दास्तान-ए-अमीर हमज़ा का मुताला
दास्तान की शेरियात (काव्यशास्त्र) जिन चीज़ों की मांग करती है, और वह शेरियात साहित्य और ब्रह्मांड के बारे में जिन धारणाओं और मान्यताओं पर आधारित है और दास्तान के असली सुनने/पढ़ने वाले इससे जिन बातों की उम्मीद रखते थे, वे कुछ और थीं और दास्तान के आधुनिक आलोचक इस पर नुक्ताचीनी किसी और शेरियात और साहित्य व ब्रह्मांड के बारे में किसी और तरह की मान्यताओं की रोशनी में करते हैं। नतीजा ज़ाहिर है।
(१)
फ़ारूक़ी की मशहूर और बेमिसाल किताब साहिरी, शाही, साहिब-क़िरानी का दूसरा नाम दास्तान अमीर हमज़ा का अध्ययन है। मैंने इसी को अपनी किताब के इस अध्याय का शीर्षक बनाया है। साहिरी, शाही, साहिब-क़िरानी तीन जिल्दों (खंडों) में सामने आई है। आगे हर जगह इसे स, श, स कहा जाएगा। उर्दू दास्तानों पर और लोगों ने भी लिखा है। स श स की पहली जिल्द में एक अध्याय है: दास्तान के आलोचक। इसमें कलीमुद्दीन अहमद और ज्ञानचंद जैन की आलोचनाओं पर विस्तार से और राज़ यज़दानी, सुहैल बुख़ारी, वक़ार अज़ीम, राही मासूम रज़ा, सुहैल अहमद, शमीम अहमद और मोहम्मद सलीमुर्रहमान की आलोचनाओं पर सरसरी नज़र डाली गई है।
स श स की तीसरी जिल्द में एम. हबीब ख़ां की दास्तान-आलोचना का भी ज़िक्र आया है। लेकिन सामने मौजूद किताब का अंदाज़ ऊपर बताए गए तमाम आलोचकों और शोधकर्ताओं की किताबों से अलग है। असल बात यह है कि उर्दू दास्तानों का इतना विस्तृत अध्ययन पहली बार पेश किया गया है और दास्तान की कला से जुड़ी चीज़ों के बारे में जो जानकारी मुहैया की गई है, वह कहीं और नहीं मिलती। सच तो यह है कि यह किताब उर्दू दास्तान का इनसाइक्लोपीडिया है। यह जानने के लिए कि दास्तान के संबंध में फ़ारूक़ी के अध्ययन की दिशा क्या है, इस किताब का परिचय देखिए:
स श स, पहली जिल्द, सैद्धांतिक चर्चाएं। पहला संस्करण: अक्टूबर/दिसंबर १९९९। साइज़: डिमाई। पृष्ठ: ५५९, क़ीमत: १८० रुपये, प्रकाशक: राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद (क़ौमी काउंसिल बराए फ़रोग़-ए-उर्दू ज़बान), दिल्ली। प्रस्तावना: डॉ. हमीदुल्लाह भट, डायरेक्टर क़ौमी काउंसिल। समर्पण: शहरयार के नाम 'आईना मारवे तेरा अक्स पज़ीर अस्त'। इसके बाद मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल का एक नुक्ता:
सहरा गर हीस्त दर दिल-ए-तंग
दरिया अरक़े-स्त चकीदा अज़-संग
लख़्ते बदर आज़ आलमे नंग
यानी कि ज़-कारगाह-ए-नैरंग
हर नक़्श कि दीदी आं क़दर नेस्त
विषय सूची:
लेखक की बात
भूमिका
अध्याय १: दास्तान की शेरियात (१)
अध्याय २: दास्तान की शेरियात (२)
अध्याय ३: मौखिक आख्यान (ज़बानी बयानिया) (१) इसका मैदां है जुदा
अध्याय ४: मौखिक आख्यान (२) जीवन और मृत्यु, तौफ़ीक़
अध्याय ५: मौखिक आख्यान (३) गतिकी (हरकियात)
अध्याय ६: दास्तान और मानव ज्ञान की सीमाएं
अध्याय ७: कथावाचक (बयान करने वाला)
अध्याय ८: श्रोता
अध्याय ९: दास्तान की रचना
अध्याय १०: याददाश्त, पुनर्प्राप्ति, पुनर्रचना
अध्याय ११: दास्तान के आलोचक
आभार
अनुक्रमणिका
दूसरी जिल्द: व्यावहारिक चर्चाएं। पहला संस्करण २००६ ई., साइज़: डिमाई, पृष्ठ: २२४, क़ीमत: २०२ रुपये, प्रकाशक: राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, दिल्ली। प्रस्तावना: रश्मि चौधरी, डायरेक्टर इंचार्ज क़ौमी काउंसिल।
समर्पण: आल अहमद सुरूर (१९११ से २००२)
की याद को श्रद्धांजलि के तौर पर
जिनके इस एक वाक्य को दास्तान की तमाम आलोचना की बुनियाद मान लिया जाए तो ग़लत न होगा:
'हमारे यहां नॉवेल से पहले दास्तानों की एक शानदार पूंजी है जिसकी महानता को स्वीकार करना ज़रूरी है, मगर जो नॉवेल से बिल्कुल अलग कला से संबंध रखती है।'
आल अहमद सुरूर, 'फ़िक्शन क्या, क्यों और कैसे?'
प्रकाशित 'शब-ख़ून' अंक ७२, मई १९७२ ई.
विषय सूची:
दूसरी जिल्द की भूमिका: इसके बाद एक पन्ने पर सिर्फ़ यह शेर:
चि गोयद कस अज़ ख़ूबी-ए-क़िस्सा-ख़्वां
कि दर मुल्क-ए-ख़ूबी अस्त साहिब-क़िरां
(हकीम अफ़ज़ल-उद-दीन ख़ाक़ानी शिरवानी)
अध्याय १: कितने दफ़्तर, कितनी जिल्दें?
अध्याय २: दास्तान का क्रम
अध्याय ३: दास्तान अमीर हमज़ा: कितने पन्ने?
अध्याय ४: प्रकाशन तिथि, दास्तान का क्रम और रचना
अध्याय ५: दास्तानगो (कथावाचकों) का ज़िक्र
अध्याय ६: दास्तान का अफ़साना
अनुक्रमणिका
इसके बाद निकात-ए-बेदिल से वही नुक्ता जो पहली जिल्द में है। यहां कोष्ठक (ब्रैकेट) में नुक्ता १० लिखा है।
तीसरी जिल्द: जहान-ए-हमज़ा। पहला संस्करण २००६, साइज़: डिमाई, पृष्ठ: ४३६, क़ीमत: २८० रुपये, प्रकाशक: राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, दिल्ली। प्रस्तावना: रश्मि चौधरी, डायरेक्टर इंचार्ज क़ौमी काउंसिल।
समर्पण: नौजवान दास्तानगो, अभिनेता, अंग्रेज़ी के पत्रकार
महमूद फ़ारूक़ी के नाम।
दास्ताने नेस्त दर दस्त-ए-जहां बेह ज़ीं सुख़न
रास्तां जां बर सर-ए-ईं दास्तां अफ़्शांदा अंद
(हकीम अफ़ज़ल-उद-दीन ख़ाक़ानी शिरवानी)
इसके बाद मिर्ज़ा बेदिल का वही नुक्ता जो पहली और दूसरी जिल्द में पेश किया गया है। फिर एक पन्ने पर फ़िरदौसी के दो शेर हैं:
हमी ख़्वाहम् अज़ दावर-ए-किर्दगार
कि चंदां अमां याबम् अज़ रोज़गार
कज़ीं नामवर नामा-ए-बास्तां
बमानम् ब-गीती यके दास्तां
विषय सूची
तीसरी जिल्द की भूमिका
प्रस्तावना
जहान-ए-हमज़ा
अनुक्रमणिका
पहली जिल्द और दूसरी जिल्द की सूचियों से विषय-वस्तु का कुछ अंदाज़ा हो जाता है। लेकिन तीसरी जिल्द के जहान-ए-हमज़ा से कुछ पता नहीं चलता। पहली जिल्द की लेखक की बात में फ़ारूक़ी ने चार जिल्दों का ख़ाका पेश किया है। पहली जिल्द तो सैद्धांतिक चर्चाओं की है। और दूसरी जिल्द व्यावहारिक चर्चाओं की। इसके बारे में वे लिखते हैं कि:
अगर यह जिल्द बहुत लंबी न खिंच गई तो दास्तान के अहम कारक यानी Actant पात्रों, मसलन अय्यार, साहिर (जादूगर), साहिब-ए-क़िरान, दीवाना, देव, परीज़ाद, क़ज़्ज़ाक़ (डाकू), दस्त-ए-चपी (बायां हाथ), दस्त-ए-रास्ती (दायां हाथ), आईन-ए-तिलिस्म (तिलिस्म के नियम), फ़ुतुव्वत (वीरता/उदारता), अमीर हमज़ा और दूसरे योद्धाओं के नारों का आलोचनात्मक जायज़ा, दास्तान में हास्य का तत्व वग़ैरह पर भी बहस इसी जिल्द में शामिल की जाएगी।
अगर बाद में ज़िक्र किए गए मामलों के बयान के लिए अलग जिल्द की ज़रूरत महसूस हुई तो उसे तीसरी जिल्द क़रार देकर उसका शीर्षक फ़िलहाल 'पात्र और स्थान' प्रस्तावित किया है। आख़िरी जिल्द का शीर्षक मैंने इस वक़्त 'दास्तान-ए-दुनिया' रखा है। इसमें सभी छियालीस जिल्दों की एक-एक करके समीक्षा होगी और ख़ूबियों के लिहाज़ से हर जिल्द की रैंकिंग (दर्जाबंदी) भी होगी। (स श स, पहली जिल्द, पृष्ठ १६)
लेकिन तीसरी जिल्द पात्र और स्थान के नाम से नहीं है बल्कि जहान-ए-हमज़ा के नाम से है। और दास्तान-ए-दुनिया वाली आख़िरी जिल्द जो चौथी जिल्द होती, अभी सामने नहीं आई है। दूसरी जिल्द की भूमिका और तीसरी जिल्द की भूमिका और प्रस्तावना में फ़ारूक़ी लिखते हैं कि:
दूसरी जिल्द की भूमिका: 'पात्र और स्थान' पर आधारित जिल्द को 'जहान-ए-हमज़ा' कहकर तीसरी जिल्द बना दिया गया है। चौथी जिल्द इंशा-अल्लाह इरादे के मुताबिक़ दास्तान (लंबी) की अलग-अलग जिल्दों के अध्ययन पर आधारित होगी और इसका शीर्षक फ़िलहाल वही है, यानी 'दास्तान-ए-दुनिया' जो पहले प्रस्तावित किया गया था।
तीसरी जिल्द की भूमिका: मेरा ख़याल था कि तीसरी जिल्द का शीर्षक 'पात्र और स्थान' रखूंगा। लेकिन काम के दौरान यह महसूस हुआ कि इस जिल्द में सिर्फ़ पात्रों और स्थानों का ज़िक्र नहीं है... लिहाज़ा अब इस जिल्द को 'जहान-ए-हमज़ा' का नाम दिया गया है। चौथी जिल्द का नाम इंशा-अल्लाह वही रहेगा ('दास्तान-ए-दुनिया') जो पहले से प्रस्तावित था।
प्रस्तावना (तीसरी जिल्द): इस जिल्द में हम दास्तान अमीर हमज़ा (लंबी) के कुछ अहम वाक़यात, किरदारों और साहित्यिक व आख्यानात्मक विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण फ़रहंग (शब्दकोश) की शक्ल में पेश करेंगे... अब 'जहान-ए-हमज़ा' नाम की फ़रहंग देखिए।
ज़ाहिर है कि जहान-ए-हमज़ा भी बहुत अहम जिल्द है। इसे दास्तान-ए-अमीर हमज़ा के मज़ामीन (विषयों) की डिक्शनरी कहना चाहिए। इसमें दास्तान की तमाम निशानियों, हालात और उससे जुड़ी चीज़ों की तफ़सीली फ़रहंग (विस्तृत शब्दकोश) दी गई है। दूसरी जिल्द की तरह यह भी बड़ा तहक़ीक़ी (शोधपूर्ण) कारनामा है। फ़न-ए-दास्तान-गोई (दास्तान सुनाने की कला) की शेरियात को समझने के लिए पहली जिल्द अहमियत रखती है और अगर चौथी जिल्द आ गई तो यक़ीन है कि वह तन्क़ीदी क़द्र-ओ-क़ीमत (आलोचनात्मक मूल्य) तय करने के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा अहम होगी।
हम यहाँ उर्दू दास्तानों के तारुफ़ (परिचय) में फ़ारूक़ी से मदद लेकर कुछ ज़रूरी बातें दर्ज करना बेहतर समझते हैं।
(1) उर्दू दास्तानों में आठ दफ़्तर, छियालीस जिल्दें और कोई चवालीस हज़ार पन्ने हैं।
(2) दफ़्तर से क्या मुराद (मतलब) है? दफ़्तर से मुराद जिल्दें नहीं है बल्कि दफ़्तर उन दास्तानों का मजमूआ (संग्रह) है जो आपस में मामूली से कुछ ज़्यादा रब्त (संबंध) रखती हैं (जिल्द दोम, पेज: 31)। इस बात को यूँ समझा जा सकता है कि अलग-अलग हालात में शान-ए-नुज़ूल (उतरने के संदर्भ) के मुताबिक़ जिस तरह हुक्म दिया गया कि फ़लाँ आयत को फ़लाँ सूरह में रखो, यानी मज़मून के रब्त की वजह से आयतों को सूरतों में जमा किया गया। ग़ालिबन इसी तरह दास्तानों के आपसी रब्त की बुनियाद पर उनके दफ़्तर बनाए गए जो तादाद में सात हुए। और एक दफ़्तर वह बनाया गया जिसमें पत्तों या बयानिया (कथा) के अलग-अलग टुकड़ों या छोटे-छोटे ग़ैर-मुताल्लिक़ वाक़यात (बेजोड़ घटनाओं) को रखा गया, इसलिए दफ़्तर-ए-हश्तम (आठवें दफ़्तर) को एक तरह का सफ़ीना या कश्कोल (विविध संग्रह) कह सकते हैं।
(3) पत्ता क्या चीज़ है? पत्ते को दास्तान बढ़ाने का इशारा कह सकते हैं। आज की ज़बान में नोट्स या ख़ाका कहिए।
(4) दास्तान की तरतीब...
यह बात बहरहाल साबित है कि दास्तानें फ़ारसी से तर्जुमा नहीं हैं। लेकिन हमारे दास्तान-गोयों को उनका मुसन्निफ़ (लेखक) भी नहीं कहा जा सकता। यह बात भी बिल्कुल साफ़ है कि दास्तान में तर्जुमा/तस्नीफ़ (रचना) या तालीफ़ (संकलन)/तर्जुमा या तसहीह (सुधार)/तरतीब या इस्तेआनत/इआनत (मदद/सहयोग) का तसव्वुर बहुत ढीला-ढाला है। लिहाज़ा यह भी ज़ाहिर है कि जब दास्तान की तश्कील (बनावट) का निज़ाम भी ख़ासा ढीला-ढाला है तो इसके अलग-अलग वाक़यात और दास्तानों में रब्त और तरतीब बस इतनी ही होगी कि बात बिल्कुल उलझ न जाए। (स. श. हिस्सा 2, पेज 61)
फ़ारूक़ी ने यह भी लिखा है कि,
दास्तान के वसीअ (विशाल) ज़बानी रूप का पहले से न सिर्फ़ वजूद था बल्कि यह भी कि शायद अलग-अलग दास्तान-गोयों ने अलग-अलग दास्तानों में अपनी-अपनी महारत (इख़्तिसास) पैदा कर ली थी। और वही इन दास्तानों को बयान करते थे। (स. श. हिस्सा 3, पेज 185)
जब दास्तानों को तरतीब देने की बात सोची गई तो अलग-अलग दास्तानें उन्हीं लोगों से लिखवाई गईं जो अपनी-अपनी दास्तानों के बयानों में महारत हासिल कर चुके थे या उनसे कहा गया कि आप अपनी दास्तान इमला कराइए (बोलकर लिखवाइए)।
(5) दास्तान को लिखकर छपवाने की शुरुआत... दास्तान को लिखकर छपवाने की शुरुआत फ़ोर्ट विलियम कॉलेज कलकत्ता से हुई जहाँ ख़लील अली अश्क ने एक मुख़्तसर (छोटी) दास्तान-ए-अमीर हमज़ा बक़ौल ख़ुद (उनके अपने अनुसार) फ़ारसी से तर्जुमा की। (स. श. हिस्सा 1, पेज 72) इस मुख़्तसर दास्तान का एक रूप ग़ालिब लखनवी ने शाया किया (कलकत्ता 1855) और इसको ज़रा सा फेर-बदल कर अब्दुल्लाह बिलग्रामी ने नवल किशोर प्रेस लखनऊ से अपने नाम से शाया किया (1871)। मेरे ख़याल में यह बात भी मुमकिन है कि दास्तान के नाम पर जो कुछ दास्तान-गोयों को याद था, उसको उन्होंने ख़ुद लिखा या किसी से इमला कराया और लिखते वक़्त ख़ासी रंग-आमेज़ी (सजावट) की।
(6) दास्तानों की बाक़ायदा इशाअत (प्रकाशन)... 1883 से 1917 तक अलग-अलग दास्तानों और उनकी कई जिल्दों की इशाअत हुई। बाज़ दास्तानों की इशाअत में दोहराव तो 1940 तक होता रहा लेकिन दास्तान की इशाअत का सबसे मसरूफ़ (व्यस्त) साल 1897 था जैसा कि फ़ारूक़ी की पेश की गई दास्तानों की फ़ेहरिस्त से मालूम होता है और उन्होंने 1897 के सबसे मसरूफ़ साल होने का ज़िक्र भी किया है। इस एक साल में फ़ारूक़ी की तहक़ीक़ के मुताबिक़ दस जिल्दें शाया हुईं। हम कह सकते हैं कि उन्नीसवीं सदी की आख़िरी दहाई ने हिंदुस्तान में उर्दू दास्तानों की इशाअत की बड़ी ख़िदमत अंजाम दी।
(7) दास्तानों का पब्लिशर/छापने वाला... इस ख़िदमत को मुंशी नवल किशोर ने अंजाम दिया। नवल किशोर प्रेस लखनऊ व कानपुर के मालिक मुंशी नवल किशोर ने दास्तान-गोयों से लिखवा-लिखवा के ताबड़तोड़ यह दास्तानें शाया कीं। हम कह सकते हैं कि उर्दू अदब का इतना बड़ा भारी-भरकम और अहम सरमाया (पूँजी) उर्दू ज़बान-ओ-अदब के एक ग़ैर-मुस्लिम चाहने वाले की तवज्जो से सामने आया वरना क़िस्सा-ख़्वानी की महफ़िलों के बिखरने से आज हमें इसके वजूद का भी इल्म न होता। हमें मुंशी नवल किशोर की उर्दू ख़िदमात पर फ़ख़्र है।
(8) उर्दू दास्तान-गो और दास्तानें:
(i) मोहम्मद हुसैन जाह (फ़ारूक़ी की तहक़ीक़ के मुताबिक़ वफ़ात 1891 और 1893 के बीच) सैयद ग़ुलाम हुसैन रम्माल के बेटे। अहमद हुसैन क़मर के छोटे भाई, लखनऊ के रहने वाले। तिलिस्म-ए-होशरुबा चार जिल्दें।
(ii) अहमद हुसैन क़मर (वफ़ात: फ़रवरी/मार्च 1901) जाह के बड़े भाई। तिलिस्म-ए-होशरुबा छह जिल्दें। होमान नामा एक जिल्द। तिलिस्म-ए-फ़ित्ना-ए-नूर-अफ़शाँ तीन जिल्दें। तिलिस्म-ए-हफ़्त पैकर तीन जिल्दें। तिलिस्म-ए-ख़याल-ए-सिकंदरी तीन जिल्दें। तिलिस्म-ए-नौख़ेज़-ए-जमशीदी तीन जिल्दें।
(iii) शेख़ तस्दीक़ हुसैन (वफ़ात 1911 और 1917 के दरमियान) नौशेरवाँ नामा दो जिल्दें। हुरमुज़ नामा एक जिल्द। कोचक बाख़्तर एक जिल्द। बाला बाख़्तर एक जिल्द। ईरज नामा दो जिल्दें। लाल नामा दो जिल्दें। आफ़्ताब-ए-शजाअत छह जिल्दें।
(iv) सैयद इस्माईल असर (वफ़ात 1927 से पहले) संदली नामा एक जिल्द।
(v) प्यारे मिर्ज़ा (वफ़ात नामालूम) और शेख़ तसद्दुक़ हुसैन मिलकर तूरज नामा जिल्द अव्वल। एक जिल्द।
(vi) अहमद हुसैन क़मर, शेख़ तसद्दुक़ हुसैन और सैयद इस्माईल असर मिलकर... तिलिस्म-ए-ज़ाफ़रान ज़ार-ए-सुलैमानी दो जिल्दें। क़मर ने ज़ाफ़रान ज़ार लिखना शुरू किया था मगर उनका इंतिक़ाल हो गया। (स. श. हिस्सा 1, पेज 122)
(vii) शेख़ तसद्दुक़ हुसैन (सैयद इस्माईल असर की तसहीह के साथ) तूरज नामा जिल्द दोम। एक जिल्द। गुलिस्तान-ए-बाख़्तर तीन जिल्दें।
कुल जोड़ छियालीस जिल्दें और दास्तान-गो पाँच। मुख़्तसर दास्तानों के लिखने वाले ख़लील अली अश्क, मीर अहमद अली, ग़ालिब लखनवी और अब्दुल्लाह बिलग्रामी को छोड़कर।
(9) अमीर हमज़ा कौन साहब हैं?... सुहैल बुख़ारी मरहूम की तहक़ीक़ है कि दास्तान-ए-अमीर हमज़ा की बुनियाद 'मग़ारी हमज़ा' नाम की एक किताब है जो हमज़ा बिन अब्दुल्लाह अश-शारी नाम के एक ख़ारिजी की सवानेह (जीवनी) पर आधारित है लेकिन यह महज़ क़यास (अंदाज़ा) है। (स. श. हिस्सा 1, पेज 154) महज़ क़यास नहीं। इसको बेतुका क़यास कहना चाहिए। हिंदुस्तान के दास्तान-गो किसी ख़ारिजी को हीरो नहीं बना सकते। एक तो लखनऊ शियों का गढ़। दूसरे दास्तान-गो ख़ुद भी शिया, तीसरे, उस वक़्त की हुकूमत भी शिया। इन सबके नज़दीक किसी ख़ारिजी की अहमियत नहीं हो सकती। इसलिए यह क़यास ही ख़िलाफ़-ए-क़यास है। शियों के नज़दीक हज़रत अमीर हमज़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बेशक अहमियत है। लेकिन फ़ारूक़ी का भी यह कहना कि दास्तान में ख़ुद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और अम्म-ए-रसूल अल्लाह (रसूल अल्लाह के चाचा) का तारीखी वजूद नहीं है बल्कि यह बिल्कुल फ़र्ज़ी हैं।
मेरे नज़दीक यह बात मानने लायक नहीं है क्योंकि मुसलमानों ने हज़रत रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शुभ नाम का इस्तेमाल काल्पनिक आख्यान में करने की हिम्मत नहीं की है। चूँकि कोई फ़रिश्ता या शैतान हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का रूप धारण करना तो दूर की बात है, आपके नाम का इस्तेमाल भी नहीं कर सकता। इसलिए मुसलमान दास्तानगो (दास्तान सुनाने वाले) ऐसा कैसे कर सकते हैं। फिर यह भी किसी समझदार व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है कि किसी फ़र्ज़ी किरदार को, या फ़र्ज़ी न सही, किसी असली मगर ग़ैर-सैयद व्यक्ति को ख़ानदान-ए-रिसालत का व्यक्ति, ख़ास तौर पर हुज़ूर अक़दस ﷺ का चहेता चाचा बना दे।
दास्तानगोई की शुरुआत के बारे में जो पुरानी रिवायतें हैं, उनसे ज़ाहिर है कि हज़रत अमीर हमज़ा के बारे में रसूलुल्लाह के हुक्म से ही इस्लामी देशों में क़िस्से मशहूर थे। और यह भी कि इन क़िस्सों को ख़ुद हुज़ूर ﷺ भी समय-समय पर हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से सुनते थे। अगर ये बिल्कुल फ़र्ज़ी बातें हैं तो क्या इनको मौज़ू अहादीस (गढ़ी हुई हदीसों) के ख़ाने में नहीं रखना चाहिए? और इसकी ज़िम्मेदारी किन लोगों पर जाती है? बनू उमय्या पर तो हरगिज़ नहीं जा सकती। बनू अब्बास पर ही जा सकती है। उन्होंने इतना बड़ा फ़साना गढ़ा तो गढ़ा, मगर झूठी निस्बत (संबंध) क्यों पैदा की? मेरा ख़याल है कि दास्तान के बहुत से बयान झूठे हो सकते हैं मगर निस्बत झूठी नहीं हो सकती। लिहाज़ा मैं दास्तान-ए-अमीर हमज़ा को हुज़ूर ﷺ की निस्बत आ जाने से हज़रत अमीर हमज़ा ही समझता हूँ। अलबत्ता हमज़ा-ए-सानी, सालिस, राबे, ख़ामिस (दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें) वग़ैरह को दास्तानों के फ़र्ज़ी और काल्पनिक किरदार मान सकता हूँ। ख़ुद दास्तानगोयों ने दास्तानगोई की शुरुआत पर जो रोशनी डाली है, उसको फ़र्ज़ी और काल्पनिक समझने की कोई वजह नज़र नहीं आती। फ़ारूक़ी ने सुहैल बुख़ारी के हवाले से कुछ पहले अपना ख़याल यह ज़ाहिर किया है,
दास्तान-ए-अमीर हमज़ा की असल (मूल) ग़ालिबन ईरानी है। (ऐज़न, पृ. 153)
