भाषा, ज़बान और मुसलमान
पाठकों को याद होगा कि एक प्रमुख हिंदू एडिटर ने एक लेख लिखा था जिसमें दावा किया था कि मुसलमानों ने मज़हबी कट्टरपन की वजह से हिंदी साहित्य पर कभी ध्यान नहीं दिया और अगर इत्तेफ़ाक़ से किसी ने कुछ किया तो उसको मुसलमानों ने काफ़िर कहकर पुकारा। इसका जवाब 'अल-नदवा' के पर्चे में मुसलमानों की निष्पक्षता के शीर्षक से लिखा गया था, जिसमें मुसलमानों की उस दरियादिली को तफ़सील से दिखाया गया था, जो संस्कृत और भाषा की रचनाओं की हिफ़ाज़त, तर्जुमे और प्रकाशन के सिलसिले में उनके ज़रिए सामने आई। यह लेख उसी का दूसरा हिस्सा है, इसमें यह दिखाया गया है कि तर्जुमे और प्रकाशन के अलावा मुसलमानों ने ख़ुद भाषा ज़बान में क्या-क्या रचनाएं कीं और भाषा की शायरी में किस दर्जे की महारत हासिल की।
इस मौक़े पर यह बात भी ध्यान देने लायक़ है कि संस्कृत ज़बान एक मुद्दत से चलन से बाहर है, यानी एक लंबे अरसे से ख़ुद हिंदू भी इस ज़बान में रचनाएं नहीं करते और इस्लाम के ज़माने से तो शायद कोई किताब इस ज़बान में नहीं लिखी गई। हिंदुओं की रचनाएं या शायरी जो कुछ है, भाखा ज़बान में है, इसलिए मुसलमानों ने भी जो कुछ लिखा इसी भाषा ज़बान में लिखा। आम तौर पर मशहूर है कि सबसे पहले जिस शख़्स ने भाखा ज़बान में शेरो-शायरी की वह अमीर ख़ुसरो हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस सिलसिले का पता और पीछे तक जाता है। मसूद साद सलमान जो ग़ज़नवी सल्तनत का मशहूर शायर गुज़रा है, और जो अमीर ख़ुसरो से तक़रीबन दो सौ बरस पहले था, उसके बारे में तमाम तज़्किरे (जीवनी-संग्रह) एकमत हैं कि हिंदी ज़बान में भी उसने एक दीवान लिखा था, तज़्किरा 'मज्मउल फ़ुसहा' में लिखा है, अलहासिल दी रासा दीवान बूद ताज़ी, हिंदी व पारसी।
इस वाक़ये से सिर्फ़ वालेह दाग़िस्तानी ने इस बिना पर इनकार किया है कि कोई शख़्स किसी दूसरे मुल्क की ज़बान में इस क़दर महारत हासिल नहीं कर सकता कि उसमें शायरी कर सके। लेकिन मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद ने इस शक को इस तरह दूर कर दिया कि मसूद साद सलमान हालांकि ख़ानदान के लिहाज़ से ईरानी था, लेकिन पैदा लाहौर में हुआ था, इसलिए हिंदुस्तान में पैदा हुए एक शख़्स का हिंदी में इस दर्जे की महारत हासिल करना कोई अचरज की बात नहीं। हज़रत अमीर ख़ुसरो ने संस्कृत और भाखा में जो महारत हासिल की वह बताने की मोहताज नहीं, मसनवी 'नुह सिपेहर' में उन्होंने ख़ुद अपने संस्कृत जानने का ज़िक्र किया है, अफ़सोस है कि उनके भाखा के ख़ालिस अशआर (शेर) आज ग़ायब हैं, आम ज़बानों पर सिर्फ़ वह अशआर हैं, जिनमें उन्होंने फ़ारसी और भाखा को मिलाया है, मसलन,
चूं शम्अ सोज़ां, चो ज़र्रा हैरां
ज़-मेहर-ए-आं मह बिगश्तम आख़िर
