दास्तान की टेक्निक
लखनऊ से बढ़कर दास्तान-गोई का चर्चा शायद ही कहीं और होगा। बीस-पच्चीस सच्चे यार और हमख़याल दोस्त रात के वक़्त, जो आशिक़ों का पर्दादार है, एक जगह पर जमा हुए। कोई गन्ना छील रहा है, कोई पोंडे पर चाकू तेज़ कर रहा है। जगह-जगह प्यालियों में अफ़ीम घुल रही है। हक़ीक़त तो यूँ है कि अफ़ीम का घोलना और गन्ने का छीलना भी लखनऊ वालों ही का हिस्सा है। कहीं चाय तैयार हो रही है और दास्तान-गो साहब सुरीली आवाज़ में फ़रमा रहे हैं, 'लेकिन ख़ूँख़्वार ज़ुल्माती की ऊँचे नसीब वाली बेटी मलिका ताऊस परी-चेहरा, निहायत हसीन, जादू में भी ज़बरदस्त, हुस्न की शराब के नशे में मस्त अपने महल में विराजमान थी कि उसको ख़बर मिली कि तिलिस्म तोड़ने वाले की क़ैद अँधेरे के पर्दे में आती है।
यह अपने महल पर आकर बैठी थी। असद को गाड़ी पर सवार करके आग बरसाने वाले मुलाज़िम ज़ुल्मात के क़िले में लाए। चौक में आकर असद ने लंगर डाला। गाड़ी रुकी। ताऊस परी-चेहरा की निगाह सूरज जैसे हुस्न वाले नामवर असद पर पड़ी। आशिक़ हुई। रातें तड़प के काटीं। अचानक यह ख़बर सुनी कि परसों तिलिस्म तोड़ने वाले को ज़ुल्मात के क़िले के बाहर क़त्ल करेंगे। अर्ज़ किया था कि एक महल पर आकर बैठी थी। वह वक़्त आया कि असद को फाँसी के तख़्ते के नीचे बिठाया। ताऊस हैरान थी कि मैं इस शेर को कैसे बचाऊँ।' एक-एक जुमले पर सुभान-अल्लाह और वाह-वाह की तारीफ़ होती जाती है और दास्तान-गो साहब का दिमाग़ सातवें आसमान से गुज़र कर ला-मकाँ की ख़बर लाता है।
ऐसे माहौल में जिस साहित्य की रचना और विकास होगा, उसमें बारीकी, गहराई और पेचीदगी का वजूद मुमकिन नहीं। इन ख़ूबियों को समझने और उनसे लुत्फ़ उठाने के लिए ग़ौर-ओ-फ़िक्र और गहरी नज़र की ज़रूरत है लेकिन ऐसी जगह जहाँ कोई गन्ना छील रहा है, कोई पोंडे पर चाकू तेज़ कर रहा है, जगह-जगह प्यालियों में अफ़ीम घुल रही है... कहीं चाय तैयार हो रही है। ऐसी जगह ग़ौर-ओ-फ़िक्र और गहरी नज़र का गुज़र नहीं हो सकता। दास्तान-गो इस हक़ीक़त से जाने-अनजाने तौर पर वाक़िफ़ होता है, इसलिए वह अपनी दास्तान में ऐसी चीज़ों से आमतौर पर परहेज़ करता है जो ग़ौर-ओ-फ़िक्र के बाद समझ में आएँ। वह सारी ख़ूबियों को इस सफ़ाई से सतह पर पेश करता है कि उन्हें एक सरसरी नज़र भी देख सकती है। वह साहित्य की दुल्हन को बेनक़ाब करता है, वह अपनी सारी पूँजी सरे-बाज़ार ले आता है। सुनने वाले भी बच्चों की तरह सतही, आंशिक और सामने मौजूद हुस्न के ख़्वाहिशमंद होते हैं क्योंकि वे इसी क़िस्म के हुस्न को समझने की सलाहियत रखते हैं। वे भी आगे-पीछे नहीं देखते। वे भी चाहते हैं कि जो हिस्सा उस वक़्त सामने हो वह दिलचस्प हो और उसकी बारीकियाँ हसीन और आसानी से समझ आने वाली हों, मसलन पहले जुमले को लीजिए, लेकिन ख़ूँख़्वार ज़ुल्माती की ऊँचे नसीब वाली बेटी मलिका ताऊस परी-चेहरा निहायत हसीन, जादू में भी ज़बरदस्त, हुस्न की शराब के नशे में मस्त अपने महल में विराजमान थी।
