अदबियात और उसूल-ए-नक़द
लिटरेचर का अनुवाद उर्दू में आम तौर पर 'अदब' या 'अदबियात' (साहित्य) किया जाता है जो अपने असली मतलब के लिहाज़ से देखने में बेमेल सा मालूम होता है, लेकिन शायद इससे बेहतर अनुवाद मुमकिन नहीं। हालाँकि शुरू-शुरू में अरबी ज़बान में 'अदब' का शाब्दिक अर्थ वही था जो इंसान के ऊँचे और शरीफ़ाना गुणों को ज़ाहिर करता है और जिसके लिए एक दूसरा लफ़्ज़ तहज़ीब भी मौजूद है। लेकिन बाद में प्रतीकात्मक रूप से इससे वे तमाम इल्म (विद्याएँ) मुराद लिए जाने लगे जो मानसिक शिष्टता और सामाजिक रिश्तों की पाकीज़गी (पवित्रता) से जुड़े हैं। और चूँकि लिटरेचर का असली मक़सद भी यही है, इसलिए शायद 'अदबियात' से बेहतर इसका अनुवाद मुमकिन नहीं।
इस शुद्ध अर्थ के लिए 'अदब' का इस्तेमाल अरबों में उस वक़्त हुआ जब दूसरी और तीसरी सदी हिजरी में वे अजमी (ग़ैर-अरब) तहज़ीब और लिटरेचर से प्रभावित हुए। उन्होंने इस विषय पर बाक़ायदा किताबें भी लिखीं जिनमें इब्न क़ुतैबा की 'अदब अल-कातिब' और 'अदब अल-वज़रा' ख़ास शोहरत रखती हैं। उन्होंने मनोरंजन के कुछ शौक़ और खेल-कूद को भी अदबियात में शामिल कर लिया था, जो अजमी तहज़ीब से प्रभावित होने का नतीजा था।
पश्चिम में भी लिटरेचर की परिभाषा अलग-अलग शब्दों में की गई है और कुछ लोगों ने इसे इतना व्यापक कर दिया है कि वे तमाम रचनाएँ जो अलग-अलग क़ौमों ने अलग-अलग समय में अपने पीछे छोड़ीं, उनके नज़दीक अदबियात में शामिल हैं। लेकिन अदबियात की यह परिभाषा सही नहीं है क्योंकि बहुत सी किताबें ऐसी हैं जिन्हें हम किसी भी हैसियत से साहित्यिक (अदबी) नहीं कह सकते और अदबी और ग़ैर-अदबी किताबों के बीच हमें फ़र्क़ की लकीर खींचना ज़रूरी है। ज़ाहिर है कि हम खाना पकाने की तरकीबें बताने वाली किताब और 'दीवान-ए-ग़ालिब' को एक ही दर्जा नहीं दे सकते और उनके बीच कोई फ़र्क़ करना पड़ेगा। चार्ल्स लैंब ने अदबियात को इस क़दर सीमित कर दिया है कि इसमें ह्यूम और गिबन की रचनाएँ भी शामिल नहीं हो सकतीं। धार्मिक किताबें भी शामिल नहीं हो सकतीं। इसके विपरीत, हैलम ने अदबियात में क़ानून, धर्म और चिकित्सा (तिब्ब) सभी को शामिल कर लिया है।
अगर ये दोनों रायें वाक़ई अति और कमी (चरम सीमा) का शिकार हैं, तो फिर बीच का संतुलित रास्ता क्या हो सकता है? इस सवाल का कोई जवाब उस वक़्त तक नहीं दिया गया। हडसन लिखता है कि अदब से मुराद सिर्फ़ वे किताबें हैं जो अपने विषय और बयान करने के अंदाज़ के लिहाज़ से आम इंसानी दिलचस्पी का कारण बन सकती हैं और जिनमें ख़ास तौर पर एक विशेष अंदाज़-ए-बयान और पढ़ने वालों के आनंद का ख़याल रखा जाए। इस उसूल से एक अदबी किताब यक़ीनन ज्योतिष, खगोल शास्त्र, राजनीति, दर्शन बल्कि इतिहास से भी अलग समझी जाएगी। क्योंकि वह किसी ख़ास वर्ग के लिए नहीं बल्कि आम तौर पर हर व्यक्ति की दिलचस्पी का कारण बन सकती है और अपने अंदाज़-ए-बयान से हमारे सौंदर्य-बोध (जमालियाती ज़ौक़) को पूरा करती है। इसके विपरीत, दूसरे विषयों की किताबों का मक़सद सिर्फ़ जानकारी में इज़ाफ़ा करना होता है और दिलचस्पी पैदा करना उनका लक्ष्य नहीं होता।
मैथ्यू आर्नल्ड ने इस मसले को बहुत व्यापक दृष्टि से देखा है। वह कहता है कि किताबों से जो इल्म भी हासिल हो, वह लिटरेचर में शामिल है। मानो लिटरेचर ज़िंदगी की आलोचना (नक़्द) है। अगर आलोचना से मुराद व्याख्या है, तो इसमें शक नहीं कि लिटरेचर की यह परिभाषा बहुत उम्दा है। इस सिलसिले में यह बात भी ग़ौर करने लायक़ है कि अच्छी किताबों से फ़ायदा हासिल करने के क्या तरीक़े हो सकते हैं। ज़ाहिर तौर पर हमें इसकी तीन सूरतें नज़र आती हैं: मानसिक, नैतिक (अख़लाक़ी) और जज़्बाती। यानी किसी किताब से या तो हमारे ज़ेहन और अक़्ल पर असर होता है, या अख़लाक़ पर, या सिर्फ़ हमारे जज़्बात में हलचल पैदा होती है। इसलिए एक किताब की क़ीमत या अहमियत का अंदाज़ा करने के लिए हमें इन तीनों बातों पर ग़ौर करना चाहिए। हालाँकि यह ज़रूरी नहीं कि एक किताब इन तीनों विशेषताओं के लिहाज़ से समान रूप से फ़ायदेमंद और उपयोगी नज़र आए, लेकिन अगर कोई साहित्यिक रचना इस पैमाने पर पूरी उतरे और उसमें फ़ायदा पहुँचाने की ये तीनों सूरतें नज़र आएँ, तो यक़ीनन हम उसको बेहतर किताब कहेंगे।
