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अदब में तंज़ की जगह

सय्यद एहतिशाम हुसैन


अनुवाद : Rekhta Editor

सय्यद एहतिशाम हुसैन

अदब में तंज़ की जगह

सय्यद एहतिशाम हुसैन

MORE BYसय्यद एहतिशाम हुसैन

    अगर यह सही है कि साहित्य (अदब) जीवन का तर्जुमान (प्रवक्ता) और चित्रकार होने के साथ-साथ उसका आलोचक भी है, तो आलोचना और परख के तमाम साधन, साहित्य के ज़रिए जीवन की कशमकश को समझने-समझाने और उसके विकास और पतन का विश्लेषण और इज़हार करने में लेखक की समझ (चेतना) के अनुसार काम में लाए जा सकते हैं।

     

    आलोचना के मौक़े उसी वक़्त ज़्यादा मिल सकते हैं जब किसी घटना या लेख से एक ख़ास क़िस्म का असर पैदा हो और उसी असर को ज़ाहिर करने में ज़ेहन और सोच की तमाम क्षमताएं काम में लग जाएं। अगर यह इज़हार, मतभेद या नापसंदगी, नफ़रत या नुक्ताचीनी की शक्ल में सामने आए, तो कभी-कभी लिखने वाले के मिज़ाज और बयान के अंदाज़ के अनुसार यह तंज़ (व्यंग्य) की शक्ल भी अख़्तियार कर सकता है। बल्कि यह कहना ग़लत न होगा कि असंतुलित या बेमौक़ा तत्वों की आलोचना में संजीदगी से ज़्यादा तंज़ को अहमियत हासिल होती है। इसीलिए वैचारिक साहित्य में तंज़ को कोई मामूली जगह नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि इसमें असर करने की जो क्षमता है, वह शायरी के सिवा साहित्य की किसी और विधा में इतनी मात्रा में नहीं पाई जाती।

     

    साहित्य की दूसरी विधाओं की तरह तंज़ की परिभाषा और उसकी सीमाएं तय करना भी आसान नहीं है। कुछ लोग तंज़ और हास्य (मिज़ाह) को इस तरह उलझा देते हैं कि तंज़ की हक़ीक़त हास्य में छिप जाती है। इसका कारण यही है कि हास्य की अलग-अलग शक्लों के बीच फ़र्क़ करने वाली लकीर खींचना मुश्किल है। तंज़, हास्य के सिवा कुछ और भी है और यही कुछ और पकड़ में नहीं आता। यूं तो हास्य और विनोद (ज़राफ़त) की दार्शनिक व्याख्या में बहुत सी बारीकियां निकाली गई हैं। हंसी की जैविक और शारीरिक प्रक्रिया से लेकर उसकी मानसिक और आध्यात्मिक कैफ़ियत तक बहुत से इशारे किए गए हैं, लेकिन तंज़ में एक विरोधाभासी कैफ़ियत होती है जिसे सुखद तकलीफ़ या नागवार मज़े का नाम दिया जा सकता है। तंज़ में नागवारी की जो कैफ़ियत मिलती है, शायद इसी वजह से बहुत से लोग इसे हास्य से अलग करके देखते हैं।

     

    थैकरे और मेरेडिथ दोनों ने हास्य की अहमियत तो मानी है लेकिन तंज़ की नहीं। असल हक़ीक़त यह है कि तंज़ का वजूद हास्य के बिना मुमकिन नहीं है। हां, हास्य तंज़ से बिल्कुल मुक्त भी हो सकता है। अरस्तू के ख़याल के मुताबिक़, ख़ालिस विनोद में भद्दापन और बदसूरती का एहसास हो सकता है लेकिन तकलीफ़ (अज़ियत) का एहसास नहीं होना चाहिए। इस तरह एक बात तो तय हो सकती है कि तंज़ हास्य की ही एक क़िस्म है जिसमें मक़सद के बदल जाने से कुछ ऐसी ख़ासियतें पैदा हो जाती हैं, जिन्हें विनोद बर्दाश्त नहीं कर सकता। तंज़ और हास्य में फ़र्क़ ज़ाहिर करना आसान न हो, लेकिन मालूम यही होता है कि विनोद का मक़सद मनोरंजन है और तंज़ का मक़सद असंतुलन (ज़्यादती और कमी) का सुधार करना है।