लेकिन ईरानी-उल-अस्ल (मूल रूप से ईरानी) होने के सुबूत पेश नहीं किए। अगर नौशेरवाँ, हुरमुज़, एरज़, तूरज, होमान वग़ैरह के शाही कमालात (खूबियों) को अमीर हमज़ा की शख़्सियत के पर्दे में बयान करने से इन दास्तानों के ईरानी-उल-अस्ल होने के सुबूत मिल जाते हैं, तो उनकी बात सही हो सकती है। क्योंकि दास्तानें तमसीली (प्रतीकात्मक) हैसियत तो ज़रूर रखती हैं। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि यह कई मुल्कों में राइज (प्रचलित) रही है और हर मुल्क ने अपने जुग़राफ़ियाई (भौगोलिक) असर डाले हैं। इसलिए,
किसी दास्तान को किसी ख़ास मुल्क या वक़्त से मंसूब करना (जोड़ना) दुरुस्त नहीं। जो चीज़ दस्त-ब-दस्त और सीना-ब-सीना (पीढ़ी-दर-पीढ़ी) आई हो, उसे हर उस ज़बान और मुल्क की मीरास (विरासत) समझना चाहिए, जहाँ वह मुरव्वज (प्रचलित) हो। (ऐज़न, पृ. 150)
इस फ़य्याज़ी (उदारता) का क्या गिला हो सकता है। लेकिन हमारे नज़दीक अहमियत इस बात की है कि जब वह सीना-ब-सीना आई हुई चीज़ फ़ारसी ज़बान में बयान की गई या लिखी गई, तो ईरान और फ़ारसी की हुई, और जब वही चीज़ उर्दू ज़बान में बयान की गई या लिखी गई, तो हिंदुस्तान और उर्दू की हुई। उर्दू दास्तानों की यही ख़ुसूसी अहमियत है क्योंकि उनका अपना तख़्लीक़ी बयानिया (रचनात्मक आख्यान) है। इनमें अपना तख़य्युल (कल्पना) है, अपनी ज़बान है। अपनी ज़िंदगी है, अपना तजुर्बा है और अपना मौक़िफ़ (दृष्टिकोण) है।
(10) अमीर हमज़ा के अल्क़ाब... ख़लील अली अश्क ने अमीर हमज़ा को 'अम्म-ए-रसूल-ए-आख़िर-उज़-ज़माँ' (आख़िरी नबी के चाचा) बताया है। इसलिए उनके अल्क़ाब (उपाधियाँ) ये हैं,
शाह-ए-मर्दां व मर्द-ए-मैदां, ताज बख़्श-ए-जहाँ व हलक़ा-ब-गोश-ए-गर्दन्-कशां, अम्म-ए-रसूल-ए-आख़िर-उज़-ज़माँ यानी अमीर-ए-किश्वर-गीर-ए-जहाँ।
अगर हम अमीर हमज़ा से मुराद 'अम्म-ए-रसूल' नहीं बल्कि कोई दूसरा अमीर लें, तो भी ये अल्क़ाब अम्म-ए-रसूल-ए-आख़िर-उज़-ज़माँ को हटाकर उसकी शायान-ए-शान (गरिमा के अनुकूल) ही हैं। मसलन बाला-ए-बाख़्तर में ये अल्क़ाब हैं,
गौहर-ए-दरिया-ए-शुजाअत व लाल-ए-बे-बहा-ए-मादन-ए-हिम्मत व जुरअत, माह-ए-आसमान-ए-दिलावरी, ख़ुर्शीद-ए-फ़लक-ए-सफ़्दरी, अमीर-ए-बा-तौक़ीर, साहब-ए-अक़्ल व तदबीर, मुल्क-गीर व किश्वर-सिताँ, फ़ख़्र-ए-सलातीन-ए-जहाँ, शाहान-ए-शाहाँ व सुल्तान-ए-सुल्ताँ, ज़लज़ला-ए-क़ाफ़, सानी-ए-सुलेमान, हमज़ा साहब-क़िराँ-ए-ज़माँ।
कोचक बाख़्तर में ये अल्क़ाब हैं,
सुल्तान-ए-सुल्तानाँ, शाह-ए-शाहाँ, हलक़ा-फ़िगन-ए-गोश-ए-गिरह-कशाँ, मर्दुम-रुबा-ए-ज़ीन-ए-जंग, शेर-ए-बेशा-ए-जंग, शिकनिंदा-ए-कमाँ-ए-रुस्तम-ए-दास्ताँ, साहब-ए-गुर्ज़-ए-साम बिन नरीमान, ज़लज़ला-ए-क़ाफ़, सानी-ए-सुलेमान, अमीर हमज़ा-ए-आली-शान, साहब-क़िरान-ए-दौराँ।
फ़ारूक़ी ने दीगर दास्तानों में मज़्कूरा (ज़िक्र किए गए) अल्क़ाब भी पेश किए हैं। ऐसे अल्क़ाबों से ज़ाहिर है कि दास्तानगोयों ने पुराने अल्क़ाब भी लिए हैं और नए अल्क़ाब भी बनाए हैं। इन अल्क़ाबों की ज़रूरत पर ग़ौर कीजिए तो साफ़ पता चलेगा कि दास्तानगोयों ने अपने दौर के सरबराह-ए-ममलकत (राज्य प्रमुख) की तारीफ़ अमीर हमज़ा के पर्दे में की है। यानी अमीर हमज़ा साहब-क़िरान, दास्तानगोयों के दौर के सियासी सरबराहों के नुमाइंदे (प्रतिनिधि) बनाकर पेश किए गए हैं।
अगर यह ग़ौर कीजिए कि अमीर हमज़ा ही को नुमाइंदा क्यों बनाया, तो यह भी साफ़ पता चलता है कि अपने मुल्क के सुल्तान या नवाब का इस्तिआरा (रूपक) अमीर हमज़ा को बनाने में, उनकी शहादत और क़त्ल के बाद की दुर्दशा में अवाम की हमदर्दियों के जो पहलू हैं, वे अपने नवाबों और शाहों के लिए हासिल हो सकें। साथ ही, इसी शख़्सियत में मौजूद बादशाह व नवाब के औसाफ़ व कमालात (गुणों और खूबियों) को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से पेश किया जा सकता था, और सरबराह की कुछ ग़ैर-अख़लाक़ी (अनैतिक) बातों को भी उसकी इम्तियाज़ी शान का जवाज़ (औचित्य) बनाया जा सकता था। और अमीर हमज़ा के इस्तिआरे की ही वजह से किसी बात के लिए सरबराह के बुरा मानने की गुंजाइश न थी। अब अगर ग़ौर कीजिए कि हज़रत अमीर हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु वाक़ई न तो शाह-ए-दीन थे और न शाह-ए-दुनिया थे, फिर उनको शाह बल्कि शाह-ए-शाहाँ क्यों कहा गया, तो इसकी वजह भी ज़ाहिर है। क्योंकि हज़रत अमीर हमज़ा ؓ शाह-ए-दीन व दुनिया, सरदार-ए-दो-जहाँ हज़रत अहमद मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बड़े प्यारे चाचा थे, और ग़ज़वा-ए-उहुद में उनकी शहादत हो गई और हिंदा ने उनका कलेजा निकालकर चबा लिया। यह ऐसा दिल-दोज़ (हृदयविदारक) वाक़िया है जिस पर ख़ुद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आँखें ख़ून रोईं।
ज़ाहिर है कि हुज़ूर ﷺ की कैफ़ियत से हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की कैफ़ियत भी बदली, लिहाज़ा पूरी उम्मत की तरफ़ से हिम्मत व मर्दानगी का तमग़ा हज़रत अमीर हमज़ा को मिला और उनकी दिलावरी (बहादुरी) पर सबको नाज़ रहा। एक दिलावर बादशाह मैदान-ए-कारज़ार (युद्धक्षेत्र) में जो कारनामे अंजाम दे सकता है, उसकी इंतिहा (चरम सीमा) मैदान-ए-जंग में शहादत है, और हज़रत अमीर हमज़ा की शहादत ख़ानदान-ए-रिसालत में से किसी मुअज़्ज़िज़ (सम्मानित) फ़र्द की पहली शहादत है। इसलिए इस फ़र्द को शाह-ए-शाहाँ कहने में कोई क़बाहत (हर्ज़) नहीं।
इसी तरह अमीर हमज़ा को साहब-क़िराँ कहने का भी जवाज़ (औचित्य) मौजूद है। साहब-क़िराँ अस्लन (मूल रूप से) उस शख़्स को कहते हैं जो ऐसे वक़्त में पैदा हुआ हो जब मुश्तरी (बृहस्पति) और ज़ोहल (शनि) या ज़ोहरा (शुक्र) यानी दो सैयारे (ग्रह) एक बुर्ज (राशि) में जमा हो जाएँ। ऐसा शख़्स अपनी ज़िंदगी में बड़ा नाम करता है। साहब-क़िराँ अमीर तैमूर का लक़ब है। दास्तानगोयों के मुताबिक़, जैसा कि फ़ारूक़ी ने बताया है, साहब-क़िरान उसे कहते हैं जो क़ाफ़ में भी जाकर लड़ा हो, हर जगह फ़तहयाब (विजयी) हो और उसका बेटा भी ऐसा ही हो। (स. श. स., जिल्द 3, पृ. 189) और साहब-क़िराँ वह है जो हसब-नसब, फ़हम व फ़िरासत (समझ और बुद्धिमत्ता), ज़ोर व जुरअत सब में तमाम मर्दान-ए-आलम (दुनिया के मर्दों) पर फ़ौक़ियत (श्रेष्ठता) रखता हो। (स. श. स. 3, पृ. 191)
इस लिहाज़ से भी देखिए तो अमीर हमज़ा हाशमी बेहतरीन खानदान वाले हैं और उनकी समझदारी और बुद्धिमानी की वजह से ही हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें इतना अज़ीज़ रखते थे। उनकी बहादुरी, जंग लड़ने की सलाहियत और शहादत में तो कोई शक ही नहीं हो सकता। वह किसी बादशाह से कम नामवर नहीं हुए। इसलिए वह 'साहिब-ए-क़िरां' ज़रूर हैं। अमीर हमज़ा को दास्तानगोयों ने यह लक़ब देकर अमीर तैमूर की याद ताज़ा की है और इसके ज़रिए अपने प्रशंसित शिया आकाओं को खुश किया है।
(11) हाज़ा मिन फ़ज़्ल-ए-रब्बी... दास्तानगोयों ने अमीर हमज़ा की औलाद और आने वाली नस्लों के आपसी रिश्ते, मामले और अखलाक़ (नैतिकता) वगैरह अच्छे-बुरे खूब पेश किए हैं। यह भी दरअसल अपने दौर के सुल्तान या नवाब से अपनी वफ़ादारी जताने के लिए है कि हम नमकख्वार हैं, तो हर अच्छी और बुरी बात से अपने आका को बाखबर रखना हमारा फ़र्ज़ है। फिर, यह बात भी है कि 'अम्र अय्यार' और 'लंधौर' जैसे मददगारों से 'अमीर हमज़ा' की अनबन होती है, तो 'अमीर हमज़ा' का कोई काम रुकता नहीं। उन पर अल्लाह का खास फ़ज़्ल (कृपा) है। उनको जिब्रील की उस्तादी नसीब है। उनको अपने भतीजे हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत और इज़्ज़त हासिल है। तो अब अल्लाह के फ़ज़्ल और उसकी तौफ़ीक़ के सिवा वह किस चीज़ या किस शख्स के मोहताज हैं।
(12) अम्र अय्यार का तआरुफ़ (परिचय)... फ़ारूक़ी लिखते हैं,
अमीर हमज़ा की तरह अम्र अय्यार के भी तफ़सीली (विस्तृत) लक़ब सबसे पहले खलील अली अश्क ने अपनी जिल्द चहारुम (चौथे खंड) के सफ़हा 2 पर इस तरह बयान किए हैं,
सरखैल पापोश बोसां (?) बिसात-ए-बनी आदम, मौलाना मुअज़्ज़म, जामे-उल-फ़ज़्ल वल-करम, दवंद-ए-बे-दरंग, क़िला-गीर बे-जंग, साहिब-ए-क़ंतूरा-ओ-ज़ंग, मर्दां रा सरहंग, नामुराद रा पालहंग, यानी जन्नत मआब, शैख-उल-अस्हाब ख्वाजा उमर बिन ज़मरी नामदार, चराग़-ए-लश्कर-ए-इस्लाम।
अम्र ने एक जगह खुद अपना नाम लक़ब के साथ यूं बयान किया है,
हिज़बर-ए-दश्त-ए-तर्रारी ओ निहंग-ए-बहर-ए-ज़ख्खार-ए-अय्यारी, सरहंग-ए-सरहंगां बिसात-ए-बिलाद-ए-बनी आदम, मौला-ए-मुअज़्ज़म ओ मुकर्रम, जामे-उल-फ़ज़्ल वल-करम दवंद-ए-बे-दरंग, क़िला-गीर बे-जंग, मर्दां सरहंग ओ नामर्दां रा पालहंग, साहिब-ए-क़ंतूरा ओ रंग, अय्यार-ए-जहांगीर-ए-आलम मोहतरम ओ मोहतशम, ज़लज़ला-ए-क़ाफ़-ए-सुलैमानी, हमज़ा साहिब-ए-क़िरां, अमीर-ए-आली शान, अय्यार तर्रार मक्कार ग़द्दार ओ खंजर गुज़ार ख्वाजा अम्र बिन उमय्या ज़मरी नामदार। (तिलिस्म-ए-होशरुबा, जिल्द शशुम (छठा खंड) पृ. 908) हवाले से: स श स जिल्द 3, पृ. 320)
दो-एक बातें ध्यान देने लायक हैं। एक तो यह कि खलील अली अश्क ने ख्वाजा उमर (बिना 'वाव' के) लिखा है। जबकि अम्र ने खुद अपना तआरुफ़ ख्वाजा अम्र ('वाव' के साथ) कराया है। अश्क ने सिर्फ बिन ज़मरी लिखा है। मगर अम्र ने अपना नाम वल्दियत (पिता के नाम) के साथ बिन उमय्या ज़मरी बताया है। दूसरी बात यह कि अश्क ने अम्र के चरित्र की बुराइयां नहीं लिखी हैं। मगर खुद अम्र ने अपने लक़ब में अय्यार तर्रार मक्कार ग़द्दार भी कहा है। यानी वह अपना तआरुफ़ बिल्कुल साफ़गोई और किसी भी तरह के एहसास-ए-कमतरी (हीन भावना) या एहसास-ए-बरतरी (श्रेष्ठता की भावना) से बेपरवाह होकर कराता है कि उसमें खूबियां हैं तो बुराइयां भी हैं और वह बनू हाशिम की तरह खानदान की फ़ज़ीलत (बड़ाई) नहीं रखता। वह 'सैय्यद-उल-अस्हाब' नहीं, शैख-उल-अस्हाब है। अब आगे चलिए। फ़ारूक़ी लिखते हैं कि,
अम्र के नाम का मामला थोड़ा पेचीदा है। ज़्यादातर दास्तानों में है कि अमीर हमज़ा और अम्र के नाम बुज़ुर्चमेहर ने रखे... लेकिन ऐसा भी है कि ख्वाजा अब्दुल मुत्तलिब ने अमीर हमज़ा का नाम अबुल-उला और अम्र अय्यार का नाम अम्र ('वाव' के साथ) रखा। (स श स. 3, पृ. 320)
बुज़ुर्चमेहर कहता है कि हमने इसका नाम 'अम्र-बिल-फ़तह' रखा (बिल्ग्रामी: 50) इसका मतलब यह है कि नाम का तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) ब-फ़तहैं (दोनों अक्षरों पर ज़बर के साथ) बर-वज़न 'ख़बर' (ख़बर की लय पर) होगा न कि ब-सुकून-ए-दोम (दूसरे अक्षर के साकिन होने के साथ) बर-वज़न 'शहर'। (ऐज़न पृ. 321)
यह बात ध्यान में रहे कि अरबी में उमर (पहला अक्षर पेश के साथ, दूसरा ज़बर के साथ) की एक तस्ग़ीर (छोटा रूप) अम्र भी है और इसका तलफ़्फ़ुज़ पहला अक्षर ज़बर और दूसरा साकिन (हलंत) के साथ बर-वज़न 'दहर' या बर-वज़न 'शहर' किया जाता है। बुज़ुर्चमेहर ने जो वज़ाहत की है कि बच्चे का नाम अम्र-बिल-फ़तह है (बिल्ग्रामी, 50) तो इसका मतलब यही निकलता है कि नाम का तलफ़्फ़ुज़ पहले और दूसरे अक्षर पर ज़बर के साथ बर-वज़न 'ख़बर' होगा... यहां (यानी हिंदुस्तानी दास्तान में) हम देखते हैं कि अम्र के नज़्म किए गए नारों में (एक नारे के सिवा) हर जगह उसका नाम बर-वज़न 'ख़बर' लिखा गया है और नाम का इमला (वर्तनी) अम्र (عمرو) दर्ज किया गया है। इसलिए, यह बात तय हो जाती है कि ईरानी दास्तान में जो भी तलफ़्फ़ुज़ रहा हो, लेकिन इसके हिंदुस्तानी रूप में तलफ़्फ़ुज़ बर-वज़न 'ख़बर' और इमला अम्र ही दुरुस्त है। 'दहर/शहर' तलफ़्फ़ुज़ जिस नारे में नज़्म हुआ है, वह इस तरह है:
(नौशेरवां, अव्वल 359)
अम्रम कि कुलाह अज़ सर-ए-क़ैसर बिबरम
रंग अज़ रुख़-ए-बहसक-ए-बद-अख्तरम बिबरम
दर मजलिस-ए-खुसरवां चू गर्दम साक़ी
तेग़ ओ सिपर ओ सुबू ओ साग़र बिबरम
(स श स. 3, पृ. 22-321)
यह ध्यान रहे कि ग़ालिब ने भी अम्र का नाम बर-वज़न 'ख़बर' बांधा है:
दुर्र-ए-मानी से मेरा सफ़्हा लुक़ा की दाढ़ी
ग़म-ए-गेती से मेरा सीना अम्र की ज़ंबील
कुछ नुस्खों (पांडुलिपियों) में अमर ब-फ़तहैं (दोनों अक्षरों पर ज़बर) लिखा मिलता है। इससे यह बात साबित हो जाती है कि ग़ालिब के ज़माने में अम्र अय्यार के नाम का तलफ़्फ़ुज़ बर-वज़न 'ख़बर' था। ग़ालिब ने इस तलफ़्फ़ुज़ का एहतमाम एक फ़ारसी क़सीदे में भी किया है। (दर मदह नवाब कल्ब अली खां)
ज़-ग़म्ज़ा-ए-तो चे गोयम कि आं बुवद ज़-अम्रो
दिलेर ओ चुस्त ओ हुनरमंद-तर ब-अय्यारी
यही तलफ़्फ़ुज़ इस क़सीदे में बार-बार आया है। फ़ारसी क़सीदे में भी ग़ालिब के इस तलफ़्फ़ुज़ से यह नतीजा निकल सकता है कि फ़ारसी में भी राइज (प्रचलित) तलफ़्फ़ुज़ बर-वज़न 'ख़बर' होगा। (ऐज़न. 3, पृ. 322)
उर्दू की हद तक तो यह बात यक़ीन से कही जा सकती है कि सही तलफ़्फ़ुज़ बर-वज़न 'ख़बर' ही है। तोता राम शायां ने अपनी नज़्म की गई दास्तान-ए-अमीर हमज़ा जिसका नाम तिलिस्म-ए-शायां है, में भी हर जगह बर-वज़न 'ख़बर' लिखा है। (कहीं 'वाव' के साथ, कहीं 'वाव' के बिना) इसलिए हम सिर्फ अंदाज़ा कर सकते हैं कि अम्र ब-फ़तहैं है। ब-ज़म्म-ए-अव्वल व फ़तह-ए-दोम (पहले अक्षर पर पेश और दूसरे पर ज़बर) नहीं है। (स श स. 3, पृ. 322)
और अपनी बात के सुबूत में फ़ारूक़ी तिलिस्म-ए-शायां से नीचे दिए गए अशआर नक़ल करते हैं:
बड़ा ही शोख होगा और चालाक
निहायत मुफ़्तरी अय्यार बेबाक
अमर अल-क़िस्सा उसने नाम पाया
क़लम अब दूसरे मतलब पर आया
सुने जिस वक़्त मज़मूं ज़हर-आमेज़
अमर की आतिश-ए-ग़ुस्सा हुई तेज़
फ़र्द हमज़ा ने की आतिश अमर की
नहीं इंसां को लाज़िम है गरमी
उठाया अल-ग़रज़ उनको ब-तौक़ीर
अमर दिल में मगर था सख़्त दिलगीर
सुनो अब दूसरे दिन की कहानी
अमर ने भी ब-रस्म-ए-मेहमानी
जहां बैठे हुए थे दोनों मेहमां
किए हाज़िर अमर ने लाके दो ख़्वां
ख़जालत से निहायत तैश खाया
अमर के क़त्ल पर खंजर उठाया
(स श स. 3, पृ. 323)
और अपना निष्कर्ष पेश करते हैं:
ऊपर दिए गए अशआर से यह बात तो साफ़ हो जाती है कि अम्र अय्यार का नाम बर-वज़न 'ख़बर' ही दुरुस्त है और जहां महज़ 'उमर' लिखा है उसे किताबत (लिखने) की गलती मानना चाहिए और बर-वज़न 'हुनर' नहीं पढ़ना चाहिए। क्योंकि यह नाम बहरहाल बर-वज़न 'हुनर' नहीं है। 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' चहारुम (चौथे खंड) के पहले एडिशन (1890) में हर जगह 'उमर' मिलता है। ज़ाहिर है कि यह भी किताबत की गलती है। 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' अव्वल, सफ़हा 818 पर एक मिसाल ऐसी है जहां अम्र का नाम नज़्म किए गए नारे में नहीं बल्कि नज़्म किए गए बयान में आया है। और वहां भी इसका तलफ़्फ़ुज़ बर-वज़न 'ख़बर' ही है क्योंकि इमला 'अम्र' (عمرو) लिखा हुआ है लेकिन 'अम्र' बर-वज़न 'हुनर' होने का सवाल ही नहीं।
अम्र को जो करते थे साहिर हलाक
गरेबाँ सहर का हुआ ग़म से चाक
रहा इसके इमले (वर्तनी) का मामला तो जैसा कि हम देख चुके हैं, दास्तान में बार-बार इसे 'अम्र' वाव के साथ (عمرو) लिखा गया है। लेकिन कहीं-कहीं इससे भटकाव भी है। इस भटकाव को हम कातिब (लिखने वाले) / दास्तानगो की लापरवाही मान सकते हैं।
(स श स. 3, पृ. 324)
फ़ारूक़ी की यह तहक़ीक़ (शोध) बहुत ठोस है। मैंने अपने तौर पर मज़ीद तसल्ली के लिए कुछ शब्दकोश देखे जो मेरी पहुँच में हैं,
फ़रहंग-ए-आसफ़िया: अम्र (पुल्लिंग। एक फ़र्ज़ी नाम) चूँकि हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के नाम और इस नाम में लिखावट के दौरान कोई फ़र्क़ नहीं रहता था। 'उमर' (पेश के साथ) को 'अमर' (ज़बर के साथ) पढ़ देना गुस्ताख़ी में शामिल था। इसलिए एक अतिरिक्त 'वाव' के साथ इस नाम को लिखने का रिवाज़ डाला गया।
मुहज़्ज़ब-उल-लुग़ात: अम्र (पहले अक्षर पर ज़बर, दूसरे पर सुकून/विराम और तीसरे पर पेश) तिलिस्म-ए-होशरुबा के हीरो का नाम जो मुसलमानों के गिरोह का नंबर 1 अय्यार था। उर्दू अवाम की ज़बान।
क़ौल-ए-फ़ैसल: वाव का इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) लिखावट में सिर्फ़ इसलिए किया गया कि 'उम्र' (जिसका मतलब ज़िंदगी है, जहाँ 'मीम' साकिन/शांत है) और 'उमर' (जो एक नाम है, जहाँ पहले अक्षर पर पेश और दूसरे पर सुकून है) में फ़र्क़ हो जाए। वाव सिर्फ़ लिखा जाता था, बोला नहीं जाता था। अवाम और जाहिल लोगों ने इसे बोलना शुरू कर दिया। लखनऊ के फ़सीह (शुद्ध बोलने वाले) लोग पहले अक्षर पर ज़बर और दूसरे पर सुकून के साथ बोलते हैं। अवाम और जाहिल लोग दोनों अक्षरों पर ज़बर के साथ बोलते हैं। इनके नाम के हिस्से 'ख़्वाजा' और 'अय्यार' हैं।
नूर-उल-लुग़ात: अम्र, अरबी, पुल्लिंग, उमर, एक शख़्स का नाम था। इसके बाद न बोला जाने वाला 'वाव' इस मक़सद से बढ़ाया गया है कि 'उमर' और 'अम्र' में फ़र्क़ हो जाए। और ज़्यादातर 'अमर' (पहले और दूसरे अक्षर पर ज़बर के साथ) ज़बानों पर है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इन शब्दकोशों में कोई तहक़ीक़ी (शोध आधारित) बात नहीं है। यह बात कि अम्र एक फ़र्ज़ी नाम है, बिल्कुल ग़लत है। और 'उमर' (पेश के साथ) को 'अमर' (ज़बर के साथ) पढ़ देने में गुस्ताख़ी की आशंका की वजह से अतिरिक्त 'वाव' के साथ इस नाम को लिखने का रिवाज़ डाला गया, यह तो और भी भ्रामक है, मानो उमर से पहले अम्र किसी का नाम नहीं था। मुहज़्ज़ब-उल-लुग़ात और नूर-उल-लुग़ात की यह बात तो सही है कि वाव सिर्फ़ लिखा जाता था, बोला नहीं जाता था। लेकिन अगर लखनऊ के फ़सीह लोग अम्र को पहले अक्षर पर ज़बर और दूसरे पर सुकून के साथ बोलते थे और सही बोलते थे, तो तीसरे अक्षर पर पेश क्या चीज़ है? क्या इसी वजह से उर्दू में वाव का इज़ाफ़ा हो गया क्योंकि उर्दू में कोई लफ़्ज़ 'मुतहर्रिक-उल-आख़िर' (जिसके आख़िरी अक्षर पर मात्रा हो) नहीं होता। फिर अगर लखनऊ के फ़सीह लोग पहले अक्षर पर ज़बर और दूसरे पर सुकून के साथ बोलते थे और अवाम और जाहिल लोग दोनों पर ज़बर के साथ बोलते थे, तो शायरों और दास्तानगो लोगों ने लखनऊ के फ़सीह लोगों की पैरवी न करके अवाम और जाहिलों की पैरवी क्यों की? तो फिर लिखे जाने वाले वाव की भी ज़रूरत क्या थी? कहते हैं कि एक शख़्स का नाम था, कौन था वह शख़्स, क्या यह बताना ज़रूरी न था?