'दुख़्तर-ए-बुलंद-अख़्तर' (ऊँचे नसीब वाली बेटी) पहला टुकड़ा है जिस पर सुभान-अल्लाह और वाह-वाह की आवाज़ बुलंद हुई होगी, हालाँकि यह जुमला ऐसा है जो हर शख़्स को सूझ सकता है और इसके लिए किसी ग़ैर-मामूली ज़हानत और सूझ-बूझ की ज़रूरत नहीं। फिर मलिका ताऊस परी-चेहरा के मुताल्लिक़ तीन तारीफ़ी जुमले हैं, निहायत हसीन, जादू में भी ज़बरदस्त, शराब के नशे से मस्त। पहला जुमला निहायत हसीन निहायत मामूली है और बुलंद अख़्तर की तरह यह भी आम जागीर है। यह हर शख़्स के ज़ेहन में फ़ौरन आएगा और इसमें नयापन, बारीकी, और अनोखेपन का नाम-ओ-निशान नहीं। बहरहाल इसी बात का दोहराव तीसरे जुमले में मिलता है जिसमें 'मस्त' ज़बरदस्त की तुकबंदी से लाया गया है, और बाक़ी अल्फ़ाज़ मस्त की तुकबंदी से। बज़ाहिर इसमें निहायत हसीन से ज़्यादा साहित्यिकता और अनोखापन है लेकिन यह भी बुलंद अख़्तर ही क़िस्म का है। जादू में भी ज़बरदस्त महज़ एक वाक़ये का इज़हार है और बस। अल्फ़ाज़ की तरतीब साफ़ और बंदिश चुस्त है लेकिन इस क़िस्म की इबारत हर पढ़ा-लिखा जिसे लिखने की कुछ भी महारत है, लिख सकता है। हुस्न अगर कुछ है तो महज़ सतही। एक मर्तबा सुन कर या पढ़ कर दोबारा सुनने या पढ़ने की ख़्वाहिश नहीं होती और अगर इसे दोबारा सुना या पढ़ा जाए तो इसके हुस्न में इज़ाफ़ा नहीं होता और कोई नई ख़ूबी नहीं मिलती। सुनने वाले इस सतही हुस्न से लुत्फ़ उठाते हैं, जैसे गन्ना और चाय उनके मुँह और तालू को वक़्ती लज़्ज़त बख़्शते हैं, इसी क़िस्म की लज़्ज़त दास्तान से उनके दिमाग़ को हासिल होती है।
वाक़ियात की तरतीब और तरक़्क़ी, उनके चुनाव और अनुपात में भी यही फ़ौरी हुस्न, यही मेयार सामने होता है। मूल घटना से मतलब नहीं जिसमें अक्सर कल्पना की बेलगामी की इंतिहा होती है, यहाँ वाक़ियात की तंज़ीम और उनके आपसी तअल्लुक़ से बहस है। इन वाक़ियात में भी आंशिक हुस्न होता है जो नज़र को फ़ौरन अपनी तरफ़ खींच लेता है और सुभान-अल्लाह और वाह-वाह की आवाज़ बुलंद होती है। वाक़ियात साफ़ होते हैं और बयान में इतनी कारीगरी ज़रूर होती है कि उन्हें आसानी से कल्पना की आँख देख ले लेकिन उनके चुनाव और तंज़ीम में बारीकी, पेचीदगी, गहराई और ख़ूबसूरती नहीं होती। वे एक के बाद एक नज़र के सामने आते हैं। हर सीन आकर्षक होता है लेकिन देर तक नहीं ठहरता। किन्हीं दो सीन में रब्त (जोड़) तो होता है लेकिन यह रब्त तफ़्सील के साथ बयान में नहीं आता। हर सीन चलता-फिरता हो, दिलचस्प हो, हमारी आँखों और हमारे कानों को लज़्ज़त बख़्शे, बस यही असल मक़सद है। समय और स्थान गोया बाक़ी नहीं रहते, उनकी वजह से कोई मुश्किल नहीं होती। दो लगातार सीन में सालों का फ़र्क़ और सैकड़ों मील की दूरी हो सकती है। इसकी ज़रूरत नहीं कि समय और स्थान की खाई पर पुल बाँधा जाए।