     

    तंज़निगारी (व्यंग्य लेखन) की हदें विनोद से जिस जगह अलग होती हैं, वहां सिर्फ़ मक़सद और बयान के अंदाज़ की दीवारें खड़ी की जा सकती हैं। लेकिन तंज़ के सिलसिले में जो चीज़ सबसे ज़्यादा ग़ौर करने लायक़ है, वह तंज़ और हक़ीक़त का रिश्ता है। हक़ीक़त को समझे बिना तंज़ पैदा ही नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर किसी के पास हक़ीक़त की कोई धारणा ही नहीं है, तो वह किसी क़िस्म के संतुलन की तलाश कर ही नहीं सकता। तंज़ के लिए हक़ीक़त के एक ऐसे केंद्र की ज़रूरत है जिसे लेखक की नज़र में व्यापकता और संतुलन हासिल हो, और जिससे घटना या बढ़ना उस व्यापकता और संतुलन में फ़र्क़ डालता हो।

     

    यही वजह है कि हर शख़्स तंज़ का हथियार इस्तेमाल नहीं कर सकता। तंज़ निगार (व्यंग्यकार) के सामने हक़ीक़त की एक तार्किक और भौतिक धारणा ज़रूर होनी चाहिए, वरना उसका तंज़ हास्यास्पद और बेनतीजा बनकर रह जाएगा। और जिस जगह तंज़ में हास्यास्पद पहलू पैदा हो जाए, वहां तंज़ कामयाब नहीं रह सकता। दूसरे लफ़्ज़ों में यह कि तंज़ महज़ ख़याली (काल्पनिक) नहीं हो सकता। इसका निशाना किसी भौतिक हक़ीक़त को होना चाहिए; महज़ लफ़्ज़ों के उलट-फेर से 'ज़िला जुगत' (शब्दों की बाज़ीगरी) बनती है। अर्थ की गहराई तंज़ पैदा करती है और इसके लिए हक़ीक़त की बुनियाद ज़रूरी है।

     

    जीवन की भौतिक रफ़्तार ख़याल पैदा करती है, उनसे असर लेती है, और अपने बहाव से दर्शन, धर्म, नैतिकता और सभ्यता के दूसरे रूपों को जन्म देती हुई चलती है। उन्हें नए सांचों में ढालती है। नई सूरतों में ज़ाहिर करती, नई शक्लों में आकार देती हुई आगे बढ़ती है। लेकिन दोनों का रिश्ता किसी ऐसी समानता और तालमेल पर आधारित नहीं होता कि किसी दार्शनिक उसूल से इन बदलावों के तमाम पहलुओं को बेनक़ाब किया जा सके, या उनकी व्याख्या में तमाम तफ़सीलों का जायज़ा लिया जा सके। विश्लेषण बड़ी हद तक दोनों के रिश्ते को साफ़ कर सकता है, लेकिन अगर तालमेल मिले तो उसकी वजहों, और अगर न मिले तो उसकी वजहों की तलाश करना विज्ञान, दर्शन और तर्कशास्त्र का काम है।

     

    मक़सद यह है कि जहां साहित्य और जीवन में तालमेल मिलता है, वहां भी एक दार्शनिक नज़र की ज़रूरत है जो इस रिश्ते की प्रकृति मालूम कर सके, और जहां मतभेद नज़र आता है, वहां मतभेद की वजह मालूम कर सके। साहित्य में हक़ीक़त की तलाश का यही मतलब है। होता यह है कि इंसान व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर तबक़ों और गिरोहों में बंटकर, जाने या अनजाने में कुछ ऐसी हरकतें करते हैं जो किसी दूसरे शख़्स, तबक़े, गिरोह या जमात की नज़र में खटकती हैं। इससे मतभेद या आलोचना की सूरत पैदा होती है, और इसी मतभेद और आलोचना का ज़िक्र तंज़ निगार अपने ख़ास बयान के अंदाज़ के साथ करता है।

     

