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अदबी समाजियात

मोहम्मद हसन


अनुवाद : Rekhta Editor

मोहम्मद हसन

अदबी समाजियात

मोहम्मद हसन

MORE BYमोहम्मद हसन

    अदबी समाजियात, अदब (साहित्य) को समाज के रिश्तों से और समाज को अदब के माध्यम से पहचानने की कोशिश है। अदबी समाजियात, अदब का अध्ययन समाज की अभिव्यक्ति के माध्यम के तौर पर ही नहीं करती, बल्कि इसके आईने में समकालीन समस्याओं, जीवन मूल्यों, बदलती हुई साहित्यिक रुचि और उनके कारणों को परखना और पहचानना भी चाहती है। बयान के अंदाज़ और तकनीक की बदलती हुई अवधारणाएं भी इसी दायरे में आती हैं।

    लेकिन इससे आगे बढ़कर वह रचना के साथ-साथ रचनाकार का भी अध्ययन करती है, वह शायरों और अदीबों के पेशे, उनके वर्ग, उनके ग्रामीण और शहरी रिश्तों और उनकी ज़िंदगी के रंग-ढंग को ही नहीं, बल्कि जनता के दिमाग़ में उनकी तस्वीर पर भी चर्चा करती है और उनसे दूरगामी नतीजे निकालती है जो अदब और समाज दोनों के अध्ययन के सिलसिले में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

    अदबी समाजियात का तीसरा अहम पहलू साहित्यिक सरपरस्ती (संरक्षण) का मसला है। हर दौर में अदब की सरपरस्ती अलग-अलग तरीक़ों से अलग-अलग वर्गों के हाथों में रही है और ज़ाहिर है कि इस सरपरस्ती के नतीजे रचनात्मक साहित्य की प्रवृत्तियों, तकनीक और बयान के अंदाज़ पर असर डालते रहे हैं। एक ज़माने में ग्रामीण समाज में चौपाल लोकगीतों और लोक कलाकृतियों की सरपरस्ती का केंद्र था, फिर दीवान-ख़ानों और दरबारों की सरपरस्ती का दौर आया। फिर औद्योगिक दौर में जनसंचार माध्यमों का बोलबाला हुआ। अख़बारों और पत्रिकाओं, रेडियो, फ़िल्म और टेलीविज़न के ज़रिए सरपरस्ती की जाने लगी और किताबों की छपाई और प्रकाशन के कारोबार में एकाधिकार रखने वालों (पूंजीपतियों) का सिक्का चलने लगा और इन सभी माध्यमों और संसाधनों ने अदब के रंग-ढंग, मूल विषय, रूप (शिल्प) और तकनीक सभी को प्रभावित किया।

    अदबी समाजियात का चौथा अहम पहलू अदब के सामाजिक प्रभाव की प्रक्रिया को पहचानना है। अदबी समाजियात सिर्फ़ इसी से मतलब नहीं रखती कि किस क़िस्म की किताबें और पत्रिकाएं ज़्यादा या कम बिकती हैं और किस हद तक लोकप्रिय हैं और क्यों? इसका विषय यह भी है कि किसी दौर का अदब उस दौर को किस हद तक और किस तरह प्रभावित करता है।

    ज़ाहिर है कि अदबी समाजियात की कार्यप्रणाली से आलोचना की विभिन्न विचारधाराओं को मतभेद है और यह बात अक्सर दोहराई जाती है कि अदबी समाजियात दरअसल साहित्यिक आलोचना का नहीं, बल्कि समाजशास्त्र का ही एक हिस्सा है और साहित्यिक समझ और कला की बारीकियों को समझने में इससे कोई मदद नहीं मिलती, बल्कि अक्सर इस क़िस्म की बारीकबीनी से अप्रासंगिक मुद्दे सामने जाते हैं जो साहित्यिक समझ को धुंधला देते हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि साहित्यिक आलोचना का कोई भी रवैया मुकम्मल और व्यापक नहीं कहा जा सकता और किसी कलाकृति के मूल्य के विभिन्न आयामों को समेटने के सिलसिले में अदबी समाजियात की भी एक अहम भूमिका है और इसे नज़रअंदाज़ करना अदब की समझ और इसकी सामाजिक सार्थकता के एक दिलचस्प और ज्ञानवर्धक पहलू से वंचित रहने के बराबर है। रिचर्ड होगर्ट ने लिखा था कि मुकम्मल साहित्यिक गवाह के बिना समाज का विद्यार्थी समाज की पूर्णता से अनजान रह जाएगा।

    “Without the full literacy witness, the student of society will be blind to the full ness of society”

    यही हाल अदब के विद्यार्थी का भी है। अदबी समाजियात के ज्ञान के बिना अदब की पूर्णता का एहसास और बोध मुमकिन नहीं, या कम से कम इसके एक अहम पहलू से वंचित रहना निश्चित है।

    समाजशास्त्रियों ने 19वीं सदी में कॉम्टे और सीसज़ के मार्गदर्शन में समाज के

    Literature and Society in‘ A guide to the Social Sciences’ ed۔ by Makenzie, London: wiedenfield and nicholson - 1966

    अध्ययन में अदब से काम लेने की परंपरा की बुनियाद डाली थी। 20वीं सदी में दुर्खीम और वेबर ने समाज के अध्ययन में जहां नए आयामों का इज़ाफ़ा किया, वहीं अदब के अध्ययन को भी नई अहमियत दी। आम तौर पर अदब के समाजशास्त्रीय अध्ययन के सिलसिले में दो रवैये अपनाए गए।