किसी किताब की बौद्धिक (अक़्ली) क़ीमत से हमारा मतलब यह होता है कि वह किसी मक़सद को तय करने के लिए हमें प्रेरित करती है और इस तरह हमारी दिमागी या मानसिक ज़िंदगी को इससे फ़ायदा पहुँचता है। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि इसके पढ़ने के बाद अगर हमारा दिमाग़ इसका समर्थन करे, तो वह किसी बौद्धिक क़ीमत का ही नतीजा हो। मिसाल के तौर पर, किसी साबुन के विज्ञापन को देखकर हम ख़याल करते हैं कि यह साबुन अच्छा होगा और हम उसे मँगा लेते हैं, फिर इससे यह तो हो सकता है कि हमारे शरीर को कोई फ़ायदा पहुँचे। लेकिन अगर किसी किताब की कोई बौद्धिक क़ीमत है, तो उससे हमें आर्थिक या शारीरिक फ़ायदा पहुँचे या न पहुँचे, लेकिन बौद्धिक फ़ायदा ज़रूर पहुँचेगा। और यह ज़रूरी नहीं कि उसमें साहित्यिकता (अदबियत) भी पाई जाए। मिसाल के तौर पर, साइंस की एक किताब है, वह बौद्धिक क़ीमत तो ज़रूर रखती है और उससे यक़ीनन हमारी ज़िंदगी लाभान्वित भी होती है, लेकिन हम उसे अदबियात में शामिल नहीं कर सकते।
अदबियात की नैतिक (अख़लाक़ी) क़ीमत पर भी लोगों ने अलग-अलग और विपरीत रायें क़ायम की हैं। कुछ का ज़ोर इस बात पर है कि असली चीज़ एक किताब की नैतिक क़ीमत है और कुछ यह कहते हैं कि कला (फ़न) को महज़ कला की हैसियत से देखो। यूनान और रोम ने लिटरेचर में नैतिकता की अहमियत पर बहुत ज़ोर दिया था और इसमें शक नहीं कि दुनिया के अदबियात का ज़्यादातर हिस्सा उपदेश और नसीहत पर आधारित रहा है। नज़्मों, अफ़सानों और नॉवेलों के ज़रिए हमेशा नैतिकता का प्रचार किया गया है। लेकिन सामाजिक नियमों के साथ किताबों के नैतिक पैमाने में भी हमेशा बदलाव होता रहता है और इसीलिए अदब की नैतिक क़ीमत को कुछ लोगों ने ज़्यादा अहमियत नहीं दी है। चुनाँचे मिस्टर स्पिंगार्न लिखता है कि नज़्म न नैतिक होती है न अनैतिक, बल्कि वह सिर्फ़ आर्ट का एक नमूना होती है और जिस तरह हम फूल से नैतिक शिक्षा (दर्स-ए-अख़लाक़) की उम्मीद नहीं रखते, उसी तरह नज़्म से भी इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
लेकिन हक़ीक़त यह है कि अदबियात से इंसानी ज़िंदगी का जो रिश्ता है, वह इसकी नैतिक अहमियत को कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। और इसलिए यह कहना कि हुस्न और आर्ट को महज़ हुस्न और आर्ट की हैसियत से देखना चाहिए और इसके नैतिक या अनैतिक होने को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए, कोई मायने नहीं रखता। हालाँकि कुछ किताबें, मिसाल के तौर पर धर्म और दर्शन की किताबें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ नैतिक या बौद्धिक क़ीमत रखती हैं और उनमें बिल्कुल कोई साहित्यिकता नहीं पाई जाती, लेकिन इससे यह लाज़िमी नहीं हो जाता कि अदबियात और नैतिकता में आपस में कोई विरोध है। हो सकता है कि एक किताब साहित्यिकता भी रखती हो और नैतिकता व बौद्धिकता भी। लेकिन इसमें शक नहीं कि लिटरेचर की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह इंसानी जज़्बात में हलचल पैदा करे और इसीलिए अदबियात में सबसे अहम इसकी जज़्बाती क़ीमत है। जो रचना हमारे जज़्बात को उभार सकती है, वह यक़ीनन अदबियात में शामिल है, चाहे उसकी कोई नैतिक क़ीमत हो या न हो।
इस सिलसिले में एक सवाल यह भी पैदा होता है कि साहित्य (अदब) से इंसानी ज़िंदगी का क्या ताल्लुक़ है? अगर यह सही है (और इसके सही होने में कोई शक नहीं) कि एक मूल्यवान किताब सीधे तौर पर ज़िंदगी से पैदा हुई है, तो ज़ाहिर है कि इसके अध्ययन से ज़िंदगी के साथ हमारे ताल्लुक़ात भी बहुत गहरे हो जाएँगे और इसी का नाम ज़िंदादिली है जो ज़िंदगी की सबसे सही व्याख्या है। साहित्य असल में उन तमाम तजुर्बों और एहसासों का एक रिकॉर्ड है, जिनसे एक इंसान अपनी ज़िंदगी में दो-चार होता है। गोया दूसरे शब्दों में यूँ कह सकते हैं कि साहित्य शब्दों के ज़रिए ज़िंदगी का इज़हार (अभिव्यक्ति) है और इसलिए जिस तरह साहित्य की रचना ज़िंदगी से होती है, उसी तरह ज़िंदगी की रचना बहुत हद तक साहित्य पर निर्भर है।