    आम तौर पर संतुलित और नॉर्मल ज़िंदगी में कुछ नैतिक, साहित्यिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पैमाने (मेयार) बन जाते हैं। उन पर लगातार अमल करने की वजह से उनमें एक तरह की रवानी पैदा हो जाती है। हर शख़्स या ज़्यादातर लोग इन चीज़ों को इसी तरह देखने के आदी होते हैं। वे रस्म-ओ-रिवाज़ और रिवायतें बना लेते हैं और आदतन उसे सही मान लेते हैं। जब इस तयशुदा पैमाने से कोई आगे बढ़ जाता है या कोई गिरोह इससे पीछे छूट जाता है, तो नुक्ताचीनी के दरवाज़े खुलते हैं और इस टकराव में तंज़ के तीर और नश्तर काम में लाए जाते हैं। दोनों तरफ़ अपनी बात के सही होने का ख़याल इस क़दर पुख़्ता होता है कि वे एक-दूसरे के नज़रिए का एहतराम (सम्मान) भी नहीं करना चाहते।

     

    यह समाज-दर्शन का एक अहम मसला है कि इंसानी रस्म-ओ-रिवाज़, रिवायत और साहित्य से ज़िंदगी में जो तब्दीलियां पैदा होती हैं, उन्हें क़बूल या रद्द करने में आम लोगों को क्या रवैया अपनाना चाहिए। जब एक तरीक़ा बिल्कुल बदल चुकता है और कोई शख़्स उसे अपने कलेजे से लगाए रखता है, तो बदल जाने वालों के यहां इस पुराने तरीक़े का मज़ाक़ उड़ाने का जज़्बा ज़रूर पैदा होता है। क्योंकि सामाजिक ज़िंदगी में जो तब्दीली होती है, उसका इनकार करने वाले ग़लत राह पर चलने के मुजरिम नज़र आने लगते हैं। यह बहस अलग है कि किसका रास्ता सही है और किसका ग़लत है; किसका नज़रिया दुरुस्त है और किसका ग़लत।

     

    होता यही है कि तय पैमाने से इधर या उधर होने वाले लोग तंज़ (व्यंग्य) के तीरों का निशाना बनते हैं। हो सकता है कि तंज़ निगार का नज़रिया सिर्फ व्यक्तिगत हो या उसके मिज़ाज में निंदकपन (cynicism) पाया जाता हो और वह खुद समाज के आम विकास और बदलाव के पैमाने को शक की निगाह से देखता हो, लेकिन हमें तंज़ निगार के नज़रिए का अध्ययन सामाजिक नज़रिए से ही करना चाहिए। क्योंकि एक व्यक्तिवादी और दकियानूसी तंज़ निगार हर उस चीज़ का मज़ाक़ उड़ाएगा जो समाज में बदलाव और विकास की मांग करती है, और तरक़्क़ी पसंद तंज़ निगार दकियानूसीपन, रूढ़िवादिता और पतनशीलता पर वार करेगा। यानी साहित्य के दूसरे क्षेत्रों की तरह तंज़ निगारी को भी सामाजिक यथार्थवाद की रोशनी में समझने की कोशिश फ़ायदेमंद हो सकती है। तंज़ निगारी को महज़ एक मनोरंजक शौक़ समझकर आलोचनात्मक नज़रिए से देखना तंज़ निगारी के वर्गीय रुझान पर पर्दा डालने के बराबर होगा।

     

    व्यक्ति, समाज और प्रकृति, साहित्य के यही विषय हैं। तंज़ निगार भी अलग-अलग रूपों में इन्हीं को अपना विषय बनाता है। व्यक्तिगत कमज़ोरियों या ताक़तों के बहुत से रूप हो सकते हैं। उनका अनोखापन तारीफ़ के क़ाबिल भी बन सकता है और निंदा के क़ाबिल भी। जहाँ साहित्य की दूसरी विधाओं में दिलचस्पी लेने वालों को व्यक्ति की और बातें आकर्षित करती हैं, वहीं तंज़ निगार उस अनोखेपन, अजीबपन और असंतुलन पर निगाह रखता है जो उसकी हक़ीक़त की अवधारणा से अलग है। शारीरिक कमज़ोरियों या प्रकृति के दिए हुए दोषों का मज़ाक़ उड़ाना अच्छे तंज़ निगार को शोभा नहीं देता, वह हमला उन्हीं दोषों और ज़्यादतियों पर करता है, जिन्हें दूर करने में इंसान सक्षम है। एक अंधा अगर किसी चीज़ को न देखे तो यह तंज़ का विषय नहीं, अगर आँखों वाला न देखे तो तंज़ निगार का क़लम हरकत में आ सकता है।