कुछ इसी तरह की तकनीक दास्तान में भी मिलती है। मसलन गुलज़ार-ए-नसीम को लीजिए। इसके मुख़्तलिफ़ हिस्से किसी तस्वीर के मुख़्तलिफ़ सीन से काफ़ी मिलते-जुलते हैं। इन हिस्सों की सुर्ख़ियाँ मुलाहज़ा हों, 'दास्तान ताज-उल-मुलूक और ज़ैद-उल-मुलूक बादशाह मशरिक़ की, जाना चारों शहज़ादों का कमाल की तजवीज़ से गुल-ए-बकावली की तलाश में, ग़ुलाम होना चारों शहज़ादों का चौसर खेल कर दिलबर बेसवा से, जीतना ताज-उल-मुलूक का दिलबर बेसवा को और छोड़कर रवाना होना गुल-ए-बकावली की तलाश में, पहुँचना ताज-उल-मुलूक का सुरंग खुदवाकर बाग़-ए-बकावली में और गुल लेकर फिरना, आवारा होना बकावली का ताज-उल-मुलूक की तलाश में, पहुँचना ताज-उल-मुलूक का एक अंधे फ़क़ीर के तकिये पर और आज़माना गुल का, मिलना चारों शहज़ादों का और छिन जाना गुल-ए-बकावली का ताज-उल-मुलूक से, रौशनी वापस आना ज़ैन-उल-मुलूक की आँख की...' यहाँ हर सीन ऐसा है जिसे किसी तस्वीर में पेश किया जा सकता है। पहले सीन में ज़ैन-उल-मुलूक अंधा होता है। सीन बदलता है और अब एक बड़ा लश्कर किसी मैदान में रवाँ-दवाँ है। फिर सीन बदलता है और शहर-ए-फ़िरदौस सामने है। दिलबर बेसवा चालाकी करती है और फिर ख़ुद अपने जाल में फँस जाती है। अब जो सीन बदलता है तो ऐसा सहरा (रेगिस्तान) नज़र आता है जहाँ,
साए को पता न था शजर का
अन्क़ा था नाम जानवर का
मुर्ग़ान-ए-हवा थे होश राही
नक़्श-ए-कफ़-ए-पा थे रेग़-माही
वह दश्त कि जिसमें पर तग-ओ-दौ
या रेग रवाँ थी या वह रह-रौ
यहाँ देव से मुक़ाबला होता है। फिर देव की मदद से ताज-उल-मुलूक हमाला देवनी के पास इरम में पहुँचता है और देवों की मदद से गुल बकावली पाता है... समय और स्थान जल्दी तय होते हैं। पूरब से फ़िरदौस और फिर इरम पहुँचने में न मालूम कितने साल लगते, कितनी दूरी तय करनी पड़ती, कितनी मुश्किलें सामने आतीं, लेकिन ये सब पड़ाव फ़िल्मी मशीन के हैंडल के एक चक्कर में आसानी से पलक झपकते तय हो जाते हैं। यही हाल तमाम दास्तानों में नज़र आता है। सुनने वाले सिनेमा बाज़ों की तरह ख़याली तस्वीरों को चलती-फिरती, बोलती-चालती, तेज़ी से गुज़रती हुई देखते हैं तो ख़ुश होते हैं। वे चाहते हैं कि इन दिलकश गुज़रने वाली तस्वीरों का सिलसिला जारी रहे और वे इन दिलचस्प बदलने वाली तस्वीरों में ऐसे मगन हो जाते हैं कि उन्हें दुनिया-जहान की बिल्कुल ख़बर नहीं रहती। उन्हें और किसी चीज़ की माँग नहीं होती, सतही अल्फ़ाज़ और ये दिलचस्प चलती-फिरती तस्वीरें बस यही उनका मक़सद है और यह हासिल हो जाता है।
गुलज़ार-ए-नसीम या किसी दास्तान का जायज़ा लिया जाए तो दास्तान के रचनात्मक तत्वों का पता मिलेगा। दूसरी क़िस्म की कहानियों की तरह दास्तान में भी एक हीरो होता है जो घटनाओं का केंद्र होता है और एक हीरोइन होती है या एक से ज़्यादा। अलग-अलग घटनाओं में जो संबंध होता है, वह हीरो के व्यक्तित्व की वजह से होता है। यह हीरो आमतौर पर कोई बादशाह या शाहज़ादा, अक्सर किसी बादशाह का सबसे छोटा बेटा होता है। इस चुनाव की वजह से दास्तान में ज़रा शान-ओ-शौकत पैदा हो जाती है। इसके अलावा आम ख़याल यह था और एक हद तक सही भी था कि बादशाह की ज़िंदगी में रंगीनी और विविधता ज़्यादा होती है और बादशाहों को जंग और महफ़िल, ग़रज़ हर क़िस्म के तजुर्बों के ज़्यादा मौक़े मिलते हैं और उनकी ज़िंदगी में दिन-रात के फेर के ज़्यादा असरदार नज़ारे हाथ आ सकते हैं। हाँ तो यह शाहज़ादा हिम्मत की कमर कस कर अलग-अलग मुहिमों को फ़तह करता है। वह निडर और बहादुर होता है। हमेशा ख़ुदा की मदद उसके साथ रहती है इसलिए वह हमेशा आख़िरकार कामयाब होता है लेकिन उसकी ज़िंदगी का सिर्फ़ यही हासिल नहीं होता।