न नींद नैनां न अंग चैनां
न आप आवें न भेजें पतियां
(आंख, बदन, आराम, ख़त)
इस अंदाज़ के उनके अशआर आम तौर पर मशहूर हैं इसलिए हम उनको छोड़ देते हैं।
अमीर ख़ुसरो के बाद शेर शाह के दौर में मलिक मुहम्मद जायसी पैदा हुए। वह भाखा ज़बान के ऐसे बड़े ज़बरदस्त शायर थे कि ख़ुद हिंदुओं में आज तक उनके बराबर का कोई पैदा नहीं हुआ। 'पद्मावत' उनकी मसनवी आज मौजूद है और घर-घर फैली हुई है, हिंदुओं में सबसे बड़ा शायर आख़िरी ज़माने का कालिदास गुज़रा है, जिसने रामायण का भाखा में तर्जुमा किया है। जानकारों का बयान है कि ज़बान पर पकड़ के लिहाज़ से पद्मावत किसी तरह रामायण से कम नहीं और इतना तो हर शख़्स देख सकता है कि पद्मावत के सफ़्हे के सफ़्हे पढ़ते चले जाओ, अरबी-फ़ारसी के अल्फ़ाज़ बिल्कुल नहीं आते और यूं इक्का-दुक्का तो रामायण भी ऐसे अल्फ़ाज़ से ख़ाली नहीं, मुलाहज़ा हों रामायण के कुछ अशआर:
राम अनेक गरीब निवाजे
लोग बर बर बरो बिराजे
(ग़रीब नवाज़)
गनी, गरीब, ग्राम, नरनागर
पंडित मोटे मिलें उजागर
(ग़नी, ग़रीब)
मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत के सिवा भाखा में और भी दो मसनवियां लिखीं, जो उनके ख़ानदान में अब भी मौजूद हैं, लेकिन अफ़सोस कि उनके छपने की नौबत नहीं आई।
अकबर के ज़माने में हिंदी ज़बान को और भी आम मक़बूलियत हासिल हुई। नौबत यहां तक पहुंची कि अमीरों और शहज़ादे तक हिंदी ज़बान में शायरी करते थे। शहज़ादा दानियाल (अकबर शाह के बेटे) का ज़िक्र करते हुए जहांगीर अपनी 'तुज़ुक' में लिखता है, ब नग्मा-ए-हिंदी माइल बूद, गाहे ब ज़बान-ए-अहल-ए-हिंदू ब-इस्तलाह-ए-ईशां शेरे मी गुफ़्त, बद न-बूदे।
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ानां जो अकबरी दरबार की शान था, हिंदी शायरी में कमाल का दर्जा रखता था, इसी किताब में ख़ान-ए-ख़ानां के इंतिक़ाल के ज़िक्र में लिखा है, ख़ान ख़ानां दर क़ाबिलियत व इस्तिदाद यकता-ए-रोज़गार बूद व ज़बान-ए-अरबी व तुर्की व फ़ारसी व हिंदी मी दानिस्त व अज़ अक़्साम-ए-दानिश-ए-अक़्ली व नक़्ली हत्ता उलूम-ए-हिंदी बहरा-ए-वाफ़ी दाश्त व ब-ज़बान-ए-फ़ारसी व हिंदी शेर निकू गुफ़्ते। जहांगीर के ज़माने में ग़व्वासी नाम का एक शायर था, उसने 'तूती नामा' को जो नस्र (गद्य) में था, इस तरह नज़्म किया कि एक मिसरा फ़ारसी और एक हिंदी में था। इससे उसकी ज़बान पर पकड़ का अंदाज़ा हो सकता है। मीर हसन साहब अपने 'तज़्किरा-ए-शोअरा' में लिखते हैं,