     

    बहरहाल व्यक्ति भी तंज़ का विषय बन सकता है, लेकिन अगर उसमें कपट, ताने-बाने, ग़ुस्सा और गाली-गलौज का रंग पैदा हो जाएगा तो तंज़ निगारी हिज्व (निंदा-काव्य) की हद में दाख़िल हो जाएगी। हालाँकि यह ज़रूरी नहीं कि हर हिज्व में महज़ व्यक्तिगत ग़म और ग़ुस्से का इज़हार होता हो, फिर भी हिज्व में बदनीयती और ज़ाती नापसंदगी की भावना साफ़ दिखाई देती है। उर्दू में सौदा के यहाँ दोनों तरह की हिज्वें मिलती हैं। किसी से उनकी ज़ाती दुश्मनी है और किसी से सैद्धांतिक, मज़हबी, इल्मी या सामाजिक। दोनों के ख़ाके अलग-अलग रंग रखते हैं और दोनों के मक़सद अलग होते हैं। ज़ाती दोष जब समाज के लिए नुक़सानदेह बन जाता है, उस वक़्त व्यक्ति पर तंज़ भी अहमियत रखता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि सामाजिक या नैतिक सुधार के समर्थन के बिना तंज़ नहीं हो सकता है। जहाँ कोई ऊँचा नैतिक या सुधारवादी मक़सद ग़ायब होगा, वहाँ तंज़ का वार निशाने पर ठीक नहीं बैठेगा।

     

    व्यक्ति की सामाजिक हैसियत जब तंज़ का विषय बनती है तो उसका दायरा विस्तृत होकर ज़िंदगी के उस क्षेत्र को पूरी तरह घेर लेता है जिसका प्रतिनिधित्व कोई शख़्स व्यक्ति की हैसियत से करता है। यहाँ से सामाजिक और राजनीतिक तंज़ निगारी शुरू होती है जिसकी अहमियत सिर्फ एक साहित्यिक विधा की हैसियत से ही तय नहीं है, बल्कि प्रभाव-क्षेत्र और कार्य-क्षेत्र के लिहाज़ से भी इस बात पर ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं कि हर दौर में तंज़ निगारी के अंदाज़ अलग होंगे। सामंती व्यवस्था में व्यक्तिगत हिज्व के अलावा उन नैतिक मूल्यों का ज़िक्र तंज़ के लिए लाज़िमी होगा जिनको उस दौर में अहमियत हासिल थी। इसलिए फ़िरदौसी, अनवरी, उबैद ज़ाकानी, सौदा और इंशा की हिज्वियात में दरबारी ज़िंदगी, सामंती व्यवस्था की नैतिकता और ज़ाती नफ़रत और मतभेद का रंग इतना गहरा है कि उनके सामाजिक पहलू स्पष्ट नहीं होते।

     

    दरबारों में ताने-बाने, हाज़िर-जवाबी और हँसी-मज़ाक़ से काम बनते थे और ये काम अपनी ज़ात तक सीमित होते थे, इसलिए फ़ारसी और उर्दू में राजनीतिक और सामाजिक तंज़ कहीं-कहीं पुराने शायरों के यहाँ मिलता है। आधुनिक युग में जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव हुए हैं, उन्होंने सौदा की हिज्वों की जगह तंज़ निगारी पैदा की जिसकी तह में मौजूदा आर्थिक व्यवस्था का संघर्ष और राजनीतिक टकराव का प्रभाव है। स्विफ़्ट की बेपनाह तंज़ निगारी पूँजीवादी समाज की बुराइयों के बिना पैदा हो ही नहीं सकती थी। अकबर इलाहाबादी अपनी रूढ़िवादिता और धार्मिकता के बावजूद मौजूदा दौर के सिवा और कहीं खप नहीं सकते थे। आज पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का सड़ा-गला निज़ाम राजनीतिक तंज़ को नई ऊर्जा बख़्श रहा है।

     