हालाँकि क़ौमों की अलग-अलग विशेषताएँ, लोगों के अलग-अलग मिज़ाज और देशों के अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक हालात साहित्य के अलग-अलग रूप पैदा करते रहते हैं, लेकिन उनमें साहित्य का कोई रूप ऐसा नहीं है जिसमें इंसानी रूह का इज़हार न किया गया हो, जिसमें ज़िंदगी के रुझानों की व्याख्या न की गई हो और ज़िंदगी के तजुर्बों से जिसमें कोई न कोई नतीजे वाली बात न पैदा की गई हो।
साहित्य के दो पहलू और भी ग़ौर करने लायक़ हैं। एक व्यावहारिक (Functional) और दूसरा सौंदर्यपरक या जमालियाती (Aesthetic)। अफ़लातून (प्लेटो) की राय में साहित्य का काम (Function) उस चीज़ की नुमाइंदगी करना है जो उसके आदर्श लोकतंत्र को लोगों के लिए अनुकरण और अमल के क़ाबिल बना दे, इसलिए उसने शायरी और ड्रामे की इसी लिए निंदा की है कि वे ग़ैर-ज़रूरी चीज़ों की नुमाइंदगी करते हैं। लेकिन यह दावा करना कि साहित्य का काम सिर्फ़ नैतिकता का पाठ पढ़ाना है, सही नहीं है।
साहित्य रूह की एक ज़बरदस्त आवाज़ है जो सामने मौजूद ज़िंदगी को देखकर पैदा होती है। इसलिए साहित्य का काम सिर्फ़ यही नहीं है कि वह नई चीज़ों के बारे में हमारे एहसास में हलचल पैदा करे, बल्कि हमारी मौजूदा जानकारी और सूचनाओं को बढ़ाना भी इसका काम है। यानी जिन चीज़ों से हम वाक़िफ़ नहीं हैं, साहित्य उनसे भी हमें वाक़िफ़ कराता है और जिनसे हम फ़िलहाल वाक़िफ़ हैं, उनसे हमारे एहसास को और ज़्यादा जोड़ देता है।
अब साहित्य के सौंदर्यपरक (जमालियाती) पहलू को लीजिए। इंसान की ज़िंदगी का एक ख़ास पहलू और भी है जिसे वह ख़ूबसूरत कहता है और इस ख़ूबी को वह हुस्न-ओ-जमाल (सौंदर्य) का नाम देता है। आम भाषा में हुस्न के असर से हर शख़्स कमोबेश वाक़िफ़ होता है, लेकिन इसकी मनोवैज्ञानिक व्याख्या का इल्म, जिसे फ़लसफ़े (दर्शन) की ज़बान में जमालियात (सौंदर्यशास्त्र) कहते हैं, बहुत कम लोगों को होता है। जिस तरह और तमाम एहसास अलग-अलग कैफ़ियत और दर्जे रखते हैं, उसी तरह हुस्न का एहसास भी अलग-अलग कैफ़ियतें रखता है। मिसाल के तौर पर, हम एक दिलकश नज़ारा या ख़ूबसूरत इमारत को देखते हैं और उससे लुत्फ़ उठाते हैं, लेकिन इस लुत्फ़ की क़िस्म उस लुत्फ़ से बिल्कुल अलग होती है जो एक उम्दा अफ़साना या नज़्म को पढ़कर हासिल होता है। हम इस फ़र्क़ को इस तरह ज़ाहिर करते हैं कि पहली चीज़ में भौतिकता (माद्दियत) का लगाव पाया जाता है और वह दूसरी चीज़ में बिल्कुल नहीं है।
इन कैफ़ियतों के फ़र्क़ की दूसरी मिसाल देखिए। एक रईस है जो आलीशान महल में रहता है और अपने महल की सजावट से पूरा लुत्फ़ उठाता है। इस महल को एक सैलानी भी देखता है और वह भी ख़ुश होता है, लेकिन इन दोनों के मज़े लेने में बहुत फ़र्क़ है। रईस का मज़ा इस बात से जुड़ा है कि वह उसकी मिल्कियत (संपत्ति) है और सैलानी सिर्फ़ इसलिए ख़ुश होता है कि एक हसीन और ख़ूबसूरत चीज़ उसकी निगाह से गुज़री। इसीलिए रईस की ख़ुशी का जज़्बा यक़ीनन ग़ैर-जमालियाती (गैर-सौंदर्यपरक) है और सैलानी का पूरी तरह जमालियाती है, हालाँकि दोनों के जज़्बात एक ही चीज़ से जुड़े हैं।
ललित कलाओं (फ़नून-ए-लतीफ़ा) में चित्रकारी और संगीत से भी जमालियाती लुत्फ़ उठाया जाता है, लेकिन इसका ताल्लुक़ बाहरी इंद्रियों (हवास) से है, यानी इंद्रियों की बाहरी हलचल ख़त्म हो जाती है तो लुत्फ़ भी ख़त्म हो जाता है। इसके बरअक्स, साहित्य का जमालियाती लुत्फ़ किसी बाहरी हलचल से जुड़ा नहीं है और वह अपने असर बिना किसी भौतिक माध्यम के भी इंसान के ज़ेहन और दिमाग़ पर छोड़ जाता है।