ग़व्वासी तख़ल्लुस दर वक़्त-ए-जहांगीर बादशाह बूद, तूती नामा बख़्शी रा नज़्म नमूदा अस्त ब-ज़बान-ए-क़दीम निस्फ़े फ़ारसी व निस्फ़े हिंदी ब-तौर-ए-बकट कहानी। सरसरी दीदा बूदम शेर-ए-आं नज़्म ब-याद नेस्त। इसी ज़माने में मुल्ला नूरी एक बुज़ुर्ग थे, क़स्बा आज़मपुर के क़ाज़ीज़ादों में से थे और फ़ैज़ी से गहरी दोस्ती रखते थे, वह अगरचे फ़ारसी कहते थे, लेकिन कभी-कभी हिंदी में भी क़लम आज़माते थे। रेख़्ता यानी उर्दू ज़बान की तरकीबें भी उनके कलाम में पाई जाती हैं। चुनांचे मीर हसन साहब ने अपने तज़्किरे में उनका एक शेर नक़्ल किया है,
हर कस कि ख़यानत कुनद अलबत्ता न-तरसद
बेचारा नूरी न करे है न डरे है
अकबरी और जहांगीरी दौर में सबसे ज़्यादा जिसने इस फ़न में नाम पैदा किया वह शेख़ शाह मुहम्मद बिन शेख़ मारूफ़ फ़रबुली थे। यह बिलग्राम के रहने वाले थे और हिसार की हुकूमत पर तैनात थे। एक दफ़ा सफ़र में एक हिंदू लड़की की हाज़िर-जवाबी उनको बहुत पसंद आई, उसको साथ लाए और तरबियत की, चुनांचे उनके अक्सर दोहे और कवित्त उसी के साथ सवाल-ओ-जवाब में हैं। एक दफ़ा सफ़र से आए, उसने उनको मुद्दत के बाद देखा तो मुहब्बत के जोश से उसकी आंखों से आंसू निकल आए। उन्होंने कहा,
किम द्रग ढरी सुनार
मम आयो भायो नहीं
(क्यों तेरी आंख आबदीदा हुई ऐ नाज़नीन, क्या मेरा आना पसंद नहीं हुआ?)
उसने बरजस्ता (तुरंत) कहा,
लीन्हे नैन पखार
मलिन हती तो को दरस बिन
(आंख साफ़ करना, गर्द-आलूद तेरे दीदार के बग़ैर)
यानी चूंकि मेरी आंखें तुम्हारी जुदाई में गर्द-आलूद (धूल भरी) हो रही थीं, इसलिए मैंने उनको आंसुओं से धो लिया।
शेख़ मुहम्मद के अशआर निहायत कसरत से (बड़ी तादाद में) 'सर्व-ए-आज़ाद' के दूसरे हिस्से में नक़्ल किए गए हैं।
तैमूरी सुल्तान भाखा ज़बान की शायरी की उसी तरह क़द्रदानी करते थे, जिस तरह वह अपनी शाही ज़बान (फ़ारसी) के क़द्रदान थे। और यह इस बात का बड़ा सबब था कि हिंदी शायरी भी रोज़-ब-रोज़ तरक़्क़ी करती जाती थी। राजा सूरज सिंह ने जब एक हिंदू शायर को जहांगीर के दरबार में पेश किया और उसने एक अछूते मज़मून की नज़्म पढ़ी तो जहांगीर ने एक हाथी इनाम में दिया, चुनांचे ख़ुद 'तुज़ुक' में लिखता है, ब-ईं ताज़गी मज़मूने अज़ शोअरा-ए-हिंद कम ब-गोश रसीदा ब-जिल्द-ए-ईं मदह फ़ीले ब-ओ मरहमत करदम। जहांगीर के हुक्म से इन अशआर का फ़ारसी में तर्जुमा भी किया गया:
गर पिसर दाश्ते जहान अफ़रोज़
शब न-गश्ते हमेशा बूदे रोज़
ज़ां कि चूं ओ निहुफ़्त अफ़सर-ए-ज़र
ब-नमूदे कुलाह गोशा पिसर
शुक्र कज़ बाद-ए-ओ चुनाँ पिदरे
जानशीन गश्त ईं चुनीं पसरे
कि ज़-शुनक़ार गश्तन-ए-आँ शाह
कस ब-मातम न कर्द जामा सियाह
इन शेरों का सार यह है कि अगर सूरज का कोई बेटा होता तो कभी रात न होती, क्योंकि जब सूरज छिप जाता तो उसकी जगह उसका बेटा दुनिया को रोशन करता। खुदा का शुक्र है कि आपके वालिद (अकबर शाह) को खुदा ने ऐसा बेटा दिया कि लोगों ने उनके इंतकाल का ग़म नहीं किया। हिंदी किताबों के प्रति मुसलमानों की दिलचस्पी इस हद तक पहुँच गई थी कि लोग हिंदी की मशहूर किताबों को ज़बानी याद करते थे। अमीन राज़ी 'तज़किरा हफ़्त इक़लीम' में मीर हाशिम मोहतरम के हालात के बारे में लिखते हैं, इमरोज़ दर हिंद अस्त, तमाम किताब महाभारत रा कि मुस्तजमा असामी ग़रीबा व हिकायात-ए-अजीब अस्त दर ज़िक्र दारद।