तहक़ीक़ी बात यह है कि अम्र और उमर दो नाम हैं और दोनों का तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) अलग-अलग है। वाव के साथ अम्र का तलफ़्फ़ुज़ बद्र या शहर के वज़न पर ही है, लेकिन उर्दू वाले साकिन (बिना मात्रा वाले अक्षर) को मुतहर्रिक (मात्रा वाला) और मुतहर्रिक को साकिन करते रहते हैं। तो जब अम्र में 'मीम' साकिन को 'मीम' मफ़तूह (ज़बर के साथ) करेंगे तो अम्र ख़बर के वज़न पर हो ही जाएगा, हुनर के वज़न पर हरगिज़ न होगा क्योंकि 'ऐन' मफ़तूह (ज़बर वाला ऐन) अपनी जगह पर बरक़रार रहेगा, वह तो न बदलेगा। फ़ारूक़ी ने बात सही कही है लेकिन 'हुनर' के वज़न पर होने का सवाल ही नहीं। को स्पष्ट कर देना था ताकि थोड़ी देर के लिए भी किसी को समझने में दिक़्क़त न होती। फ़ारूक़ी की यह बात भी इसी वजह से सही है कि उमर बिना वाव के अम्र अय्यार के लिए लिखना इमले (वर्तनी) की ग़लती है क्योंकि यहाँ अमर असल में अम्र के साकिन 'मीम' पर मात्रा देने की वजह से अमर ख़बर के वज़न पर हुआ है। जिन लोगों ने उमर बिना वाव के लिखा है, उन्होंने यह न सोचा कि इसको उमर ('ऐन' पर पेश के साथ) पढ़ा जा सकता है।
इस सूरत में पढ़ने वाले का ज़ेहन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ जाएगा और इस नाम की बेअदबी होगी। इसलिए जब असल नाम अम्र बिन उमय्या ज़मरी है तो हमेशा अम्र (वाव के साथ) लिखा जाए और शायरी में भी इसका सही तलफ़्फ़ुज़ अदा हो। 'मीम' मुतहर्रिक (मात्रा के साथ) न बाँधा जाए। लेकिन अगर जानते-बूझते ऐसा किया गया है कि अम्र में 'मीम' को मुतहर्रिक कर दिया और वाव को हटा दिया गया तो ज़ाहिर है कि इस लफ़्ज़ को अब उमर ('ऐन' पर पेश के साथ) पढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। यह इस्तेमाल करने वालों की जानबूझकर की गई शरारत हो सकती है। इसको हम लापरवाही कहकर टाल नहीं सकते। यह एंटी-सुन्नी हरकत मालूम होती है। दास्तानगो और शायरों ने अपने ममदूहों (जिनकी वे तारीफ़ करते थे) के साथ ऐसा क्यों नहीं किया।
अब रही बात अम्र अय्यार के फ़र्ज़ी होने की, तो यह शख़्स फ़र्ज़ी नहीं है। अरब में अम्र नाम के कई लोग गुज़रे हैं। जैसे अम्र बिन आस, अम्र बिन साद, इसी तरह अम्र बिन उमय्या ज़मरी। मैंने सीरत (पैग़ंबर की जीवनी) की एक पुरानी किताब जो अल्लामा अली इब्न बुरहानुद्दीन हलबी (निधन 1044 हिजरी) की लिखी हुई है और जिसका उर्दू अनुवाद इदारा-ए-क़ासमिया, कुतुब ख़ाना क़ासमी, देवबंद ने सीरत-ए-हलबिया के नाम से प्रकाशित किया है, कई साल पहले पढ़ी थी। उसको फिर देखा। इसकी जिल्द अव्वल (खंड 1) क़िस्त आठ, पृ. 72 पर विद्वान लेखक ने लिखा है कि,
अम्र बिन उमय्या... अरब में इंतहाई अक़्लमंद और समझदार आदमी समझा जाता था। यह अंधा था और लोगों को होने वाले वाक़ियात से मुताल्लिक़ (संबंधित) ख़बरें दिया करता था।
इस किताब की जिल्द दोम (खंड 2) क़िस्त आठ, पृ. 13 पर है कि
आँहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने मुख़्तलिफ़ अहम मामलों में हज़रत अम्र बिन उमय्या ज़मरी को अपना क़ासिद (दूत) और नुमाइंदा बनाकर भेजा करते थे क्योंकि वह बेहद समझदार और अच्छी राय रखने वाले लोगों में से थे। यह बात ज़ाहिर है कि आँहज़रत उन्हें उनके मुसलमान होने के बाद ही भेजते रहे होंगे और उनके इस्लाम के बारे में यह बात मालूम है कि वह 4 हिजरी में मुसलमान हुए हैं।
लेकिन किताब असल यानी उयून-उल-असर के हवाले से अल्लामा हलबी ने यह लिखा है कि एक सहाबी के साथ हज़रत अम्र बिन उमय्या ज़मरी के मक्का जाने की तजवीज़ (सुझाव) पर आँहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया था कि,
जब अम्र बिन उमय्या ज़मरी अपनी क़ौम के दरमियान यानी अपने इलाक़े में पहुँच जाए तो उससे बचते रहना... उससे तुम अपने को महफ़ूज़ मत समझना। (पृ. 13)
इसी किताब की जिल्द सोम (खंड 3) क़िस्त नौ, पृ. 52 पर है कि,
यह अम्र बिन उमय्या ज़मरी जाहिलियत (इस्लाम से पहले के दौर) के ज़माने में निहायत अय्यार और चालाक आदमी थे (यहाँ तक कि इनकी चालाकियों और बहादुरी की वजह से लोग इनको शैतान कहा करते थे और सब इनसे डरते थे...)
ग़रज़ यह कि अम्र बिन उमय्या ज़मरी एक शख़्स थे और उनकी अय्यार व चालाक शख़्सियत के बारे में ऐतिहासिक सुबूत सीरत की किताब से मिल जाता है। अलबत्ता इस बात से इनकार नहीं कि दास्तानगो लोगों ने जिस तरह अमीर हमज़ा की शख़्सियत में अपनी कल्पना से रंग भरा, उसी तरह अम्र बिन उमय्या ज़मरी की शख़्सियत को भी अपनी कल्पना शक्ति से एक बेमिसाल किरदार बना दिया है। इसलिए इस बात को हम यूँ कह सकते हैं कि उर्दू दास्तान ऐतिहासिक बुनियाद पर काल्पनिक वाक़ियात का अज़ीम बयान है। लेकिन सिरे से इसकी ऐतिहासिक बुनियाद ही को ख़ारिज नहीं कर सकते। इस तरह के अदब (साहित्य) की मिसाल में हम मसनवी यूसुफ़ ज़ुलैख़ा को पेश कर सकते हैं।
अब अगर यह ग़ौर कीजिए कि दास्तान-ए-अमीर हमज़ा में अम्र बिन उमय्या ज़मरी ही को इस्लाम के एक मददगार की हैसियत से क्यों लाया गया है? तो इसका जवाब भी सीरत से मिल सकता है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बनी ज़मरा के साथ एक समझौता किया था। अल्लामा हलबी ने सीरत-ए-हलबिया जिल्द दोम (खंड 2), क़िस्त पंजुम (पाँच), पृ. 36 पर लिखा है कि,
बनी ज़मरह से जिन शर्तों पर सुलह हुई वो ये थीं कि दोनों पक्ष एक दूसरे से जंग नहीं करेंगे। न ही आनहज़रत के मुक़ाबले में हमला करेंगे और न मुसलमानों के किसी दुश्मन की मदद करेंगे।
अल्लामा हलबी ने इस समझौते की नक़ल भी पेश की है। इसी में ये भी है कि,
जब तक दरिया-ए-सूफ़ा में पानी बाक़ी है, इस समझौते पर अमल किया जाएगा... और ये कि जब भी आनहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनको मदद के लिए बुलाएं, उनको मदद के लिए आना ज़रूरी होगा...
ज़ाहिर है कि जब क़बीला बनी ज़मरह से हुज़ूर का ऐसा समझौता हो चुका है तो दास्तान सुनाने वालों ने इसके एक व्यक्ति से फ़ायदा उठाया। उनकी ऐतिहासिक जानकारी ने उनकी कल्पना को सही राह दिखाई।
(13) दास्तान सुनाने की शुरुआत: इस सिलसिले में कई रिवायतें हैं। फ़ारूक़ी ने स. श. भाग 2 में दास्तान का अफ़साना शीर्षक के तहत कई हवालों से इन सबका ज़िक्र किया है। उन्हीं के लफ़्ज़ों में,
हम यहाँ दास्तान की शुरुआत के बारे में कुछ रिवायतों पर चर्चा करेंगे। (क) क़िस्सा-ए-हमज़ा। पांडुलिपि, संपादक जाफ़र शिआर (1969) पृष्ठ 3 से 4)
अनुवाद (फ़ारसी से...) ये क़िस्सा अरब और अजम (ग़ैर-अरब) और तमाम इस्लामी देशों में अलग-अलग रिवायतों के साथ मशहूर है। लेकिन सही रिवायत अबू तालिब और अब्बास जो हज़रत पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा थे, उनसे हम तक पहुँची है... रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस क़िस्से को इब्न-ए-अब्बास से सुनते थे। जैसा कि शायर कहता है, नज़्म:
मुहम्मद जो कि 'कुन' (हो जा) शब्द के ज़ाहिर होने का कारण थे।
जब कामों से दिल तंग हो जाता तो अब्बास से कहते कि ऐ नेक स्वभाव वाले,
मेरे चाचा के हालात में से कोई हिस्सा बयान करो,
अब्बास इस बीती हुई कहानी को बयान करते कि हमज़ा पर वक़्त कैसे गुज़रा...
(ख) रुमूज़-ए-हमज़ा (मुंबई 1909) पृष्ठ 2 से 3
(अनुवाद फ़ारसी से...) दास्तान अमीर हमज़ा साहिब-ए-क़िराँ, अरब और अजम में मशहूर क़िस्सा है और इस क़िस्से की बहुत सी रिवायतें हैं। लेकिन सबसे सही वो है जो हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से हम तक पहुँची है। आप जनाब हमज़ा के बड़े भाई थे और हमेशा हर जगह उनके साथ रहते थे और हमज़ा साहिब-ए-क़िराँ और अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा और अबू तालिब हज़रत पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आदरणीय पिता के भाई थे और हज़रत पैग़ंबर जब कभी उदास होते तो इस क़िस्से को हज़रत अब्बास से सुनते थे। नज़्म:
मुहम्मद जो कि 'कुन' शब्द का कारण थे,
जब इस दुनिया से उदास हो जाते तो अब्बास से कहते कि ऐ नेक स्वभाव वाले,
मेरे चाचा के हालात में से कोई हिस्सा बयान करो,
अब्बास इस बीती हुई कहानी को बयान करते कि हमज़ा पर वक़्त कैसे गुज़रा।
इसलिए ऐ पवित्र धर्म वाले मोमिन, अब तुम भी हमज़ा के बारे में कि उनका कोई सानी (जोड़) न था, कुछ कहानियाँ सुनो...
(ग) ज़ुबदत-उल-रुमूज़ (1693) पन्ना 1, पृष्ठ 2
(i) अनुवाद (फ़ारसी से...) जंग के मैदान के शेर (अमीर हमज़ा) की शहादत के बाद जब सरवर-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने चाचा के घर से कभी-कभी गुज़रते तो अरब की महान महिलाएँ जो वहाँ रहती थीं, हमेशा अपनी ज़बान से उन जंग के सरदार (अमीर हमज़ा) की जंगों और उनकी मर्दानगी को याद करके विलाप करती थीं और इन बातों को सुनकर नेकों के सरदार (पैग़ंबर) कभी-कभी वहाँ ठहरना मुनासिब समझते थे। और इस अनोखी बात के रावी (वर्णनकर्ता) उमर (कज़ा) बिन उमय्या ज़मरी (कज़ा) हैं जो दरबारियों और बुद्धिमानों में गिने जाते हैं। एक मुद्दत तक ये क़ीमती मोती अरब देश में छिपा हुआ था। जब मौलाना मसूद मक्की जो अरब के विद्वानों में से एक थे, के हाथ इन ठोस बातों का सिरा आया, तो उन्होंने इसमें कुछ इज़ाफ़ा किया और उस ज़माने में लोग, हज़रात (सहाबा? अहल-ए-बैत?) के ख़िलाफ़ अनुचित बातों पर क़ायम थे, जब उन्होंने इस हाल को देखा तो उनकी राय यह बनी कि हर रोज़ लोगों के सामने इस क़िस्से में से संक्षेप में कुछ पेश करें कि शायद इस तरह अवाम इस बुरी बात से बाज़ आ जाएँ...
(ii) और कुछ का ख़याल है कि बनी अब्बास के ख़लीफ़ाओं में से एक को दिमागी बुख़ार हो गया। किसी भी तरकीब से उसका इलाज न होता था। तब लोगों का एक गिरोह इस किताब की रचना में व्यस्त हुआ और उन लोगों ने जो कि... बनी अब्बास के ख़लीफ़ाओं के महान हकीम थे, ये कहानी गढ़ी और उनमें से कुछ लोग उस ताक़तवर बादशाह की ख़िदमत में दिन-रात इसको पढ़ते और इस जद्दोजहद का बयान करते। यहाँ तक कि उस भाग्यशाली को इस बीमारी से शिफ़ा (मुक्ति) मिली...
(iii) और अक्सर जानकारों का कहना है कि इस अनोखी कहानी को फ़ारसी भाषा में मौलाना अबुल मआली नेशापूरी और मुल्ला जलाल बल्ख़ी ने, जो कि ज़माने के बेहतरीन उस्ताद हैं और इस इल्म में पूरी महारत रखते हैं, उन्होंने इस अफ़साने को वजूद बख़्शा (रचा) और मौलाना सुल्तान हुसैन मुश्ताक़ी जो कि महान क़िस्सा सुनाने वालों में से एक हैं, उन्होंने क़िस्से की शुरुआत से लेकर ईरज की गिरफ़्तारी तक इस क़िस्से का संपादन किया...
इन रिवायतों में बहुत आसानी से सामंजस्य (मेल) हो सकता है लेकिन इसकी यहाँ ज़रूरत नहीं। असल मसला वो है जो फ़ारूक़ी की बात से पैदा होता है। वो कहते हैं कि,
ये बात ध्यान में हमेशा रखनी चाहिए कि जिस तरह अमीर हमज़ा और अम्र अय्यार बिन उमय्या ज़मरी के किरदार (कुछ मामूली विवरणों के सिवा) बिल्कुल फ़र्ज़ी और ग़ैर-ऐतिहासिक हैं। इसी तरह पैग़ंबर-ए-आख़िर-उज़-ज़माँ अलैहिस्सलातु वस्सलाम का भी ज़िक्र जहाँ-जहाँ दास्तान में आया है, वो ग़ैर-ऐतिहासिक है और इस्लाम धर्म या सीरत-ए-रसूल (पैग़ंबर के जीवन) से इसका कुछ संबंध नहीं। (स. श. भाग 3, पृष्ठ 234)
इसका मतलब ये है कि हुज़ूर के हमज़ा के हालात सुनने की रिवायत बिल्कुल गढ़ी हुई है। हालाँकि ये बात समझ से परे नहीं है कि हुज़ूर अपने मरहूम और शहीद चाचा के हालात सुनना पसंद फ़रमाते हों और आपने कभी एक-आध बार ही सही, सुने हों। क्योंकि आप सफ़र और जंग के वाक़ियात दिलचस्पी से सुनते थे। और वही हालात सुनना बाद में लंबी दास्तान सुनाने की बुनियाद बन गया हो। वल्लाहु आलम (अल्लाह बेहतर जानता है)। सीरत-ए-हलबिया (उर्दू) खंड दो, भाग नौ में पृष्ठ 69 पर है कि,
हज़रत हमज़ा के क़ातिल वहशी बाद में मुसलमान हो गए थे। मक्का की फ़तह के वक़्त जब मक्के पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा हो गया तो ये वहशी मक्के से फ़रार होकर ताइफ़ चले गए थे। फिर जब ताइफ़ के लोग मुसलमान होने के लिए आनहज़रत की ख़िदमत में हाज़िर हुए तो वहशी भी उनके साथ मुसलमान होने के लिए आए... वहशी कहते हैं कि फिर आनहज़रत से मेरा सामना सिर्फ़ एक ही दफ़ा हुआ था जब कि मैंने आपके पास खड़े होकर हक़ और सच्चाई की गवाही दी थी। आपने पूछा, तुम ही वहशी हो? फिर पूछा कि तुमने हमज़ा को कैसे क़त्ल किया था? मैंने आपको वो वाक़िया बतलाया...
सीरत की इस पुरानी किताब के इन वाक्यों से तो साफ़ ज़ाहिर है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अमीर हमज़ा की शहादत का वाक़िया ख़ुद क़ातिल ही से पूछा। उसने बताया कि उसने किस तरह वार किया था और हज़रत की जान ली थी। और हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस वाक़िये को सुना। सीरत का इतना ताल्लुक़ काफ़ी है। दास्तानगोयों (दास्तान सुनाने वालों) ने महज़ बे-पर की नहीं उड़ाई है। कुछ लाग रहने ही पर लगाव का चर्चा होता है। यह बात साहित्य के हर विद्यार्थी को मालूम है कि अरब में भी चौपालें थीं और क़िस्सा-गोई होती थी। हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इन चौपालों में तो न जाते थे, लेकिन हालात और हादसों की जानकारी रखते थे। हज़रत हस्सान बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु की शायरी पसंद करने से तो यह भी साबित होता है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बयानिया (कथात्मकता) की प्रभावशाली प्रस्तुति को भी पसंद फ़रमाते थे। वाक़िये में कल्पना की मिलावट सिर्फ़ साहित्य की विशेषता नहीं है बल्कि मानवीय स्वभाव की भी विशेषता है कि वह इसको क़ुबूल कर लेता है और शायद इसी वजह से महान साहित्यिक कृतियों का विकास भी होता है। इसमें तो शक नहीं कि उर्दू दास्तान शिया साहित्य है और शियों की कल्पना की उड़ान का शाहकार है, लेकिन यह ऐतिहासिक बुनियाद भी रखती है और इसी वजह से कुछ किरदारों के नाम फ़ारूक़ और नोमान रखने पर मुझे यह एहसास हुआ कि इनमें सुन्नियों के अपमान का पहलू हो सकता है। फ़ारूक़ी ने इत्तला दी है कि,
बुराई से ताल्लुक़ रखने वाले दो किरदार, उनका नाम 'फ़ारूक़' है। (होमान नामा) ... एक ग़ैर-इस्लामी सरदार का नाम 'फ़ारूक़' और उसके अय्यार का नाम 'नोमान' है। (तिलिस्म-ए-नूर-अफ़शां) (स श स. अ. पृ. 275)
दास्तानगो तो तरह-तरह के नाम रखने में बड़े माहिर थे। काश, बुरे और ग़ैर-इस्लामी किरदारों के नाम फ़ारूक़ और अय्यार का नाम नोमान न होते।
(2)
कहानी सुनना और सुनाना तो इंसानी फ़ितरत है। हज़रत अमीर हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत दिल दहला देने वाले वाक़ियात की कुछ ऐसी प्रकृति ज़रूर रखती है जिसको लोग एक अरसे तक भूले न होंगे और इस शहादत के ताल्लुक़ से हज़रत हमज़ा की ज़िंदगी के अन्य वाक़ियात भी इस्लामी मर्दों और औरतों में बयान होते रहे होंगे। लेकिन इसकी बाक़ायदा शुरुआत अब्बासी काल के आरंभ से हो गई थी जैसा कि दास्तानगोयों ने इशारे किए हैं। उन्होंने जो वजहें बताई हैं वह भी समझ से परे नहीं हैं। (देखें नंबर 13, दास्तान-गोई की शुरुआत।) रिवायतों के मतभेद और बहुलता में बड़ी आसानी से तालमेल पैदा किया जा सकता है। मसलन अहल-ए-बैत पर बनु उमय्या के तानों और निंदा को ख़त्म करने के लिए बनु अब्बास के भाषा-विशेषज्ञों ने हज़रत अमीर हमज़ा को हीरो की हैसियत से पेश किया और अवाम में उनकी प्रशंसा बयान की।
कुछ बुज़ुर्गाने-दीन और विद्वानों ने इस वाक़िये को हृदय सुधार और शारीरिक शक्ति के लिए भी इस्तेमाल किया क्योंकि कुछ विशेष ज़िक्र का ज़ेहन और जिस्म पर ज़रूर असर होता है। फिर जैसे-जैसे ज़माना आगे बढ़ा, साहित्यिक तौर पर भी वाक़िया-गोई (कथावाचन) की अहमियत रौशन हुई और उन तमाम इलाक़ों में जहाँ बनु अब्बास ग़ालिब आए और / या अल्वियों और फ़ातिमियों की हुकूमत क़ायम हुई, अमीर हमज़ा के वाक़ियात के ज़रिए मुसलमानों में नया जोश-ओ-उत्साह और नई राजनीतिक और सामाजिक चेतना पैदा की गई और इसमें रचनात्मक बयानिया के तहत काल्पनिक वाक़ियात और हादसे भी पेश होने लगे और अपनी-अपनी दुनिया के बड़े-बड़े लोगों का बयान दास्तान कहा जाने लगा।
कहा जाता है कि दास्तान या दस्तान रुस्तम के बाप ज़ाल का लक़ब (उपाधि) था। ज़ाल के बाल पैदाइशी सफ़ेद थे। इसलिए उसका नाम ज़ाल यानी पीर (बूढ़ा) रखा गया। मगर दास्तान/दस्तां उसका लक़ब इसलिए मशहूर हुआ कि इन लफ़्ज़ों में शोहरत, बुज़ुर्गी और शान-ओ-शौकत के भी मानी थे। चूँकि ज़ाल में भी बुज़ुर्गी के मानी मौजूद हैं, इसलिए इस संबंध से दास्तान/दस्तां उसका लक़ब भी उचित था। शायद दास्तान के बुनियादी मानी शोहरत, दबदबा, शान, बुज़ुर्गी ही के हैं जैसा कि फ़िरदौसी के इस शेर से ज़ाहिर है:
मनम करदा अम रुस्तम दास्तां
वगर न यले बूद दर सीस्तां
और यह बिल्कुल स्पष्ट है कि दस्तां में भी ज़ोर-ए-बाज़ू, ज़बरदस्त के मानी मौजूद हैं। लेकिन लंबे-चौड़े, विस्तृत पेचीदा क़िस्सों के लिए जो वाक़ियात और किरदार हर लिहाज़ से बुज़ुर्गी, शान और शोहरत के मानी रखते हैं, दास्तान का लफ़्ज़ चल निकला। फिर बड़े-बड़े वाक़ियों और बड़े-बड़े किरदारों पर आधारित शाहनामों को भी दास्तान कहा जाने लगा। यानी इन बुनियादी मानी में यह मानी बाद में लाक्षणिक रूप से शामिल हो गए। चूँकि बादशाहों को ज़िल्ल-ए-इलाही (ईश्वर की छाया) समझा जाता था, इसलिए अजीब-ओ-ग़रीब, अस्वाभाविक वाक़ियात और हादसे भी उनसे या उनकी फ़ौज से घटित हो सकते थे। लिहाज़ा अलौकिक तत्व दास्तान की ख़ास विशेषता ठहरे। अब अगर अस्वाभाविक तत्वों को किसी बयान में आने दिया गया तो उनको रोका नहीं जा सकता। यानी उनकी कोई हद नहीं है। वह कहीं भी, किसी भी वक़्त कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन बयान बनाने वाले की तो हदें हैं। अगर उसको कहा जाए कि इन तत्वों को स्टेज पर दिखाओ तो उसके लिए मुश्किल होगी। इसलिए दास्तान का बयानिया मौखिक होता है। क्रियात्मक नहीं होता। और क्रियात्मक न होने, सिर्फ़ मौखिक होने की वजह से वह वास्तविक जीवन का पाबंद नहीं होता बल्कि आज़ाद और स्वतंत्र कल्पना का बे-लगाम बयान होता है। लिहाज़ा दास्तान में बयान या बयानिया की सबसे ज़्यादा अहमियत है।
जब हम कहते हैं कि फ़लां साहब ने फ़लां बयान दिया है तो इसका क्या मतलब हुआ? हम लोग आम तौर पर यह समझते हैं कि किसी स्थिति या ख़याल या राय को ज़ाहिर करने के लिए अपनाए गए ढंग से जो मज़मून बनता है, वह बयान है। इस बात से हटकर कि इसमें मन की बात पूरी तरह स्पष्ट हो रही है या नहीं। इस तरह के कई बयानों की इकाइयों में मामूली या गहरा संबंध पैदा करके बयान का सिलसिला क़ायम किया जाए तो उसे बयानिया कहते हैं। ज़ाहिर है कि इस सूरत में इस बयानिया में शुरुआत और अंत की भी उम्मीद होगी। यानी बयानिया शुरू हुआ, जारी रहा और अंत को पहुँचा। बात पूरी हो चुकी। लेकिन फ़ारूक़ी ने बयानिया को बहुत व्यापक मानी में इस्तेमाल किया है:
बयानिया तो उस महान और तक़रीबन असीम अभिव्यक्ति की शैली का फल है, जिसे हम किसी घटना, किसी हालत, किसी कैफ़ियत यहाँ तक कि कभी-कभी किसी ख़याल को ज़ाहिर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। आज की शब्दावली में किसी भी चीज़ के बारे में सुसंबद्ध विचार-प्रकटीकरण या विश्लेषण भी 'बयानिया' यानी Narrative कहा जा सकता है। इस अर्थ के अनुसार वे तमाम अवधारणाएं जिन पर हम किसी विचार-प्रणाली या कार्य-प्रणाली को क़ायम करते हैं, बयानिया कहे जाने के हक़दार हैं। (स श स, 3, पृ, 13)
इस वज़ाहत (व्याख्या) में इस बात की पूरी संभावना है कि अधूरे बयानों के सिलसिले को भी बयानिया (narrative) कह सकते हैं और यह इंशा की खूबी है। इसलिए इस वज़ाहत में इसकी भी पूरी संभावना है कि आज के बयानिया को कल की इंशा समझा जाए। इंशा हमारी पुरानी इस्तेलाह (पारिभाषिक शब्द) है। बयानिया कायम करने वाले को ही मुंशी कहा जाता था। इंशा का माद्दा (मूल) 'नशा' (نشاء) है। इसके मायने होते हैं पैदा करना। ज़ाहिर है कि बात पैदा करना, बातों में रब्त (जुड़ाव) पैदा करना, बातों में तर्क का ज़ोर पैदा करना, बातों में हुस्न और तासीर पैदा करना, बातों में अर्थ और कैफ़ियत पैदा करना और फिर कुछ ख़ला (खालीपन) भी रखना यानी कुछ मुबहम (अस्पष्ट) फ़िज़ा पैदा करना। ये सब इंशा की विशेषताएँ और ज़रूरतें थीं और बयानिया भी, जो नई इस्तेलाह है, इन्हीं से कायम होता है। नरेशन (Narration) और डिस्क्रिप्शन (Description) में जो फ़र्क़ है, वही बयान और वज़ाहत में फ़र्क़ है। बयान या नरेशन की ख़ासियत यह है कि वह किसी भी बात/ख़याल को वाक़ये या घटना में ढाल देता है। वज़ाहत या डिस्क्रिप्शन इसके बाद की मंज़िल है। बयान की वज़ाहत हो सकती है मगर वज़ाहत का बयान नहीं होता। मन की बात (माफ़िज़्ज़मीर) के कल्पनाशील इज़हार में बयान की अहमियत है, ख़ासकर साहित्य की उस विधा में जो पढ़ने और देखने के लिए नहीं बल्कि सुनने के लिए बनाई गई हो।