वह एक बेमिसाल हस्ती होता है। सारी इंसानी ख़ूबियाँ उसमें खिंच आती हैं। हुस्न में भी कोई उसकी बराबरी नहीं रखता। उसका नाम बेनज़ीर हो या ताज-उल-मुलूक या जान-ए-आलम, वह एक मुकम्मल हस्ती है, तमाम ऐबों से पाक। ऐसी हस्ती जिसकी मिसाल इस नामुकम्मल और ख़ामियों भरी दुनिया में मुमकिन नहीं। इस मुकम्मल हस्ती को कोई समझदार शख़्स ज़िंदा हक़ीक़त नहीं मान सकता और न उसकी कोई अपनी अलग हस्ती होती है। वह मुकम्मल होने का महज़ एक निशान है और दास्तान की बुनियाद असलियत और हक़ीक़त के बदले आदर्शवाद पर क़ायम होती है।
इस मुकम्मल हस्ती को जहाँ और मुहिमों को फ़तह करना होता है, वहाँ इश्क़ की मुश्किल मंज़िल से भी गुज़रना होता है। और वह इस मुहिम में भी कामयाब होता है। शायद इश्क़ दास्तानों का सबसे अहम तत्व है। इसकी वजह से जहाँ दिलचस्पी बढ़ जाती है, वहाँ दास्तान सुनाने वाले को मुश्किलें भी होती हैं। हिंदुस्तान का रहन-सहन पश्चिम के रहन-सहन से अलग है। यहाँ मर्द-औरत आज़ाद नहीं, पाबंद हैं, इसलिए इश्क़, अगर उसे हवस-परस्ती के इल्ज़ाम से बचाया जाए, तो अजब टेढ़ी खीर है। इस मुश्किल के एहसास ने साहित्यिक रिवाज की बुनियाद डाली। यह रिवाज इस रोशन-ख़याल ज़माने में ग़ैर-फ़ितरी और हास्यास्पद समझा जाता है लेकिन इसी की देन है कि बहुत सी ऐसी चीज़ें दास्तान में मिलती हैं जो इसकी ग़ैर-मौजूदगी में मुमकिन न होतीं। इश्क़ और इश्क़ के لواज़मात (ज़रूरी बातें) इसी की देन हैं। अलग-अलग क़िस्म के जज़्बात, मुहब्बत, नफ़रत, रक़ाबत, हसरत, तमन्ना, निराशा, उम्मीद, ग़म और ग़ुस्सा, हँसी-ख़ुशी, ये सब चीज़ें दास्तान की रंगीनी और दिलकशी में चार चाँद लगाती हैं।
बहरहाल, हीरो यानी वही शाहज़ादा किसी हसीन शाहज़ादी पर आशिक़ होता है लेकिन यह इश्क़ मुलाक़ात, मेल-जोल, या ज़ाती कशिश का नतीजा नहीं, आमतौर पर यह इश्क़ अनदेखा होता है। किसी शाहज़ादी के हुस्न का चर्चा सुनकर शाहज़ादा उस पर आशिक़ हो जाता है या किसी की तस्वीर देखकर यह जज़्बा उभरता है या किसी अप्रत्याशित तौर पर सामना होता है और आँखें चार होते ही इश्क़ का तीर दिल के पार होता है, यानी मुहब्बत 'पहली नज़र' में पैदा होती है जैसे, ताऊस परी-चेहरा की निगाह आफ़ताब-जमाल असद नामदार पर पड़ी, आशिक़ हुई। यह तरीक़ा अगर ग़ौर से देखा जाए तो इस क़दर अस्वाभाविक नहीं जितना ख़याल किया जाता है। जहाँ मर्द-औरत आज़ादी से नहीं मिल सकते, जहाँ उनकी ज़िंदगी के दायरे आमतौर पर अलग-अलग रहते हैं, वहाँ हुस्न का चर्चा, तस्वीर, अचानक मुलाक़ात, ये चीज़ें आसानी से प्रेरक, ज़बरदस्त प्रेरक का काम कर सकती हैं।