इस मसले में हैरानी की बात यह है कि आलमगीर (औरंगज़ेब) को बहुत कट्टर कहा जाता है, और आम खयाल यह है कि वह हिंदुओं के इल्म और ज़बान से बहुत नफ़रत करता था, लेकिन मुसलमानों ने भाषा (हिंदी) पर जितना ध्यान उसके ज़माने में दिया, पहले कभी नहीं दिया था। ज़मीर ईरान का एक मशहूर शायर था, वह आलमगीर के ज़माने में ईरान से आया और शाही मनसबदारों में मुक़र्रर हुआ। उसने भाषा में कमाल का हुनर पैदा किया। हालाँकि वह भाषा और संस्कृत के लफ़्ज़ों का सही तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) नहीं कर सकता था, फिर भी इस ज़बान में बहुत शानदार शेर कहता था। हिंदी में उसका तख़ल्लुस 'पथी' था। 'यारजातक' जो मौसीक़ी (संगीत) में हिंदी ज़बान की मशहूर किताब है, उसका तर्जुमा उसी ने फ़ारसी ज़बान में किया। मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद बिलग्रामी 'यद-ए-बैज़ा' में उसके हालात के तहत लिखते हैं:
दर अहद-ए-आलमगीर बादशाह अज़ विलायत-ए-ईरान ब-हिंद आमदा व दर मसलक-ए-मनसबदारान-ए-शाही इंतिज़ाम दाश्त व बा-वजूद आँ कि ब-हिंद आमदा ज़बान-ए-ईं विलायत आमोख़्त अम्मा ब-वास्ता-ए-हिद्दत-ए-ज़हन दर नज़्म-ए-हिंदी तबा-ए-ओ आँ क़दर दख़ील शुद कि अज़ जुमला उस्तादान-ए-फ़न बर-आमद ज़बानाश ब-तलफ़्फ़ुज़-ए-ईं ज़बान ख़ूब नमी गर्दीद, अम्मा नज़्म बिस्यार पुख़्ता वाक़े मी शुद दर हिंदी पथी तख़ल्लुस मी कर्द। तर्जुमा-ए-यारजातक दर फ़न-ए-रक़्स व नग़मात-ए-हिंदी अज़ोस्त।
आलमगीर के ही दरबारियों में एक शायर का तख़ल्लुस 'दाना' था, उसके बारे में मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद बिलग्रामी 'यद-ए-बैज़ा' में लिखते हैं, नज़्म-ए-हिंदी बिस्यार ख़ूब गुफ़्ता।
भाषा जानने और शायरी का शौक़ उस ज़माने में इस क़दर आम हुआ कि बड़े-बड़े आलिम और सूफ़ी बुज़ुर्ग इसमें कमाल हासिल करते थे। शेख़ ग़ुलाम मुस्तफ़ा, जिनका तख़ल्लुस 'इंसान' था, बहुत ऊँचे दर्जे के इंसान गुज़रे हैं। वह क़ौम के कंबो और मुरादाबाद के रहने वाले थे। तर्कशास्त्र की तालीम हज़रत मुल्ला क़ुतुबुद्दीन शहीद सिहालवी (मौलाना बहरुल उलूम के दादा) की ख़िदमत में हासिल की, हदीस का इल्म मुहद्दिस देहलवी के ख़ानदान से सीखा, तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) में शेख़ जान मुहम्मद शाहजहाँ आबादी के मुरीद थे। तिब्ब (चिकित्सा), ज्योतिष, ख़ुशनवीसी (सुलेख), और जंग के हुनर—इन सभी चीज़ों में कमाल रखते थे। आलमगीर के ज़माने में मनसबदारी के ओहदे पर मुक़र्रर होकर दक्कन गए, लेकिन कुछ दिनों के बाद इस्तीफ़ा देकर चले आए। 1142 हिजरी में इचलपुर के मुक़ाम पर वफ़ात पाई। हिंदी ज़बान और भाषा की शायरी में उनका जो मक़ाम था, उसका अंदाज़ा मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद की नीचे दी गई इबारत से हो सकता है:
इल्म-ए-हिंदी ब-हैसियते कि अक्सर बराहमा हल-ए-ग़वामिज़ अज़ ख़िदमत-ए-शेख़ मी कर्दंद व शेर-ए-हिंदी नीज़ ख़ूब मी गुफ़्त, सनादीद-ए-शोअरा-ए-हिंदी बरहमन दर हुज़ूर-ए-ओ सर फ़रोद मी आवुर्दंद व इस्लाह-ए-कबित्त व दोहा मी गिरिफ़्तंद।
सर्व-ए-आज़ाद
अब्दुल जलील बिलग्रामी
(मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद के नाना) जो आलमगीर के दरबारी थे, हिंदी ज़बान के मुमताज़ शायर थे। फ़ारसी क़सीदों में भी कहीं-कहीं भाषा बोल जाते हैं, चुनाँचे एक क़सीदे में लिखते हैं:
असीस देके, कहे हिंदवी में यों सुमत
रहे जगत में अचल बास यह वज़ीर सदा
यह शौक़ इस क़दर तरक़्क़ी करता गया कि मुहम्मद शाह के ज़माने में जब जयपुर के राजा जय सिंह ने बीस लाख के ख़र्च से वेधशाला क़ायम की और गणित के साथ बहुत ख़ास इंतज़ाम किया, तो इस्लाम के आलिमों ने उनके हुक्म से 'शरह चुग़मीनी' और खगोल विज्ञान की और किताबों का तर्जुमा भाषा में किया। चुनाँचे आज़ाद, 'सुबहतुल मरजान' में लिखते हैं:
व क़द नक़ल अल-उलमा अल-अहांद ब-अम्र-ए-जय सिंह शरह अल-चुग़मीनी व ग़ैरह मिन कुतुब लिल-हैयत वल-हंदसा मिन अल-अरबिया इलल-हिंदिया।
(सुबहतुल मरजान, पृष्ठ 134)
(हिंदुस्तान के आलिमों ने जय सिंह के हुक्म से 'शरह चुग़मीनी' वग़ैरह किताबों का, जो खगोल विज्ञान और ज्यामिति में थीं, अरबी ज़बान से हिंदी ज़बान में तर्जुमा किया।) 'शरह चुग़मीनी' इस दर्जे की मुश्किल किताब है कि उर्दू में इसका तर्जुमा नहीं किया जा सकता, इससे अंदाज़ा लगाना चाहिए कि जो आलिम भाषा में इसका तर्जुमा कर सके, उनकी भाषा की जानकारी का क्या मक़ाम रहा होगा।
उसी ज़माने में सैयद निज़ामुद्दीन बिलग्रामी ने संस्कृत और भाषा के इल्म और अदब में बहुत शोहरत हासिल की। संस्कृत सीखने के लिए बनारस का सफ़र किया और वहाँ रहकर इस इल्म को पूरा किया। हिंदी मौसीक़ी (संगीत) में इस दर्जे का कमाल पैदा किया कि लोग उन्हें 'नायक' कहते थे। चुनाँचे इस फ़न से मुताल्लिक़ भाषा में दो किताबें लिखीं, 'नाओ चंद्रिका' और 'मधनायक सिंगार'। भाषा में 'मधनायक' तख़ल्लुस करते थे। 1009 हिजरी में वफ़ात पाई, उनके कलाम का नमूना यह है:
जो चतुरानन चित चढ़े, न बढ़े, बुध बेदन, ग्रंथ न गाए
(फ़रिश्ता, दिल, तरकीब व सूरत, अक़्लमंद, आसमानी किताबें, क़दीम किताबें)
भारथी, भोरी करी, भरिन, जप, जोगन, जोग अथीह गिनाए