फ़ारूक़ी ने इसी वजह से दास्तान के अध्ययन में सबसे ज़्यादा अहमियत दास्तान के बयानिया को दी है। उनका तर्क यह है कि दास्तान ज़बानी बयानिया की शेरियात (काव्यशास्त्र) रखती है और वह लिखित बयानिया से बिल्कुल अलग है, भले ही उसे बाद में लिखा ही क्यों न गया हो, लेकिन लिखना उसकी अनिवार्यता नहीं है। इसका ताल्लुक़ सुनने से है। अगर सुनने वाले हैं तो लिखना बिल्कुल ज़रूरी नहीं। अलबत्ता अगर लोग लिखी हुई हालत में भी सुनने पर आमादा (तैयार) हों या ज़रा इत्मीनान से तन्हाई में बैठकर पढ़ना ही चाहते हों तो उसे लिखने में कोई हर्ज़ या विधा का अपमान नहीं है। लेकिन वह उसी तरह लिखी जाए जिस तरह कोई चीज़ सुनाई जाती है, यानी उस पर बातचीत (तकल्लुम) का नियम लागू होगा और पढ़ने वाले इसी को मद्देनज़र रखेंगे, चाहे जब भी पढ़ें।
दास्तान की शेरियात, ख़ासकर ज़बानी बयानिया पर फ़ारूक़ी ने बहुत उम्दा चर्चा की है। दास्तान पर सैद्धांतिक बहसों के लिए 'स श स' (साहिरी, शाही, साहिबक़िरानी) की पहली जिल्द, जिसका तआरुफ़ (परिचय) गुज़र चुका है, बहुत मुफ़ीद है। वह कहते हैं कि,
बयानिया दो चीज़ों का नाम है। एक तो वे हालात और वाक़यात जिनसे हम बयानिया के ज़रिए दो-चार होते हैं और दूसरी चीज़ वह बयानिया मत्न (पाठ) या कलाम जिसके ज़रिए हमें इन वाक़यात और हालात की जानकारी होती है।
(स श स। १। पृष्ठ, ५२)
यानी किसी बयान से जो हालात मालूम हुए वे बयानिया हैं और किसी हालत पर आधारित जो बयान बनाया गया वह भी बयानिया है। बज़ाहिर यह एक ही बात के दो रुख़ हैं। लेकिन इनमें ज़बानी बयानिया और लिखित बयानिया का बारीक फ़र्क़ मौजूद है। फ़ारूक़ी ने यह बात बोरिस तोमाशेव्स्की (Boris Tomashevsky) के 'नज़रिया-ए-नफ़्स-ए-मतलब' (Sujet) और 'नज़रिया-ए-क़िस्सा-ए-काफ़ा' (Fabula) की रोशनी में कही है। लेकिन हमारे मतलब की बात यहाँ यह नज़र आती है कि हम इसमें ज़बानी बयानिया और लिखित बयानिया को अलग-अलग पहचान सकते हैं, वह इस तरह कि किसी ने कोई वाक़या सुनाया तो वह वाक़या ख़ुद हमारी कल्पना में एक बयानिया बन रहा है। यह ज़बानी बयानिया की वजह से हुआ और अगर किसी ने कोई तहरीर (लेख) थमा दी जिसमें कोई वाक़या लिखा हुआ है तो अब वह तहरीर ख़ुद हमारी कल्पना में बयानिया बन रही है। और यह लिखित बयानिया की वजह से हुआ, यानी लिखे हुए वाक़ये में हमारी कल्पना तहरीर के पीछे-पीछे चलती है और सुने हुए वाक़ये में हमारी कल्पना ख़ुद वाक़ये का पीछा करती है। गोया वह नक़ल की नक़ल नहीं करता, बल्कि असल की नक़ल करता है। यानी वाक़या असल है और उसका बयान नक़ल है, इसको हम फ़ुरूग़ (विस्तार/शाखा) भी कह सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों, वाक़या और बयान या असल और फ़रा (शाखा) के मिलने से ही बयानिया बनता है।
अगर यह पूछिए कि बयान को नक़ल या फ़रा क्यों कहा, तो इसका जवाब यह है कि बयान में जहाँ अल्फ़ाज़ इस्तेमाल होते हैं वहाँ ख़ामोशी भी काम आ सकती है। इसलिए अल्फ़ाज़ इज़ाफ़ी (अतिरिक्त) हो जाते हैं। अगर कोई आदमी सामने आकर खड़ा हो जाए और कुछ न बोले, तो भी उसकी ख़ामोशी बहुत कुछ कह देती है। ग़ालिब कहते हैं,
नश्व-ओ-नुमा है अस्ल से ग़ालिब फ़ुरूअ को
ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए
तो सूरत यह है कि लिखित बयानिया में एक तो अल्फ़ाज़ की पाबंदी है और दूसरे अल्फ़ाज़ जो ख़ुद क़ैद-ए-तहरीर में आकर पा-ब-ज़ंजीर (ज़ंजीर में बंधे) हो जाते हैं, जबकि ज़बानी बयानिया में ऐसी कोई सख़्ती और शर्त है ही नहीं। इसलिए यहाँ बड़ी आज़ादी और संभावना है।
पश्चिमी साहित्य में यह चर्चा हो चुकी है कि नॉवेल निगार (उपन्यासकार) को अपने क़ारी (पाठक) का पता नहीं होता। जबकि दास्तानगो अपने सुनने वालों के रूबरू होता है। वह उनके मिज़ाज और समझ-बूझ को दास्तान सुनाने के दौरान भी समझता रहता है और क़िस्से को आगे-पीछे करने, ज़ोर देने और दोहराने, वाक़यात की नौइयत (प्रकृति) और उतार-चढ़ाव, नारेबाज़ी, मुकालमा (संवाद), मुबहम-जोई (अस्पष्टता की तलाश), फ़ौक़-उल-फ़ितरी (अलौकिक) तत्वों, लहज़े, हरकतों वग़ैरह से श्रोताओं पर अलग-अलग क़िस्म के प्रभाव क़ायम करता रहता है। नॉवेल में यह बात नहीं हो सकती क्योंकि उसका क़ारी नॉवेल निगार के सामने हाज़िर नहीं होता। फिर लिखने का मतलब ही यह है कि तहरीर को अनपढ़ नहीं पढ़ेगा, वह पढ़े-लिखे तबक़े के लिए है। दास्तान में श्रोताओं के पढ़े-लिखे होने की कोई शर्त नहीं है। दास्तानगो के सामने मौजूद श्रोता पढ़े-लिखे और अनपढ़ सब हो सकते हैं।
इसलिए दास्तानगो की बातचीत की अदबियत (साहित्यिकता) के दर्जे बदलते रहते हैं और इन दर्जों का तालमेल श्रोताओं से होता रहता है। नॉवेल और अफ़साने की कला इस ख़ासियत से महरूम होती है, यह बात तो बिल्कुल ज़ाहिर है कि कल की दास्तान और आज का नॉवेल क़िस्सा-कहानी की चीज़ें हैं। इसलिए दोनों की गिनती कहानी-साहित्य में होती है। लेकिन दोनों की प्रकृति में फ़र्क़ बहुत साफ़ है। इस फ़र्क़ की बिना पर नॉवेल को दास्तान की रिवायत (परंपरा) से जोड़ना, फ़ारूक़ी कहते हैं कि सही नहीं। वह लिखते हैं,
यह बात बिल्कुल ग़लत है कि दास्तान को नॉवेल की शुरुआती शक्ल कह सकते हैं। और यह कि नॉवेल के विकास में दास्तान का भी कोई हिस्सा है।
(स श स। १, पृष्ठ, ६४)
फ़ारूक़ी का कहना दरअसल यह है कि,
दो विधाओं में कौन बेहतर है, इसका फ़ैसला करने के लिए किसी एक विधा को पैमाना और नियम बनाने वाला (Normative) नहीं क़रार दे सकते। (वही, पृष्ठ, ५४)
दास्तान पर आलोचनात्मक नज़र डालते वक़्त अमूमन हमारे आलोचक इस विधा को नॉवेल की विधा की रोशनी में परखते हैं और नॉवेल चूँकि आधुनिक दौर की पैदावार है, इसलिए दास्तान को नॉवेल की शुरुआती शक्ल कह देते हैं। और ऐसा कहते वक़्त उनके ज़हन में नॉवेल की श्रेष्ठता की बात होती है। फ़ारूक़ी ने अपने अध्ययन से यह नतीजा निकाला है कि दोनों विधाओं की अलग-अलग तकनीकी ज़रूरतें हैं। इसलिए न तो दास्तान नॉवेल से कमतर और न नॉवेल दास्तान से बेहतर कहा जा सकता है। यह मुमकिन है कि कई मामलों में नॉवेल हमें ज़िंदगी के क़रीब और अच्छा लगे, लेकिन यह भी मुमकिन है कि कुछ और मामलों में दास्तान हमें ज़िंदगी के ज़्यादा क़रीब और अच्छी लगे।
अपने मज़मून (लेख) दास्तान की शेरियात के पहले हिस्से में फ़ारूक़ी ने सोलह बिंदु बताए हैं। मैं सिर्फ़ दो-एक का ज़िक्र करूँगा। जिस बात पर फ़ारूक़ी ने सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया है, वह है दास्तान का ज़बानी बयानिया। उनका कहना है कि,
दास्तान ज़बानी सुनाने की चीज़ है। दास्तान अगर लिखी जाए और छाप भी दी जाए तो भी उसका असल मक़सद यही होता है कि वह ज़बानी सुनाई जाती है। वह लिखी भी इस तरह जाती है मानो ज़बानी सुनाई जा रही हो, वह रचना जो ज़बानी सुनाए जाने के मक़सद से लिखी जाए। उसकी गतिकी (Dynamics) उस रचना से बिल्कुल अलग होती है जो खामोश या ऊँची आवाज़ में लेकिन व्यक्तिगत रूप से पढ़ने के लिए लिखी जाए।
(स. श. स. 1, पृ. 72)
दूसरी बात दास्तान की शेरियात (काव्यशास्त्र) के बारे में उन्होंने यह बताई है कि क्लासिकी उर्दू गद्य की परंपराओं में विराम चिह्नों (punctuation) का इस्तेमाल नहीं होता था। उनका कहना है कि,
वह इबारत जो विराम चिह्नों के विचार के बिना लिखी जाए, उसकी गतिकी (Dynamics) उस इबारत से बिल्कुल अलग होती है, जिसे लिखते वक़्त विराम चिह्नों का ध्यान रखा जाए। (वही, पृ. 82)
तीसरी बात उन्होंने यह बताई है कि दास्तानों में चरित्र-चित्रण का एक-कालिक (Synchronic) तरीक़ा रहा है। वहाँ द्वि-कालिक (Diachronic) तरीक़ा नहीं रहा है। मगर उसूलन एक तरीक़े को दूसरे पर प्राथमिकता नहीं है। (पृ. 82) और इसमें कोई तरीक़ा न बेहतर है न कमतर (पृ. 83)। दास्तानों का चरित्र-चित्रण दास्तान सुनाने वालों की ब्रह्मांड की अवधारणाओं के अनुसार है। वह कहते हैं कि,
दास्तान की ब्रह्मांड की अवधारणा यह है कि ब्रह्मांड गतिहीन यानी Static है। इस ब्रह्मांड में ख़ुदा अपनी मर्ज़ी से दखल देता है और प्रभाव डालता है। यह ईश्वरीय दखलंदाज़ी सीधे भी हो सकती है और इंसान के ज़रिए भी, लेकिन जो बदलाव पैदा होते हैं वे अस्थायी और अवास्तविक होते हैं। ब्रह्मांड का आम संतुलन हमेशा बरक़रार रहता है। इसमें हर चीज़ अपनी जगह पर रहती है जो उसके लिए सृष्टि के आरंभ से तय है। इसलिए चरित्र का एक-कालिक होना ज़रूरी है और चरित्र का हालात पर या हालात का चरित्र पर प्रभाव डालना ज़रूरी नहीं है। (पृ. 83)
लेकिन इस तर्क को स्वीकार करने में हिचकिचाहट हो सकती है। मेरा ख़याल है कि दास्तान सुनाने वालों ने चरित्रों को एक-रंग या एक-कालिक इसलिए रखा कि उनको हर रंग के इंसान मिल रहे थे। हर रंग के प्रतिनिधित्व के लिए मानव समाज के इस्तेमाल में उनको कोई दिक्कत और रुकावट नहीं थी। वरना वे एक इंसान, उदाहरण के लिए अमीर हमज़ा में ही अलग-अलग पहलू दिखा सकते थे, तो अन्य चरित्रों में क्यों न दिखाते। नॉवेल का ज़माना आते-आते हम कह सकते हैं कि योग्य लोगों का अकाल हो गया। यानी क़िस्सा बयान करने वालों या क़िस्सा लिखने वालों को ऐसे चरित्र उपलब्ध नहीं हुए, जिनको एक-रंग होने पर कोई एतराज़ न होता हो। दास्तान तरह-तरह के इंसानों और प्राणियों की दुनिया पेश करती है। वहाँ अलग-अलग ख़ासियतों के आदर्श चरित्र मिल जाते हैं।
यह एक सोचा-समझा तकनीकी मामला हो सकता है कि ऐसा करने पर श्रोता अलग-अलग ख़ासियतों में अच्छाई को अपने ऊपर और बुराई को दूसरों पर क़यास करेंगे (अनुमान लगाएँगे) और फिर कभी अच्छाई को दूसरों पर और बुराई को अपने ऊपर लागू करने का संदेह भी उनमें पैदा होगा। इससे दास्तानगोई की कला में रचनात्मक तनाव की संभावनाएँ बढ़ेंगी क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से श्रोता भी दास्तान का हिस्सा बनते रहे हैं। इस सूरत में वे अपने व्यक्तित्व को एक-दूसरे के मुक़ाबले में रखकर Establishment (व्यवस्था) के हिस्सों के तौर पर देखेंगे कि शासक वर्ग की तरफ़ उनका रवैया क्या है? यह बात साफ़ रहनी चाहिए कि दास्तान सुनाने वालों का मक़सद जनता को प्रशासन का शुभचिंतक बनाए रखना होता था। फिर यह बात भी है कि जब सबसे बेहतरीन स्रष्टा (ईश्वर) ने सिर्फ़ नेकी और सिर्फ़ बदी की प्रतिनिधि मखलूक़ात (प्राणियाँ) बनाई हैं, तो इंसान की कला में भी ऐसे चरित्र क्यों नहीं हो सकते जो अपने-अपने गुणों में एक-रंग हों। उस वक़्त के हावी मुस्लिम समाज में कुफ़्र (अधर्म) को पूरी तरह बदी और इस्लाम को नेकी का प्रतिनिधि बनाकर पेश करने के और भी निहितार्थ हैं, जैसे अबू लहब है तो है! मगर अबू सुफ़ियान हैं तो नहीं हैं! ये नेकी हो गए, वह बदी रह गया। ये नाम दास्तानों में नहीं हैं।
मैंने सिर्फ़ अपनी बात की वज़ाहत (स्पष्टीकरण) में उदाहरण पेश किए, हम समझते हैं कि हर इंसान में नेकी है लेकिन इसका दारोमदार पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के संदेश पर ईमान लाने पर है। अगर यह बात न होती तो काफ़िरों की नेकी बेकार न जाती। इस विचार के तहत दास्तान सुनाने वालों को नेकी और बदी के अलग-अलग चरित्र दिखाने ही थे। इसलिए उस वक़्त और उस नज़रिए की रोशनी में चरित्र-चित्रण का वही तरीक़ा सबसे मुनासिब था। साथ ही यह बात भी है कि दास्तान में चरित्र घटनाओं के प्रतीक होते थे। वे कोई अपना नज़रिया और मानसिक हालात पेश नहीं करते थे। क्योंकि श्रोताओं को चरित्रों की कशमकश और दशाओं में नहीं, घटनाओं में दिलचस्पी होती थी। आज अगर कोई साहित्यकार दास्तान लिखने बैठे और चरित्र-चित्रण के इस तरीक़े से बेपरवाह रहे, तो दास्तानगोई की कला की सार्थकता को आहत कर देगा। चरित्रों की कशमकश और दशाओं को अहमियत देकर हमने फ़िक्शन को इंसान का प्रतिनिधि बना दिया है। दास्तानगो हज़रात घटनाओं को अहमियत देकर दास्तान को ज़िंदगी का प्रतिनिधि बनाए हुए थे। जिसकी कोई सीमा और अंत नहीं। फ़ारूक़ी ने लिखा है कि,
दास्तान अपनी बुनियादी अवधारणा के लिहाज़ से प्रतिनिधित्व न करने वाली Anti Mimetic है (यानी यह ज़िंदगी की नक़ल/तर्जुमानी नहीं करती), अलबत्ता बारीकियों के लिहाज़ से दास्तान प्रतिनिधित्व करने वाली Mimetic है।
ये बारीकियाँ ज़िंदगी की हैं जिनमें चरित्रों के क्रियाकलाप भी मौजूद हैं। ज़िंदगी की नक़ल नहीं हो सकती। क्योंकि इसकी हर पल नई शान है। दास्तान सुनाने वालों के बयान इतने बदलते रहे हैं कि किसी घटना को हम ज़िंदगी की नक़ल नहीं समझ सकते। हाँ, उस घटना की बारीकियाँ ज़िंदगी से ही ली गई हैं, इसलिए वे नक़ल मालूम होती हैं और वह भी इस वजह से कि उनमें किसी चरित्र का काम सक्रिय है। इस लिहाज़ से देखिए तो एक-रंग चरित्र भी जैसा वक़्त आया और जो उसका तक़ाज़ा हुआ, उसके मुताबिक़ काम कर गुज़रते हैं, यानी अपनी ब्रह्मांड की अवधारणा के बावजूद उनमें बड़ी हिम्मत होती है और वे ख़ासे समकालिक Synchronic नज़र आते हैं। इस मायने में वे आज के किसी पेचीदा चरित्र Round Character से कम और पीछे नहीं होते।
दास्तान की शेरियात के दूसरे हिस्से में फ़ारूक़ी ने एक बात यह बताई है कि,
ज़बानी बयान अगर लिख भी लिया जाए तो उसके पाठ (text) में कोई निश्चितता नहीं होती और न ही उसूलन उसके किसी एक पाठ को किसी और पर प्राथमिकता दी जा सकती है। (स. श. स. 1, पृ. 121)
इसकी वजह यह है कि दास्तान की अलग-अलग रिवायतें रही हैं और उनके कई बयान करने वाले रहे हैं। उन्होंने अपने-अपने तौर पर इन रिवायतों की रोशनी में बहुआयामी घटनाएँ बयान की हैं। यानी उन्होंने सिर्फ़ नक़ल नहीं की बल्कि रचना की। इसको हम आज के साहित्य से यूँ समझ सकते हैं कि जैसे दंगों के अफ़साने हैं। इन अफ़सानों के प्लॉट अलग-अलग हैं। चरित्र अलग-अलग हैं। अफ़सानानिगार अलग-अलग हैं, उनका मूल विषय (Sujet) अलग-अलग है, उनकी संपूर्ण कथा (Fabula) अलग-अलग है। तो फिर किसको निश्चितता और प्राथमिकता होगी। सब अपनी-अपनी जगह पर निश्चित और श्रेष्ठ हैं।
यह हमारे दौर की मजबूरी है कि ज़बानी बयानिया (मौखिक आख्यान) को तहरीरी बयानिया (लिखित आख्यान) की मिसाल से समझना पड़ रहा है। बोरिस तोमाशेवस्की के हवाले से फ़ारूक़ी ने सूजे (Sujet) और फ़ेबुला (Fabula) की जो बात कही है, वह तहरीरी बयानिया पर भी लागू हो सकती है जैसा कि हमने दंगों के विषय पर लिखे गए अफ़सानों में देखा है। फ़ारूक़ी ने लिखा है कि जो घटनाएँ और विवरण बयान में आ जाएँ वह Sujet या नफ़्स-ए-मतलब (मूल विषय) हैं और वह तमाम हालात और घटनाएँ जिनकी बुनियाद पर नफ़्स-ए-मतलब तैयार होकर बयान हुआ है वह Fabula यानी पूरी कहानी हैं जो अभी पर्दे के पीछे (छिपी हुई) हैं। इस बात की बुनियाद पर फ़ारूक़ी ने कई मिसालों को पेश करके कहा है कि,
अगर Sujet ख़त्म भी हो जाए तो Fabula ख़त्म नहीं होता। यानी दास्तान के जारी रहने की संभावना बराबर बनी रहती है।
बस यही वह मुक़ाम है जहाँ ज़बानी बयानिया तहरीरी बयानिया से अलग और विशिष्ट हो जाता है। क्योंकि दंगों पर आधारित कोई एक अफ़साना भी पढ़ लेने के बाद Fabula के जारी रहने की संभावना और माँग नहीं रहती। स श स की तीसरी जिल्द (खंड) में दास्तान कभी ख़त्म नहीं होती की व्याख्या फ़ारूक़ी ने इस तरह की है,
दास्तान कभी ख़त्म नहीं होती... इस बयान के दो अर्थ हैं। एक तो यह कि बयान करने वाले (या रावी) के दृष्टिकोण से दास्तान कभी ख़त्म नहीं होती यानी बयान करने वाला या रावी दास्तान को जितना चाहे लंबा कर सकता है। इसमें नई-नई घटनाएँ जोड़ सकता है और यह भी है (कि) हर दास्तान के नए-नए बयान करने वाले पैदा होते रहते हैं। और हर बयान करने वाला दरअसल अपनी दास्तान का रचयिता होता है। यही अर्थ है जिसमें दास्तान कभी ख़त्म न होने वाली (अनंत) है... दास्तान कभी ख़त्म नहीं होती। इस बयान का दूसरा अर्थ यह है कि दास्तान के किरदारों की उम्रें बहुत लंबी होती हैं। वे अक्सर बचपन में ही बालिग़ हो जाते हैं और देर तक सक्रिय रहते हैं। बुढ़ापा आता है। लेकिन उन पर हावी नहीं होता। दास्तान की दुनिया में वक़्त का गुज़रना इस अर्थ में आम दुनिया से अलग होता है कि वक़्त उस पर वह असर नहीं डालता जो हमारी दुनिया में डालता है।
(स श स. 3, पृ. 78-77)
इस व्याख्या को पढ़ने के बाद यह सवाल ज़ेहन में आता है कि दास्तान के न ख़त्म होने की वजह क्या है और वह कैसे जारी रखी जाती है। इसका जवाब मैंने ढूँढा तो फ़ारूक़ी के यहाँ टोदोरोव के हवाले से मुझे यह मिला कि Story Equals Life यानी क़िस्सा बराबर है ज़िंदगी के। टोदोरोव ने यह जवाब अलिफ़ लैला के हवाले से क़ायम किया था जैसा कि फ़ारूक़ी ने बताया है और उसके ख़याल को उर्दू दास्तानों पर लागू किया है।
यह सही है कि क़िस्सा तमाम (ख़त्म) का मतलब है घटना तमाम और घटना तमाम का मतलब है क़िस्सा तमाम। और क़िस्सा तमाम तो ज़िंदगी तमाम। लिहाज़ा जब तक यह ज़िंदगी है, घटनाएँ जारी रहेंगी, लेकिन उनको बयानिया में किस तरह जारी रखा जा सकता है और रखा जाता है। वह इस तरह कि जब मान लिया कि क़िस्सा ही ज़िंदगी है, तो क़िस्से कहना और क़िस्से सुनना इंसानी फ़ितरत (स्वभाव) से कभी ख़त्म न होगा। इंसान की बयान करने की ताक़त अपना जौहर दिखाती रहेगी। इसके बिना आदमी जी नहीं सकता और अगर जी भी लेगा तो सांस्कृतिक तरक़्क़ी नहीं कर सकता। कहा जाता है कि इंसान के पेट में कोई बात पचती नहीं और उसको दूसरों से कहे बिना उसका खाना हज़्म नहीं होता। यह तो नकारात्मक बात हुई। सकारात्मक बात यह है कि इंसान एक दूसरे के बारे में इसी तरह से जानता है और उसकी संस्कृति बनती है तो साबित हुआ कि बयान करना जीने के बराबर है। (स श स. 1, पृ. 124)
ऊपर के उद्धरण में दास्तान की दुनिया में वक़्त के गुज़रने का ज़िक्र आया है। फ़ारूक़ी ने यह भी लिखा है कि,
दास्तान में वक़्त के गुज़रने का निर्धारण इस बात से होता है कि कौन सा किरदार किस दास्तान में सबसे पहले सामने आता है... लिहाज़ा दास्तान में वक़्त के गुज़रने को नापने का सबसे विश्वसनीय ज़रिया यह है कि हम उसके स्थायी किरदारों को देखें कि वे पहली बार कब प्रकट हुए और कब तक मौजूद रहे। (स श स. 3, पृ. 78)
मगर इस बात से दास्तान में मौजूद नज़र आने वाले समय के सिद्धांत (नज़रिया-ए-वक़्त) पर कोई रोशनी नहीं पड़ती। मेरा ख़याल है कि दास्तान सुनाने वालों (दास्तानगोयों) ने जिस तरह ज़मीन-आसमान के कुलाबे मिलाकर एक ब्रह्मांडीय राज्य यानी वहदत-ए-मकान (स्थान की एकता) की अवधारणा क़ायम की है, इसी तरह उन्होंने वक़्त की ऐसी अवधि का सुराग़ लगाया है जिसे हम वहदत-ए-ज़माँ (समय की एकता) की अवधारणा कह सकते हैं। हालाँकि फ़ारूक़ी का यह ख़याल है कि
दास्तान हमारी दुनिया के बाहर की चीज़ नहीं है। आम हालात में इस पर हमारा ही वक़्त लागू होता है। (वही, पृ. 78)
मगर मेरी गुज़ारिश यह है कि जिस तरह दास्तानों की रचना हुई है और घटनाओं को आगे-पीछे करके उनके समय के क्रम (ज़मानी तसल्सुल) को तोड़ा गया है, इसके पीछे अवधारणा यही मालूम होती है कि साहिब-ए-क़िराँ के लिए वक़्त भी अधीन है। वह ऐसी गर्दिश करता है कि साहिब-ए-क़िराँ की इच्छानुसार परिणाम सामने आएँ। चाहे वे पहले प्रकट हो जाएँ और घटनाएँ बाद में हों या घटनाएँ पहले हो जाएँ और परिणाम बाद में सामने आएँ, दास्तानगो हज़रात अस्र (दोपहर के बाद की नमाज़) का वक़्त ख़त्म होने के बाद 'रज्अत-ए-शम्स' (सूरज के वापस लौटने) की रिवायत से वाक़िफ़ थे। शायद इसी मिसाल को ज़ेहन में रखते हुए उन्होंने यह अवधारणा क़ायम की कि साहिब-ए-क़िराँ की मर्ज़ी से वक़्त आगे-पीछे होकर घटनाओं और परिणामों को आगे-पीछे कर सकता है। इसीलिए दास्तानगो बाद में भी पहले की घटनाओं को बयान करने का औचित्य रखते हैं और यह इशारा है कि क़िस्से का क़िस्सा ख़त्म नहीं हुआ है। और इसका सुबूत यह है कि दास्तान में घटनाएँ अतीत की हैं तो सब चीज़ें अतीत की ही होनी चाहिए मगर यहाँ समकालीन (मुआसिर) ज़िंदगी भी है।