    पहला रवैया अदब को समाज के किसी विशेष दौर का आईना मानकर, उससे उस दौर के बारे में सांस्कृतिक और मूल्य-संबंधी प्रमाण हासिल करने का था, जिसकी शुरुआत लुई डी बोनाल्ड (1754 ई. से 1840) से होती है। यह सही है कि किसी दौर का अदब उस दौर का सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी होता है और जनता की, ख़ास तौर पर पढ़े-लिखे वर्गों की भावनाओं और अनुभूतियों का चित्रण भी करता है, लेकिन इससे सामाजिक नतीजे निकालना काफ़ी पेचीदा प्रक्रिया है और अक्सर भ्रामक भी हो सकता है। इसके लिए दो बातें ख़ास तौर पर ज़रूरी हैं, पहली तो यह कि किसी दौर के अदब को उसके साहित्यिक बयान के ढंग, साहित्यिक परंपरा, फ़ैशन और फ़ॉर्मूले से अलग करके, उसके उस हिस्से तक पहुंच बनाई जाए जो वास्तव में असली हो और सही मायनों में अपने दौर का चित्रण करता हो, और इस हिस्से और इसकी असल सार्थकता तक इसके साहित्यिक अभिव्यक्ति के ढंग और विशेष शैली के बावजूद पहुंचा जाए। दूसरी यह कि उस दौर की भावनाओं और अनुभूतियों, सांस्कृतिक मूल्यों और अवधारणाओं का ज्ञान हमें किसी और माध्यम से भी हासिल हो चुका हो। यानी अदब के ज़रिए हासिल होने वाले प्रमाण समकालीन संस्कृति के बारे में पुष्टि तो कर सकते हैं, मगर अकेले प्रमाण के तौर पर काफ़ी नहीं हो सकते।

    इसके अलावा एक बड़ा ख़तरा यह भी है कि साहित्यिक कलाकृति कलात्मक दृष्टि से जितनी घटिया और निम्न होगी, सामाजिक चित्रण के लिहाज़ से शायद ज़्यादा वर्णनात्मक होने की वजह से उतनी ही ज़्यादा उपयोगी होगी। ग़ालिब के दीवान के मुक़ाबले में 1857 ई. की दिल्ली का हाल उस दौर के अख़बारों से कहीं बेहतर तौर पर मालूम हो सकता है। इस लिहाज़ से कलाकृति का सौंदर्यपरक गुण अदबी समाजियात के लिहाज़ से इसकी प्रमाणिकता की राह में बाधक हो सकता है। इसके अलावा अदब में चूंकि व्याख्या की गुंजाइश बहुत ज़्यादा है, इसलिए इससे निकाले गए नतीजे भ्रामक हद तक सापेक्ष और व्यक्तिपरक हो सकते हैं।

    इन ख़तरों के मद्देनज़र अदबी समाजियात की एक दूसरी विचारधारा ने अदब को किसी दौर के समाज की हूबहू तस्वीर समझने के बजाय इस बात पर ज़ोर दिया कि अदब किसी दौर की भावनाओं और अनुभूतियों के सांचे की निशानदेही करता है और इसे घटनाओं का वर्णन समझने के बजाय किसी दौर की उम्मीदों, अरमानों, आशंकाओं, ख़्वाबों और ख़्वाहिशों से बुना एक ऐसा ताना-बाना समझना चाहिए जो कुछ रवैयों और मूल्यों में साकार हो गया है। इस लिहाज़ से वह एक ऐसा जटिल मिश्रण है जिसे अभी अदबी समाजियात को अपने तौर पर अपनी ज़बान में ढालना है और अपने तौर पर विश्लेषण के बाद समझना है। बक़ौल लोवेन्थाल (Lowenthal) उपन्यासों के किरदारों की अंदरूनी ज़िंदगी की सामाजिक सार्थकता सामाजिक परिवर्तन की समस्याओं से जुड़ी होती है और इस रिश्ते को अदबी समाजियात के ज़रिए ही पहचाना जा सकता है। जैसे-जैसे अदबी समाजियात का ज्ञान विशेषज्ञों के दायरों में बंटता गया और स्पेशलाइज़ेशन (Specialization) आम हुआ, अदब की विभिन्न शैलियों और उनके विषयों, विमर्शों और मूल्यों की छान-फटक इसी दृष्टिकोण से की जाने लगी।

    अदबी समाजियात की दूसरी विचारधारा वह थी जिसने अदब का अध्ययन सौंदर्यपरक कलाकृति के बजाय व्यापारिक वस्तु की हैसियत से किया। उनके नज़दीक अहम मसला यह था कि किसी दौर में अदब की सरपरस्ती किन वर्गों के हाथ में रही है और क्यों? अदब के प्रकाशन का ख़र्च कितना है और इस पर किस वर्ग का क़ब्ज़ा है या इसका स्वरूप क्या है? जनसंचार माध्यमों का इसमें कितना हिस्सा है? इस सिलसिले में मशहूर फ्रांसीसी अदबी समाजियात के विशेषज्ञ रॉबर्ट एस्कार्पिट (Robert Escarpit) ने उल्लेखनीय काम किए।

    इस सिलसिले में लेखक (अदीब) और उसकी रचना, और इस रचना के ज़रिए उसके पाठक तक उसके नतीजे तक पहुँचने की समस्याएँ भी सामने आईं और अलगाव (बेगानगी) का सवाल भी उठा। औद्योगिक दौर में लेखक अपनी कलाकृति से काफी हद तक कट कर रह गया है और असंबद्ध (गैर-मुताल्लिक) और बेगाना हो गया है। उसकी रचना औद्योगिक दौर के जनसंचार माध्यमों में पूरी तरह से उसके व्यक्तित्व (ज़ात) की अभिव्यक्ति नहीं रह जाती, बल्कि उसके व्यक्तित्व से आज़ाद हो जाती है। इसकी सबसे स्पष्ट मिसाल फिल्म के लिए गाना लिखने वाले शायर की रचना है। यह गाना शायर अक्सर अपने व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति या अपनी भावनाओं और एहसासों के इज़हार के लिए नहीं, बल्कि दी गई स्थिति पर प्रोड्यूसर या डायरेक्टर की फरमाइश के मुताबिक लिखता है, जिसकी धुन अक्सर म्यूज़िक डायरेक्टर पहले ही दे देता है। और यह भी मुमकिन है कि शायर जब अपना गीत पूरा करके लाए, तो म्यूज़िक डायरेक्टर या सलाहकारों के मशवरे से गीत के बोलों में तब्दीली कर दी जाए या एक-दो पंक्तियों या लफ़्ज़ों का इज़ाफ़ा कर दिया जाए। जब यह गीत रूपहले पर्दे (सिनेमा स्क्रीन) पर पेश होगा, तो शायर का गीत कोई एक्टर या एक्ट्रेस किसी दूसरे गायक या गायिका की आवाज़ में म्यूज़िक डायरेक्टर की धुन पर गा रहा होगा या गा रही होगी। और उसका गीत अब सिर्फ उसका अपना नहीं होगा, इसमें बहुत से दूसरे कलाकार भी शामिल और शरीक होंगे, और शायर की शख्सियत इस मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते गीत से लगभग बेगानी (Alienate) हो चुकी होगी। यानी गीत अब उसके लिए अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि व्यापार का माल (माल-ए-तिजारत) बन चुका होगा।