ग़रज़ कि तमाम कलाओं में लिटरेचर (साहित्य) की वही हैसियत है जो गुलदस्ते में सबसे ऊपर बीच वाले फूल की होती है। बल्कि इससे भी ज़्यादा सही और सूक्ष्म अंदाज़ में यूँ समझना चाहिए कि जिस तरह हम किसी फूल को देखे बिना सिर्फ़ उसकी ख़ुशबू से उसकी क़िस्म का अंदाज़ा लगा लेते हैं, उसी तरह हम एक क़ौम के लिटरेचर को देखकर उसके सामूहिक जीवन के तमाम पहलुओं को समझ सकते हैं। लिटरेचर से मेरा मतलब यहाँ सिर्फ़ शायरी या अफ़साना-निगारी नहीं है, बल्कि एक क़ौम का वह तमाम लिखित कारनामा है जो उसने अपने बाद छोड़ा, और जिससे हम उसके उत्थान और पतन (उरूज-ओ-ज़वाल) की दास्तान का अध्ययन कर सकते हैं।
इस रिकॉर्ड में यक़ीनन इतिहास पहले दर्जे की हैसियत रखता है क्योंकि इसका मक़सद ही सीधे तौर पर हमारी जानकारी में इज़ाफ़ा करना है। मैथ्यू आर्नल्ड की व्याख्या के मुताबिक़ साहित्य इंसानी ज़िंदगी की आलोचना (नक़्द) भी है और टैन (Taine) के बयान के मुताबिक़ सामाजिक हरकत और अमल का इज़हार भी। वह ऐसा व्यापक रिकॉर्ड है जिससे एक क़ौम की तमाम जिस्मानी और ज़ेहनी ताक़तों के विकास और पतन (इर्तेक़ा और इनहेतात) का हाल मालूम हो सकता है और इसलिए जहाँ तक उपयोगिता के पहलू का ताल्लुक़ है, इतिहास से ज़्यादा मुफ़ीद और दिलचस्प कोई चीज़ नहीं। इसके बाद फ़लसफ़े (दर्शन) का दर्जा है जिससे हालाँकि हमें एक क़ौम की सिर्फ़ ज़ेहनी ताक़तों का हाल मालूम होता है, लेकिन चूँकि हम अपनी रफ़्तार का अंदाज़ा दूसरों की ज़ेहनी रफ़्तार को सामने रखकर आसानी से कर सकते हैं, इसलिए फ़लसफ़े का अध्ययन भी फ़ायदे के लिहाज़ से कम दर्जे की चीज़ नहीं है।
यह तो हुआ लिटरेचर का वह हिस्सा जिसे हम ठोस या वज़नी कहते हैं, रह गया इसका दूसरा हिस्सा जिसे लाइट लिटरेचर (हल्का साहित्य) या अदब कहते हैं, वह न सिर्फ़ इस लिहाज़ से बहुत अहम है कि वह हमारे जमालियाती ज़ौक़ (सौंदर्य बोध) को पूरा करने वाला है, बल्कि इस लिहाज़ से भी कि एक क़ौम के रचनात्मक साहित्य (Creative Literature) का सही अंदाज़ा इसी से हो सकता है। वे कलाएँ हों या साहित्य, उन्हें सूक्ष्मता (लत़ाफ़त) से उसी वक़्त जोड़ा जा सकता है, जब कोई क़ौम इंतेहाई उरूज (चरम उत्कर्ष) पर पहुँचकर सिर्फ़ जज़्बात के लिए ज़िंदा रहना चाहती है। साहित्य का ज़ौक़, जिसमें शायरी, अफ़साना-निगारी और नाटक (तमसील-निगारी) शामिल हैं, एक क़ौम के इतिहास में उस वक़्त पुख़्ता होता है जब वह जीवन-संघर्ष की मंज़िलों से गुज़रकर अपनी जिस्मानी और ज़ेहनी थकान दूर करने के लिए सुकून की तलबगार होती है। और चूँकि क़ौमी ज़िंदगी का यह दौर सिर्फ़ ख़यालों की नज़ाकत से ताल्लुक़ रखता है, इसलिए हम एक क़ौम के ललित साहित्य (अदब-ए-लतीफ़) को देखकर आसानी से समझ सकते हैं कि दुनिया के मैदान में कितनी मुसीबतें झेलने के बाद उसने कितनी ज़ेहनी चमक हासिल की और उसके एहसास और जज़्बात की नज़ाकत और लत़ाफ़त उसकी ज़िंदगी के किन-किन उतार-चढ़ाव की आभारी है।
यूँ तो एक क़ौम की ख़ास नफ़्सियात (मनोविज्ञान) का हाल हमें उसके लिटरेचर के अलग-अलग शोबों से मालूम होता है, लेकिन आम तौर पर इसका इल्म सिर्फ़ ललित साहित्य (अदब-ए-लतीफ़) के ज़रिए ही हासिल हो सकता है। और इसलिए लाइट लिटरेचर के अध्ययन के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि हमें किसी क़ौम की ज़ेहनी और सामूहिक ज़िंदगी का भी इल्म हासिल हो। और इसीलिए कहा जाता है कि ललित साहित्य को समझने के लिए सिर्फ़ जमालियाती ज़ौक़ (सौंदर्य बोध) की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि बहुत व्यापक अध्ययन की ज़रूरत है और इसी के साथ खरे-खोटे को परखने की भी, जिसे पारिभाषिक शब्दावली में नक़्द-ओ-इन्तेक़ाद (आलोचना) कहते हैं।
**आलोचना के सिद्धांत**
साहित्य के अध्ययन के सिलसिले में सबसे ज़्यादा अहम चीज़, जो न सिर्फ़ अपनी रुचि की संतुष्टि बल्कि दूसरों के विचारों के परिणामों की क़ीमत का अंदाज़ा लगाने के लिए भी बहुत ज़रूरी है, सैद्धांतिक रूप से उस कला को जानना है जिसे अंग्रेज़ी में (Criticism) कहते हैं। इसका मूल यूनानी शब्द है जिसके मायने फ़ैसला करने के हैं, उर्दू में आम तौर पर इसका अनुवाद 'तनक़ीद' किया जाता है लेकिन ज़्यादा सही शब्द 'नक़्द' या 'इंतिक़ाद' है, जिसका अर्थ परखना या जाँचना है और हर वह व्यक्ति जो यह सेवा अंजाम देता है उसे नक़्क़ाद (आलोचक) कहते हैं।