फ़ारूक़ी ने दास्तान की शेरियात (दास्तान का काव्यशास्त्र) के दूसरे हिस्से में दूसरी बात यह बताई है कि ऐसी बातें जिनका ज़िक्र दास्तान में ज़रूरी नहीं, मसलन अपने दौर के किसी शायर का नाम लेकर उसकी ग़ज़ल पेश करना। अपनी सदी (तेरहवीं सदी हिजरी) के हवाले देना, बैंक घरों का ज़िक्र करना वग़ैरह भी दास्तान में मौजूद हैं। फ़ारूक़ी ने सवाल उठाया है कि,
दास्तानगो इस क़दर दीदा-दिलेरी (साहस) से अपनी दास्तान में समकालीन ज़िंदगी और समकालीन दुनिया के हवाले क्यों लाता है। (स श स. 1, पृ. 131)
फ़ारूक़ी ने इसके कई जवाब दिए हैं। मसलन यह कि दास्तानों के इस शुतुर-गुर्बगी (बेमेलपन) पर सुनने वालों को कोई एतराज़ न था। और यह कि दास्तान की दुनिया हमारी दुनिया में शामिल हो सकती है। वग़ैरह। लेकिन शुतुर-गुर्बगी शब्द का इस्तेमाल करने से यह भी ज़ाहिर है कि फ़ारूक़ी ने दास्तानगोयों के समय के सिद्धांत (नज़रिया-ए-वक़्त) पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। मेरे नज़दीक, दास्तानों की यह सूरत दास्तानगोयों के 'नज़रिया-ए-दौरान-ए-ख़ालिस' (शुद्ध अवधि के सिद्धांत) की वजह से है और इसे शुतुर-गुर्बगी कहना उचित नहीं। क्योंकि अगर इसको हम शुतुर-गुर्बगी कहेंगे तो हमारी दुनिया में जिन्न, देव, परी वग़ैरह का हस्तक्षेप भी शुतुर-गुर्बगी की ही श्रेणी में रखा जाएगा।
लगे हाथों यहीं पर यह भी देख लेना चाहिए कि दास्तान की इस विशाल दुनिया का असली औचित्य क्या हो सकता है और क्यों हो सकता है? हम जानते हैं कि इस दुनिया, जिसमें हम जी रहे हैं, के अलावा और बहुत सी दुनियाएँ हैं। इंसान के अलावा बहुत से प्राणी हैं। हमारे साथ बहुत से दूसरे सामाजिक जीव हैं। जानवर होने से क्या होगा, वे एक Social Animal (सामाजिक प्राणी) के रूप में इंसानों के साथ और इंसान एक Social Animal के रूप में जानवरों के साथ जी रहे हैं। मानो मुर्गियों से लेकर हाथियों तक इंसान का एक कुनबा है और वह इस कुनबे का मालिक है, मुखिया है। इसी तरह जिन्नों और परियों की दुनिया है। इंसान इस दुनिया से भी व्यवहार कर सकता है। वह अपनी जानकारी और सूझबूझ से साँपों और शेरों को भी वश में कर लेता है। उनको सधा कर अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लेता है। घर में चींटियाँ हैं, चूहे हैं, बिल्लियाँ हैं, ये नुकसान भी पहुँचाती हैं। फिर भी इंसान इनसे डरा हुआ नहीं है, यह जानते हुए भी कि इनके भेष में जिन्न हो सकते हैं वह डरता नहीं है, बल्कि अगर वे शैतानी हरकत पर उतर आते हैं तो इंसान अपनी तरकीब से उन पर काबू पा लेता है। वह घने जंगलों में खूँखार डाकुओं की पनाहगाहें तलाश करके कार्रवाई कर सकता है। वह कोह-ए-क़ाफ़ (परियों का देश) में पहुँच सकता है। गरज कि इंसानी विजय के अजीबोगरीब नमूने इंसान के अधिकार में हैं।
हमारी असली दुनिया की यही विशालता दास्तानी दुनिया की विशालता का सच्चा औचित्य है। अगर दास्तान की यह दुनिया न होती तो हमें ज़िंदगी भर अपनी दुनिया की विशालताओं का सही अंदाज़ा न होता। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है कि दास्तानगो (दास्तान सुनाने वालों) ने विशाल और रंग-बिरंगी ज़िंदगी पेश कर दी है और बस। नहीं, इसके पीछे उनका स्थान (space) का नज़रिया काम कर रहा है। यह ब्रह्मांड एक है। अलग-अलग देशों, अलग-अलग क्षेत्रों, खासियतों और स्थान की बंदिशों में हमने इसको बाँट दिया है। वरना मनशा-ए-ईजाद हर आलम यकी अस्त (हर दुनिया की रचना का उद्देश्य एक ही है), इसी बुनियाद पर ग़ालिब ने दूसरा मिसरा कहा था कि,
गर दो सद आलम बुवद ख़ातम यकी अस्त
यही स्थान की एकता (वहतद-ए-मकान) की अवधारणा है। इक़बाल ने कहा कि,
ज़माना एक, हयात एक, कायनात भी एक
तो उन्होंने समय, स्थान और जीवन तीनों की एकता की अवधारणा दी और यह अवधारणा इस्लाम की है। दास्तानगो ने दीन-ए-हक़ यानी इस्लाम की शान बयान की है। वह इस अवधारणा की व्यावहारिक प्रस्तुति के बिना अधूरी रहती। इंसान अपना कदम कहीं भी रख सकता है। कहीं की भी ख़बर ला सकता है। पूरा ब्रह्मांड उसके अधीन है... हम ने दश्त-ए-इमकां (संभावनाओं के जंगल) को एक नक़्श-ए-पा (पदचिह्न) पाया और आलम-ए-बशरियत (मानव जगत) की ज़द में है गरदूं (आसमान), ये सब महज़ शायरी नहीं हैं बल्कि एक ख़ास अवधारणा के तहत अनुभव और अवलोकन हैं। इसी तरह दास्तानगो, अपने बयान (आख्यान) से एक ब्रह्मांडीय राज्य की अवधारणा कायम करते हैं। जो क़ुरआन के 'ख़लीफ़त-उल-अर्ज़' (धरती का प्रतिनिधि) वाले नज़रिए के मुताबिक है।
यह दास्तानगो के बयान की ऐसी हिम्मत है जो इस कला को दुर्लभ साहित्यिक पहुँच की गारंटी देती है। मैं इस बात को इंसान की दिमागी कोशिश के लिहाज़ से दास्तान की कला की सबसे बड़ी मज़बूती समझता हूँ। दास्तान हमें इंसान की इस कुदरत का कि वह समय और स्थान की क़ैद से आज़ाद है, आँखों देखा दर्शन करा देती है। अगर दास्तानगो का समय और स्थान की एकता के नज़रिए में यक़ीन न होता तो हमारी दास्तानें इंसानी कुदरत की संभावनाओं की वैसी मिसालें पेश न करतें।
तीसरी बात फ़ारूक़ी ने यह बताई है कि दास्तान की शेरियात (काव्यशास्त्र) में नारेबाज़ी का अहम रोल रहा है। बल्कि कहना चाहिए कि दास्तानगो ने नारेबाज़ी को कला का दर्जा दे दिया है। फ़ारूक़ी कहते हैं कि,
नारा साहित्य की एक विधा है और दास्तानगो को इस विधा का जन्मदाता क़रार दिया जाए तो ग़लत न होगा। (स. श. भाग-१, पृष्ठ १३९)
यहाँ मेरी गुज़ारिश यह है कि दास्तानगो को नारे का जन्मदाता नहीं कहा जा सकता क्योंकि फ़िरदौसी के 'शाहनामा' में इस तरह के नारे मिलते हैं। मसलन,
मनीज़ा मनम दुख़्त-ए-अफ़रासियाब
बरहना न दीदा तनम आफ़ताब
अमीर हमज़ा ने इस तरह के नारे बुलंद किए हैं जिनसे साफ़ ज़ाहिर है कि उनके रचनाकार लोग फ़िरदौसी के 'शाहनामा' से नारेबाज़ी सीख चुके थे और यहीं पर हम यह बात भी कह सकते हैं कि दास्तानगोई ज़बानी बयान (मौखिक आख्यान) की कला होने के बावजूद लिखित बयान से भी कुछ शैलियाँ हासिल कर सकती है। लिखित बयान से मुराद लिखित साहित्य है। अगर मौखिक साहित्य को भी लिख लिया गया तो अब वह लिखित साहित्य में शामिल कर लिया गया। इस लिहाज़ से दास्तान का साहित्य भी हमारे लिए लिखित साहित्य है।
दास्तान की शेरियात के बाद फ़ारूक़ी ने ज़बानी बयान, बयान करने वाले और सुनने वालों (श्रोताओं) जैसे विषयों पर अपने विचार प्रकट किए हैं। दास्तान की शेरियात में उन्होंने ज़बानी बयान पर संक्षेप में बातचीत की थी। ज़बानी बयान पर अलग से काफ़ी तफ़सील से तीन हिस्सों में बातचीत की है और कमाल की छानबीन से काम लिया है। इसी तरह बयान करने वाले और सुनने वालों के बारे में भी पहली बार ऐसी विस्तार से बातचीत की गई है। इन सबका नतीजा यह है कि हम अपने ज़माने में नॉवेल की शेरियात से दास्तान की परख नहीं कर सकते और दास्तान की शेरियात से अनजान होने के कारण आलोचना की कला के कई उसूलों से महरूम रह सकते हैं।
क़िस्सागोई (कहानी सुनाने) की कला में सुनने वाले का सामने होना कई लिहाज़ से कला के निर्माण में अहमियत रखता है। एक सामने की मामूली सी बात है कि क़िस्सा सुनाते वक़्त फसाहत (स्पष्टता), बलाग़त (वाक्पटुता), सफ़ाई, रवानी (प्रवाह), ठहराव, झटका, ज़ोर देना, बयान का ज़ोर, नारा वग़ैरह की प्रतिक्रिया ज़ाहिर होती रहती है। और इसके मुताबिक़ दास्तानगो अपने बयान और लहज़े, उतार-चढ़ाव, तीव्रता, हल्कापन, सामान्यता, विशिष्टता, लंबाई, पेचीदगी, बात बनाने की कला, शब्दों की शुद्धता, रोज़मर्रा की बोलचाल, दृश्य-चित्रण, प्रभाव डालने वग़ैरह से काम लेता है। इतना ही नहीं, दास्तानगो अपनी भाषा के ज्ञान, साहित्यिक रुचि, रचनात्मक उपज, घटना गढ़ने, दृश्य-चित्रण वग़ैरह को अपनी याददाश्त और अपनी याद करने की क्षमता से नई शक्लें देता है। फिर अपने लहज़े और हाव-भाव से ऐसा माहौल बनाता है जिसमें बयान करने वाला और सुनने वाले दोनों आपसी शारीरिक भाषा (body language) को समझकर प्रभाव डालने और प्रभाव ग्रहण करने का मामला करते हैं। इस लिहाज़ से ग़ौर कीजिए तो दास्तान बेहतरीन बयान (आख्यान) है, क्योंकि नॉवेल पढ़ने की कला है। ड्रामा देखने की कला है और दास्तान सुनने की कला है।
पढ़ने में लेखक और पाठक का आमना-सामना ज़रूरी नहीं। देखने में ड्रामा करने वाले और दर्शक आमने-सामने ज़रूर होते हैं लेकिन ड्रामा करने वाले किसी और के निर्देश के मुताबिक़ किसी और की नक़ल करने पर मजबूर होते हैं। इसलिए वे दर्शकों के सामने अपनी कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं कर सकते और दर्शक ज़ाहिर करें तो वह सब अनसुना हो जाता है। लेकिन दास्तान का बयान करने वाला सुनने वालों के सामने होता है। इसलिए उसका बयान दोतरफ़ा प्रभावों के तहत काम करता है और उसका निखार और सजावट दोनों तरफ़ से होती रहती है। ज़ाहिर है कि इस प्रक्रिया में बयान करने वाले और सुनने वाले दोनों को कुछ अंदाज़ा ज़रूर हो जाता है कि वे प्रभाव डालने और प्रभाव ग्रहण करने की किस मंज़िल में हैं। साहित्य, वह शायरी का हो या गद्य का और मौखिक हो या लिखित, भाषा व बयान और शब्द व अर्थ की कला है। इसके लिए मन की बात का संप्रेषण (पहुँचाना) और प्रभाव की सुंदरता बहुत ज़रूरी बातें हैं। इनका सुनने वालों के सामने कामयाबी से तुरंत व्यावहारिक प्रदर्शन होना कोई आसान काम नहीं है।
इसीलिए कहा जाता है कि दास्तानगोई जाहिलों का फ़न नहीं है। इसके लिए 'इल्मी लियाक़त' (शैक्षिक योग्यता) ज़रूरी है। (स. श. स. - 2, पृ. 170) हमारे दास्तानगो अपनी सारी क़ाबिलियतों के बावजूद सुनने वालों (सामईन) से आमतौर पर डरे रहते थे। उनकी यह माफ़ी या सफ़ाई सिर्फ़ आजिज़ी (विनम्रता) के कारण नहीं है, बल्कि सुनने वालों की क़ाबिलियतों की संभावनाओं को देखते हुए कुछ छिपे हुए मायने भी रखती है। जैसा कि शेख़ तसद्दुक़ हुसैन ने बालाबाख़्तर में लिखा है,
दास्तानगो शेख़ तसद्दुक़ हुसैन सम्मानित पाठकों की सेवा में पूरे अदब के साथ गुज़ारिश करता है कि... हालाँकि कम-मायगी (तुच्छता) और इल्मी लियाक़त की कमी रास्ते की रुकावट थी, फिर भी अमीरों, रईसों और शहर के अन्य गणमान्य लोगों ने अपनी आली-हिम्मती (बड़े हौसले) से इस कमज़ोर ज़बान वाले के बयान को पसंद फ़रमाया... मुझ नाचीज़ को कुछ अच्छी सिफ़ात (गुणों) वाले हज़रात की तरह अपनी लच्छेदार और मीठी ज़बान का दावा नहीं है।
(हवाला: स. श. स. - 2, पृ. 170)
अब मैं इस हिस्से में फ़ारूक़ी के सिर्फ़ एक मज़मून (लेख) का ज़िक्र करूँगा। स. श. स. खंड दो के आख़िर में फ़ारूक़ी ने दास्तान का अफ़साना लिखा है। इसमें उन्होंने दो-तीन बातें ऐसी बताई हैं जिनकी ख़ास अहमियत है। पहली तो यह कि दास्तानगो की नज़र में हक़ीक़त या सच्चाई वही है जो उसने बयान कर दी है। अगर किसी घटना के बारे में कई बयान हैं, तो वे दास्तानगो की अपनी कल्पना (तख़य्युल) के ज़ोर पर बनाई हुई अपनी सच्चाइयाँ हैं और उनको दास्तान के फ़न के लिहाज़ से झुठलाया नहीं जा सकता। इसके पीछे तर्क यह है कि क़िस्सा बढ़ते ही रहने के लिए और नए-नए बयानिया (आख्यान) बनाने के लिए होता है, क्योंकि इसका संबंध उन घटनाओं से है जो ज़िंदगी में घटित होती हैं। जब ज़िंदगी चलती-फिरती (रवाँ-दवाँ) है, तो क़िस्सा भी रवाँ-दवाँ होगा। हम लोगों ने नॉवेल और आधुनिक अर्थों में अफ़साने को जहाँ-तहाँ ठहरा दिया है। इसका आग़ाज़ और अंजाम तय कर दिया है। अगर ऐसा हुआ है, तो ऐसा करने पर हमें लिखाई के नियमों ने मजबूर किया। वरना हमारा फ़िक्शन (सच्ची ज़िंदगी की घटनाओं पर आधारित) भी बहुत ज़्यादा काल्पनिक और रवाँ होता। ज़बानी बयानिया पर आधारित फ़न को हम नए ज़माने में अदब (साहित्य) नहीं समझते। इसलिए हमने लिखाई की क़ैद लगाई है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि बात बढ़ाना क़िस्से की फ़ितरत में है। हम लिखें तो भी और न लिखें तो भी, क़िस्सा ख़त्म नहीं होता, पिछली पंक्तियों में दंगों के अफ़सानों की मिसाल आई है।
इतने अफ़साने लिखे जाने के बावजूद, महसूस यही होता है कि इस घटना को लिखना अभी बहुत बाक़ी है। तो यह मामला सिर्फ़ दास्तान के साथ नहीं है कि वह सिर्फ़ बढ़ते रहने के लिए है। बल्कि यह लक्षण तमाम कथा-साहित्य (कहानी के अदब) का है और इसका असर इसके हक़ीक़त के नज़रिए पर पड़ता है। हर कहानीकार, वह पुराना क़िस्सागो हो या नया अफ़सानानिगार, उसी बात को सच्चाई और हक़ीक़त मनवाता है जो उसने बयान कर दी है। इसको हम सिर्फ़ दास्तान के फ़न के लिहाज़ से नहीं, बल्कि मूल रूप से फ़िक्शन के लिहाज़ से भी झुठला नहीं सकते। फ़ारूक़ी ने इन बातों की तरफ़ बिल्कुल ध्यान नहीं दिया।
फ़ारूक़ी की दूसरी बात यह है कि शुरुआत में दास्तानें संक्षिप्त (मुख़्तसर) होती थीं, जैसा कि उर्दू दास्तानगोई के पहले दौर के दास्तानगो की कारगुज़ारियों से ज़ाहिर होता है, मगर उन्हीं में बात को लंबा करने (ततवील-ए-कलाम) के बीज मौजूद हैं। इसका सुबूत यह है कि मुख़्तसर दास्तानों में किसी घटना को जो बयान किया गया है, तो उसका असल मज़मून मात्रा के लिहाज़ से तक़रीबन बराबर है। लेकिन उसके अल्फ़ाज़ मात्रा के लिहाज़ से बराबर नहीं हैं। फ़ारूक़ी ने एक घटना के दो बयान नक़ल करके लिखा है कि,
हम देखते हैं कि इस छोटी सी इबारत में बिलग्रामी ने अश्क के मुक़ाबले में तक़रीबन सत्ताईस फ़ीसदी अल्फ़ाज़ ज़्यादा इस्तेमाल किए हैं और असल मज़मून में कोई इज़ाफ़ा नहीं किया है। दरअसल यह वही बात है कि 'कहने से कहानी बढ़ती है।'
इससे फ़ारूक़ी ने नतीजा निकाला है कि
ज़बानी बयानिया अगर लिखा भी जाए, तो भी उसका रुझान बढ़ोतरी (अफ़ज़ाइश) ही की तरफ़ होता है, कमी (तख़फ़ीफ़) की तरफ़ नहीं।
और इस नतीजे से उन्होंने लंबी दास्तानों का औचित्य (जवाज़) मुहैया किया है। इस नतीजे और औचित्य को क़ुबूल करने में कोई हर्ज़ नहीं। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि ज़बानी बयानिया में बढ़ोतरी अपने आप में क्या अहमियत रखती है। और इस बढ़ोतरी से बयानिया में जो बदलाव और परिवर्तन आता है, उसका क्या असर साहित्यिक सच्चाई पर पड़ता है। ज़ाहिर तौर पर तो मुशाहिदा (अवलोकन) यही कहता है कि बातें बनाना और बातों में बातें गढ़ना ज़बानी बयानिया की ख़ूबी है, लेकिन ग़ौर कीजिए तो तजुर्बा यह कहता है कि बढ़ोतरी हमेशा ख़ूबी नहीं होती, बल्कि कभी ख़राबी की वजह भी बनती है। और अगर ज़बानी बयानिया को लिखने का रिवाज हो जाए, तो ज़्यादा संभावना है कि बयान की इस बढ़ोतरी के ख़राब नतीजे सामने आएँगे और आए भी। दास्तान के ख़िलाफ़ जो माहौल बना, उसको इस बढ़ोतरी ने और हवा दी। तो, बढ़ोतरी अपने आप में नहीं, बल्कि ज़रूरत की माँग के तहत ही फ़न के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है। इसी निस्बत से बयानिया में जो बदलाव आता है, वह साहित्यिक सच्चाई को प्रभावित करता है। बल्कि कहना चाहिए कि इस तब्दीली की भी अपनी साहित्यिक सच्चाई है।
इसकी वजह यह है कि जब हम सुनी हुई या पढ़ी हुई चीज़ को भी लिखने बैठते हैं, तो उसको अपने लफ़्ज़ों में और अपने तर्क (लॉजिक) से लिखते हैं। इसका तजुर्बा हम लोगों को इम्तिहान के पर्चे लिखने में बख़ूबी हुआ है कि हम जिस नोट को पढ़ कर गए, उसको हेर-फेर और बदलाव के साथ लिखा। और हम सबने एक ही लिखाया हुआ नोट पढ़ा था और उसी नोट की रोशनी में पर्चा लिखा था, लेकिन हमें अलग-अलग नंबर मिले। तो यक़ीन है कि हमने अपने भाषाई सरोकार और अपनी बात पहुँचाने (इब्लाग़) के तरीक़े से उस ख़ास सवाल में असल मतलब का नयापन पैदा कर दिया होगा। छात्रों से सवाल पूछने में यह ज़रूर दर्ज रहता है कि Candidates are required to give their answers in their own words तो यह सिर्फ़ इम्तिहान का मामला नहीं है कि बयानिया बनाने की मश्क़ (अभ्यास) के तहत ऐसा हुक्म दिया जाए। नहीं, यह तो हर उस शख़्स की ज़िंदगी के साथ लगा हुआ रोग है जो अपने मन की बात (माफ़िज़्ज़मीर) दूसरों तक पहुँचाने में दूसरे साधनों से कम, लफ़्ज़ों से ज़्यादा काम लेता है।
आप मिसरा-ए-तरह (मुशायरे के लिए दी गई पंक्ति) दीजिए। क़वाफ़ी (क़ाफ़िये) बता दीजिए। कुछ और अल्फ़ाज़ की भी निशानदेही कर दीजिए, लेकिन फिर भी देखिएगा कि मुशायरे में हर शायर ने अपने-अपने तौर पर मज़ामीन (विषय) पेश किए हैं। यानी आपके बताए हुए अल्फ़ाज़ के इस्तेमाल के बावजूद मज़ामीन आपके नहीं हैं। ऐसा क्यों होता है? वजह वही है कि साहित्यिक बयानिया में उँगली रख कर नहीं कहा जा सकता कि सच्चाई यहीं पर है। एक विषय का बयानिया बढ़ता है, विविध (तरह-तरह का) होता है। और इससे जो नक़्श (छाप) बनते हैं, वे साहित्यिक सच्चाई के ही नुमाइंदे होते हैं। फ़ारूक़ी ने इस बात को सिर्फ़ दास्तान के फ़न तक ख़ास करके और लिखित बयानिया को ख़ारिज करके इसे महदूद (सीमित) कर दिया है।
फ़ारूक़ी की तीसरी बात यह है कि उर्दू दास्तान मज़हबी पसमंज़र (पृष्ठभूमि) में शुरू हुई थी, लेकिन बाद में उसने मज़हबी हवाले को छोड़ दिया और सिर्फ़ तारीखी (ऐतिहासिक) हवाले से काम रखा और इस तरह सही मायनों में अब जाकर दास्तान पूरी तरह अफ़साना बन गई है। (स. श. स. - 2, पृ. 215) मज़मून के आख़िर में उन्होंने लिखा है कि,
मेरा ख़याल है कि अब यह बात पूरी तरह वाज़ेह (स्पष्ट) हो गई होगी कि दास्तान किस तरह 'तवारीख़' का रूप धार कर पूरी तरह 'अफ़साना' बनती है। (ऐज़न, पृ. 216)
फ़ारूक़ी की यह खोज (Finding) सही मालूम होती है क्योंकि जब लंबी दास्तानों ने बहुत छोटी दास्तानों का मज़हबी घेरा तोड़ना शुरू किया तो उनमें कल्पनाओं की दुनिया भी बड़ी होती गई और उनका सेक्युलर किरदार भी साफ़ होता गया। फ़ारूक़ी ने इस बात पर ख़ासी तवज्जो दी है कि हिंदुस्तानी दास्तानें सेक्युलर हैं। हालाँकि उन्होंने यह माना है कि दास्तान का बुनियादी मौज़ू (मुख्य विषय) शौकत-ए-दीन-ए-हक़ (सच्चे धर्म की शान) बयान करना है। (स. श. स. 3, पृ. 186) और दीन-ए-हक़ से मुराद इस्लाम है और इस्लाम से मुराद शिया इस्लाम है। (ऐज़न पृ. 274) उन्होंने लिखा है कि:
कुल मिलाकर इस्लाम को बरहक़ (सच्चा) और बाक़ी हर मज़हब को बातिल (झूठा) ज़रूर क़रार दिया गया है लेकिन ज्ञान चंद का यह ख़याल ग़लत है कि दास्तान में इस्लाम और हिंदू मज़हब को एक दूसरे के आमने-सामने लड़ते हुए दिखाया गया है। दास्तान में हिंदू मज़हब और इस्लाम की जंग नहीं है... (ऐज़न 186)
अलबत्ता यह ज़रूर है कि मख़लूक़ात (प्राणियों) की आपसी कशमकश में कामयाबी उसी को मिलती है जिसे तौफ़ीक़-ए-इलाही (ख़ुदा की मदद) हासिल है और तौफ़ीक़-ए-इलाही की हक़दार वही मख़लूक़ है जो ख़ुदा की एकता और मोहम्मद की पैग़ंबरी को मानने वाली है। क्योंकि आख़िरत (परलोक) या बिगड़ी हुई शक्ल में पैग़ंबरी को मानने वाली तो कई क़ौमें हैं बल्कि बिगड़ा हुआ ख़ुदा का तसव्वुर भी रखती हैं। लेकिन उनमें से किसी को अल्लाह की मदद हासिल नहीं होती, लेकिन जब वह एक ख़ुदा को मानने वालों, सच्चाई पर चलने वालों और आख़िरी रसूल के नाम लेवाओं से अपने मक़सद के लिए टकराती हैं और उनको बुरी हार नसीब होती है तो ऐसा लगता है कि दास्तान-गोयों (दास्तान सुनाने वालों) ने एक-तरफ़ा नतीजे दिखाए हैं। दरअसल इसमें उनका कोई इरादा और क़सूर नहीं है।
दास्तान में सच और झूठ की जंग तो है ही मगर आख़िरी नतीजा फ़ितरी तौर पर (स्वाभाविक रूप से) सच ही के हक़ में सामने आता है। दास्तान-गोयों ने तो अपने तौर पर झूठ को भी बहुत मज़बूत विरोधी पक्ष, ख़ूब टक्कर देने वाला दिखाया है। उन्होंने अपनी ऊँची कल्पना को उनके लिए भी ख़ूब ज़ोरदार तरीक़े से इस्तेमाल किया है। इसलिए हम उन पर तरफ़दारी का इल्ज़ाम नहीं धर सकते। उन्होंने मुसलमानों पर हिंदू रस्म-ओ-रिवाज़ के जो असरात दिखाए हैं वह भी उनको निष्पक्ष साबित करते हैं। बल्कि सच्चाई तो यह है कि उन्होंने हिंदुस्तान की सियासी मज़बूती और सामाजिक एकता की ख़ातिर अपने मज़हबी लगाव को क़ुर्बान किया है। लेकिन दास्तान की वाक़ियाती (घटनात्मक) ख़ूबी यह है कि तौफ़ीक़-ए-इलाही पर ईमान और यक़ीन के बावजूद इस्लामियों का अमल (काम) कहीं कमज़ोर नहीं पड़ता। यानी वह यह नहीं सोचते कि हम तो अल्लाह और रसूल के नाम लेवा हैं, हमें तौफ़ीक़-ए-इलाही और ग़ैबी मदद हासिल है। इसलिए हमें ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत नहीं। हमारा मक़सद चमत्कारी तौर पर पूरा होता चला जाएगा। नहीं, वह मक़सद को पाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कोशिश करते हैं, ज़्यादा से ज़्यादा जोखिम उठाते और ख़तरों में पड़ते हैं।