    ज़ाहिर है, यह सवाल सिर्फ साहित्य के संरक्षण (सरपरस्ती) का नहीं है, बल्कि पूरी रचनात्मक प्रक्रिया को प्रभावित करने का है और इसकी जड़ें साहित्यिक आलोचना की बुनियादी बहसों तक फैली हुई हैं। इसी नज़रिए की बिना पर मानहेम (Mannheim) ने लेखकों को एक घूमने-फिरने वाली ऐसी बौद्धिक मखलूक करार दिया था जो अपनी जड़ों से कट चुकी है और जिसकी साहित्यिक रचना अब व्यापार का माल बन चुकी है। इसके बरखिलाफ लूसियन गोल्डमान (Lucien Goldmann) ने यह दलील पेश की है कि यह स्थिति सिर्फ निचले दर्जे के लेखकों के साथ पेश आती है, जबकि आला दर्जे का लेखक कभी बाज़ार के लिए नहीं लिखता और इस तरह वह पब्लिशर, लेखक और पाठक के दबाव से निकल जाता है और अपनी रचनाओं को व्यापार का माल नहीं बनने देता।

    इसके साथ-साथ साहित्यिक समाजशास्त्र (अदबी समाजियात) इसका भी अध्ययन करता है कि एक खास समाज पर किसी साहित्यिक कलाकृति का किस तरह का रिएक्शन (रद्द-ए-अमल) होता है। दोस्तोवस्की के उपन्यासों को किस तरह नाज़ियों ने जर्मनी में अपनी बुद्धि-विरोधी और ज्ञान-विरोधी विचारधाराओं के समर्थन में इस्तेमाल किया, इसका विश्लेषण लोवेन्थाल (Lowenthal) ने बड़ी खूबी से किया है।

    इसके साथ-साथ खुद लेखकों का अध्ययन साहित्यिक समाजशास्त्र के लिए दिलचस्पी का विषय रहा है। बड़े कलाकार की कलाकृतियाँ, लोवेन्थाल के शब्दों में, हकीकत से ज़्यादा हकीकत होती हैं और रिचर्ड होगार्ट के शब्दों में, महान साहित्य इंसानी तजुर्बों की गहराइयों तक पहुँच हासिल करता है, क्योंकि इसमें सिर्फ व्यक्तिगत स्थितियों से आगे बढ़कर, सतही बारीकियों के नीचे काम कर रही टिकाऊ प्रवृत्तियों को देख लेने की अंतर्दृष्टि (बसीरत) होती है। और महान साहित्य इसीलिए इस गहरी अंतर्दृष्टि की बिना पर अपने दौर के बाद भी ज़िंदा रहता है, क्योंकि वह उन बुनियादी मूल्यों और रुझानों को अपनी पकड़ में ले लेता है जो किसी दौर के अलग-अलग समूहों और वर्गों के बीच साझा रिश्ते कायम करते हैं। आधुनिक युग के इंसान को समझने के लिए अवामी कल्चर के इन्हीं सबूतों से काम लिया जा सकता है।

    (१)

    यूँ तो साहित्य के सामाजिक अध्ययन की परंपरा प्लेटो (अफ़लातून) से शुरू होती है, जिसने हकीकत और ललित कलाओं (फ़नून-ए-लतीफ़ा) के रिश्ते पर गौर करके कला को 'नकल की नकल' करार दिया था और दूसरी तरफ समाज पर कला के नुकसानदेह असर को देखते हुए कलाकारों को अपने आदर्श समाज से निकाल बाहर किया था। लेकिन विज्ञान के उभार के बाद साहित्य का रिश्ता समाज से और गहरा हो गया और यह कोशिश की जाने लगी कि जिस तरह वैज्ञानिक तरीका भौतिक हकीकत के अलग-अलग हिस्सों को वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) तौर पर जाँचने और परखने में कामयाबी हासिल कर चुका है, उसी तरह साहित्य की परख में भी दो-टूक और पक्के फैसलों तक पहुँचा जाए। प्रत्यक्षवाद (Positivism) इसी कोशिश का नतीजा था और साहित्य को वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ पैमानों पर परखने की कोशिश अलग-अलग रूपों में जारी रही। विको (Vico) ने 1725 ई. में नई साइंस में इसकी कोशिश की।