यह इश्क़ की मुहिम आसानी से तो फ़तह नहीं होती और न ऐसा होना चाहिए वरना दास्तान वहीं ख़त्म हो जाएगी और दास्तान बस इतनी ही होगी कि एक शाहज़ादा था, वह किसी शाहज़ादी पर आशिक़ हुआ, दोनों की शादी हुई और वे हँसी-ख़ुशी ज़िंदगी बसर करने लगे। हर दास्तान का निचोड़ तो बस इतना ही है लेकिन दास्तान सुनाने वाले इस पर संतोष कैसे कर सकते थे। इसलिए उन्होंने एक तरकीब निकाली यानी मक़सद हासिल करने में रोड़े अटकाए। माशूक़ या उसके माँ-बाप कोई ऐसी शर्त पेश करते हैं जिसको पूरा करना मुश्किल हो, जो हर ऐरे-ग़ैरे के बस की बात न हो, जिसके लिए ग़ैर-मामूली साहस और ताक़त या बुद्धिमानी की ज़रूरत हो या कोई ऐसा वाक़िया पेश आता है कि आशिक़ और माशूक़ जुदा हो जाते हैं और आशिक़ आवारा, परेशान और भटकता फिरता है या सख़्त क़ैद में गिरफ़्तार होता है और फिर मुद्दतों के बाद मुश्किलों को हल करता है या क़ैद से छुटकारा पाता है।
कभी आशिक़ और माशूक़ दोनों मुसीबत में फँसते हैं और तरह-तरह की मुसीबतें उठाकर आख़िर एक-दूसरे से मिलते हैं और अपनी बाक़ी उम्र हँसी-ख़ुशी बसर करते हैं। अगर ऐसा न होता तो दास्तान फिर फ़ौरन ख़त्म हो जाती और उसमें कोई दिलकशी मुमकिन न होती, इसलिए ये रुकावटें, मुश्किलें, तकलीफ़ें क़िस्से को पेचीदा बनाती हैं और उसकी दिलचस्पी बढ़ाती हैं और बहुत से ऐसे इंसानी जज़्बात के इज़हार के लिए मौक़े पेश आते हैं जो दूसरी सूरत में मुमकिन न होते।
ये रुकावटें अक्सर किसी अलौकिक हस्ती की दख़लंदाज़ी से पैदा होती हैं और सच तो यह है कि दास्तान में इस क़िस्म के तत्व का दबदबा नज़र आता है। आमतौर पर इस तत्व की मौजूदगी दास्तान के कमतर होने की काफ़ी दलील समझी जाती है, हालाँकि यह कुछ दास्तानों तक सीमित नहीं, हर ज़बान में और शायद साहित्य की हर विधा में यह कहीं न कहीं, किसी न किसी सूरत में ज़रूर पाया जाता है, इसलिए महज़ इस वजह से दास्तान को दोषी समझना सही नहीं। अगर दास्तानों में ज़िंदगी, इंसानी तजुर्बों और ख़यालात का वह उम्दा, गहरा और ज़बरदस्त ख़ुलासा होता जो मसलन शेक्सपियर के ड्रामों या दांते की 'डिवाइन कॉमेडी' में मिलता है तो फिर ये अलौकिक तत्व हास्यास्पद और इल्ज़ाम के लायक़ न समझे जाते। बहरहाल, दास्तानों में अलौकिक चीज़ों की अधिकता होती है। इसकी एक वजह तो यह है कि इन चीज़ों में पहले लोगों को यक़ीन था। लोग समझते थे कि ख़ुदा ने इस दुनिया और इस दुनिया के बाशिंदों के अलावा कोई दूसरी दुनिया भी पैदा की है और उस दूसरी दुनिया में ऐसी हस्तियाँ बसती हैं जो हमें नज़र नहीं आतीं लेकिन जो अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ हमारे सामने ज़ाहिर भी हो सकती हैं और हमारे मामलात में दख़लंदाज़ी भी कर सकती हैं।