तौफ़ीक़ और अमल का ऐसा मेल और उनकी ऐसी कारगुज़ारी हमें नए दौर के कहानी के अदब (कथा साहित्य) में कहीं नहीं मिलती। यह इस बात की दलील है कि दास्तान-गोयों को कोशिश के मुताबिक़ फल मिलने के इस्लामी नज़रिए को समाज के सामने रखना था और साथ-साथ यह भी जता देना था कि नतीजे जितने कोशिश पर निर्भर हैं उतने ही तौफ़ीक़ और मदद पर भी निर्भर हैं। इसलिए कोई इंसान ग़ैबी ताक़त से बेपरवाह नहीं हो सकता? या बहुत सी ग़ैबी ताक़तों के तसव्वुर से भी कामयाब नहीं हो सकता। या महज़ तौफ़ीक़ के भरोसे या सिर्फ़ अमल के ज़रिए भी कामयाब नहीं हो सकता। यह समझना कि दास्तान में इस्लाम और हिंदू मज़हब को एक दूसरे के आमने-सामने लड़ते हुए दिखाया गया है बिल्कुल ग़लत है। जैसा कि प्रोफ़ेसर ज्ञान चंद जैन का ख़याल था।
यहीं पर यह बात भी कहने की है कि दास्तान में तिलिस्म और जादू के साथ झूठे ख़ुदा भी ख़ूब पेश किए गए हैं और वह भी ताक़त और क़ुदरत का मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) करते हैं। लेकिन आख़िर में वह हार जाते हैं, मुमकिन है दास्तान-गोयों ने इस सिलसिले में ख़ुदाई का झूठा दावा करने वालों और ख़ुदा को झुठलाने वालों से मुताल्लिक़ क़ुरान की बातों को ध्यान में रखा हो। इन बातों से कुफ़्र और इस्लाम की जंग ज़रूर ज़ाहिर होती है लेकिन इस जंग को ख़ास हिंदू मज़हब और इस्लाम की जंग का रंग नहीं दिया जा सकता, उन्होंने तो यह दिखाया है कि अल्लाह, Almighty God, ईश्वर, जिस नाम से पुकारिए, उसका सामना करके कोई ताक़त पार नहीं पा सकती लेकिन उसकी मदद हासिल करने की कुछ शर्तें हैं। असल बात यह है कि कोई मुसलमान हो या हिंदू या कोई और क़ौम, उसे कामयाबी चाहिए। तो इसके लिए दास्तान-गोयों को उनकी अपनी सोच में, जो मुनासिब और ठीक राह नज़र आई उसको उन्होंने पेश किया और कहीं प्रचार (तबलीग़) नहीं की। वाक़ियात, छोटे-बड़े मुमकिन और कल्पना से परे वाक़ियात के ऐसे जाल बुने, ऐसी रंग-आमेज़ी की (रोचक बनाया), ऐसी कल्पनाओं से काम लिया कि उनका तसव्वुर भी आ गया और कलाकारी भी हो गई।
(3)
दास्तान की परख और तनक़ीद (आलोचना) में उर्दू नक़्क़ादों (आलोचकों) ने कई ज़ावियों (नज़रियों) से अपने ख़याल पेश किए हैं। इनमें कुछ तो तारीफ़ी बातें हैं और कुछ फ़र्द-ए-जुर्म (आरोप-पत्र) है। तारीफ़ी बातों का ख़ुलासा फ़ारूक़ी ने स. श. स. की पहली जिल्द के पृ. 62 से पृ. 64 तक ग्यारह नुकात (बिंदुओं) में दिया है और फ़र्द-ए-जुर्म को बारह नुकात में पेश किया है। इन दोनों के दरमियान वह अफ़सोस और शर्मिंदगी से अपनी बातें भी रखते हैं,
मुझे अफ़सोस और शर्मिंदगी से कहना पड़ता है कि दास्तान पर जो तनक़ीद अब तक मेरी नज़र से गुज़री है, वह ज़्यादा तर बचकाना, सतही (ऊपरी) और असल मामले से दूर है। (पृ. 64)
अफ़सोस और शर्मिंदगी ग़ालिबन (शायद) इसलिए है कि दास्तान की तनक़ीद में असल बुनियादी बातें जो होनी चाहिए उनकी बक़ौल फ़ारूक़ी हमें आम तौर पर कोई ख़बर नहीं। (पृ. 64) वह क्या हैं? फ़ारूक़ी ही की ज़बानी सुनिए,
(1) दास्तान एक नई तरह की दुनिया ख़लक़ करती (बनाती) है। यह दुनिया अपनी जुज़ियात (छोटी-छोटी बातों) के ऐतबार से नुमाइंदगी-पज़ीर (Mimetic) और असल के ऐतबार से ग़ैर-नुमाइंदगी-पज़ीर (Anti Mimetic) है। अदब की कोई सिन्फ़ (विधा) इस ख़ूबी में इसके बराबर नहीं ठहरती बल्कि इसके क़रीब भी नहीं आती।
(2) दास्तान ग़ैर-मामूली तख़य्युलाती कारगुज़ारी (काल्पनिक काम) है। यह हमें ज़बान और बयानिया (कथा-शैली) दोनों की इंतहाओं तक ले जाने की कोशिश करती है और अक्सर कामयाब भी होती है।
(3) दास्तान-ए-अमीर हमज़ा नवल किशोरी की छियालीस जिल्दें ज़बानी बयानिया के फ़न (कला) का आख़िरी (और उर्दू की हद तक पहला भी) अज़ीम नमूना हैं। ज़बानी बयानिया के फ़न का ग़ालिबन कोई तर्ज़ (शैली) ऐसा नहीं है जो यहाँ न मिल जाता हो। यह सही मायने में ज़बानी बयानिया का ख़ज़ाना-ए-आमिरा (बड़ा ख़ज़ाना) है।
(4) दास्तान-ए-अमीर हमज़ा नवल किशोरी की छियालीस जिल्दों में हिन्द+इस्लामी तसव्वुर-ए-कायनात (World View) पूरी क़ुव्वत और बस्त (विस्तार) से बयान हुआ है। यह दास्तान हिन्द+इस्लामी तसव्वुर-ए-कायनात का भी ख़ज़ाना-ए-आमिरा है।
इसके बाद लिखते हैं,
मेरा ख़याल है कि मंदरजा-बाला (ऊपर दिए गए) चार नुकात हमारे यहाँ दास्तान की तनक़ीद में ज़ेर-ए-बहस (चर्चा में) नहीं आए। (स. श. स. 1, पृ. 65)
यह बातें तो स. श. स. पहली जिल्द के बाब-ए-अव्वल (पहले अध्याय) दास्तान की शेरियात... 1 में आई हैं। इसी जिल्द में आख़िरी बाब (याज़दहुम - ग्यारहवाँ) दास्तान के नक़्क़ाद के उनवान (शीर्षक) से लिखा गया है। इसका पहला जुमला है,
ज्ञान चंद को दास्तान का सबसे ज़्यादा कार-आमद (उपयोगी) नक़्क़ाद कहा जा सकता है।
और पहला ही जुमला उलझन में डालता है। अगर वह चार नुकात जो ऊपर नक़ल किए गए, ज्ञान चंद की तनक़ीद में भी ज़ेर-ए-बहस नहीं आए तो फिर वह कार-आमद नक़्क़ाद कैसे कहे जा सकते हैं?
फ़ारूक़ी ने राज़ यज़दानी को भी बेकार ही खींचा है। वह बेचारे इस आँधी-तूफ़ान में कहाँ ठहरने वाले हैं। उन्होंने दास्तान पर कुछ काम ज़रूर किया है। लेकिन सुहैल बुख़ारी, वक़ार अज़ीम वग़ैरह की तरह उनका ज़िक्र कभी न हुआ। सुहैल बुख़ारी, वक़ार अज़ीम और राही मासूम रज़ा के बारे में फ़ारूक़ी कहते हैं कि इन लोगों की कोशिशों को आलोचना का दर्जा मुश्किल ही से दिया जा सकता है। (पृष्ठ, 524)
इसी तरह सुहैल अहमद, शमीम अहमद, मुहम्मद सलीम उर रहमान वग़ैरह भी छोड़ ही देने के लायक़ हैं। हो सकता है कि इन्हीं लोगों की आलोचनाओं के मद्देनज़र फ़ारूक़ी ने दास्तान की आलोचना के लिए बचकाना शब्द इस्तेमाल किया हो, क्योंकि इन लोगों ने दास्तान में प्रतीकात्मक पहलू दिखाकर शायद कोई आलोचनात्मक काम नहीं किया। मगर यह बात मैं भी मानता हूँ कि दास्तान प्रतीकात्मक पहलू भी रखती है। ख़ैर, मुहम्मद हसन अस्करी और जमील जालबी भी दास्तान की आलोचना में बस नाम-मात्र ही बड़े भाई हैं और हो सकता है कि दास्तान की आलोचना में सतही शब्द इन्हीं के लिए हो। इसलिए इन सबका बस वाजिबी सा ज़िक्र कर दिया गया है।
असल मामला यह है कि फ़ारूक़ी को कलीमुद्दीन अहमद की दास्तान की आलोचना का जायज़ा लेना था और बचकाना, सतही और असल मामले से दूर या और भी जो कुछ कहिए, वह कलीमुद्दीन अहमद ही के बारे में कहना था। इसलिए उन्होंने कई पन्नों में कलीमुद्दीन अहमद की किताब उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तान गोई पर आलोचनात्मक नज़र डाली है और विस्तृत विश्लेषण के बाद आख़िरी फ़ैसला यह किया है,
दास्तान पर कलीमुद्दीन अहमद की आलोचना का इतना विस्तृत ज़िक्र मैंने इसलिए किया कि कलीमुद्दीन अहमद के अलावा किसी ने दास्तान पर इतनी विस्तृत सैद्धांतिक आलोचना नहीं लिखी है और कलीमुद्दीन अहमद ही के विचारों की बुनियाद पर आज तक के तक़रीबन तमाम आलोचकों ने दास्तान पर अपनी आलोचना की इमारत क़ायम की है। कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान को गंभीर अध्ययन के लायक़ समझा, इसके दोषों और गुणों पर साहित्यिक दृष्टिकोण से बहस की। दूसरे शब्दों में उन्होंने हमारी दास्तानों को सम्मानित बनाया। इसलिए उनकी जितनी तारीफ़ हो कम है। अगर वह दास्तान की विधा के साथ मामला इसके अपने काव्यशास्त्र और इसकी अपनी परंपरा की रोशनी में करते तो उनके नतीजे और भी बेहतर होते। (स श पृ. 1, पृ. 524)
यानी दास्तान के काव्यशास्त्र और परंपरा को मद्देनज़र न रखने की वजह से उनके आलोचनात्मक नतीजे बेहतर न हो सके। तो फिर उनकी तारीफ़ क्यों? कहते हैं कि कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान... की ख़ामियों और ख़ूबियों पर साहित्यिक दृष्टिकोण से बहस की। ख़ामियों का शब्द पहले लाने में यह इशारा हो सकता है कि कलीमुद्दीन अहमद ने ख़ामियाँ पहले देखी हैं और वह ख़ामियाँ पहले देखते ही हैं। अगर वह ख़ूबियाँ पहले देखते तो ख़ामियाँ नज़र ही न आतीं। बहरहाल, उन्होंने साहित्यिक दृष्टिकोण से बहस की यही बहुत है। क्योंकि,
असल बात यह देखने की है कि किन आलोचकों ने दास्तान को साहित्यिक पाठ क़रार देकर इसकी अहमियत और क़द्र के अनुसार इसका अध्ययन किया है, सरपरस्ती और रहम वाले लहज़े की जगह अकादमिक और ज़िम्मेदाराना लहज़ा इख़्तियार किया है और दास्तान की बुनियादी विशेषताओं और ख़ूबियों को ख़ुद दास्तान के काव्यशास्त्र के हवाले से बयान किया है। (ऐज़न पृ. 535)
फ़ारूक़ी को इस बात में तो शक नहीं है कि कलीमुद्दीन अहमद दास्तान को साहित्यिक पाठ क़रार देते हैं या नहीं। लेकिन इस बात में शक ज़रूर है कि कलीमुद्दीन अहमद सरपरस्ती और रहम वाले लहज़े की जगह अकादमिक और ज़िम्मेदाराना लहज़ा इख़्तियार करते हैं या नहीं। और इस बात का तो उनको यक़ीन ही नहीं है कि कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान की बुनियादी विशेषताओं और ख़ूबियों को ख़ुद दास्तान के काव्यशास्त्र के हवाले से बयान किया है। इस शक और अनिश्चितता की प्रकृति और स्थिति को समझने के लिए और सही सूरत-ए-हाल से वाक़िफ़ होने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि फ़ारूक़ी ने दास्तान के संबंध में कलीमुद्दीन अहमद के बारे में क्या कहा और ख़ुद कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान की कला के संबंध में दास्तान के बारे में क्या कहा था। यह देखने के लिए दोनों आलोचकों के विचार समानांतर पेश किए जाते हैं।
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
(1) कलीमुद्दीन अहमद साहब ज़बानी सुनाए जाने वाले पाठ या ज़बानी सुनाए जाने के लिए लिखे जाने वाले पाठ और ख़ामोश पढ़ने की ख़ातिर लिखे हुए पाठ में कोई फ़र्क़ नहीं करते। लिहाज़ा अगर वह दास्तान-गोई (दास्तान सुनाने) की पारिभाषिक शब्दावली इस्तेमाल भी करते हैं तो इसके निहितार्थों से कोई वास्ता नहीं रखते। (स श पृ. 1, पृ. 503)
कलीमुद्दीन अहमद
(1) अलिफ़. 'बीस-पच्चीस यारान-ए-सादिक़ (सच्चे दोस्त) और दास्तान मुवाफ़िक़ (अनुकूल दास्तान)' का जमा होकर दास्तान सुनना और बात है और उनका ग़ौर से फ़ुर्सत के वक़्त अध्ययन करना और बात है। जब हम ग़ौर-ओ-फ़िक्र के साथ पढ़ते हैं, जब हम किसी चीज़ की तरफ़ अपनी पूरी तवज्जो केंद्रित करते हैं तो हमें आंशिक और सामने मौजूद चीज़ों से तसल्ली नहीं होती और हम कुछ और चाहते हैं और कलात्मक और सौंदर्यपरक पैमानों को काम में लाते हैं। दास्तान-गो इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ थे और वह दास्तान-गोई को अपनी हदों में कलात्मक तौर पर बरतते थे। यानी वह चंद उसूल सामने रखते थे।
(उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तान गोई। पृ. 28)
बे. वह कहानी हो या दास्तान यह फ़न कहने का फ़न है। दास्तान-गो बातें करता है और अपनी दिलचस्प बातों में वह सुनने वालों को मग्न कर लेता है। उसकी बातों में रवानी, सरलता, सादगी होती है। उसकी ज़बान स्वाभाविक होती है। लब-ओ-लहज़े में बोलचाल का लुत्फ़ मिलता है। जहाँ उसकी बातों में बनावट की मिलावट हुई तो फिर उनका असर जाता रहता है।
(उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तान गोई। पृ. 146)
जीम. कहने वाले ने इस तरह कहा है। (बाग़-ओ-बहार) लिखने वाले ने यूँ लिखा है। (आराइश-ए-महफ़िल) कह सकते हैं कि इन दोनों दास्तानों में कहने और लिखने का फ़र्क़ है। आराइश-ए-महफ़िल लिखी गई है, इसलिए इसमें अन्य ख़ामियों और सीमाओं के साथ-साथ भारीपन अपेक्षाकृत ज़्यादा है। (ऐज़न पृ. 150)
(2) कलीमुद्दीन अहमद साहब को नॉवेल की मौजूदगी में दास्तान की कोई ज़िंदा ज़रूरत न दिखाई दी और कुल मिलाकर उन्हें दास्तान और नॉवेल के लिए 'आब आमद तयम्मुम बरख़ास्त' (यानी बेहतर विकल्प आने पर पुरानी चीज़ छोड़ दी जाती है) का हुक्म लगाना पड़ा... कलीमुद्दीन अहमद को दास्तानें पसंद होंगी लेकिन वह उन्हें लिखित साहित्य मसलन नॉवेल के मुक़ाबले में कोई दर्जा देने को तैयार नहीं। ख़ुद किताब के पाठ में वह जगह-जगह दास्तान, कहानी और क़िस्सा-गोई को जंगली इंसान या कम उम्र बच्चों की काल्पनिक दुनिया की चीज़ें क़रार देते हैं।
(स श पृ. 1, पृ. 503-4)
(2) अलिफ़. सभ्य इंसान भी बच्चों और असभ्य लोगों की तरह क़िस्से-कहानी का शौक़ीन होता है। यानी इंसान सभ्यता की सीढ़ियों पर पहुँच कर भी कहानियों को व्यर्थ और बेमानी नहीं ख़याल करता बल्कि उनका स्वरूप बदल कर अपनी सभ्य ज़िंदगी की ज़रूरत को पूरा करता है... क़िस्से-कहानियाँ अपनी कलात्मक और साहित्यिक ख़ामियों के बावजूद भी ऐसी चीज़ें नहीं कि उन्हें एक सिरे से अविश्वसनीय समझा जाए... (ऐज़न पृ. 9 से 12)
बे. दास्तान-गोई एक कला है और अपनी सीमाओं और ख़ामियों के बावजूद एक दिलचस्प कला है और इस क़दर कम क़ीमत नहीं कि हम इसे एक सिरे से नज़रअंदाज़ कर सकें। अफ़सोस है कि मौजूदा ज़माने में इस कला के जानने और बरतने वाले नहीं मिलते और अब यह कला साहित्य की दुनिया में ज़िंदा कला की हैसियत नहीं रखती और कोई दूसरी साहित्यिक विधा इसका विकल्प नहीं हो सकती। (ऐज़न पृ. 31-32)
ज हमारी ज़िंदगी की बेरंगी और हमारा असंतोष एक हक़ीक़त है। रंग-बिरंगे तजुर्बों तक हमारी पहुँच नहीं, जो तमन्नाएँ दिल में उभरती हैं। जो हौसला दिमाग़ महसूस करता है, जो इत्मीनान रूह ढूँढती है, वह इस दुनिया में हासिल नहीं... इसलिए किसी छुटकारे के रास्ते की तलाश होती है और यह छुटकारे का रास्ता हमें वह दूसरी ज़िंदगी दिखाता है जो हम अपनी चौबीस घंटों वाली ज़िंदगी के साथ ही साथ बसर करते हैं। यह दूसरी ज़िंदगी ज़्यादा रंगीन, विविध और दिलचस्प होती है... तिलिस्म-ए-होशरुबा में यह दूसरी ज़िंदगी अपनी तमाम रंगीनियों, बारीकियों और सुंदरताओं के साथ मुस्कुराती है और हमें नज़ारे की दावत देती है। इस दूसरी दुनिया में अपनी मामूली दुनिया की जानी-पहचानी चीज़ों की तलाश समझदारी से दूर की बात है। (ऐज़न पृ. 38 से 39)
आगे बढ़ने से पहले फ़ारूक़ी के इन दो नुक़्तों को कलीमुद्दीन अहमद के हवालों में देखिए कि वे हैं या नहीं। अगर कलीमुद्दीन अहमद ज़बानी सुनने के लिए ज़बानी पाठ या लिखित पाठ और ध्यान से पढ़ने के लिए ज़बानी या लिखित बयानिया (आख्यान) के लिखित पाठ में फ़र्क़ नहीं करते, तो वे यह क्यों कहते हैं कि दास्तानगो कुछ उसूल सामने रखते थे और दास्तानगोई एक फ़न है कहने का न कि लिखने का और बाग़-ओ-बहार कही गई है जबकि आराइश-ए-महफ़िल लिखी गई है। और यह तो कलीमुद्दीन अहमद पर इल्ज़ाम है कि वे नॉवेल के मुक़ाबले में दास्तान को कोई दर्जा देने को तैयार नहीं। उन्होंने दास्तान को तयम्मुम (पानी न होने पर मिट्टी से वज़ू करना) और नॉवेल को पानी कहीं नहीं और कभी नहीं समझा। बल्कि उन्होंने तो साफ़-साफ़ कहा है कि कोई दूसरी विधा दास्तान का बदल नहीं हो सकती। और यह भी इल्ज़ाम ही है कि कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान, कहानी और क़िस्सा गढ़ने को जंगली इंसान या कम उम्र बच्चों की ख्याली दुनिया की चीज़ें क़रार दिया है। हक़ीक़त यह है कि उन्होंने कहानी और दास्तान को अलग-अलग मायनों में इस्तेमाल किया है। क़िस्से-कहानी को उन्होंने ज़रूर जंगलियों और बच्चों से जोड़ा है। लेकिन दास्तान के बारे में कहा है कि क़िस्से-कहानी का स्वरूप बदलकर सभ्य इंसान दास्तान बनाता है और अपनी ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करता है। यानी आम क़िस्से-कहानियों से दास्तान का स्वरूप बदला हुआ होता है।
अब रही यह बात कि कलीमुद्दीन अहमद ने कहने का फ़न और फ़ारूक़ी ने ज़बानी बयानिया पर जो इतना ज़ोर दिया है, उसकी असलियत हमारे नज़दीक, जिनके हिस्से में दूर का नज़ारा है और जो लिखित बयानिया के जादू में आ चुके हैं, क्या है? वाक़या यह है कि दास्तान कहने का फ़न होने के बावजूद हम तक जो पहुँची है, तो लिखी हुई हालत में पहुँची है, हम इसको सिर्फ़ पढ़ते हैं। जो लोग अपने कानों से दास्तान को सुना करते थे, हम उनकी तरह कैसे हो सकते हैं। मसलन एक मिसाल लीजिए। दास्तान में लंबी-लंबी ग़ज़लें हैं। फ़ारूक़ी ने लिखा है कि,
मुमकिन है (शायद तरन्नुम से सुनाई जाने की वजह से) सुनने वालों को इनसे उकताहट न होती हो बल्कि एक तरह की राहत (Relief) महसूस होती हो। (स. श. भाग 3, पृ. 339)
इसमें तो ख़ैर शक नहीं कि शायरी तरन्नुम से सुनाई जाए या तहत-उल-लफ़्ज़ (बिना गाए) में, सुनने वालों पर इसका ख़ास असर होता है। जैसा कि मर्सिया-ख़्वानी में आज भी नज़र आता है। हो सकता है कि सुनने वाले न उकताते हों बल्कि राहत महसूस करते हों। लेकिन आज का पाठक दास्तान में लंबी-लंबी ग़ज़लों को कबाब में हड्डी ही समझता है। ज़बानी बयानिया का फ़न ज़बानी बयान ही में खुलता है। पढ़ने में नहीं खुलता। लिखित बयानिया का फ़न अपने आप में भी क़ायम रहता है और नई तरह से पढ़ने पर छुपी हुई फ़नकारी की संभावनाओं को भी रोशन करता है। दास्तानगोयों ने ज्यों ही दास्तानें लिखीं और प्रकाशित कीं, तो बस उसी पल उनको लिखित बयानिया के दायरे में ख़ुद ही डाल दिया। दास्तानों को मुनासिब अंदाज़ और शाइस्ता इबारत के साथ तरतीब दिया गया। अब यह और बात है कि लिखने में भी यह उसूल सामने रहा कि दास्तान यूँ लिखनी चाहिए कि लिखावट में बोलने का मज़ा हो। इसलिए अब लिखित बयानिया के उसूलों से दास्तान को जाँचना पूरी तरह ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है, ख़ुद फ़ारूक़ी ने भी कहा है कि,
इसमें कोई शक नहीं कि ज़बानियत (Orality) को हम सभ्यताओं का लक्ष्य नहीं कह सकते। और हर समाज देर-सवेर ज़बानीपन से लिखाई-पढ़ाई की तरफ़ सफ़र करता है। (स. श. भाग 1, पृ. 270)
हम ज़बानीपन को कोई नकारात्मक चीज़ नहीं समझते और कैसे समझ सकते हैं जबकि इस ज़बानीपन ने हमें दास्तान का इतना बड़ा विशाल ख़ज़ाना अता किया है। लेकिन इसको लिखित रूप से बड़ी चीज़ भी नहीं कह सकते। बल्कि यही ज़बानीपन से बड़ी चीज़ है क्योंकि ज़बानीपन को भी बहरहाल और आख़िरकार लिखाई का ही सहारा लेना पड़ा। फिर यह बात भी है कि फ़न किस तरह वजूद में आया है, यह देखने में आलोचक को ज़्यादा वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहिए। आलोचक को तो यह देखना है कि जो फ़न का नमूना उसके सामने है, वह एक फ़न के तौर पर क्या क़द्र रखता है। मसलन हमारे शायरों ने कई ग़ज़लें और ग़ज़लों के शेर शौचालय में कहे होंगे, कई तन्हाई में और कई बेसाख़्ता तौर पर महफ़िल में। छानबीन करने पर हमको पता भी मिल सकता है कि कौन-सी ग़ज़ल कहाँ कही गई है, तो क्या हम विश्लेषण में इन जगहों को भी लाज़िमी तौर पर ध्यान में रखेंगे? बुनियादी बात यह है कि बयानिया जिस तरह का भी हो और जिस सूरत-ए-हाल में भी बनाया गया हो और जिस मक़सद के लिए और जिस ज़रिए से भी बना हो, अब जबकि वह हमारे सामने लिखित शक्ल में है, तो हम उसको लिखित बयानिया की शेरियात (काव्यशास्त्र) से अलग नहीं रख सकते।
अगर आराइश-ए-महफ़िल लिखी गई है तो ठीक है, लिखी गई है। लेकिन ऐसी बात नहीं कि इसमें बोझिलपन लिखने ही की वजह से आया और बाग़-ओ-बहार कही गई, तो ठीक है कही गई है। लेकिन ऐसा तो नहीं है कि कहने ही की वजह से इसमें सरलता और रवानी आई, लिखने की वजह से न आई। बोझिलपन और सरलता कुछ लिखाई और ज़बानीपन पर निर्भर नहीं है। यह कहीं भी आ सकती है। असल यह है कि कहने वाला और लिखने वाला भाषा के ज्ञान और रचना करने के कितने क़ाबिल है और कौन-सा अंदाज़ ख़ुद उसको पसंद है। सुनने वाले और पढ़ने वाले तो दूसरे दर्जे के हो जाते हैं। इस लिहाज़ से देखिए तो फ़ारूक़ी की ज़बानी बयानिया पर लंबी बहस के मुक़ाबले में कलीमुद्दीन अहमद की कहने का फ़न पर छोटी बातचीत दो हाथ आगे ही रहती है।
फ़ारूक़ी कहते हैं कि,