    हर्डर (Herder) ने (1744 ई. से 1803 ई.) अपनी किताबों में कल्पना (तखय्युल) और खेल के नज़रिए के ज़रिए साहित्य के मनोरंजक तत्व को सामाजिक तरबियत और शख्सियत के निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ना चाहा। मैडम डी स्टेल (Madame de Staël) (1755 ई. से 1817 ई.) ने साहित्य को राष्ट्रीय मिज़ाज का अक्स करार दिया और उस पर आब-ओ-हवा और रहन-सहन के भौगोलिक और सांस्कृतिक असर तलाश करने की कोशिश की। उन्होंने इस खयाल का भी इज़हार किया कि नॉवेल सिर्फ उन समाजों में तरक्की पाता है जहाँ औरत का मर्तबा ऊँचा होता है। मध्यम वर्ग का उभार, आज़ादी और नेकी के उन मूल्यों की ज़मानत देता है जो कला की ज़रूरी शर्तें हैं। उन्होंने लिखा, मुबारक है वह देश जहाँ लेखक उदास हों, व्यापारी संतुष्ट हों, दौलतमंद दुखी हों और अवाम खुशहाल हों।

    इस तरह की कोशिशों से अलग, तेन (Taine) (1828 ई. से 1893 ई.) ने पहली बार सभ्यता और इतिहास के पसमंज़र में आलोचना की शुरुआत की और साहित्यिक आलोचना के ऐतिहासिक स्कूल की बुनियाद डाली, और इस लिहाज़ से तेन को साहित्यिक समाजशास्त्र का संस्थापक (बानी) करार दिया जा सकता है। तेन की कोशिश यह थी कि साहित्य का किसी एक वस्तुनिष्ठ साइंटिफिक तत्व की मदद से अध्ययन किया जाए, जिसमें मतभेद की गुंजाइश हो और जिसको जाँचा और परखा जा सके। इसके लिए उन्होंने नस्ल (Race), क्षण (Moment) और माहौल (Milieu) का फॉर्मूला बनाया। उनके नज़दीक हर दौर का साहित्य अपने नस्ली मिज़ाज का आईनादार होता है और अपने दौर के आम माहौल और समकालीन घटनाओं, विचारों और मूल्यों से मिलकर बनता है, और अपने रचनाकार के ज़हनी और दिली अनुभवों का अक्स पेश करता है। यानी अगर कोई साहित्यिक आलोचक किसी साहित्य के नस्ली मिज़ाज के तत्वों का पता लगा ले, उसके दौर के आम माहौल के तत्वों को पहचान ले और कलाकार की शख्सियत और उसके निजी हालात और अनुभवों की निशानदेही कर ले, तो वह उस साहित्यिक रचना के विश्लेषण में सक्षम हो सकता है। लेकिन इस तरह के आलोचनात्मक रवैये में माहौल और बाहरी कारकों को रचनात्मक प्रक्रिया में बुनियादी अहमियत दे दी गई है और रचनात्मक प्रक्रिया की उपज, उसके निजी पहलू और उसकी कलात्मक आंतरिक शख्सियत को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।

    इसके अलावा यहाँ साहित्य को मानो एक सामाजिक दस्तावेज़ की हैसियत दे दी गई है, जो सही नहीं है। लेखक महज़ रिपोर्टर नहीं है, वह महज़ कैमरे की आँख या कैसेट का रिकॉर्डर नहीं है कि जो देखे या सुने उसे महफूज़ करता जाए, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक और रचनात्मक हैसियत है और इसमें कल्पना का एक बड़ा हिस्सा है। इस लिहाज़ से साहित्य में पेश की गई बारीकियों को ऐतिहासिक हकीकत का दर्जा देना उतना ही गलत और गुमराह करने वाला होगा, जितना साहित्य के कलात्मक पहलू और उसकी सौंदर्यशास्त्रीय अंतर्दृष्टि (जमालियाती बसीरत) को नज़रअंदाज़ करना।

    तेन की वैज्ञानिक आलोचना की इस कोशिश के साथ-साथ कार्ल मार्क्स (1818-1883) और फ्रेडरिक एंगेल्स (1820-1895) के सामाजिक दृष्टिकोण से पैदा होने वाली साहित्यिक आलोचना थी। यह बात उल्लेखनीय है कि बॉन यूनिवर्सिटी में मार्क्स की दिलचस्पी क़ानून से ज़्यादा साहित्य से थी। और शायरी के अलावा एक मज़ाकिया क़िस्सा A Humorous Tale के नाम से उसने एक अधूरा नॉवेल भी लिखा था। क्लासिकी तर्ज़ का त्रासद (अलमिया) ड्रामा लिखने की भी कोशिश की थी और 1840 में हीगल के प्रभाव में साहित्य का यह शौक़ आख़िरकार दर्शन की भेंट चढ़ गया।

    तेन ने साहित्य को व्यक्ति की रचना क़रार दिया और इसीलिए व्यक्ति के व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक अध्ययन को साहित्यिक आलोचना की बुनियाद बना डाला। मार्क्स और एंगेल्स ने इसके बरख़िलाफ़ साहित्य को किसी दौर की हावी सच्चाई का दर्पण क़रार दिया। वे साहित्य में महज़ किसी दौर की तस्वीर या बयान तलाश नहीं करते, बल्कि उन मूल्यों की खोज करते हैं जिनसे वह दौर पहचाना जाता है।

    मार्क्स और एंगेल्स ने साहित्य को सामाजिक विकास की प्रक्रिया का हिस्सा क़रार दिया। उनके नज़दीक सामाजिक विकास भौतिक द्वंद्ववाद का ही दूसरा नाम है। और हर दौर का समाज अपनी आर्थिक ज़रूरतों और आर्थिक व्यवस्था के एतबार से अलग-अलग वर्गों में बंटा हुआ होता है और हर वर्ग अपनी आर्थिक ज़रूरतों की वजह से अपनी संस्कृति और मूल्य-व्यवस्था का पाबंद होता है। अलग-अलग वर्गों की ये मूल्य-व्यवस्थाएं एक-दूसरे से टकराती हैं और इसी टकराव से सामाजिक विकास मुमकिन होता है। हर वर्ग की अपनी संस्कृति, अपने मूल्य और अपना साहित्य है और इसी तरह हर दौर के साहित्य का कोई कोई वैचारिक झुकाव ज़रूर होता है। या तो वह उन शोषक वर्गों का हामी होता है जो बदलाव और विकास के विरोधी हैं, या फिर उन मज़लूम वर्गों का हिमायती और उनके प्रगतिशील और बदलाव इंक़लाब चाहने वाले मूल्यों का पैरोकार होता है, जो कमज़ोर होने के बावजूद सत्ता से टकराते हैं। यही झुकाव साहित्य को सिर्फ़ अपने दौर के इंक़लाबी रवैये से तालमेल में रखता है, बल्कि उसे इंसानियत के हर दौर के प्रगतिशील तत्वों का समर्थक और हम-आवाज़ बना देता है।