    अगर निगाह उर्दू साहित्य तक सीमित रखी जाए तो इसका इज़हार कभी-कभी जोश की शायरी में और ज़्यादातर कृश्न चंदर के अफ़सानों में होता है। नज़रिए का यह बदलाव भी इस बात का सुबूत पेश करता है कि अगर तंज़ की तह में सामाजिक हक़ीक़त न हो तो वह एक हथियार की हैसियत से इस्तेमाल किया जा सकता है, हालाँकि तंज़ में हक़ीक़त को इस तरह काम में लाया जा सकता है, जिस तरह कार्टून बनाने वाला घटनाओं और व्यक्तियों को अपने काम में लाता है। कभी-कभी हक़ीक़त अतिशयोक्ति (मुबालग़े) में छुप जाती है और हक़ीक़त के उस पहलू पर ज़ोर होता है जिसके दोष को तंज़ निगार अपने क़लम और पढ़ने वालों के ज़ेहन का केंद्र बनाना चाहता है।

     

    तंज़ में हक़ीक़त की जगह का सवाल फिर आ गया तो फ्रायड का ख़याल आया, जिसने हास्य (ज़राफ़त) और मज़ाक (मिज़ाह) का विश्लेषण अपने यौन मनोविज्ञान की रोशनी में किया है और मिज़ाह की रचना को भी ख़्वाब की रचना के समान ज़ाहिर किया है। दोनों में हक़ीक़तें भेष बदलकर ज़ाहिर होती हैं और चेहरे पर नक़ाब डाल लेती हैं जिससे पहचानी न जा सकें, लेकिन यह सही नहीं क्योंकि अवचेतन के अंधेरे से भेष बदलकर निकलने वाली ज़राफ़त ख़्वाब से बिल्कुल अलग नज़र आती है। यहाँ फ्रायड के ख़याल की आलोचना मक़सद नहीं है। कहना सिर्फ यह है कि उसने भी एक हैसियत से हक़ीक़त की बुनियादी जगह को स्वीकार किया है, हालाँकि उसके यहाँ तक़रीबन सारी हक़ीक़तें अवचेतन की दुनिया में बसती हैं।

     

    फ्रायड के इशारों से यह बात ज़रूर स्पष्ट हो जाती है कि तंज़ में हक़ीक़त पेचीदा होकर अंदाज़े-बयाँ की ज़रूरतों के साथ प्रकट होती है। इसमें उपमा (तश्बीह) और रूपक (इस्तेआरे) के पेंच होते हैं। दृष्टांतों (तमसीलों) की तरफ़ इशारे होते हैं और प्रतीकों (अलामात) और ऐतिहासिक संदर्भों (तल्मीहात) के पर्दे में तंज़ का वार कभी सीधा नहीं होता और अगर सीधा हुआ तो हल्की सी खरोंच डालकर गुज़र जाता है। तंज़ की पेचीदा और छुपी हुई हक़ीक़त कुछ तो अंदाज़े-बयाँ से खुलती है और कुछ पढ़ने वाले के रचनात्मक ज़ेहन के शामिल होने से, क्योंकि तंज़ निगार का मक़सद अगर महज़ व्यक्तिगत और ज़ाती ग़म और ग़ुस्से का इज़हार नहीं है तो उसका संबोधन अक़्ल और आम धारणाओं से होता है।

     

    तंज़ साहित्य की उन विधाओं में से है जिनमें विषय के साथ अंदाज़े-बयाँ का संबंध बहुत गहरा होता है। बल्कि कई बार तो अंदाज़े-बयाँ पर ही तंज़ निर्भर होता है। संक्षेप और सारगर्भितता, कुशाग्रता और बुद्धिमत्ता के मेल से तंज़ के तीर-ओ-नश्तर तैयार होते हैं। दुश्मन से दुश्मनी का इज़हार और पढ़ने वालों की हमदर्दी हासिल करना, ज़हर में बुझे हुए जुमले लिखना और पढ़ने वालों को अपने साथ रखना आसान नहीं, लेकिन तंज़ निगार के अंदाज़े-बयाँ का यह जादू है कि पढ़ने वाला न सिर्फ उससे प्रभावित होता है बल्कि अपने गिरेबान में झाँककर खुद अपने व्यक्तित्व का जायज़ा लेने लगता है।

     