(कलीमुद्दीन अहमद साहब ने) यह कहीं नहीं बताया कि साहित्यिक कृतियों की हैसियत से हमारी दास्तानों की अहमियत क्या है? ये साहित्य हैं कि नहीं? और अगर साहित्य हैं तो साहित्य की दुनिया में इनकी जगह कहाँ है। (स. श. भाग 1, पृ. 504)
या अल्लाह! अगर कलीमुद्दीन अहमद ने यही बातें नहीं बताईं तो दास्तान पर तनक़ीद क्या की? लेकिन ठहरिए, उनकी किताब उठाइए, खोलिए और पढ़िए,
अलिफ़: जिस दास्तान की शुरुआत ऐसी हो, उसकी कुल हैसियत का अंदाज़ा आप आसानी से कर सकते हैं। इस दास्तान (तिलिस्म-ए-होशरुबा) में कम से कम हक़ीक़त-निगारी (यथार्थवाद) का गुज़र मुमकिन नहीं। यहाँ तो कल्पना की आज़ाद उड़ान ही भली मालूम हो सकती है और हक़ीक़त-निगारी की कमी के बावजूद भी इसमें दिलचस्पी मुमकिन है... इसका असर दूसरे गद्यकारों और शायरों पर बहुत गहरा पड़ा। यही हक़ीक़त इसकी अहमियत और इसके मुफ़ीद होने की काफ़ी दलील है।
(उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तानगोई, पृ. 50)
ब तिलिस्म-ए-होशरुबा महज़ एक दिलचस्प दास्तान नहीं, इसकी क़द्र-ओ-क़ीमत और उन कहानियों की क़द्र-ओ-क़ीमत में जिनसे बचपन में हम अपना दिल बहलाते हैं, कोई समानता नहीं। तिलिस्म-ए-होशरुबा में जो गहराई और अर्थपूर्णता है, वह उर्दू नॉवेलों या अफ़सानों में कहीं नहीं मिलती, (ऐज़न पृ. 55)
जीम तिलिस्म-ए-होशरुबा की दुनिया शेक्सपियर के ड्रामों की दुनिया से क़द्र-ओ-क़ीमत में बहुत कम है। दोनों में कोई मेल नहीं। लेकिन जहाँ तक इस नुक्ते (कि नेकी के पुतले और बदी के मुजस्समे उर्दू दास्तानों और उर्दू मर्सियों में अलग-अलग हैं... मंसूर) का ताल्लुक़ है। तिलिस्म-ए-होशरुबा का दर्जा मर्सियों से बुलंद है। मर्सिया कहने वाले की हैसियत तरफ़दार की है। वह एक जमात की ख़ूबियों को चमकाता है। इस जमात में किसी कमी का गुज़र मुमकिन नहीं। तिलिस्म-ए-होशरुबा में भी तरफ़दारी है लेकिन यह स्याही इस क़दर गहरी नहीं और यहाँ दूसरे रंगों की भी झलक नज़र आती है। (ऐज़न पृ. 56 से 57)
दूसरे रंग क्या हैं और कैसे हैं। इनको देखने के लिए किताब का पृ. 42 से 47 देखिए। यहाँ वही जुमले पेश किए गए जिनका फ़ारूक़ी के एतराज़ से ताल्लुक़ है और सच तो यह है कि कलीमुद्दीन अहमद ने अदब पारों (साहित्यिक रचनाओं) में दास्तान की अहमियत को दूसरे सभी आलोचकों से ज़्यादा समझा है। इसे अदब ही नहीं बड़ा अदब माना है। हम उनकी तुलना को क़ुबूल करें या न करें, लेकिन उन्होंने अपने तौर पर यह बताया है कि अदब की दुनिया में इन दास्तानों की जगह कहाँ है। उन्होंने अदब की दुनिया में उर्दू दास्तानों को शेक्सपियर के ड्रामों से कमतर और उर्दू नॉवेलों और उर्दू मर्सियों और उर्दू मसनवियों से बुलंद और बेहतर मुक़ाम पर दिखाया है। उन्होंने अपनी किताब का बाब (अध्याय) 13 उर्दू दास्तान और मसनवी सहर-उल-बयान व गुलज़ार-ए-नसीम के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि कहने को तो सहर-उल-बयान भी दास्तान है लेकिन दास्तानियत के लिहाज़ से बहुत पतली है।
इस सूरत में गुलज़ार-ए-नसीम तो वाक़ई क़ाबिल-ए-ज़िक्र ही नहीं ठहरती। लेकिन तन्क़ीदी ख़िदमत (आलोचनात्मक ज़िम्मेदारी) की मजबूरी के तहत ही ग़ालिबन कलीमुद्दीन अहमद ने इसकी सबसे बड़ी मानी जाने वाली ख़ूबी यानी इख़्तिसार और जामेइयत (संक्षेप और व्यापकता) को ज़ेर-ए-बहस लाया है। और इसके अशआर पेश करके उन्होंने कहा है कि ज़रा सी बात को नसीम ने अफ़साना कर दिया है। और लुत्फ़ यह है कि असर कुछ भी नहीं। यानी उर्दू दास्तानों के मुक़ाबले में नॉवेलों और अफ़सानों के बारे में वह पहले ही कह चुके हैं कि वे दास्तानों का बदल नहीं हैं और यहाँ नामवर मसनवी सहर-उल-बयान के बारे में कहा कि इसकी दास्तानियत बहुत पतली है तो अब उर्दू की कौन सी सिन्फ़ (विधा) ऐसा दम-ख़म रखती है कि इसके बलबूते पर वह दास्तान के मुक़ाबले में आ सकेगी। कलीमुद्दीन अहमद की तहरीरों से मेरी समझ तो यह है कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल, नज़्म, मर्सिया, मसनवी, क़सीदा, क़ितआ, रुबाई, नॉवेल, अफ़साना, ड्रामा वग़ैरह सब को उर्दू दास्तानों से कमतर समझा है। वह शे’र-ओ-अदब में जिस आपसी जुड़ाव, विकास, पूर्णता, मौज़ूनियत (संतुलन), तालमेल, कल्पना की उड़ान, मुशाहिदों (अवलोकनों) की कसरत, तजुर्बों की वुसअत (विस्तार) और बयान की फ़नकाराना क़ुदरत (महारत) को ढूँढते हैं, वह सब उनको सिर्फ़ उर्दू दास्तानों ही में और भरपूर मात्रा में मिलते हैं और यह कहकर कि,
दास्तानों का जो सरमाया उर्दू में मौजूद है, यह सरमाया किसी दूसरी ज़बान की दास्तानों के मुक़ाबले में बिना किसी झिझक के पेश किया जा सकता है और यह भी बिना झिझक कहा जा सकता है कि किसी दूसरी ज़बान के सरमाये (दास्तान) के मुक़ाबले में कम नहीं। (उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तान गोई पृ. 4-203)
वह उर्दू दास्तानों का बाक़ायदा मुक़ाम भी तय कर देते हैं। अब और क्या चाहिए?
नॉवेल और दास्तान के फ़र्क़ के सिलसिले में फ़ारूक़ी कहते हैं कि,
अव्वल तो यह कि नॉवेल तहरीरी बयानिया (लिखित आख्यान) है और दास्तान ज़बानी बयानिया है। दूसरी बात यह कि दास्तान अपने मिज़ाज के एतबार से क़ब्ल-अज़-जदीद (Pre Modern) सिन्फ़-ए-सुख़न (साहित्यिक विधा) है। इसके पीछे जो तसव्वुर-ए-कायनात (ब्रह्मांड की अवधारणा) काम कर रहा है, वह नॉवेल के पीछे काम करने वाले तसव्वुर-ए-कायनात से बिल्कुल अलग होता है। ज़बानी पन की वजह से दास्तान के ज़वाबित-ए-बयान यानी Narrative Principles नॉवेल से बहुत अलग होते हैं। चूँकि नॉवेल और दास्तान दोनों ही बयानिया हैं। इसलिए इनकी शेरियात (काव्यशास्त्र) में कुछ बातें मुश्तरक (समान) ज़रूर हैं लेकिन इस साझापन की नौइयत (प्रकृति) ऐसी हरगिज़ नहीं कि इसकी बिना पर दास्तान और नॉवेल में कोई नामियाती ताल्लुक़ (जैविक संबंध) माना जाए।
कलीमुद्दीन अहमद साहब इन बुनियादी बातों को नज़रअंदाज़ करते हैं। उनकी किताब उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तान गोई के पहले दो अध्यायों के उनवान (शीर्षक) हैं: दास्तान क्या है और दास्तान की तकनीक। इस पूरी बहस को बीस-इक्कीस सफ़हों में निपटा दिया गया है। और पूरी गुफ़्तगू में इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं कि दास्तान ज़बानी बयानिया होती है और न इस बात का ज़िक्र है कि दास्तान का उसूल-ए-हक़ीक़त (यथार्थ का सिद्धांत), वाक़ेइयत (यथार्थवाद) (या नॉवेल निगारी) के उसूल-ए-हक़ीक़त से बिल्कुल अलग होता है। कलीमुद्दीन अहमद साहब का ज़ेहन इस बात को तस्लीम करने (तस्लीम करना क्या, इसका सामना भी करने) पर तैयार नहीं कि वह मत्न (पाठ) जिसमें हेनरी जेम्स के नॉवेल जैसी तथाकथित वाक़ेइयत न हो और जिसमें अक़्ल को हैरान करने वाली (हैरतअंगेज़) बातें बयान की गई हों, वह संजीदा और मतीन (गंभीर) और वक़ीअ (अहम) भी हो सकता है। (स. श. पृ. 1, पृ. 512)
फ़ारूक़ी तशरीही (व्याख्यात्मक) अंदाज़ में अपनी बातें रखते हैं। कलीमुद्दीन अहमद बात को फैलाकर बयान नहीं करते। इजमाली (संक्षिप्त) या तफ़सीली गुफ़्तगू करना अपने आप में ऐब और हुनर की बात नहीं है। यह तो तर्ज़-ए-बयान है। कुछ लोग वज़ाहती (विस्तृत) अंदाज़ इख़्तियार करते हैं और कुछ लोग इख़्तिसार (संक्षेप) में काम की ज़रूरी बातें बयान कर देते हैं। इसलिए देखना यह चाहिए कि मौज़ू से मुताल्लिक़ बातें बयान में आईं या नहीं। दास्तान क्या है? और दास्तान की तकनीक को कलीमुद्दीन अहमद ने बीस-इक्कीस सफ़हों में जो निपटा दिया है तो क्या ज़रूरी बातें नहीं आईं? इक़्तिबासात (उद्धरण) देना अब ज़रूरी नहीं, लेकिन उन्होंने भी कहा है कि दास्तान कहने का फ़न है और दास्तान की सिन्फ़ अब ज़िंदा नहीं। फ़ारूक़ी ज़बानी बयानिया और क़ब्ल-अज़-जदीद सिन्फ़ की इस्तेलाह (पारिभाषिक शब्द) इस्तेमाल करते हैं। ये बातें कहने का फ़न और दास्तान की सिन्फ़ अब ज़िंदा नहीं से अलग नहीं हैं। फ़ारूक़ी दास्तान के ज़वाबित-ए-बयान का ज़िक्र करते हैं। कलीमुद्दीन अहमद ने भी एक अदीब के हवाले से दास्तान के ज़वाबित-ए-बयान नक़्ल किए हैं। मसलन अव्वल, मतलब मुतव्वल (विस्तृत) और ख़ुशनुमा हो। दोम, ख़ुश-तरकीब मुद्दआ और दिलचस्प मतलब के सिवा कोई ऐसा मज़मून जो कानों को बुरा लगे (सामेआ-ख़राश) और मज़ाक़िया (हज़्ल) हो, दर्ज न किया जाए। सोम, ज़बान की लताफ़त और बयान की फ़साहत। चहारुम, इबारत ऐसी हो जो जल्दी समझ में आ जाए (सरी-उल-फ़हम)। पंजुम, क़िस्से की तमहीद (भूमिका) में गुज़रे हुए इतिहास (तवारीख़-ए-गुज़िश्ता) का लुत्फ़ हो। (पृ. 28 से 29) और अपना तब्सिरा यह पेश किया है कि,
इन जुमलों से ज़ाहिर है कि दास्तान गोई एक दिलचस्प मशग़ला होने के साथ फ़न्नी हैसियत भी रखती थी और हर कोई (हर कस-ओ-नाकस) दास्तान गो नहीं हो सकता था। (पृ. 29)
तो फ़ारूक़ी कौन सी नई बात कह रहे हैं?
मेरे नज़दीक फ़ारूक़ी की नई बात यह है कि उन्होंने कलीमुद्दीन अहमद पर यह तोहमत रखी है कि कलीमुद्दीन साहब अक़्ल को हैरान करने वाली (हैरतअंगेज़) बातों को संजीदा, मतीन (गंभीर) और वक़ीअ (अहम) नहीं समझते। वाक़िया यह है कि कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तानों की हैरतअंगेज़ बातों की जैसी मंतक़ी तावील (तार्किक व्याख्या) की है, वह दास्तान की संजीदगी, मतानत (गंभीरता) और वक़अत (अहमियत) को ख़ासी बढ़ाने वाली है। चंद जुमले देखिए,
ये रुकावटें अक्सर किसी अलौकिक हस्ती के दखल से पैदा होती हैं। और सच तो यह है कि दास्तान में इस किस्म के तत्व का दबदबा नज़र आता है... इसकी एक वजह तो यह है कि इन चीज़ों में पहले लोगों को यक़ीन था। लोग समझते थे कि ख़ुदा ने इस दुनिया और इस दुनिया के रहने वालों के अलावा कोई दूसरी दुनिया भी पैदा की है और इस दूसरी दुनिया में ऐसी हस्तियां बसती हैं जो हमें नज़र नहीं आतीं लेकिन जो अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ हमारे सामने ज़ाहिर भी हो सकती हैं। और हमारे मामलों में दखलंदाज़ी भी कर सकती हैं... इसके अलावा यह दूसरी दुनिया और इसके निवासी सुनने वालों या पढ़ने वालों की जिज्ञासा को भड़काते हैं और उनकी कल्पना पर चाबुक का काम करते हैं और साथ-साथ दास्तान में रंगीनी, पेचीदगी, विविधता और दिलचस्पी का भी इज़ाफ़ा होता है।
फिर जब हम इन जिन्नों, देवों, परियों को इंसान की तरह बोलते-चालते, हंसते-रोते, मुहब्बत और नफ़रत करते, हमदर्दी और दया या क्रोध और ग़ुस्से की भावनाओं से प्रभावित देखते हैं तो हमें एक तरह का इत्मीनान होता है और हम अपनी भावनाओं और विचारों पर ज़्यादा भरोसा महसूस करने लगते हैं... कहने का मतलब यह है कि इस ख़ास तत्व की वजह से दास्तानों को सिरे से नज़रअंदाज़ कर देना अक़्लमंदी से दूर है... जिन्न, देव, परी सामने आएं तो आने दीजिए और देखिए कि वे क्या करते हैं। वे इंसान से मिलते-जुलते हैं। कभी दास्तान में रुकावटें पैदा करते हैं तो कभी मुश्किलों को आसान कर देते हैं... ग़रज़ यह सब चीज़ें इस्तेमाल होती हैं और इनसे तरह-तरह का काम लिया जाता है। कभी इनकी वजह से दास्तान में गुत्थियां पड़ जाती हैं तो फिर इन्हीं की मदद से सुलझ भी जाती हैं। जब दास्तानगो को मुश्किल पेश आती है तो वह स्वाभाविक तरीक़ों के बदले इन अस्वाभाविक या अप्रत्याशित और समझ से परे तरीक़ों से काम लेता है और उसे इनसे काम लेने का हक़ हासिल है। (पृष्ठ, 26 से 28)
फ़ारूक़ी कहते हैं कि,
कलीम उद्दीन अहमद साहब इस बात को भी भूल जाते हैं कि 'हक़ीक़तनिगारी' (यथार्थवाद) हो या 'सामाजिक हक़ीक़तनिगारी', ये बयानिया (आख्यान) की शैलियां हैं। सारा का सारा बयानिया नहीं हैं। और जिस तरह 'हक़ीक़तनिगारी' एक शैली है, उसी तरह असाधारण और अलौकिक को बुनियाद बनाना भी बयानिया की एक शैली है। वे दास्तान के वजूद में आने की मनोवैज्ञानिक व्याख्या करते हैं। उनका कहना है,
सभ्य इंसान भी बच्चों और असभ्यों की तरह क़िस्से-कहानी का शौक़ीन है। यानी इंसान सभ्यता की सीढ़ियों पर पहुंचकर भी कहानियों को फ़ुज़ूल और बेमतलब नहीं ख़याल करता बल्कि उनका स्वरूप बदलकर अपनी सभ्य ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करता है। बहरहाल, किसी बच्चे और असभ्य में यह समानता है कि दोनों कहानियों को पसंद करते हैं और उन्हें तर्क और आलोचना के तराज़ू पर नहीं तौलते... जब बच्चे का दिमाग़ तरक़्क़ी के चरण तय करता है, जब असभ्य सभ्यता की मंज़िलों से गुज़रता है तो वह इन कहानियों में एक कमी महसूस करता है... और वह दूसरी विधाएं ईजाद करता है और अपनाता है। जिनसे उसकी नई प्यास की तृप्ति होती है।
कलीम उद्दीन अहमद के उपरोक्त उद्धरण के बारे में कहना पड़ता है कि 'मुरब्बियाना' (संरक्षक जैसी), अतार्किक और सुविधाभोगी सोच की इससे बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है। इस पूरे उद्धरण का विश्लेषण बात को लंबा खींचने का कारण होगा। सिर्फ़ चंद बुनियादी और सामने की बातों पर ग़ौर करें। (स श पृ. 1, पृ. 513)
अगर फ़ारूक़ी पूरे उद्धरण का विश्लेषण करते तो पता नहीं क्या करते। सिर्फ़ सामने की बातों पर ग़ौर करने में वे पांच पन्नों में सात नुक्ते (बिंदु) बयान करते हैं और बाल की खाल निकालते हैं। मगर गंभीर आलोचनात्मक विमर्श के लिए चिंताजनक बात यह है कि वे कलीम उद्दीन अहमद के आशय पर झूठा आरोप लगाते हैं। अगर मैं भी इन सब बातों को मिसालों के साथ पेश करने लगूं तो वाक़ई बात लंबी हो जाएगी। इसलिए सिर्फ़ एक बात की मिसाल दूंगा जो कलीम उद्दीन अहमद के विचार से बिल्कुल अलग है।
कलीम उद्दीन अहमद ने ख़ुदा की क़सम यह बात इस उद्धरण में या कहीं भी, हरगिज़ नहीं कही है कि बच्चा/असभ्य जब कहानियों से असंतोष महसूस करता है तो नई साहित्यिक विधाएं ईजाद करता है और अपनाता है। (फ़ारूक़ी का चौथा नुक्ता। स श पृ. 1, पृ. 516) उन्होंने तो यह कहा है कि जब असभ्य सभ्यता की मंज़िलों से गुज़रता है तो वह इन कहानियों में एक कमी महसूस करता है... और वह दूसरी विधाएं ईजाद करता है और अपनाता है... असभ्य के सभ्यता की मंज़िलों से गुज़रने का मतलब यह हुआ कि वह असभ्य न रहा। सभ्य हो गया। यानी सभ्य इंसान नई साहित्यिक विधाएं ईजाद करता है और अपनाता है। ज़ाहिर है कि कलीम उद्दीन अहमद के वाक्य का कर्ता बच्चा/असभ्य नहीं है बल्कि सभ्य इंसान है। लेकिन फ़ारूक़ी ने चालाकी से कर्ता बदलकर इसको कलीम उद्दीन अहमद के मत्थे मढ़ दिया। क्या ही बुरा किया।
फ़ारूक़ी जब दूसरों पर आलोचना करते हैं तो मुरब्बियाना का लफ़्ज़ भी आमतौर पर इस्तेमाल कर ही देते हैं। पता नहीं, इस लफ़्ज़ से उनका क्या मतलब होता है। मैंने नए सिरे से शब्दकोश देखे लेकिन मुझे यहां मुरब्बियाना के इस्तेमाल का औचित्य नज़र न आया और न यह बात समझ में आई कि आलोचनात्मक लिहाज़ से इस लफ़्ज़ के नकारात्मक अर्थ क्या हैं। अब रही बात कलीम उद्दीन अहमद की अतार्किक और सुविधाभोगी सोच की, तो मुझे कलीम उद्दीन अहमद के उपरोक्त उद्धरण में अतार्किकता और सुविधाभोग नहीं मिला। कलीम उद्दीन अहमद ने बच्चे के बारे में लिखा है कि,
जैसे वह कहानियों को वास्तविकता और हक़ीक़त की रोशनी में नहीं देखता, उसी तरह वह उन्हें सौंदर्यशास्त्र और कला की कसौटी पर नहीं जांचता, ... वह उनके रूप में सौंदर्य, संतुलन, क्रम और विकास की तार्किक शुद्धता से सरोकार नहीं रखता। इसलिए इन कहानियों में हक़ीक़त और कलात्मक सौंदर्य का वजूद आमतौर पर नहीं होता।
इस उद्धरण को नक़ल करके फ़ारूक़ी बिल्कुल अप्रासंगिक बातें करते हैं और कलीम उद्दीन अहमद के स्पष्ट उद्देश्य को छोड़ देते हैं। कलीम उद्दीन अहमद ने बच्चों के लिए कहानी में दिलचस्पी के तत्व पर जो ज़ोर दिया है कि बच्चा सिर्फ़ दिलचस्पी से वास्ता रखता है, कला के आलोचनात्मक पैमाने से नहीं। इस बात को फ़ारूक़ी पता नहीं क्यों नज़रअंदाज़ कर देते हैं। और ख़्वाह-मख़्वाह कलात्मक सौंदर्य और वास्तविकता के बारे में कलीम उद्दीन अहमद को सुविधाभोगी कहते हैं। बच्चों की कहानियों को दरकिनार करें, और दास्तान-ए-अमीर हमज़ा कोई बच्चों की कहानी नहीं है, दास्तानगोई की कला के बारे में कलीम उद्दीन अहमद ने अपनी किताब में जो कुछ विचार व्यक्त किए हैं, उसमें से किसी हिस्से को अतार्किक और सुविधाभोगी सोच की मिसाल नहीं समझा जा सकता। फ़ारूक़ी एक और ज़ुल्म यह ढाते हैं कि हक़ीक़तनिगारी और सामाजिक हक़ीक़तनिगारी के मुक़ाबले में असाधारण और अलौकिक को खड़ा करके बातचीत इस तरह करते हैं जैसे कलीम उद्दीन ने बाद वाले को बयानिया की शैली मानने से इनकार कर दिया है या अगर इसको स्वीकार किया है तो सिर्फ़ बच्चों और असभ्यों के लिए किया है। सभ्य इंसानों के लिए नहीं किया है और उनके लिए नॉवेल के लिखित बयानिया को ख़ास कर दिया है जो उनकी नज़र में अलौकिक बयानिया का विकसित रूप है। ये सारी बातें फ़ारूक़ी के दिमाग़ की उपज हैं। इनका कलीम उद्दीन अहमद से कोई ताल्लुक़ नहीं।
फ़ारूक़ी ने कलीम उद्दीन अहमद की किताब के पृष्ठ 75 से ये वाक्य उद्धृत किए हैं,
(यह एक जानी-मानी बात है कि) अदब में घटनाओं और वास्तविक लोगों का बयान नहीं होता... वह ड्रामा हो या नॉवेल या अफ़साना, उसमें काल्पनिक घटनाओं और काल्पनिक किरदारों का प्रदर्शन होता है।
और यह टिप्पणी की है,
मालूम नहीं क्यों वह यहाँ दास्तान का ज़िक्र करना भूल गए (बल्कि कहना चाहिए कि वजह ज़ाहिर है। अगर वह यह फ़ैसला दास्तान के बारे में लगाते तो फिर दास्तान को 'बच्चों/असभ्यों' की चीज़ बताने के बजाय नॉवेल के बराबर कहीं जगह देनी पड़ती) (स श स. 1, पृ. 523)
यह सरासर इल्ज़ाम है कि कलीमुद्दीन ने दास्तान को बच्चों/असभ्यों की चीज़ बताया है। बल्कि वाक़िया यह है कि उन्होंने बच्चों/असभ्यों के क़िस्से-कहानियों से दास्तान को अलग और विशिष्ट रखा है और दास्तान को नॉवेल के बराबर नहीं बल्कि उसके ऊपर जगह दी है। वह बात जो फ़ारूक़ी ने टिप्पणी के ब्रैकेट में लिखी है, बहुत ज़्यादा गुमराह करने वाली है। और जो पहला जुमला है वह भी नेक नीयती से नहीं है। क्योंकि कलीमुद्दीन अहमद के जुमले में दास्तान के ज़िक्र का मौक़ा ही न था।
मुझे सख़्त हैरत है कि बड़े नक़्क़ादों (आलोचकों) को कभी-कभी क्या हो जाता है। वे क्यों इतनी उल्टी-सीधी बातें करने लगते हैं। क्या यह रवैया भी उनके बड़े नक़्क़ाद होने की कोई ग़ैर-शऊरी (अचेतन) निशानी है? कलीमुद्दीन अहमद ने लिखा था कि,
दास्तानगोई एक फ़न (कला) है और अपनी... सीमाओं और कमियों के बावजूद एक दिलचस्प फ़न है।
इस ख़याल को नक़ल करके फ़ारूक़ी टिप्पणी करते हैं:
यानी वे (कलीमुद्दीन अहमद) दास्तान से बतौर अदबी मतन (साहित्यिक पाठ) कोई सरोकार नहीं रखते और उनके ख़याल में दास्तानगोई अगरचे एक दिलचस्प फ़न है लेकिन इसमें सीमाएँ और कमियाँ भी हैं। (स श स. 1, पृ. 520)
इस टिप्पणी के कोई मायने नहीं निकलते। क्योंकि कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान की परख अदबी मतन की हैसियत से ही तो की है और इसमें उनको कुछ सीमाएँ और कमियाँ नज़र आई हैं।
कलीमुद्दीन अहमद ने यह वज़ाहत (स्पष्ट) कर दी है कि वे सीमाएँ और कमियाँ किस तरह की हैं। अगर इख़्तिलाफ़ (मतभेद) था तो यह बताना था कि वे सीमाएँ और कमियाँ नहीं हैं। हालाँकि फ़ारूक़ी ने ख़ुद भी दास्तान में कमियाँ निकाली हैं। वे कहते हैं,
दास्तान में शायरी बहुत है और तरह-तरह की है। कुछ दास्तानों में ग़ैर-ज़रूरी और लंबी-चौड़ी ग़ज़लों की भरमार है। अहमद हुसैन क़मर की बयान की गई दास्तानों में यह बात ऐब (दोष) की हद तक पहुँच गई है।
(स श स. 3, पृ. 339)
इसी तरह अश्लीलता से भरे मज़ाक़ के बारे में फ़ारूक़ी ने ख़ुद इस तरह के ख़यालात ज़ाहिर किए हैं: नागवार जिंसी (यौन) अंदाज़, नागवार जिंसी बयान, मज़ाक़ के बजाय घिनौनापन, बेहद नागवार तहरीर। ज़ाहिर है कि यह भी अदबी तहरीर का नुक़्स (कमी) ही है। यह बिल्कुल मुमकिन है कि किसी नक़्क़ाद को कला के किसी नमूने में कुछ नुक़्स नज़र आए। किसी को कुछ और नुक़्स नज़र आए। किसी को इन्हीं में हुस्न (ख़ूबसूरती) दिखाई दे। यह आलोचना के उसूल और देखने के नज़रिए, दोनों पर निर्भर है। दास्तान भी इंसान की बनाई हुई है और तमाम इंसानी बयानों और कारीगरी की तरह इसमें भी कमियाँ हो सकती हैं। इसलिए इस बात को तूल देने की ज़रूरत क्या है?