    मार्क्सवाद ने साहित्य को आर्थिक व्यवस्था के बनाने और बदलने वाले वर्गीय टकराव से जोड़ दिया। अलबत्ता मार्क्स और एंगेल्स दोनों ने इस दृष्टिकोण को यांत्रिक होने से बचाने की कोशिश की और बार-बार इस पर ज़ोर दिया कि साहित्य को महानता बख़्शने वाला तत्व युग-बोध (रूह-ए-असर) से उसका जुड़ाव और उसकी सच्चाइयों पर उसकी नज़र है, महज़ वैचारिक झुकाव नहीं। चुनांचे मार्क्स ने बाल्ज़ाक को सामंती व्यवस्था से उसकी वैचारिक वफ़ादारियों के बावजूद, और लेनिन ने लियो टॉल्स्टॉय को उनके विचारों के प्रतिगामी तत्वों के बावजूद कलाकार तस्लीम किया। क्योंकि दोनों युग-बोध से रिश्ता जोड़ने में कामयाब हुए। हालांकि उनका दृष्टिकोण इस राह में रुकावट था। इसी बात को ज़्यादा स्पष्टता के साथ बाद के दौर के मशहूर मार्क्सवादी आलोचक लूकाच ने इन अल्फ़ाज़ में बयान किया:

    बाल्ज़ाक की तरह जब कोई अज़ीम यथार्थवादी जब कभी यह देखता है कि उसके रचे गए हालात और किरदारों का आंतरिक कलात्मक विकास उसके अपने अज़ीज़ मूल्यों और पूर्वाग्रहों या उसके अपने पवित्र अक़ीदों से टकराता है, तो वह एक लम्हे की भी हिचकिचाहट किए बग़ैर अपने पूर्वाग्रहों और अक़ीदों को ताक़ पर रख देता है और वह सब कुछ बयान करने लगता है जो वह ख़ुद देख रहा है, और वह बयान नहीं करता जो वह देखना चाहता है (और जो हक़ीक़त के ख़िलाफ़ है)।

    बाद के आलोचकों में कॉडवेल ने साहित्य को कर्म के लिए ज़हनी तैयारी का ज़रिया क़रार देकर अतिरिक्त ऊर्जा की क्रियाशीलता बताया। लूकाच ने समग्रता, विश्व-दृष्टि और प्रतिनिधि चरित्र की अवधारणाओं का इज़ाफ़ा किया। समग्रता से मुराद यह थी कि हर व्यक्ति के निजी एहसास और जज़्बात दरअसल उस दौर की वर्गीय व्यवस्था के किसी किसी हिस्से की नुमाइंदगी करते हैं और लाज़िमी तौर पर सामूहिक लय की किसी एक इकाई की आवाज़ हैं। इकाई का यह तसव्वुर किसी किसी विश्व-दृष्टि पर आधारित होना लाज़िम है। इस विश्व-दृष्टि में किसी भी रचनात्मक कलाकृति की बाहरी और सार्वभौमिक सार्थकता को तय करना है, और टाइप या प्रतिनिधि स्थिति या प्रतिनिधि किरदार किसी मख़सूस दौर के बदलते हुए नक़्शे की वे इकाइयां हैं जो सामाजिक बदलाव का ज़रिया बनी हुई हैं और जो इतिहास के इस मोड़ पर निर्णायक हैसियत रखती हैं।

    गोल्डमान ने लूकाच के नज़रियों को एक नई दिशा बख़्शी। अपने काम के तरीक़े को गोल्डमान ने Generalized Genetic Structuralism (सामान्य, आनुवंशिक, संरचनावाद) का नाम दिया। इसका सार सिर्फ़ यह था कि हर साहित्यिक कलाकृति को अपने आप में एक मुकम्मल इकाई क़रार दिया जाए और उसे पहले उसके अलग-अलग तत्वों और हिस्सों की पहचान और उनके आपसी रिश्तों के ज़रिए समझने की कोशिश की जाए। और फिर इन तत्वों और हिस्सों की ठोस ऐतिहासिक और सामाजिक जड़ें और कारण प्रेरक तलाश किए जाएं, और उन्हें उन सामाजिक वर्गों से जोड़कर देखा जाए जो लेखक के आलमी विज़न या जीवन-दृष्टि में ज़ाहिर हुए हैं।

    इस एतबार से गोल्डमान का संरचनावाद रूसी रूपवादियों (मसलन तलाव्स्की और रोमन जैकबसन वग़ैरह) से बिल्कुल अलग है, बल्कि यह रूपवादियों की पाठ-पूजा और मार्क्सवादी आलोचना के सामाजिक विश्लेषण के बीच एक असरदार समझौता है।

    (2)

    मगर साहित्य की सामाजिक व्याख्या और सामाजिक विकास के ज़रिए उसकी समझ साहित्यिक समाजशास्त्र का महज़ एक पहलू है। साहित्य का ताल्लुक़ लाज़िमी तौर पर किसी किसी हद तक कलाकार की शख़्सियत से भी होता है और साहित्यिक समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से हर कलाकार एक ऐसा सांस लेता हुआ इंसान है जो अपने समाज का हिस्सा है, उसके किसी किसी वर्ग से ताल्लुक़ रखता है, वह अपने ख़ानदान का एक फ़र्द भी है, वह किसी का बेटा भी है, किसी का भाई भी और किसी का मोहल्लेदार भी। इस एतबार से उसकी सामाजिक पहचान है और इसका असर महज़ मनोवैज्ञानिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक स्तर पर उसके एहसासात पर ही नहीं, उसकी पूरी संवेदना और पूरी चेतना पर पड़ता है।