साहित्य में सबसे ज़्यादा ऊँची चीज़ रचनात्मक साहित्य (Creative Literature) है जिससे तात्पर्य जीवन की व्याख्या है, इसलिए एक उच्च आलोचना का सही उद्देश्य यह होना चाहिए कि साहित्य के उन तमाम रूपों पर ग़ौर करे जिनके ज़रिए जीवन की व्याख्या की जाती है। इस ग़ौर-ओ-फ़िक्र से जो नतीजा निकले वही एक आलोचक का फ़ैसला कहलाएगा। मैथ्यू आर्नल्ड कहता है कि आलोचना उस चीज़ के बेहतरीन हिस्से को सीखने और उजागर करने की एक निष्पक्ष कोशिश है जो दुनिया के ज्ञान और विचार के दायरे से बाहर न हो। इससे उसका तात्पर्य सिर्फ़ जीवन का अध्ययन है और इस अध्ययन के विभिन्न तरीक़ों और सिद्धांतों पर बातचीत करना है।
साहित्य में तीन अलग-अलग शक्तियाँ सक्रिय पाई जाती हैं: एक रचना की शक्ति, दूसरी आनंद लेने की शक्ति और तीसरी आलोचना की शक्ति। इन तीनों शक्तियों में से पहले ज़िक्र की गई दो शक्तियों का वजूद पहले पाया जाता है और उसके बाद आलोचना की शक्ति अपना काम करती है। ज्यों ही एक व्यक्ति को इसका एहसास होता है कि एक से ज़्यादा चीज़ों में से किसी ख़ास चीज़ को प्राथमिकता देनी चाहिए, आलोचना शुरू हो जाती है। इसमें शक नहीं कि आलोचना की रुचि बिल्कुल स्वाभाविक चीज़ है और इसका वजूद सृष्टि की शुरुआत से पाया जाता है, लेकिन सदियों के लगातार बदलाव के बाद एक बाक़ायदा शास्त्र का रूप इसने पिछली सदी में अख़्तियार किया है।
अरबों में यह कला सिर्फ़ शुरुआती चरणों तक सीमित रही और अगर 'अस्मा-उर-रिजाल' (हदीस के रात्रियों का जीवन-परिचय) और हदीस के सिद्धांतों को धार्मिक साहित्य समझकर अलग कर दिया जाए, तो मालूम होगा कि उनकी आलोचना का विषय सिर्फ़ भाषा (लुग़त) था। पश्चिमी लेखकों ने इस कला में बड़ी संख्या में किताबें लिखी हैं, लेकिन पहल का गौरव यूनानियों को हासिल है और उसके बाद रोमनों को। जब कुस्तुनतुनिया की विजय के बाद यूनान और रोम के विद्वानों ने इटली में निवास किया, तो वहाँ के अमीरों ने ज्ञान और कला के प्रसार में बहुत मदद की। और उन्हीं कलाओं में से एक आलोचना की कला भी थी। जब बाद के ज़माने में ज्ञान और कला की अधिकता हुई और एक ही विषय पर लोगों ने अलग-अलग रायें पेश करना शुरू कीं, तो ज़रूरत महसूस हुई कि इन विभिन्न विचारों और विचारधाराओं को समझने के लिए कोई सही पैमाना क़ायम किया जाए। इसलिए यूरोप की आम क़ौमों ने इस तरफ़ ध्यान दिया, ख़ास तौर पर फ़्रांस ने, जहाँ के लोगों को ग़ौर-ओ-फ़िक्र और तेज़ दिमाग़ के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य (ज़राफ़त) का भी हिस्सा मिला है, जो आलोचना की कला के लिए बहुत ज़रूरी है।
इस कला ने साहित्य को किस हद तक प्रभावित किया, इसके विस्तार का यहाँ मौक़ा नहीं है, लेकिन संक्षेप में यह कहना ज़रूरी है कि वर्तमान युग में इस कला की शर्तें क्या हैं और एक आलोचक बनने के लिए किन सिद्धांतों का पालन करना लाज़िमी है। पिछले ज़माने में आलोचना का आधार सिर्फ़ वे सिद्धांत और नियम थे जो प्राचीन विद्वानों के ज्ञान और कला से लिए गए थे। मिसाल के तौर पर, अगर कोई व्यक्ति भाषा-विज्ञान पर कोई किताब लिखता, तो वह उसी वक़्त सही मानी जाती जब वह भाषा के उस्तादों के कलाम से ली गई होती या उनके तय किए गए सिद्धांतों पर तैयार की जाती, क्योंकि प्राचीन विद्वानों के सिद्धांतों को अमिट सच्चाई माना जाता था।
लेकिन अठारहवीं सदी से ज्ञान और कला का नया दौर शुरू होता है, क्योंकि इस ज़माने में कलाओं की तरक़्क़ी का आधार सिर्फ़ बहस और तजुर्बा क़रार पाया। वह युग जब अरस्तू के कथनों को एक अकाट्य सच्चाई माना जाता था, गुज़र गया, और दुनिया आधुनिक सभ्यता के साथ-साथ अंधी नक़ल और प्राचीन विद्वानों के दबदबे से आज़ाद होकर, पारंपरिक सिद्धांतों के बजाय सिर्फ़ तजुर्बों, अवलोकनों और बहस-ओ-आलोचना को सच्चाई का पैमाना समझने लगी। इसका नतीजा यह हुआ कि तमाम ज्ञान और कलाओं में तरक़्क़ी होने लगी, और एक-एक मसले पर बड़ी अहम किताबें लिखी जाने लगीं। इन्हीं में से एक आलोचना की कला भी है, जिसने एक स्वतंत्र रूप अख़्तियार कर लिया है।