फ़ारूक़ी ने कलीमुद्दीन अहमद का क़ौल (कथन) नक़ल किया है,
दास्तान को हक़ीक़त के मेयार (पैमाने) से जाँचना ग़लत है।
और इस पर यह टिप्पणी की है,
सच तो यह है कि यह कोई कहने की बात न थी। (स श स. 1, पृ. 521)
पहली बात तो यह कि कलीमुद्दीन अहमद का असल जुमला यह है,
अगर यह बात तस्लीम कर ली जाए और इससे इंकार मुमकिन नहीं कि 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' ख़्वाब की दुनिया है। इसमें ख़याली ज़िंदगी, ख़्वाब की ज़िंदगी की तस्वीरकशी (चित्रण) है तो फिर इसे वाक़इयत (यथार्थ) और हक़ीक़त के मेयार से जाँचना ग़लत है। (... फ़न-ए-दास्तानगोई. पृ. 39)
दूसरी बात यह कि अगर यही बात कहने की नहीं तो फिर हक़ीक़त के मेयार से दास्तान पर जितने एतराज़ किए गए हैं, उनका जवाब किस तरह सामने आएगा। और क्या ख़ामोशी उनको क़ुबूल करने के बराबर न होगी? हक़ीक़त यह है कि कलीमुद्दीन अहमद ने दास्तान की हिमायत में एक ऐसी बात कह दी है जो उनके आलोचना के उसूलों से अलग है। वे तनक़ीद (आलोचना) अपने ज़माने के नए मेयार से करते हैं। लेकिन दास्तान को वे हक़ीक़तनिगारी (यथार्थवाद) के नए उसूल और मेयार से नहीं बल्कि उसके अपने रचनात्मक तत्वों (अनासिर-ए-तरकीबी) के मेयार से जाँचते हैं। ख़ुद अपने उसूल से हटकर एक बात कहनी थी तो ज़ाहिर है कि वह ख़ास तौर पर कहने की थी। ऐसा कहकर उन्होंने अपने लिए ख़तरा मोल लिया है। हम कह सकते हैं कि तज़किरों की तनक़ीद को भी पुराने ही आलोचना के उसूलों से सराहना चाहिए था। दास्तान के सिलसिले में ऐसी बात कहकर उन्होंने यह संकेत तो ज़रूर दिया है कि पुरानी विधाओं (असनाफ़) की जाँच-परख पुराने अदबी नज़रियों की रोशनी में की जा सकती है।
आपने कलीमुद्दीन अहमद के ऊपर दिए गए जुमले में देखा कि वे तिलिस्म-ए-होशरुबा को ख़्वाब की दुनिया कहते हैं लेकिन फ़ारूक़ी ने फेरबदल (तहरीफ़) करके यह जुमला नक़ल किया है: दास्तान की दुनिया ख़्वाब की दुनिया है। और इसका खंडन यूँ किया है,
यह बात क़तई साफ़ है कि दास्तान की दुनिया ख़्वाब की तरह मुबहम (अस्पष्ट), नामुकम्मल, अलामती (प्रतीकात्मक) और धुँधली नहीं होती। यहाँ हर चीज़ शफ़्फ़ाफ़ (पारदर्शी) है।
(स श स. 1, पृ. 521)
पहले तो कलीमुद्दीन अहमद के ख़याल का संदर्भ (महल) मुलाहज़ा कीजिए। उन्होंने अपने पहले मज़मून दास्तान क्या है में किताब के पृष्ठ 16 पर एक जुमला लिखा है,
दास्तान गोया एक क़िस्म की ख़्वाब-आवर (नींद लाने वाली) दवा थी।
और पृष्ठ 17 पर लिखा है कि,
आजकल 'सिनेमाबाज़ी' का शौक़ 'बटेरबाज़ी' का दूसरा रूप है। जब हम रोज़ाना के काम से थक जाते हैं तो सिनेमा चले जाते हैं और वहाँ की दिलचस्पियों में अपनी जिस्मानी थकन, परेशानियों, उलझनों, मुश्किलों को वक़्ती तौर पर भूल जाते हैं और गोया किसी दूसरी ख़्वाब-आवर दुनिया में पहुँच जाते हैं।
पृष्ठ 16 और 17 के इन जुमलों का पस-मंज़र (पृष्ठभूमि) यह है कि बादशाहों और अमीरों की सुस्ती और ऐश-परस्ती का यह आलम था कि वे सोने से पहले कोई दिलचस्प दास्तान सुनते थे और सुनते-सुनते सो जाते थे। यानी दास्तान गोया एक क़िस्म की ख़्वाब-आवर दवा थी जो उन्हें आसानी से नींद की दुनिया में पहुँचा देती थी। (16) फिर यह बात भी है कि दास्तान सुनना एक दिलचस्प मश्ग़ला (शौक़) भी था, हर आदमी को मनोरंजन (तफ़रीह) चाहिए। अपनी जिस्मानी थकन और ज़ेहनी उलझन को मनोरंजन से दूर करने का चलन पुराना है। इस तरह हम कड़वी सच्चाइयों से भरी हुई अपनी दुनिया से निकल कर किसी दूसरी ख़्वाब-आवर दुनिया में पहुँच जाते हैं। इन मायनों में दास्तान एक ख़्वाब-आवर दवा और ख़्वाब-आवर दुनिया रही है। मुबहम (अस्पष्ट), नामुकम्मल, अलामती (प्रतीकात्मक) और धुँधली के मायनों में दास्तान को ख़्वाब-आवर दवा या दुनिया नहीं कहा गया है। अब रही बात तिलिस्म-ए-होशरुबा की ख़्वाबों की दुनिया की, तो कलीमुद्दीन अहमद ने वाज़ेह (स्पष्ट) किया है कि,
जब हम इस दास्तान को पढ़ते हैं तो अपने को किसी दूसरी दुनिया में पाते हैं (पृ. 33) ... शुरू में अचंभा तो ज़रूर होता है लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता हमारी हैरत मिटने लगती है और हम मुख़्तलिफ़ चीज़ों को पहचानने लगते हैं, गोया कभी पहले, सैकड़ों बरस पहले रूह इस दुनिया में बसती थी या कभी उसने इस मुल्क की सैर की थी लेकिन उसे मुद्दत हुई और ज़माने की रफ़्तार और वक़्त की उड़ान ने जाने-पहचाने निशानों (नुक़ूश) को दिल से भुला दिया था। मगर ये निशान एकदम मिटने न पाए थे, याददाश्त में महफ़ूज़ थे और फिर उभर आए। या ऐसी कैफ़ियत होती है जैसे किसी ने कोई दिलचस्प ख़्वाब देखा हो और यकायक वह ख़्वाब हक़ीक़त में बदल गया हो और उसकी जागी हुई आँखों के सामने खड़ा मुस्कुरा रहा हो।
आमतौर पर इसे दास्तान का सबसे अहम ऐब (दोष) माना जाता है कि इसमें एक खयाली दुनिया की रचना होती है, ऐसी दुनिया जो इंसानी दुनिया से बिलकुल अलग है, जिसमें ज़ाहिर तौर पर असलियत को पीछे छोड़ दिया जाता है। (पृष्ठ 34)
अगर मैं उन तमाम जुमलों को नक़ल करूँ जिनमें ख्वाब की दुनिया या ख्वाब की ज़िंदगी या खयाली ज़िंदगी जैसे शब्द इस्तेमाल हुए हैं तो उद्धरण बहुत लंबा हो जाएगा। इसकी ज़रूरत नहीं। ऊपर दिए गए जुमलों ही से साफ़ ज़ाहिर है कि कलीमुद्दीन अहमद ने ख्वाब की दुनिया का मतलब अस्पष्ट, अधूरी, प्रतीकात्मक और धुंधली (दुनिया) लिया ही नहीं है। अल्लाह ताला फ़ारूक़ी पर रहम करे! क्या सोच कर उन्होंने यह बात लिख दी?
कलीमुद्दीन अहमद ने अपनी किताब के चौथे मज़मून में जो अमीर हमज़ा और किंग आर्थर की तुलना पर आधारित है, ख्वाब की बात फिर की है। उन्होंने आर्थर के एक अजीब-ओ-ग़रीब ख्वाब का विस्तार से ज़िक्र करते हुए कहा है कि,
दास्तान किंग आर्थर इसी ख्वाब की व्याख्या और स्पष्टीकरण है। यह ख्वाब हैरतअंगेज़ और अविश्वसनीय है। इस ख्वाब में चमकीले रंग हैं और रंगीन चमक है। ऐसी चमक, ऐसे रंग जो इस दुनिया में उपलब्ध नहीं... अगर कोई शख़्स हमसे कहे कि उसने अपनी जागती आँखों से ये खौफ़नाक शक्लें देखी हैं तो हम कभी मान नहीं सकते। लेकिन ख्वाब में सभी कुछ मुमकिन है। ख्वाब की दुनिया में कोई चीज़ नामुमकिन नहीं और जब ख्वाब देखते हैं तो हमें हर चीज़ सच्ची, मामूली और स्वाभाविक मालूम होती है। संभव और असंभव के बीच यहाँ फ़र्क करना मुमकिन नहीं। उनके बीच कोई खाई मौजूद नहीं। 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' का भी यही हाल है। इसमें भी यही रंग, यही चमक, यही सच्चाई है। (पृष्ठ 54)
इन जुमलों से तो यह बात ज़ाहिर है कि 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' की दुनिया ज़्यादा से ज़्यादा संभावनाओं की दुनिया है, खासकर हौसलामंद, बहादुर और बुद्धिमान इंसान के लिए तो जहाँ चाह वहीं राह है। कहीं कोई रुकावट नहीं। कुछ भी नामुमकिन नहीं। कलीमुद्दीन अहमद ने 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' को अस्पष्ट, अधूरी वगैरह ख्वाब के अर्थ में ख्वाब की दुनिया नहीं कहा है बल्कि कल्पना और संतुष्टि के स्तर पर गुज़रने वाली रंग-बिरंगी, विशाल, सुलभ और सुंदर व आनंददायक ज़िंदगी के अर्थ में कहा है।
आलोचनात्मक ज़िम्मेदारी के तहत यह कहना पड़ता है कि दास्तान के सिलसिले में कलीमुद्दीन अहमद की परख पर फ़ारूक़ी की आलोचना उलझनों और ग़लतफ़हमियों से भरी हुई है। आलोचनात्मक मतभेद एक अलग बात है लेकिन किसी के खयाल को Twist (तोड़-मरोड़) करके पेश करना और जो बात उसने नहीं कही है वह उससे जोड़ देना और फिर उन सबका खंडन करना किसी तरह भी आलोचना की कला को शोभा नहीं देता। फ़ारूक़ी की इस किताब को राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, मानव संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। उसे चाहिए कि जब इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित करे तो फ़ारूक़ी से सख़्त पुनरीक्षण (नज़रसानी) करवाए और उन बिंदुओं की निशानदेही कर दे जिनका पुनरीक्षण ज़रूरी है। या फिर पहली जिल्द के ग्यारहवें अध्याय जिसका शीर्षक दास्तान के आलोचक है, उससे वह पूरा हिस्सा जो कलीमुद्दीन अहमद से संबंधित है, निकाल दे। वरना पाठकों को वास्तविक स्थिति का भी ज्ञान न होगा और वे गुमराही के शिकार बने रहेंगे। इन बातों के साथ मेरी गुज़ारिश यह है कि राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद नई दिल्ली प्रोफ़ेसर कलीमुद्दीन अहमद की इस छोटी सी किताब को जिसका नाम उर्दू ज़बान और फ़न-ए-दास्तानगोई है, अपने खर्च से जल्द प्रकाशित करे तभी कुछ भरपाई हो सकती है।
इसमें शक नहीं कि उर्दू दास्तान पर फ़ारूक़ी ने इन तीन जिल्दों में बहुत विस्तार से लिखा है। और मैं उनका परिचय करा चुका हूँ और यह भी कह चुका हूँ कि अगर चौथी जिल्द आ गई तो यक़ीन है कि वह आलोचनात्मक मूल्य के निर्धारण के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा ठोस होगी। इसका मतलब यह है कि इन जिल्दों की ज़्यादातर बहसें जानकारी उपलब्ध कराने यानी अनुसंधानात्मक लिहाज़ से मूल्य रखती हैं, आलोचनात्मक लिहाज़ से नहीं। पहली जिल्द जिसमें सैद्धांतिक चर्चाएँ हैं, ज़ाहिर तौर पर आलोचना के अंतर्गत आने वाली चीज़ें पेश करती है। लेकिन मूल रूप से वह दास्तान की आलोचना नहीं, दास्तान की व्याख्या है ताकि दास्तान का नया पाठक दास्तान के गठन और रचना में काम आने वाली कार्यप्रणालियों और नियमों व सिद्धांतों को ठीक से समझ सके। मौजूदा पीढ़ी के लिए दास्तान एक छिपा हुआ रहस्य है। फ़ारूक़ी ने तीन जिल्दों में इसको इस तरह खोल दिया है कि अब हम इसके तक़रीबन तमाम मूल तत्वों से वाक़िफ़ हो गए हैं। दास्तान पर आधुनिक चर्चा में फ़ारूक़ी का यही कारनामा है और यह कुछ कम अहम नहीं है। वरना विशुद्ध साहित्यिक आलोचना के लिहाज़ से फ़ारूक़ी कलीमुद्दीन अहमद के मक़ाम तक नहीं पहुँचते।
उन्होंने तीन जिल्दों में लगभग बारह सौ पृष्ठ लिखे हैं जबकि कलीमुद्दीन अहमद ने छोटे आकार की एक किताब सिर्फ़ 208 पृष्ठ की लिखी है और वह भी बड़े अक्षरों की लिखावट में है। अगर इसको कंप्यूटर पर छोटे फ़ॉन्ट में छापा जाए तो शायद डेढ़ सौ पृष्ठों में पूरी किताब आ जाएगी। लेकिन कलीमुद्दीन अहमद ने इस छोटी सी किताब में दास्तान क्या है, दास्तान की तकनीक, तिलिस्म-ए-होशरुबा की अजनबी दुनिया, अमीर हमज़ा और किंग आर्थर की तुलना, तिलिस्म-ए-होशरुबा और हुकूमत का खुफ़िया विभाग, तिलिस्म-ए-होशरुबा और जादूगरी, तिलिस्म-ए-होशरुबा और लखनऊ का स्थानीय रंग, तिलिस्म-ए-होशरुबा के दोष, बोस्ताँ-ए-खयाल की विशेषता, दास्तान और हास्य, दास्तान और कामुकता, दास्तान और कल्पना, दास्तान और साहित्यिक रुचि, दास्तान और अरबी-फ़ारसी अल्फ़ाज़, दास्तान और उर्दू गद्य, बाग़-ओ-बहार, आरायश-ए-महफ़िल और फ़साना-ए-अजायब, दास्तान और समय व स्थान की दूरी, दास्तान और मसनवी (सहर-उल-बयान और गुलज़ार-ए-नसीम), और दास्तान का भविष्य जैसे विषयों पर संक्षेप में तमाम ज़रूरी चर्चाएँ पेश कर दी हैं।
मज़मून के इस तीसरे हिस्से की शुरुआत में आपने देखा था कि फ़ारूक़ी ने दास्तान की आलोचना के सिलसिले में चार बिंदु पेश करके लिखा था कि वे चार बिंदु दास्तान की आलोचना में चर्चा का विषय नहीं बने हैं। उनके वे बिंदु यह हैं,
(1) दास्तान एक नई तरह की दुनिया रचती है। (2) दास्तान एक असाधारण कल्पनाशील कार्य है। (3) दास्तान अमीर हमज़ा मौखिक आख्यान का एक समृद्ध खज़ाना है। (4) दास्तान अमीर हमज़ा हिंद-इस्लामी ब्रह्मांड की अवधारणा का भी समृद्ध खज़ाना है। वास्तविक स्थिति यह है कि पहले और दूसरे बिंदु को दास्तान के तक़रीबन तमाम आलोचक चिह्नित करते रहे हैं। और कलीमुद्दीन अहमद ने तो इनको ख़ास स्पष्टीकरण के साथ पेश किया है। तिलिस्म-ए-होशरुबा पर उन्होंने छह हिस्सों में लिखा है। उनको आप पढ़ जाइए। चूँकि उन्होंने शीर्षक नहीं दिए हैं, इसलिए मैं इन हिस्सों को पढ़ने को कह रहा हूँ। सब छोटे-छोटे अध्याय हैं और आपका ज़्यादा वक़्त न लगेगा। इनको पढ़ जाइए और देखिए कि इनमें दास्तान की नई दुनिया और दास्तान की कल्पना पर क्या कुछ नहीं कहा गया है।
मैंने इस लेख में जो उद्धरण दिए हैं, वही इस बात के सुबूत हैं। अलबत्ता ज़बानी बयानिया (मौखिक आख्यान) वाला तीसरा नुक़्ता कलीमुद्दीन अहमद ने उस विस्तार से पेश नहीं किया है जिस विस्तार से फ़ारूक़ी ने पेश किया है। लेकिन ऐसी बात नहीं है कि वह कलीमुद्दीन अहमद की आलोचना में चर्चा का विषय नहीं बना। उन्होंने दास्तान का परिचय और उसकी तकनीक पर चर्चा उसे सुनाने की कला के रूप में ही की है। उन्होंने बाग़-ओ-बहार के बारे में साफ़ लिखा है कि बाग़-ओ-बहार कही गई है। और आराइश-ए-महफ़िल के बारे में साफ़ कहा है कि आराइश-ए-महफ़िल लिखी गई है। क्या ये बातें ज़बानी बयानिया और तहरीरी बयानिया (लिखित आख्यान) के फ़र्क़ को ज़ेहन में रखे बिना कही जा सकती हैं? फिर फ़न-ए-दास्तान गोई के वे अध्याय पढ़िए जिनमें दास्तान और अदबी ज़ौक़ (साहित्यिक रुचि) और दास्तान और उर्दू नस्र (गद्य) के विषय पर चर्चाएँ पेश हुई हैं, उनसे दास्तानों का रचनात्मक बयानिया अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है। लेकिन यह ज़रूर है कि उन्होंने ज़बानी बयानिया का इतना प्रचार नहीं किया है और जिसकी वह हक़दार भी नहीं है। ज़बानी बयानिया की अनिवार्यता को ख़ुद दास्तानगोयों ने ख़त्म किया है।
कोई भी ज़बानी बयानिया जब लिखा जाता है, तो वह अपनी तमाम मूल विशेषताओं को बरक़रार नहीं रख सकता। वह तहरीरी बयानिया के साथ समझौता कर लेता है। क्योंकि अपनी पहचान और सुरक्षा के लिए लिखित रूप में आना उसकी मजबूरी होती है, इसलिए वह अपनी मर्ज़ी को सौ फ़ीसदी लिखाई पर थोप नहीं सकता। बल्कि लेखन के नियमों और उसके मिज़ाज को स्वीकार करके ही ज़िंदा रह सकता है। अब रही बात चौथे नुक़्ते की, जो विचारधाराओं और अवधारणाओं के अंतर्गत आता है। तो यह बेशक कलीमुद्दीन अहमद की आलोचना का विषय नहीं बना है और कलीमुद्दीन अहमद साहित्य को वैचारिक और अवधारणात्मक पैमाने से कभी नहीं जाँचते। वह साहित्य को साहित्यिक पैमाने से जाँचते हैं।
फ़ारूक़ी ने भी विचारधाराओं और अवधारणाओं को साहित्य का ग़ैर-साहित्यिक पैमाना ही माना है। लेकिन यहाँ वह दास्तान में प्रस्तुत हिन्द-इस्लामी विश्वदृष्टि (तसव्वुर-ए-कायनात) पर बहुत ख़ुश हैं और दास्तान के साहित्यिक मूल्य के आकलन में इसे ख़ज़ाना-ए-आमरा कहते हैं। अगर उन्होंने अपना विचार बदल लिया है, तो मुझे सिर्फ़ यह कहना है कि जो लोग आलोचना में अपने विचार बदलते रहते हैं, वे बड़े आलोचक नहीं हो सकते। चाहे मोहम्मद हसन अस्करी ही क्यों न हों, किसी विचारधारा और अवधारणा की साहित्यिक पाठ (मतन) में व्याख्या की जा सकती है और उसे समझा जा सकता है, उसकी आलोचना नहीं हो सकती; यानी आलोचनात्मक ज़िम्मेदारी के साथ उसे अच्छा या बुरा नहीं कहा जा सकता और न ही उसे साहित्यिक आलोचना का पैमाना बनाया जा सकता है। यानी उस विचारधारा और अवधारणा की वजह से पाठ की साहित्यिकता साबित नहीं की जा सकती। और अगर यह भी कोई पैमाना है, तो इंसान की विश्वदृष्टि जिस तेज़ी से बदल रही है और पुरानी अवधारणा अर्थहीन हो रही है, उसकी रौशनी में तो दास्तान बिल्कुल महत्वहीन हो जाएगी। इसलिए दास्तान को इससे मत जोड़िए। और कलीमुद्दीन अहमद ने अच्छा किया कि इस पहलू पर चर्चा नहीं की।
दास्तान की साहित्यिक आलोचना के दृष्टिकोण से कलीमुद्दीन अहमद उर्दू के तमाम आलोचकों पर श्रेष्ठता रखते हैं।
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