    सामाजिक बदलाव का अमल यहां भी लगातार जारी रहता है। एक ज़माना था जब शायर चौपाल में सामूहिक प्रामाणिकता और जन-स्वीकृति वाले क़िस्से नज़्म करता था और गली-गली गाता था। फिर वह देहातों से शहर आया और चौपाल से दीवान और दरबार तक पहुंचा। उसकी माली हैसियत बदली, उसकी वर्गीय प्रकृति बदली, और यह विश्लेषण दिलचस्पी से ख़ाली होगा कि किसी दौर के अदीब कितने शहरों में आबाद हैं और कितने देहातों में बसे हुए हैं। उनके पेशे क्या हैं और उनकी वर्गीय संबद्धता की नौइयत क्या है। एरिक फ्रॉम (Erich Fromm) ने अपने एक मक़ाले में इस ख़याल का इज़हार किया है कि अच्छे अदीब के लिए मौजूदा दौर में साहित्य को पेशा बनाने के बजाय ग़ैर-साहित्यिक पेशों में रहकर साहित्य को महज़ अंशकालिक दिलचस्पी बनाए रखना ज़रूरी हो गया है, ताकि साहित्य पर शायर के रोज़गार के असर पड़ें।

    अदीबों के इन व्यक्तिगत अध्ययनों का ताल्लुक़ उनकी मनोवैज्ञानिक पेचीदगियों से नहीं है, क्योंकि साहित्यिक समाजशास्त्र मनोवैज्ञानिक आलोचना के स्कूल से अलग है। अलबत्ता साहित्यिक समाजशास्त्र का ज़ोर है कि व्यक्तिगत मनोविज्ञान भी दरअसल व्यापक सामूहिक समाजशास्त्र का ही एक हिस्सा है, और इस लिहाज़ से साहित्यिक समाजशास्त्र अदीबों की व्यक्तिगत स्थिति का अध्ययन करके अदीबों की सामूहिक हैसियत और उनके साहित्य पर पड़ने वाले प्रभावों के मुताल्लिक़ नतीजे निकालता है।

    अलग-अलग दौर में अदीबों (साहित्यकारों) के व्यक्तित्व, उनके पेशे, शौक और वर्गीय भूमिका का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो इससे सिर्फ दिलचस्प नतीजे निकल सकते हैं बल्कि उनके विषयों और बयान के अंदाज़, उनके प्रतीकों और बिंबों के बारे में भी नई जानकारी मिल सकती है और हर दौर में शायर और अदीब की बदलती हुई तस्वीर और उसकी शोहरत और मक़बूलियत के उतार-चढ़ाव के अध्ययन से भी कुछ अहम तथ्य सामने सकते हैं। इन अध्ययनों से साहित्य की समझ और उसकी परख का एक नया पहलू तो सामने आएगा ही, इसके साथ-साथ किसी दौर के समाज की मानसिक और भावनात्मक सेहत या बीमारी के बारे में भी जानकारी हासिल हो सकती है।

    इस नज़रिए से हर व्यक्ति समाज की अभिव्यक्ति का ज़रिया है और हर शायर और अदीब की निजी संवेदना व्यापक सामूहिक संवेदना का हिस्सा भी है और उसकी प्रतिनिधि भी, और व्यक्तिगत संवेदना ही नहीं व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तिगत रवैयों का अध्ययन भी पूरे समाज के अध्ययन को अपने घेरे में ले लेता है और यही रवैये कभी साहित्य की दुनिया की धूप-छाँव में ज़ाहिर होते हैं। कभी दूसरे ज्ञान और कलाओं के रंग और लय में और कभी समाज की बनावट और उसके बदलावों की निशानदेही करते हैं।

    (3)

    अदबी समाजियात (साहित्यिक समाजशास्त्र) का तीसरा अहम पहलू साहित्य का संरक्षण करने वाली संस्थाओं का अध्ययन है। ज़ाहिर है कि यह भी साहित्य के विषयों और बयान के अंदाज़ दोनों पर अपने तौर पर असर डालता है। कहावत मशहूर है कि जो पैसा देगा वही राग चुनेगा। पहले ज़माने में साहित्य के संरक्षण का मामला सीधा-सादा था और इसकी संरक्षक संस्थाओं की पहचान ज़्यादा आसान थी। शायर का संरक्षण कबीला या उसका समाज करता था। फिर यह काम अमीर-उमरा के हवाले हुआ। दीवानख़ानों में शायर और दास्तानगो आबाद होने लगे। फिर शायर की सरकारी दरबार तक पहुँच हुई। शायर क़सीदा-ख़्वाँ (प्रशंसा करने वाला) और अदीब पर्चा-नवीस (पत्रकार) और मीर मुंशी बन गया और इन सभी पदों और पेशों में मुक़ाबला होने लगा। शायर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मोर्चाबंद होने लगे। अदबी बहसों के मैदान गर्म हुए।

    अदबी शैली पर भी इसका असर पड़ा। शिल्पकारी का रिवाज़ हुआ। गद्य में सजावट और तुकबंदी वाले अंदाज़ के ज़रिए अदीब अपना कमाल ज़ाहिर करने लगे। शायरी में कहीं ईहाम (द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग) का चलन हुआ, कहीं लफ़्ज़ी बाज़ीगरी का, कहीं ख़याल-बंदी और नए विषय गढ़ने के ऐसे हथकंडे इस्तेमाल किए जाने लगे जो विरोधियों के मुक़ाबले में शायर की श्रेष्ठता ज़ाहिर कर सकें। शब्दों की शान-ओ-शौकत का ख़याल रखा जाने लगा। क़सीदा कमाल दिखाने का ज़रिया और रोज़ी-रोटी का साधन बन गया और शायर आम कारोबार में लगने या आम पेशे अपनाने के बजाय ख़ुद को कुलीन वर्ग का हिस्सा समझने लगा और अपने रुतबे को ऊँचा मानने लगा।