इस कला का उद्देश्य सिर्फ़ यह है कि रचनाओं और उनके विषय पर बहस की जाए और लेखक तथा रचना के ज़माने का आपसी संबंध ज़ाहिर करके उन किताबों से तुलना की जाए जो किसी ख़ास विषय पर अलग-अलग ज़मानों और देशों में लिखी गई हैं। अकादमिक रायों पर विचार व्यक्त करना आलोचक का काम नहीं है क्योंकि आलोचक के लिए हर विषय में पूरी महारत रखना ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता, हर युग और देश के ज्ञान के इतिहास से उसका वाक़िफ़ होना यक़ीनन लाज़िमी है क्योंकि आलोचना की कला और ज्ञान-ओ-साहित्य के इतिहास में आपस में बहुत गहरा संबंध पाया जाता है।
आलोचना की कला के तीन उद्देश्य हैं: व्याख्या, निर्णय और दर्जे तय करना। जो व्यक्ति किसी किताब की आलोचना करे, उसे चाहिए कि पहले उसे ग़ौर से समझ ले और उसी के साथ उस विषय की और किताबों का भी अध्ययन करे, क्योंकि इसके बिना वह आलोच्य पुस्तक (जिस किताब की आलोचना की जा रही है) का कोई दर्जा तय नहीं कर सकता। प्राचीन विद्वानों का नियम था कि जब वे किसी किताब की आलोचना करते थे, तो सिर्फ़ उसके विषय और विषय-वस्तु पर नज़र डालते थे और अर्थ, भाषा तथा व्याकरण की दृष्टि से उस पर नज़र नहीं करते थे, लेकिन मौजूदा आलोचना की कला बहुत उच्च है। आज जब कोई व्यक्ति आलोचना करता है, तो उसे यह भी बताना पड़ता है कि ज्ञान और साहित्य के इतिहास में यह किताब किस दर्जे में रखे जाने की हक़दार है और इसकी विषय-वस्तु का विषय से कहाँ तक संबंध है, वर्तमान युग से इसका क्या ताल्लुक़ है और रचना का लेखक तथा उसके माहौल से क्या संबंध है।
सबसे पहले वह लेखक की जीवनी पर नज़र डालता है कि उसके वतन की भौगोलिक स्थिति और माहौल की क्या हालत है, वह किस ख़ानदान या क़ौम से ताल्लुक़ रखता है, किन लोगों में उसने परवरिश पाई, उसका ख़ानदान ग़रीब था या दौलतमंद, उसका लड़कपन और जवानी किन विचारों और व्यस्तताओं में गुज़री, ज़माना उसके अनुकूल था या प्रतिकूल, उसने शिक्षा कहाँ प्राप्त की, किन लोगों से फ़ायदा उठाया (सीखा), उसकी ज़िंदगी किस तरह बसर हुई, किसी से उसको मुहब्बत हुई या नहीं, ज़िंदगी उसे अज़ीज़ थी या नहीं, वतन से बाहर उसने यात्रा की या नहीं, ज़िंदगी में उसे क्या-क्या तजुर्बे हासिल हुए, लोगों के साथ उसका बर्ताव कैसा रहा, उसकी दिमागी हालत और शारीरिक सेहत कैसी थी। ग़रज़, आलोचक इन तमाम बातों से वाक़िफ़ होकर किताब के बारे में अपनी राय ज़ाहिर करता है और इसी का नाम व्याख्या है।
इसके बाद निर्णय (हुक्म) का दर्जा है। इसके लिए ज़रूरी है कि आलोचक अपने निजी झुकाव और व्यक्तिगत रुचि से अलग होकर किताब के विषय के लिहाज़ से निष्पक्ष राय क़ायम करे। यानी अगर उसकी तबीयत ड्रामा को पसंद करती है तो बिना वजह नॉवेल की बुराई न करे। अगर उसे अबू नवास की शराब की शायरी (ख़मरियात) से दिलचस्पी है तो अंतरा के युद्ध-काव्य (रज़्मियात) पर एतराज़ न करे, अगर उसे मीर अनीस के मर्सिए अच्छे मालूम होते हैं तो वह ग़ालिब की ग़ज़ल-गोई पर आपत्ति न करे, बल्कि हर रचना को निष्पक्ष नज़र से देखे और उसकी ख़ूबियों और ख़ामियों पर इंसाफ़ से क़लम उठाए। सच्चाई बयान करने के सिवा कोई और उद्देश्य उसके सामने न हो। इसीलिए बेहतरीन आलोचक वही हो सकता है जो किसी ख़ास कला या विषय से दिलचस्पी न रखता हो बल्कि एक आम अकादमिक रुचि रखता हो।
फ़ैसले के बाद दर्जे तय करने की मंज़िल आती है। अगर हम आतिश, मोमिन और ग़ालिब के हालात-ए-ज़िंदगी, निजी ज़रूरतों और ख़ास अंदाज़-ए-बयां का ज़िक्र करके अच्छी परख (ज़ौक़-ए-सलीम) से काम लें, तो इनमें से हर एक का दर्जा तय करना पड़ेगा। यही वह चीज़ है जो एक आलोचक (नक़्क़ाद) के फ़र्ज़ में सबसे ज़्यादा नज़ाकत और अहमियत रखती है और इसीलिए आलोचना के उसूल (सिद्धांत) तय करने की कोशिश अरसे से जारी है, मगर किसी ख़ास क़िस्म के साहित्य को सामने रखकर उसूलों के मुकम्मल होने की ज़िम्मेदारी नहीं ली जा सकती। इसकी वजह सिर्फ़ यह है कि ये उसूल ख़ूबियों का मुक़ाबला करके बनाए जाते हैं। अगर साहित्य का नज़रिया पहले अक़्ली (तार्किक) उसूलों के मुताबिक़ तय कर लिया जाए तो आलोचना में भी आसानी हो सकती है और इसका भी कोई उसूल निकाला जा सकता है। लेकिन यह शायद उस वक़्त तक मुमकिन नहीं जब तक साहित्य का जज़्बाती पहलू ख़त्म होकर इसकी बुनियाद पूरी तरह उपयोगिता (अफ़ादियत) पर क़ायम न हो जाए, और यह न सिर्फ़ मुश्किल है बल्कि साहित्य के रस और मज़े को ख़त्म कर देने वाला भी है।
