था, और उनकी रचनाओं में और आजकल की रचनाओं में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ भी है। हालाँकि फ़साहत और बलाग़त (भाषा की सुंदरता और प्रभाव) अब ज़्यादा है, मगर ख़यालात अक्सर ख़्वाब (काल्पनिक) हो गए हैं। इसका कारण उस ज़माने के सुल्तानों और शासकों की ख़राबी है। उन्होंने जिन-जिन चीज़ों की कद्रदानी की, लोग उसी में तरक़्क़ी करते गए, वरना इसी नज़्म और शायरी में कमाल के शायरों ने बड़ी-बड़ी किताबें लिखी हैं। जिनकी बुनियाद सिर्फ़ नसीहत और उपदेश पर है और उनसे ज़ाहिरी और बातिनी (बाहरी और भीतरी) मार्गदर्शन हासिल होता है। चुनांचे कुछ कलाम, मिसाल के तौर पर सादी, मौलवी रूम, हकीम सनाई और नासिर ख़ुसरो की रचनाएँ इसी क़िस्म की हैं।

    इसलिए इस अंजुमन (सभा) की चर्चा और आप साहिबों के इकट्ठा होने की बरकत से यह भी उम्मीद है कि जहाँ अन्य खूबियों को बढ़ावा देने और बुराइयों को सुधारने पर नज़र होगी, वहीं शायरी की कला की इस ख़राबी पर भी नज़र रहेगी। भले ही आज नहीं, मगर पक्की उम्मीद है कि इंशा-अल्लाह कभी कभी इसका अच्छा फल हासिल होगा, क्योंकि यह उत्तम कला लंबे समय से ख़राबी में पड़ी है और दिन-ब-दिन तबाह होती जा रही है।

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