(बोलने की ताक़त, तस्बीह पढ़ना, रियाज़त, तपस्वी)
जो मुख जोत जगी, न थगी, मधनायक घूँघट चंचल ताए
(चेहरा, रोशनी, शायर का नाम, शोख़ी)
झीन, दुकूल, छे झलकी, अबछ, बिराजत, अछ रिझाए
(बारीक, दुपट्टा, सजना, बेमिसाल, लुभाना)
मतलब यह है कि तेरी आँखें नक़ाब के अंदर जितनी ख़ूबसूरत हैं, उनकी ख़ूबी फ़रिश्तों के ख़याल में भी नहीं आ सकती और न आसमानी किताबों में उनकी तारीफ़ पाई जाती है। बोलने की ताक़त ख़ुद हैरत में डूबी है और तपस्वी तस्बीह पढ़ने से भी ज़्यादा उसका प्रशंसक है। नक़ाब तक इन आँखों की ख़ूबी को छिपा नहीं सकती, बल्कि बारीक दुपट्टा इसकी ख़ूबी को और भी दोगुना कर देता है। उनका बहुत सा कलाम 'सर्व-ए-आज़ाद' में नक़ल किया गया है। लेकिन चूँकि पढ़ने वालों के लिए वह एक अनजानी बात होगी, इसलिए हम उसे छोड़ रहे हैं।
सैयद रहमतुल्लाह, जो सैयद ख़ैरुद्दीन बिलग्रामी के बेटे थे, भाषा के मशहूर उस्ताद थे। सल्तनत की तरफ़ से दो-सदी मनसब और जागीर मुक़र्रर थी। उस ज़माने में भाषा का मशहूर उस्ताद चिंतामन एक हिंदू था, उसका एक शागिर्द रहमतुल्लाह की शोहरत सुनकर उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ और चिंतामन का दोहा उनके सामने पढ़ा:
हिय हरत अर करत उत चिंतामन चित चैन
वा मृग नैनी की लखी वाही की सी नैन
सैयद रहमतुल्लाह ने इस दोहे में ग़लती निकाली और चिंतामन ने सुना तो ग़लती मानकर उसे सुधार दिया। चिंतामन ने सैयद रहमतुल्लाह की तारीफ़ में एक दोहा भी लिखा जिसका मतला यह है:
गरब, घ संग, जिवन, सबल, कल गाज मन, प्रबल गज बाज, दल, साज, धापो
(ग़ुरूर, शेर, ताक़तवर होने के तौर पर बहादुरी का इज़हार, ज़बरदस्त हाथी, घोड़ा, फ़ौज, सजा हुआ, हमला किया)
बजत इक जमक घन घमक दुंदुभिन की तुरंग, खुर, धमक, भूतल हलायो
(एक तरह पर, आसमान फाड़ने वाली आवाज़, नक़्क़ारा, घोड़े का सुम, ज़मीन)
सैयद रहमतुल्लाह ने 13 रबी-उल-अव्वल 1118 हिजरी में वफ़ात पाई। उनके बहुत से दोहे 'सर्व-ए-आज़ाद' में नक़ल किए गए हैं, हम सिर्फ़ एक पर ही बस करते हैं:
कर उचाए जम्हाए तीर धारी भुज यह भाए
(हाथ उठाना, अँगड़ाई, बाज़ू, ख़ूबसूरत मालूम हुए)
मनोचीला दुई चमक हुए गिरी भूम पर आए
(यानी बिजली, ज़मीन)
यानी महबूब ने जम्हाई लेते हुए जब दोनों हाथ उठाकर नीचे कर लिए तो ऐसा लगा जैसे दो बिजलियाँ चमक कर ज़मीन पर गिर पड़ीं।
सैयद गुलाम नबी, जो सैयद मुहम्मद बाक़िर के बेटे और सैयद अब्दुल जलील बिलग्रामी के भांजे थे, 2 मुहर्रम 1111 हिजरी में पैदा हुए। सैयद अब्दुल जलील उस ज़माने में आलमगीर के साथ दक्कन की मुहिम (अभियान) पर थे। भांजे के पैदा होने की ख़बर सुनी तो जन्म का साल निकालने की फ़िक्र हुई, इसी हालत में सो गए और ख़्वाब में यह वाक्य हाथ आया: 'नूर-ए-चश्म बाक़िर अब्दुल हमीदम'।