इस फ़न के तारीखी (ऐतिहासिक) पहलू पर जिस वक़्त ग़ौर किया जाता है तो हमें इसके दो हिस्से नज़र आते हैं। एक नज़री (सैद्धांतिक) और दूसरा अमली (व्यावहारिक)। सत्रहवीं सदी तक अलग-अलग किताबों और लेखकों की आलोचनात्मक समीक्षाएं हमें नहीं मिलतीं, अलबत्ता नज़रियों पर बिखरे हुए ख़यालात ज़रूर नज़र आते हैं। मगर अरस्तू, होरेस और बोइलो वग़ैरह ने शायरी पर आलोचना के जो उसूल बनाए थे और जिनको (Poetics) के नाम से जाना जाता है, बेशक वे पुराने ज़माने की अहम चीज़ें हैं। इन लेखकों ने दो कोशिशें की हैं। एक यह कि उन्होंने साहित्य या शायरी की परिभाषा तय की और दूसरे यह कि नज़्मों की क़िस्में करके रज़्मिया (महाकाव्य), हुज़निया (त्रासदी) और इंबिसातिया (सुखांत) नज़्मों के क़ायदे और उसूल अलग-अलग बनाए। ये क़ायदे देखने में तो उसूली (Pragmatic) मालूम होते हैं लेकिन ये असल में सिर्फ़ इस्तक़रा (Induction) का नतीजा हैं।
सबसे पहले अरस्तू ने यूनान के बड़े लेखकों के लिखने के अंदाज़ को देखकर आलोचना के उसूल बनाए। मसलन यह देखकर कि होमर की नज़्मों में पहले भूमिका (तम्हीद) होती है, इसके बाद असल बयान और फिर नतीजा। अरस्तू ने तय कर दिया कि हर रज़्मिया (महाकाव्य) नज़्म को इन्हीं तीन हिस्सों में बंटा होना चाहिए। अरस्तू के बाद होरेस वग़ैरह ने कुछ और उसूल बनाए और सोलहवीं सदी तक उनका पालन भी किया गया, लेकिन आख़िरकार ये भी बदले और नए उसूल बनाए गए। चुनांचे सोलहवीं सदी के एक आलोचक अर्टिनो (Artino) का ख़याल है कि निजी और व्यक्तिगत ज़ौक़ (पसंद) के अलावा आलोचना का कोई पैमाना नहीं है। अनातोल फ्रांस एक अच्छे आलोचक की तारीफ़ इन अल्फ़ाज़ में करता है कि, बेहतरीन आलोचक वह है जो साहित्य के शाहकारों (महान रचनाओं) के ज़िक्र के सिलसिले में ख़ुद अपनी रूह के कारनामे बयान करता है, कुछ ऐसे आलोचक भी हैं जो अपनी रचनाओं को साइंस का दर्जा देते हैं।
आलोचना का एक स्कूल और है जो इसे बिल्कुल अंतर्ज्ञान (वजदान) या सौंदर्यशास्त्र (जमालियात) से जुड़ा हुआ समझता है। चुनांचे मिसेज़ पफ़र हो (Mrs. Pufferhoe) का ख़याल है कि आलोचना का असल मक़सद यह बताना है कि किसी रचना में क्यों दिलकशी पाई जाती है और वह कैसे पैदा हुई। गोया उनके नज़दीक आलोचना का दायरा सिर्फ़ सौंदर्यशास्त्रीय दायरा है और इसी के अंदर रहकर जज़्बाती व्याख्या और विश्लेषण (तजज़िया) करना चाहिए।
मौल्टन ने आज के दौर की आलोचना कला पर लिखते हुए इसकी तीन क़िस्मों का ज़िक्र किया है। एक इस्तक़राई यानी (Inductive) जिसके ज़रिए से हम किसी किताब के विषय की व्याख्या करके उसका रचनात्मक दर्जा तय करते हैं। दूसरी क़िस्म तफ़क्कुरी यानी (Speculative) है, इससे मुराद साहित्य के दार्शनिक पहलू पर ग़ौर करना है और इसी लिहाज़ से ख़ास नज़रियों को क़ायम करके किसी नतीजे पर पहुंचना। तीसरी क़िस्म तशरीई या (Judicial) है जो किसी साहित्यिक रचना की हक़ीक़त मालूम करने के लिए उसको सिर्फ़ माने गए आलोचनात्मक उसूलों पर लागू करती है।
हालांकि यह बिल्कुल सही है कि हमको किसी रचना पर आलोचना करने के लिए पूरी सामग्री जमा करके उसका विश्लेषण करना चाहिए और उसकी दिलकशी और रस की वज़ाहत करनी चाहिए। लेकिन साथ-साथ हमको यह भी देख लेना चाहिए कि वह रचना वाक़ई कोई ऐसी चीज़ है जिससे इंसानी रूह आनंद हासिल कर सकती है और इस आनंद प्राप्ति के कारण क्या हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि हम ख़ुद अपने लिए कुछ उसूल बना लें क्योंकि आजकल जबकि आलोचना कला के कई स्कूल पाए जाते हैं और इनमें से हर एक ने अपने लिए अलग क़ायदे तय कर लिए हैं, एक आज़ाद आलोचक के लिए बेहतरीन तरीक़ा यही होगा कि वह अपने-आप को किसी स्कूल का पैरोकार (अनुयायी) न समझे और ख़ुद अपनी परखने की ताक़त से काम लेकर अच्छाई और बुराई (हुस्न-ओ-क़ुब्ह) का फ़ैसला करे।