इस दुनिया का एक नाम कोह-ए-क़ाफ़ है, जहाँ परियाँ बसती हैं। यह ज़रूर है कि यह यक़ीन वह ज़िंदा यक़ीन न था जो यूनानियों को अपने देवताओं और देवियों में था, लेकिन एक क़िस्म का यक़ीन, हल्का सही, कमज़ोर सही, ज़रूर था। इसके अलावा यह दूसरी दुनिया और इसके बाशिंदे सुनने वालों या पढ़ने वालों की उत्सुकता को भड़काते हैं और उनकी कल्पना पर चाबुक का काम करते हैं, और साथ-साथ दास्तान में रंगीनी, पेचीदगी, विविधता और दिलचस्पी का भी इज़ाफ़ा होता है। फिर जब हम इन जिन्नों, देवों, परियों को इंसान की तरह बोलते-चालते, हँसते-रोते, मुहब्बत और नफ़रत करते, हमदर्दी और रहम या ग़ुस्से और क्रोध के जज़्बात से प्रभावित देखते हैं, तो हमें एक तरह का इत्मीनान होता है और हम अपने जज़्बात और ख्यालात पर ज़्यादा भरोसा महसूस करने लगते हैं और ये अजनबी हस्तियाँ इंसान से अलग नहीं बल्कि इंसान जैसी ही, मगर इंसान से ज़्यादा विकसित नज़र आती हैं, यानी फ़र्क़ बस उतना ही है जितना अफ़्रीका की जंगली क़ौमों और पश्चिमी क़ौमों में। अगर कोई पश्चिमी क़ौम अपनी नई ईजादों (आविष्कारों) के साथ किसी ऐसी क़ौम में जा पहुँचे जिसका तहज़ीब और सभ्य क़ौमों से अब तक कोई ताल्लुक़ नहीं रहा है, तो शायद उस जंगली क़ौम की नज़र में वह पश्चिमी क़ौम जिन्न और परी जैसी मालूम होगी।
हाँ, तो कहने का मतलब यह है कि इस ख़ास पहलू की वजह से दास्तानों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देना समझदारी से दूर की बात है। हम इसका स्वागत न करें, लेकिन हमें इसे क़ुबूल कर लेना चाहिए। जिन्न, देव, परी सामने आएँ तो आने दीजिए और देखिए कि वे क्या करते हैं। वे इंसान से मिलते-जुलते हैं। कभी दास्तान में रुकावटें पैदा करते हैं तो कभी मुश्किलों को आसान कर देते हैं। कभी कोई जिन्न किसी शहज़ादी पर आशिक़ होता है तो कभी कोई शहज़ादा किसी परी पर फ़िदा होता है। जादू, तिलिस्म, और तिलिस्मी चीज़ों का चमत्कार तो हर जगह है। ग़रज़ ये सब चीज़ें इस्तेमाल होती हैं और इनसे तरह-तरह का काम लिया जाता है। कभी इनकी वजह से दास्तान में गुत्थियाँ पड़ जाती हैं तो फिर इन्हीं की मदद से सुलझ भी जाती हैं। जब दास्तान-गो (दास्तान सुनाने वाले) को मुश्किल पेश आती है तो वह स्वाभाविक ज़रियों के बदले इन ग़ैर-फ़ितरी (अस्वाभाविक) या जिनकी उम्मीद न हो, ऐसे समझ से परे ज़रियों से काम लेता है और उसे इनसे काम लेने का हक़ हासिल है।
बहरहाल, बीस-पच्चीस सच्चे दोस्तों और क़रीबी यारों का जमा होकर दास्तान सुनना और बात है और इसका ग़ौर से फ़ुर्सत के वक़्त मुताला करना (पढ़ना) और बात है। जब हम सोच-विचार के साथ पढ़ते हैं, जब हम किसी चीज़ की तरफ़ अपना पूरा ध्यान लगाते हैं, तो हमें मामूली और सामने नज़र आने वाली चीज़ों से तसल्ली नहीं होती। हम कुछ और चाहते हैं और कलात्मक और सौंदर्य के पैमानों को काम में लाते हैं। दास्तान-गो इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ थे और वे दास्तान-गोई को अपनी हदों में कलात्मक तौर से बरतते थे, यानी वे कुछ उसूलों को सामने रखते थे। इन उसूलों को किसी ने इन लफ़्ज़ों में बयान किया है:
ज़ाहिर है कि क़िस्से और अफ़साने की असल के लिए कुछ बातें ज़रूरी और लाज़िमी हैं... अव्वल (पहला), लंबा और ख़ूबसूरत मज़मून जिसकी शुरुआत और बुनावट में मज़मून का दोहराव और बयान की तकरार हो। एक लंबे अरसे तक ख़ात्मे के लिए सुनने वाले बेताब रहें। दोम (दूसरा), अच्छी बुनावट वाले मक़सद और दिलचस्प मज़मून के सिवा कोई कानों को चुभने वाली और फूहड़ बात... दर्ज न की जाए... सोयम (तीसरा), ज़बान की मिठास और बयान की साफ़-गोई। चहारम (चौथा), जल्दी समझ में आने वाली इबारत (भाषा) जो क़िस्सा-गोई की कला के लिए ज़रूरी है। पंजम (पाँचवाँ), क़िस्से की शुरुआत में हूबहू गुज़रे हुए इतिहास का मज़ा हासिल हो, नक़ल और असल में हरगिज़ फ़र्क़ न हो सके।
इन जुमलों से ज़ाहिर है कि दास्तान-गोई एक दिलचस्प शग़ल (शौक़) होने के साथ-साथ कलात्मक हैसियत भी रखती थी और हर ऐरा-ग़ैरा दास्तान-गो नहीं हो सकता था। दास्तान में कल्पना की बेलगामी एक अहम ऐब (दोष) समझा जाता है, लेकिन इस बेलगामी की वजह से कोई ख़राबी न होती। अगर इसका बराबर ख़याल रखा जाता कि क़िस्से की शुरुआत में हूबहू गुज़रे हुए इतिहास का मज़ा हासिल हो, नक़ल और असल में हरगिज़ फ़र्क़ न हो सके। इन लफ़्ज़ों से यह बात साबित होती है कि क़िस्सा-गोई के सबसे अहम उसूलों से वाक़िफ़ियत (जानकारी) थी। क़िस्से को यक़ीन के क़ाबिल बनाने के लिए ऐसा अंदाज़, ऐसा लहज़ा अपनाना चाहिए जिससे यह मालूम हो कि किसी असली वाक़ये का बयान हो रहा है और शुरू में ऐसी बारीकियाँ हों जिनमें असलियत पूरी तरह से मौजूद हो, कोई ऐसी बात न हो जो नामुमकिन सी या असंभव हो, और जब भरोसेमंद माहौल पैदा हो जाए तो फिर क़दम आगे बढ़े और ख़याली तस्वीरों को सामने लाया जाए। यह तो नहीं कह सकते हैं कि दास्तान-गो हमेशा इस उसूल को सामने रखते थे और न यह कि वे हमेशा सच्चा माहौल पैदा कर सकते थे, लेकिन यही गनीमत है कि वे इस उसूल से अनजान नहीं थे और अपनी हदों के अंदर वे इस पर अमल करना चाहते थे। आज भी इस उसूल की वही अहमियत है जो पहले थी।
दूसरा अहम नुक्ता दास्तानों की दिलचस्पी से ताल्लुक़ रखता है और इस नुक्ते से भी दास्तान-गो बाख़बर थे। मैं कह चुका हूँ कि दास्तान, कहानी की लंबी, पेचीदा और भारी-भरकम शक्ल है। लंबाई और पेचीदगी की वजह से एक ख़राबी का अंदेशा रहता है और वह है दोहराव (तकरार)। लफ़्ज़ों का हो या वाक़यात का, किसी चीज़ के दोहराव से सुनने वालों या पढ़ने वालों की तबीयत बहुत जल्द उचाट हो जाती है और यह ज़रूरी नहीं कि यह दोहराव खुला हुआ (साफ़ ज़ाहिर) हो। किसी लफ़्ज़, फ़िक़रे (वाक्यांश) या जुमले का साफ़ और बेफ़ायदा दोहराव बेमज़गी की वजह होता है। इसी तरह किसी ख़ास वाक़ये को बार-बार दोहराने से बदमज़गी पैदा होती है। अक्सर यह दोहराव खुला हुआ नहीं होता, यानी कोई एक लफ़्ज़, जुमला या वाक़या बार-बार पेश नहीं होता, बल्कि दोहराव की किसी हद तक पर्दा-पोशी की जाती है (छिपाया जाता है), और वह इस तरह कि एक ही क़िस्म की बातों को ज़रा बदल-बदल कर कहा जाता है। लेकिन इस बहरूप के बावजूद भी संवेदनशील स्वभाव इस नुक़्स (कमी) से फ़ौरन वाक़िफ़ हो जाता है। बहरहाल, दोहराव साफ़ हो या पर्दे के पीछे, एक ऐब है और इसे ऐब ही गिना जाता था।