शगुन के तौर पर भविष्यवाणी की कि यह लड़का शायर होगा। ख़ुदा की क़ुदरत, भविष्यवाणी सही साबित हुई। हालाँकि अरबी और फ़ारसी में महारत रखते थे, लेकिन भाषा की शायरी में बहुत कमाल हासिल किया। 1163 में नवाब वज़ीर और अफ़ग़ानों की लड़ाई में नवाब के साथ थे, और ठीक जंग के मैदान में मारे गए। मौलवी गुलाम अली आज़ाद से बहुत गहरी दोस्ती थी। इसलिए आज़ाद ने तारीख़ कही, 'रक़म कर्द है है गुलाम नबी'। भाषा ज़बान में एक दीवान लिखा जिसमें 177 दोहे हैं, उसका नाम 'अंग दर्पन' रखा। भाषा में उनका तख़ल्लुस 'दरस लीन' है, दरस के मायने भाषा में दीदार (दर्शन) के हैं और लीन के मायने मग्न होने के हैं, और दरसलीन का लफ़्ज़ी तर्जुमा 'दर्शन में मग्न' है। उनके कलाम का नमूना यह है:
तौहीद
तेरी मनोरथ को होत है सैन लोक तूं ही हुई अकास कमरत नखत उदित है
(मतलब, इशारा, देना, आसमान, सितारा, रोशनी)
तूं ही चारो तत्त्व, सैल तरु पसु, पंछी, होत तूं ही मेघ पूजि कोतु और अकोतु है
(चार, तत्त्व, पहाड़, पेड़, पशु-पक्षी, बादल, देता है, हिसाब-बेहिसाब)
तूं ही बन नारी भरता की रसलीन मीत तूं ही हुई कै सत्रु लब इन तन लोत है
(औरत, पति, स्वभाव, दुश्मन)
जाग पड़ी झूठों ज्यों सुपन लोग होत त्यों ही आतमबिचारी लोक जागत को मोत है
(जागना, ख़्वाब, रूह)
यानी तेरे ही इशारे से दुनिया पैदा होती है, तू ही आसमान बनकर सितारों को रोशन करता है, तू ही चारों तत्त्व और पहाड़, पेड़, पशु और पक्षी बन जाता है, तू ही बादल बनकर बेहिसाब बारिश करता है, तू ही औरत के रूप में आकर मर्द को सुकून पहुँचाने वाला है, तू ही आख़िरकार मौत की सूरत में जान का दुश्मन है, तो जिस तरह कि जागने के बाद ख़्वाब बिल्कुल वहम मालूम होता है, उसी तरह ख़ुदा को पहचानने वालों के नज़दीक यह दुनिया पूरी तरह ख़्वाब है।
सैयद बरकतउल्लाह बहुत बड़े फ़क़ीह (इस्लामी विद्वान) थे। भाषा में शेर कहते थे और 'पेमी' तख़ल्लुस रखते थे। भाषा में जो उनकी नज़्मों का संग्रह है, उसका नाम ख़ुद 'पेम प्रकास' रखा था। 'सर्व-ए-आज़ाद' में उनका बहुत सा कलाम नक़ल किया गया है, हम सिर्फ़ एक दोहे पर ही बस करते हैं:
चख जोगी कंथा गरें, अरुन, स्याम और सीत
(आँख, गला, लाल, काला, सफ़ेद)
आँसू बूँद सुमिरन लिएँ दरसन भिच्छा हेत
(क़तरा, तस्बीह, दर्शन, ख़ैरात)
यानी आँखें एक तपस्या करने वाली जोगी हैं, जो लाल, काले और सफ़ेद दानों की माला पहने हुए और आँसुओं की तस्बीह लिए हुए दीदार (दर्शन) की भीख की तलबगार हैं।