    औद्योगिक क्रांति के बाद जब साहित्य का संरक्षण पूँजीपतियों के हाथ में आया तो इसकी प्रकृति में अहम बदलाव हुए। अकादमियाँ बनने लगीं, यूनिवर्सिटियों का विकास हुआ और साहित्य के संरक्षण के दूसरे अप्रत्यक्ष रूप अपनाए जाने लगे। क़सीदा लिखने वाले लुप्त हो गए मगर सत्ताधारियों की प्रशंसा और चापलूसी में कमी नहीं हुई। जनसंचार माध्यमों ने क़सीदा लिखने वालों की जगह लेने का हक़ अदा कर दिया। जनसंचार माध्यमों का चलन हुआ तो प्रेस और अख़बार वजूद में आए। फ़िल्म, रेडियो और टेलीविज़न का रिवाज़ हुआ और इनमें से हर माध्यम ने साहित्य के विषयों, बयान के अंदाज़ और तकनीक पर बहुत दूरगामी असर डाले। साहित्य के प्रभाव क्षेत्र को व्यापक भी किया और गहरा भी, और इनमें से हर असर की प्रकृति इतनी जटिल और विविध है कि साहित्यिक शोध के लिए नई संभावनाओं का दरवाज़ा खुलता है। अदबी समाजियात इन सभी प्रभावों के अध्ययन के ज़रिए आगे बढ़ती है।

    अलग-अलग जनसंचार माध्यमों के साहित्यिक प्रभावों के सिलसिले में रेडियो और फ़िल्म की मिसालें काफ़ी होंगी। रेडियो ने महज़ आवाज़ की इकाइयों के ज़रिए कलाकृतियों की रचना की, आवाज़ के प्रभाव-खंडों को नई तकनीक के माध्यम से पेश किया। फ़्लैशबैक मक़बूल हुआ और बैकग्राउंड म्यूज़िक ने महज़ माहौल ही नहीं बनाया बल्कि प्रतीकात्मक ढंग से मानो पूरी स्थिति को बयान कर दिया। ये सब तकनीकें काव्य और कथा साहित्य में भी अपने तौर पर रच-बस गईं। फ़िल्म ने बिखरे हुए वर्णनात्मक टुकड़ों की इकाइयों का इस्तेमाल किया। मोंटाज की तकनीक बरती और माहौल बनाने और परिप्रेक्ष्य (Perspective) को असरदार तौर पर अपनाया। इन सभी हथकंडों को साहित्य की अन्य विधाओं में बरता जाने लगा, बल्कि यह कहना ग़लत होगा कि साहित्य में कुछ विधाओं की शुरुआत और विकास, संरक्षण करने वाले वर्गों और संस्थाओं और संरक्षण के तरीक़ों की ही देन है।

    क़सीदा दरबारों के संरक्षण के बिना शायद इस तरह विकसित होता, नॉवेल को औद्योगिक दौर का महाकाव्य कहा जाता है, मध्यम वर्ग के उदय, प्रेस के चलन और छापेख़ाने और अख़बारों पत्रिकाओं के रिवाज़ के बिना नॉवेल का विकास मुमकिन था। जिन्न, परियों, बादशाहों और शहज़ादों के रूमानी क़िस्से और रूमानी कारनामों से दिल बहलाने वाले समाज की जगह मध्यम वर्ग के पाठकों ने ले ली थी और अब वे अपने वर्ग के लोगों के क़िस्से, उनकी सफलताओं और नाकामियों की दास्तानें सुनना चाहते थे, इसीलिए नॉवेल ने दास्तान के नायक का ताज शहज़ादों के सिर से उतार कर मध्यम वर्ग के नौजवान और उसके समाज के सिर पर रख दिया। ग़रज़ साहित्य का संरक्षण करने वाली संस्थाओं के असर सीधे तौर पर विषय और रूप (विधा), विचार-शैली और अभिव्यक्ति के अंदाज़ पर पड़ते हैं।

    इसी पड़ाव पर जनसंचार माध्यमों के एकाधिकार का मसला भी सामने आता है। जागीरदारी दौर के विपरीत औद्योगिक दौर में शायर और अदीब की रचनाएँ सीधे तौर पर अवाम या उनके पाठकों/श्रोताओं तक नहीं पहुँचतीं, बल्कि इन दोनों के बीच जनसंचार माध्यमों का पूरा कारोबार है जिस पर सरकार या अमीर वर्गों का एकाधिकार किसी किसी रूप में क़ायम है। मिसाल के तौर पर कोई शायर शेर कहे तो उसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने का इंतज़ाम वह ख़ुद अपने तौर पर नहीं कर सकता। अख़बार, पत्रिकाएँ, प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता, रेडियो, फ़िल्म, टेलीविज़न या इसी क़िस्म का कोई ज़रिया उसे ज़रूर इस्तेमाल करना होगा और ये सब ज़रिए सीधे तौर पर उसके क़ाबू से बाहर हैं और इन संचार माध्यमों पर जो वर्ग या सत्ताधारी क़ाबिज़ हैं, वे अपने इसी एकाधिकार के ज़रिए अदीबों को, उनके रचे गए साहित्य और उनके विचारों और रवैयों को प्रभावित कर सकते हैं।