    जिस जगह यह एहसास हो जाए कि तंज़ (व्यंग्य) किसी ज़ाती (निजी) जलन और दुश्मनी का नतीजा है, उस जगह दूसरों की हमदर्दी साथ नहीं हो सकती। लेकिन अगर तंज़ में खुलेपन, बड़े दिल और इंसानी हमदर्दी के अंश नज़र आएं तो तंज़ बेहतरीन साहित्य बनता है। हालात को बेहतर बनाने की ख्वाहिश, इंसानियत से मुहब्बत का जज़्बा और ज़ाती गुस्से को पी जाने की ताक़त के बिना कोई अच्छा तंज़ निगार (व्यंग्यकार) नहीं बन सकता। इस बात पर इतना ज़ोर देना इसलिए ज़रूरी है कि कुछ लोग स्विफ्ट और दूसरे तंज़ निगारों को इंसानी भलाई के जज़्बे से खाली पाते हैं, हालाँकि उन्हें यह नहीं मालूम कि तंज़ नकारात्मक होते हुए भी सकारात्मक असर पैदा करता है।

     

    बहरहाल, तंज़ निगारी हल्के-फुल्के मज़ाक की तरह बेमक़सद नहीं होती, वह हँसी के सिवा कुछ और होती है। यह बात याद रखनी चाहिए कि मज़ाक के बिना तंज़ गाली बन जाता है। और वह असर पैदा नहीं करता जिसके लिए तंज़ का हथियार इस्तेमाल किया जाता है। इसमें शक नहीं कि तंज़ में मुबालग़े (बढ़ा-चढ़ा कर कहने) का अंश कभी-कभी इसे एकतरफ़ा बना देता है और हक़ीक़त के अच्छे पहलुओं को नज़रअंदाज़ करता मालूम होता है, लेकिन अपने मक़सद और असर डालने की ताक़त को देखते हुए, अपने अख़लाक़ी (नैतिक) और सुधारात्मक मक़सद के लिए, सिर्फ़ उन्हीं बातों को तंज़ की रोशनी में लाना मुनासिब मालूम होता है जो सुधार चाहती हैं।

     

    तंज़ निगार अपनी पूरी ताक़त एक ख़ास बिंदु पर केंद्रित कर देता है ताकि वह ज़रूरी असर पैदा कर सके। यही वजह है कि जिस पर तंज़ का वार होता है, अगर वह खुशमिज़ाज और बड़े दिल वाला न हो तो बर्दाश्त नहीं कर सकता। एक पश्चिमी शायर ने तंज़ की तुलना साही (काँटेदार जानवर) से की है, ख़ास जज़्बात के तहत जिसके जिस्म के तमाम काँटे खड़े हो जाते हैं। इसका यही मतलब है कि तंज़ निगार कभी अपने बचाव के लिए और कभी हमला करने के लिए अपने ज़हरीले तीरों और नश्तरों से लैस हो जाता है।

     

    सामाजिक और सियासी तंज़ को दुनिया के साहित्य में बहुत अहम जगह हासिल है क्योंकि इससे न सिर्फ़ विरोधी ताक़तों को पीछे धकेलना मक़सद होता है बल्कि ख़ुद अपनी सामूहिक और क़ौमी ज़िंदगी का सुधार भी इसी के ज़रिए से होता है। तंज़ निगार से ज़्यादा और किसी में यह जुर्रत (हिम्मत) नहीं होती कि वह ख़ुद अपनी हुकूमत और अपनी क़ौम की कमियों का मज़ाक उड़ा सके। शायद चीनी लेखक लिन युतांग ने लिखा है कि अगर जंग छिड़ने वाली हो तो जंग पर उतारू मुल्कों के तंज़ निगारों और हास्यकारों को फ़ैसला करने के लिए इकट्ठा कर देना चाहिए, और जंग कभी शुरू न हो सकेगी। इस तरह तंज़ निगार इंसान का दोस्त बनकर हमारे सामने आता है। वह समाज में संतुलन और इंसाफ़ क़ायम करने की जद्दोजहद में एक ज़बरदस्त साधन की हैसियत अख्तियार कर सकता है।

     