यह हम पहले कह चुके हैं कि आलोचक के लिए ज़रूरी नहीं कि वह किसी ख़ास फ़न या विषय से गहरी दिलचस्पी रखता हो, बल्कि उसको एक आम इल्मी और साहित्यिक ज़ौक़ रखने वाला इंसान होना चाहिए। लेकिन इसके यह मायने नहीं हैं कि हम इस इल्मी और साहित्यिक ज़ौक़ को इतना विस्तार दे दें कि हर वह शख़्स जो अलग-अलग इल्म और फ़न की एक सामान्य जानकारी रखता है, वह हर इल्म और फ़न की किताब पर आलोचना करने के क़ाबिल मान लिया जाए। या यह कि जो किसी एक ही ख़ास फ़न से गहरी दिलचस्पी रखता है, वह उस फ़न की किताबों पर आलोचना करने का हक़दार न माना जाए। ऐसे लोग जो तमाम इल्मों से दिलचस्पी रखते हुए उनकी ज़रूरी जानकारी रखते हों, बहुत कम होते हैं। इसलिए व्यावहारिक सूरत सिर्फ़ यही है कि हर शख़्स के ज़ौक़ और ज्ञान के लिहाज़ से आलोचनात्मक ख़िदमत की उम्मीद उससे करनी चाहिए।
हो सकता है कि एक शख़्स फ़लसफ़े (दर्शन) का ज़ौक़ रखता हो और साथ ही साथ साहित्य की अच्छाई-बुराई समझने की भी क़ाबिलियत रखता हो। तो ऐसी सूरत में वह यक़ीनन फ़लसफ़े की किताबों पर आलोचना करने का ज़्यादा हक़दार समझा जाएगा। लेकिन साहित्य पर गुफ़्तगू करने से भी उसे रोका नहीं जा सकता। मगर यह यक़ीनन ज़ुल्म होगा कि ऐसा शख़्स जो शायरी से बिल्कुल लगाव नहीं रखता, उसको मोमिन और ग़ालिब की तुलना करने के क़ाबिल समझा जाए, महज़ इसलिए कि फ़लसफ़े में उसकी बारीक़ियां निकालने की महारत बहुत मशहूर है।
साहित्य या शायरी में दो लफ़्ज़ अक्सर सुनने में आते हैं, एक सुख़न-गो (शायर) और दूसरा सुख़न-फ़हम (शायरी समझने वाला)। मेरी राय में दोनों लफ़्ज़ आलोचना की शब्दावली में शामिल कर लेने के क़ाबिल हैं क्योंकि सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना की बहस के सिलसिले में इनसे बहुत मदद मिल सकती है। अगर एक शख़्स अच्छा शायर है तो हम उसे सुख़न-गो कहते हैं, मगर दूसरा जो शायर नहीं है मगर शायरी का बेहतरीन ज़ौक़ रखता है, उसे सुख़न-फ़हम कहते हैं। फिर जिस तरह हर सुख़न-गो का सुख़न-फ़हम होना भी ज़रूरी नहीं, और इसकी सबसे नुमाया मिसाल हम मीर को पेश कर सकते हैं कि यूं तो वह सुख़न-गोई के लिहाज़ से यक़ीनन ख़ुदा-ए-तग़ज़्ज़ुल (ग़ज़ल के ख़ुदा) हैं, लेकिन जिस वक़्त वह ख़ुद अपने अशआर का चुनाव पेश करते हैं तो हमको हैरत होती है कि दुनिया जिन अशआर को मीर के नश्तर समझती है, वे ख़ुद मीर के नज़दीक दिल में फांस चुभाने की भी क़ाबिलियत नहीं रखते।
मैंने चुनाव करने की क्षमता का यह दोष अक्सर अच्छे शायरों में पाया है और मनोवैज्ञानिक नज़रिए से ग़ौर करने के बाद इसे बिल्कुल तर्कसंगत पाता हूँ, क्योंकि शायर की हैसियत एक ऐसे कलाकार की है जो अपनी हर कोशिश में अपनी पूरी रूह लगा देता है और अपनी तमाम साहित्यिक रचनाओं को वह उसी नज़र से देखता है जैसे कोई बाप अपनी कई औलादों को देखता है। इसलिए जब उसे ख़ुद अपने कलाम के चुनाव के लिए मजबूर किया जाएगा, तो यक़ीनन वह कोई सही राय नहीं दे सकेगा। इसीलिए आलोचना का हक़ अदा करने के लिए यह ज़रूरी है कि गिरेबान मेरा हो और हाथ आपका, मैं ख़ुद अपने हाथ से अपने गिरेबान के फैलाव और तंगी की दाद नहीं दे सकता।
साहित्य और ख़ास तौर पर शायरी पर टिप्पणी करने के सिलसिले में सबसे ज़्यादा झगड़े की चीज़ ज़ौक़ (रुचि) का सवाल है। हो सकता है कि एक ही चीज़ आपके लिए पसंदीदा हो और मेरे लिए नागवार, बयान का एक ही अंदाज़ मुझे भाता हो और आपको पसंद न हो। इसलिए आलोचना के क्षेत्र में यह तयशुदा उसूल मान लिया गया है कि जिस वक़्त सवाल सिर्फ़ ज़ौक़ का पैदा होगा, तो हमें विशिष्ट वर्ग को सामने रखना पड़ेगा, और आलोचना के ये उसूल तक़रीबन वही हैं जिनका मैं ऊपर ज़िक्र कर चुका हूँ और जिनकी बुनियाद अंतर्ज्ञान (विजदान) और मनोविज्ञान दोनों पर क़ायम है।
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