इन बुज़ुर्गों के अलावा और भी बहुत से कमाल वाले लोग गुज़रे हैं जिन्होंने भाषा ज़बान की गद्य रचना और शायरी में शोहरत हासिल की, और जिनके हालात अलग-अलग तज़्किरों (जीवनी-संग्रहों) में मिल सकते हैं। क्या इन वाक़यात के बाद भी हमारे हिंदू दोस्त का यह बयान मानने लायक़ है कि मुसलमानों ने कभी हिंदू लिटरेचर पर ध्यान नहीं दिया? और जो ऐसा करना चाहता था उसे काफ़िर क़रार दिया जाता था। हमारे हिंदू दोस्तों को याद रखना चाहिए कि मुसलमानों से ज़्यादा बिना किसी भेदभाव वाली क़ौम, न सिर्फ़ दुनिया का पिछला इतिहास बल्कि मौजूदा और आने वाला ज़माना भी क़यामत तक पेश नहीं कर सकेगा।
हाशिये
(1) 'बद्र-ए-मुनीर' के लेखक मीर हसन का 'तज़्किरा-ए-शोअरा' हमारे पुस्तकालय में मौजूद है।
(2) यह बात बता देने के क़ाबिल है कि मौलवी गुलाम आज़ाद ने 'सर्व-ए-आज़ाद' जो तज़्किरा लिखा उसके दो हिस्से किए। एक फ़ारसी शायरों के ज़िक्र में और दूसरे हिंदी यानी भाषा कहने वालों के हालात में। इस दूसरे हिस्से की भूमिका में लिखते हैं:
फ़स्ल-ए-सानी दर ज़िक्र-ए-क़ाफ़िया संजान-ए-हिंदी जज़ाहुमुल्लाह बे-जाइज़तुल-ख़ैर मन हेचमदान बा ज़बान-ए-अरबी ओ फ़ारसी ओ हिंदी आशनाएम ओ अज़ हर से मयकदा ब-क़द्र-ए-हौसला क़दमे मे पैमायम, मश्क़-ए-सुख़न-ए-हिंदी हर चंद इत्तेफ़ाक़ न-उफ़्ताद, अम्मा सामिआ रा अज़ नवा-ए-तूतीयान-ए-हिंद हज़्ज़े वाफ़िर अस्त ओ ज़ाइक़ा रा अज़ चाशनी-ए-शकर फ़रोशान-ए-ईं गुल ज़मीं नसीबे मुतकासिर, अफ़सोस ख़्वानान-ए-हिंद हम दरीं माद्दी पाए कमी न-दारंद बल्कि दर फ़न-ए-नायका भेद क़दम-ए-सहर साज़ी पेश मे गुज़ारंद, मौज़ूनान-ए-ज़बान-ए-हिंदी दर बिलग्राम फ़रावाँ जल्वा नमुदा अंद, लेहाज़ा फ़स्ल-ए-ईं जमाअत अलाहिदा ब-तहरीर रसीद ओ शमामा-ए-मुअत्तरे ब-दस्त-ए-बू-शनासान हवाला गर्दीद।
फिर इस हिस्से के ख़ात्मे में लिखते हैं:
ब-इक़्तिज़ा-ए-तरतीबे कि दरीं तालीफ़ इख़्तियार उफ़्तादा ख़त्म-ए-किताब बर नज़्म-ए-हिंदी दस्त ब-हम दादा चे मुज़ाइक़ा बाज़ अल्फ़ाज़-ए-हिंदी जुज़्व-ए-फ़ुरक़ान-ए-अज़ीम अस्त।
'सर्व-ए-आज़ाद' का यह हिस्सा हमारे दोस्त नवाब नूरुल हसन ख़ाँ, जो जनाब नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ाँ मरहूम के बड़े बेटे हैं, ने अपने तज़्किरे 'तूर-ए-कलीम' में शामिल कर लिया। चुनाँचे 'फ़रोग़-ए-दोम' में जहाँ से हिंदी शायरों का तज़्किरा है, शुरुआती इबारत (भूमिका) भी वही 'सर्व-ए-आज़ाद' की है। मैं इस मज़मून में बिलग्रामी भाषा के शायरों का जो तज़्किरा लिखूँगा और उनके अशआर नक़ल करूँगा, वह 'तूर-ए-कलीम' से लिए गए होंगे, लेकिन 'तूर-ए-कलीम' का यह हिस्सा दरअसल 'सर्व-ए-आज़ाद' ही है। 'तूर-ए-कलीम' छप गई है और हर जगह मिलती है। इसलिए पढ़ने वालों को वह आसानी से मिल सकती है। (1) तुज़ुक-ए-जहाँगीरी, छपी हुई अलीगढ़, पेज 67।
- रचनाकार :शिबली नोमानी
- प्रकाशन : डायरेक्टर क़ौमी कौंसिल बरा-ए-फ़रोग़-ए-उर्दू ज़बान, नई दिल्ली
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