    तंज़ का पौधा सामाजिक उथल-पुथल और सियासी कशमकश की हवाओं में पनपता है क्योंकि जब कुछ नए ख्यालात क़बूल करने और कुछ पुरानी परंपराओं को छोड़ने का वक़्त आता है तो समाज का वह पारंपरिक संतुलन तहस-नहस हो जाता है जिसमें एक सामान्यता और जाना-पहचाना अंदाज़ पैदा हो चुका था। तंज़ निगार के मज़ाक और खुशदिली में दर्द और ग़म की एक हल्की सी मिलावट भी पाई जाती है जो उसकी इंसानियत से मुहब्बत और बेहतरी की ज़बरदस्त ख्वाहिश का नतीजा होती है और उसके तंज़ की कड़वाहट में गहरा दर्द करवटें लेता मालूम होता है।

     

    इस वक़्त उर्दू तंज़ निगारी का विश्लेषण या उस पर चर्चा करना हमारा मक़सद नहीं है, हालाँकि ऊपर बताए गए ख्यालात के आईने में उर्दू तंज़ निगारी के संक्षिप्त इतिहास का जायज़ा लेना कुछ ऐसा मुश्किल नहीं रह जाता। फिर भी यह कहना बेमौक़ा न होगा कि तंज़ का सामाजिक और सियासी स्वरूप पूरी तरह नए दौर में ही उभर कर सामने आता है, क्योंकि मौजूदा सामाजिक और सियासी हलचल में तंज़ निगार के लिए मौज़ू (विषय) और सामग्री की कमी नहीं है। ग़ुलामी, पश्चिम की नक़ल, आर्थिक बदहाली, बेरोज़गारी, जिंसी (यौन) भटकाव, ज़माने का ग़म और महबूब का ग़म, फिरक़ापरस्ती (सांप्रदायिकता), दकियानूसीपन, तरक़्क़ीपसंदी, रिश्वत, चोरबाज़ारी, पूँजीवाद, जागीरदारी और औद्योगिक युग के मूल्यों में टकराव, आज़ादी का धोखा, जम्हूरियत (लोकतंत्र), औरतों के हक़, संस्थाएं बनाना, मौत का व्यापार और कफ़न बेचना—अनगिनत मौज़ू हैं जिनकी शक्ल कहीं न कहीं टेढ़ी है और तंज़ निगार की हस्सास (संवेदनशील), हमदर्द और दूरदर्शी निगाह इस टेढ़ेपन का पता लगा लेती है।

     

    ये मौज़ू इस शक्ल में नए दौर से पहले अगर थे भी, तो इस तरह बेढंगे और टेढ़े-मेढ़े न थे। यही वजह है कि उर्दू के नए दौर ने ऐसे तंज़ निगार पैदा किए जो कशमकश, टकराव, बेचैनी और उथल-पुथल के सामाजिक और सियासी पसमंज़र (पृष्ठभूमि) में इसके ऐसे अक्स उभार सकते हैं जिनसे नए दौर की सामाजिक और सियासी ज़िंदगी का घिनौनापन, अपनी कड़वाहट और भ्रष्टाचार के साथ ज़ाहिर हो जाए। महफ़ूज़ अली, अकबर इलाहाबादी, ज़फ़र अली ख़ाँ, क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार, सिंदबाद जहाज़ी, रशीद अहमद सिद्दीक़ी, पतरस, जोश मलीहाबादी, कृश्न चंदर, कन्हैया लाल कपूर में अभी कोई सर्वेनेटर, स्विफ्ट और डिकेंस तक नहीं पहुँचा है, लेकिन इनमें से किसी-किसी के यहाँ कभी-कभी तंज़ का वह आला मयार (उच्च स्तर) झलक उठता है जिसमें एक साथ मज़ाक, कड़वाहट, बयान के अंदाज़ का अनोखापन, गहरी इंसानियत और मक़सद की बुलंदी का एहसास होता है। इनकी चढ़ी हुई कमानों से भी कभी-कभी ऐसे तीर छूटते हैं जो फ़िज़ा के सन्नाटे को चीर कर रख देते हैं और निशाने पर ठीक बैठ जाते हैं, गोया (मानो) हमारे तंज़ निगार तंज़ से काम लेना सीख रहे हैं।

     

    हाशिया

    (१) मैं तंज़ को पुल्लिंग इस्तेमाल करता हूँ। एहतेशाम।

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