    इसका एक पहलू यह भी है कि अपनी रचनाओं को बाज़ार की वस्तु बनाने के ख़िलाफ़ विरोध के तौर पर कुछ अदीब संचार माध्यमों से अपना रिश्ता तोड़ना चाहते हैं और संचार की प्रक्रिया को ही फ़िज़ूल और ग़ैर-ज़रूरी क़रार देकर अपने वजूद की निजी अभिव्यक्ति ऐसे प्रतीकों और ऐसी इबारतों में करते हैं जो उनके निजीपन को बरक़रार रख सकें और उनके निजी प्रभावों और निजी अनुभवों को बाज़ार की वस्तु बनने दें। अलगाव की यह प्रक्रिया और पाठकों/श्रोताओं से कलाकार के रिश्ते के कट जाने का यह सिलसिला भी साहित्य और अदीब पर असर डालता है और समाज को भी प्रभावित करता है। अदबी समाजियात इसी क्रिया-प्रतिक्रिया का अध्ययन है।

    (4)

    साहित्यिक समाजशास्त्र का सबसे ज़्यादा व्यापक और शायद ज़्यादा वस्तुनिष्ठ क्षेत्र साहित्यिक रुचि का विश्लेषण, इसके कारकों और प्रेरकों का अध्ययन, और समाज पर इसके असर की प्रकृति और इसके प्रभाव क्षेत्र को तय करना है। कोई भी रचनात्मक कलाकृति अपनी गूंज से खाली नहीं होती। अलग-अलग रूपों में वह अवाम तक पहुँचती है। आम स्वीकृति हासिल करती है और उसकी लोकप्रियता कभी-कभी इस हद तक भी बढ़ जाती है कि वह अपने दौर की आवाज़ ही नहीं बनती बल्कि उस आवाज़ को बदलने में मददगार हो जाती है। साहित्यकारों और शायरों का ज़ाती असर यूँ भी होता है कि पढ़े-लिखे लोग उनकी नक़ल करने लगते हैं। उठने-बैठने, रहन-सहन, बातचीत के अंदाज़, लिबास और पोशाक ही में नहीं, चलने-फिरने के तरीक़े और मनोरंजन तथा शौक़ में भी उनका अनुसरण किया जाता है। यही नहीं बल्कि कुछ नॉवेलों के किरदार एक मिसाल बन जाते हैं और कुछ नॉवेल अपने दौर की संवेदना को बदलने में कामयाब होते हैं। रचनात्मक किरदारों पर हक़ीक़त का गुमान होने लगता है। लोग रिचर्डसन की 'पामेला' और मिर्ज़ा हादी हसन रुस्वा की 'उमराव जान अदा' के मकान तलाश करने निकल पड़ते हैं। कुछ नॉवेलों के ज़रिए चेतना और संवेदना में ऐसा बदलाव जाता है कि नॉवेलों के केंद्रीय विचार युगांतरकारी साबित होते हैं। मिसाल के तौर पर वॉल्टेयर का नॉवेल 'कांदीद' या बंकिम चटर्जी का नॉवेल 'आनंदमठ'।

    इन साहित्यिक कृतियों (और साहित्यकारों) के असर और पहुँच को किस तरह तय किया जाए और इन प्रभावों का अध्ययन कैसे हो? साहित्यिक समाजशास्त्र ने इसके लिए वस्तुनिष्ठ पैमाने बनाने की कोशिश की। सबसे पहले प्रकाशित किताबों के प्रकाशन के आँकड़ों की तरफ़ ध्यान दिया गया। किस साहित्यिक विधा की किताबें ज़्यादा बिकती हैं और उस विधा में भी किस क़िस्म की किताबें लोकप्रिय हैं, और इस रास्ते से साहित्यिक समाजशास्त्र किताबों की बिक्री के चार्ट और मार्केट सर्वे (बाज़ार के जायज़े) तक पहुँचा। ज़ाहिर है कि आँकड़े गुमराह करने वाले भी हो सकते हैं और लोकप्रियता और बिक्री के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें प्रकाशक का सलीक़ा, पुस्तक विक्रेता की विज्ञापनबाज़ी, समीक्षा लेखन की अहमियत और अन्य तत्व शामिल हो सकते हैं। फिर भी आम रुचि का पता लगाने के लिए दूसरे तरीक़ों के साथ-साथ यह तरीक़ा भी बरता जाता रहा है और इससे हासिल किए गए नतीजों को दूसरे तरीक़ों से निकाले गए नतीजों की पुष्टि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसी के साथ-साथ फ़िल्म, रेडियो और टेलीविज़न पर पेश होने वाले प्रोग्रामों का विश्लेषण भी किया जाता है जो आम रुचि की निशानदेही करता है और उस दौर के समाज के आम मूड को ज़ाहिर करता है।

    फ़िल्म, रेडियो और टेलीविज़न और अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यमों के ज़रिए अवाम तक पहुँचने वाले साहित्य को सामने रखकर किसी समाज की संवेदना के आम रुझान का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। किस क़िस्म के विषय किसी ख़ास समाज को ज़्यादा पसंद हैं (और इस मक़सद के लिए “Content Analysis” या विषय-वस्तु के विश्लेषण का तरीक़ा बरता जाता है), किस क़िस्म का अंदाज़-ए-बयान, प्रतीक, तलमीहें उसे ज़्यादा अज़ीज़ हैं, और इन सबकी मदद से किसी दौर की रुचि का ही नहीं, बल्कि उस समाज के जज़्बात और एहसासात, मूल्यों और विचारों का एक्स-रे किया जा सकता है।

    इस तरह साहित्यिक समाजशास्त्र पूरे समाज को एक इकाई या एक व्यक्ति समझकर उसका अध्ययन करता है और किसी दौर के अंदेशों और अरमानों, ख़्वाहिशों और ख़तरों का इसी नज़रिए से जायज़ा लेता है कि उस दौर के बदलते हुए पैटर्न, वैचारिक और संवेदनात्मक साँचे महज़ इत्तेफ़ाक़ी नहीं रहते, बल्कि सामाजिक विकास की प्रक्रिया का एक हिस्सा बन जाते हैं और साहित्य तथा सामाजिक विकास दोनों को समझने में मददगार होते हैं।

    मूल उर्दू लेख यहाँ पढ़िए :

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