इसीलिए कहा गया है कि, शुरुआत और बुनावट में मज़मून का दोहराव और बयान की तकरार न हो। इस दोहराव से दिलचस्पी में साफ़ कमी आती है और दास्तान-गोई का सबसे बड़ा उसूल यह है कि वह दिलचस्प हो, और दिलचस्प हो, और बराबर दिलचस्प हो। इतनी दिलचस्प हो कि एक लंबे अरसे तक ख़ात्मे के लिए सुनने वाले बेताब रहें। और वे बराबर फिर क्या हुआ... फिर क्या हुआ... की आवाज़ बुलंद करते रहें। यह नहीं कह सकते कि दास्तान-गो इस मक़सद में हमेशा कामयाब होते हैं, ख़ासकर दोहराव एक ऐसा ऐब है जिससे वे बच नहीं सकते। एक ही क़िस्म के मौक़े, एक ही रंग के वाक़यात बराबर पेश आते हैं, इसलिए दोहराव लाज़िमी हो जाता है। और सच तो यह है कि एक लंबी दास्तान में इस क़िस्म के दोहराव से बचना मुश्किल है, और दास्तान-गो इसकी कोशिश ज़रूर करते थे कि अल्फ़ाज़ के रद्दोबदल (फेरबदल) से दोहराव की पर्दा-पोशी की जाए।
दास्तान-गो (कथावाचक) शब्दों से ख़ास दिलचस्पी रखते थे। जहाँ तक उनसे मुमकिन होता, वो ज़बान की लताफ़त और बयान की फ़साहत (भाषा की कोमलता और स्पष्टता) और इसी क़िस्म की ख़ूबियों को अपनी रचना में हासिल करना चाहते थे। वो जानते थे कि शब्द अभिव्यक्ति का ज़रिया हैं और दिलचस्प से दिलचस्प वाक़या भी बे-लुत्फ़ (फीका) मालूम हो सकता है, अगर उसे अच्छे और ख़ूबसूरत लफ़्ज़ों में न बयान किया जाए। साथ-साथ उनकी नज़र सुनने वालों या पढ़ने वालों पर भी थी और वो ऐसे शब्द इस्तेमाल करते थे जो आसानी से समझ में आ जाएँ, इसीलिए कहते हैं कि इबारत (लेखन) 'सरी-उल-फ़हम' (आसानी से समझ आने वाली) हो। शायद साहित्य की किसी दूसरी विधा के लिए यह ख़ासियत इस क़दर अहम नहीं है जितनी यह क़िस्सा-गोई के लिए है। अगर हर बात आसानी से समझ में न आ जाए, तो फिर क़िस्से में दिलचस्पी को क़ायम रखना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर हो जाएगा। अक्सर यह आसानी से समझ में आने वाली बात सतहीपन (छिछलेपन) की शक्ल अख़्तियार कर लेती है और दास्तान-गो उर्दू शायरों की तरह लफ़्ज़ों से खेलने लगते हैं। 'ज़बान की लताफ़त और बयान की फ़साहत' महज़ लफ़्फ़ाज़ी (शब्दजाल) की सूरत अख़्तियार कर लेती है।
बहरहाल, दास्तान-गोई एक कला है और अपनी हदों और ख़ामियों के बावजूद एक दिलचस्प कला है, और इसकी अहमियत इतनी कम नहीं है कि हम इसे यक-क़लम (पूरी तरह) नज़रअंदाज़ कर सकें। अफ़सोस है कि मौजूदा ज़माने में इस कला को जानने और बरतने वाले नहीं मिलते और अब यह कला साहित्य की दुनिया में ज़िंदा कला की हैसियत नहीं रखती, और साहित्य की कोई दूसरी विधा इसका विकल्प नहीं हो सकती। अगर हम कोलरिज के शब्दों पर अमल करें, तो दास्तानों से काफ़ी लुत्फ़ हासिल कर सकते हैं। अगर हम अपनी बे-एतेक़ादी (अविश्वास) को अपनी मर्ज़ी और शौक़ से कुछ देर के लिए मुल्तवी कर दें (टाल दें), अगर हम कल्पना की इस ख़याली पैदावार का आरज़ी (अस्थायी) तौर पर एतबार कर लें, तो हमारे लिए एक दिलचस्प दुनिया का दरवाज़ा खुल जाएगा। और इस दुनिया की सैर महज़ वक़्त की बर्बादी नहीं होगी, बल्कि हमारी कल्पना, हमारे दिमाग़ और हमारी रूह को ताज़गी और ख़ुशी बख़्शेगी।
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