अदब की अलिफ़, बे, ते
मेरी नानी अम्माँ ने तो ख़ैर मुग़लों का सिक्का भी देखा था मगर मैंने बचपन में बस दो सिक्के देखे। मलिका की इकन्नी जो बहुत घिस गई थी और जॉर्ज पंचम का चमकदार और उभरी मूरत वाला पैसा। अब ये दोनों सिक्के टकसाल से बाहर हैं। हालाँकि 'अज़ीम इंसान' (महान इंसान) की इस्तलाह (शब्दावली) अब भी चालू है। इस्तलाहें, इस्तिआरे (रूपक) और तसव्वुरात (अवधारणाएँ) सिक्के होते हैं। अपने वक़्त में ख़ूब चलते हैं। वक़्त का सिक्का बदलता है तो उनकी भी क़ीमत गिर जाती है। मगर वज़ादार (परंपरावादी) लिखने वाले अपने लफ़्ज़, इस्तिआरे, तरकीबें (शब्द-संयोजन) और तसव्वुरात पत्थर पर बजाकर नहीं देखते और उन्हें चालू समझ कर आख़िरी दम तक इस्तेमाल करते रहते हैं।
मलिका के वक़्त के तीन घिसे हुए सिक्के:
(1) जोश मलीहाबादी की अक़्ली (बौद्धिक) शायरी।
(2) नियाज़ फ़तेहपुरी और नई पौध की दहरियत (नास्तिकता)।
(3) इंसान-दोस्ती (मानवतावाद)।
चंद इस्तिआरे (रूपक) जिन्हें फफूँदी लग चुकी है: सहर (सुबह), अँधेरा, रहज़न (लुटेरा), रहबर (मार्गदर्शक)। क्लासिकी शायरी के वो इस्तिआरे जो नए तरक़्क़ीपसंद (प्रगतिशील) शायरों के हाथों मानी (अर्थ) खो बैठे: दार-ओ-रसन (फाँसी और फंदा), ज़िंदाँ (क़ैदख़ाना), क़फ़स (पिंजरा), मंसूर। ग़दर से पहले के लफ़्ज़, लहजे और तरकीबें जिनके किनारे घिस चुके हैं: मआज़अल्लाह (ईश्वर बचाए), अरे तौबा, लहू के चराग़, परचम, गहरा सन्नाटा, ख़ला (शून्य), सिसकियाँ, आकाश, समाज, धुँधलका, हरीरी मलबूस (रेशमी लिबास), ग़म-ए-जानाँ (प्रेमिका का ग़म), ग़म-ए-दौराँ (ज़माने का ग़म), अज़ीम अदब (महान साहित्य), आफ़ाक़ियत (सार्वभौमिकता), अबदी अक़दार (शाश्वत मूल्य), इन्फ़िरादियत (व्यक्तिवाद), रचाव, सोज़-ओ-गुदाज़ (दर्द और तड़प)।
उर्दू तन्क़ीद (आलोचना) की ज़ंग-आलूद (ज़ंग लगी) ज़र्ब-उल-अमसाल (कहावतें):
(1) अदब नाम है तन्क़ीद-ए-हयात (जीवन की आलोचना) का।
(2) अदब और ज़िंदगी का चोली-दामन का साथ है।
(3) अदब शख़्सियत (व्यक्तित्व) का इज़हार है।
(4) अदब प्रोपेगैंडा होता है।
(5) हर अदब अपने माहौल का तर्जुमान (प्रतिनिधि) होता है।
(6) अदब रिवायत (परंपरा) के शऊर (चेतना) से पैदा होता है।
घिसी हुई दुअन्नियाँ-चवन्नियाँ: रैंबो, बोदेलेयर, टी. एस. इलियट, ग़ालिब, गोर्की, मोपासां।
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हर दौर अदब पैदा करने के अपने नुस्ख़े साथ लेकर आता है। नई शायरी पैदा करने का नुस्ख़ा: निम्नलिखित में से किसी को उनवान (शीर्षक) बनाकर नज़्म कर डालिए— क्लर्क, रेडियो अनाउंसर, नर्स, तवायफ़, कोई क़दीम (पुरानी) शाही इमारत, रक़्क़ासा (नर्तकी), आलमी अम्न (विश्व शांति), भूख।
नई शायरी बनाने का नया नुस्ख़ा: यूनानी देवमाला (पौराणिक कथाओं) से कोई किरदार चुनिए। उसे मुफ़र्रस (फ़ारसी-युक्त) उर्दू में जकड़ दीजिए। ऊपर से थोड़ा सा युंग (Jung) छिड़क दीजिए व नीज़ (और साथ ही) निम्नलिखित मौज़ूआत (विषयों) पर तबा-आज़माई (क़लम-आज़माई) कीजिए: एटमी जंग का ख़तरा।
नई ग़ज़ल वज़ा करने (गढ़ने) का टोटका यह है कि नई अशिया (चीज़ों) के नाम शेर में इस्तेमाल कीजिए। जैसे: कुर्सी, साइकिल, टेलीफ़ोन, रेलगाड़ी, सिग्नल।
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उर्दू अदब के हक़ में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा मोहलिक (घातक) साबित हुईं: इंसान-दोस्ती और खद्दर का कुर्ता। आदमी की पूरी ज़ात (अस्तित्व) मुहब्बत के वास्ते से सामने आती है न कि दोस्ती के हवाले से, और जिनकी नफ़रत अमीक़ (गहरी) नहीं होती उनकी मुहब्बत भी अमीक़ नहीं होती। रहा खद्दर के कुर्ते का मामला तो वो जोगिया हो या नीला, उसकी इंतिहा (आख़िरी मंज़िल) पाकिस्तान में हर हाल में मोटरकार है। वो जागीरदारी का दौर गुज़र गया जब सआदत हसन मंटो मलमल का सफ़ेद कुर्ता पहन कर ताँगे में माल (माल रोड) पर निकला करते थे। अब लाहौर की माल रोड पर ताँगा ममनूअ (प्रतिबंधित) है और नए मूल्यों ने मोटरकार की सूरत इख़्तियार कर ली है।
अदब और मोटरकार दो अलग-अलग क़दरें (मूल्य) हैं। अदब शेर और अफ़साना घसीट देने का नाम नहीं है। अदब एक ज़हनी रवैया (मानसिक दृष्टिकोण) है, जीने का एक तौर है, मोटरकार जीने का एक दूसरा उसलूब (शैली) है। अदब और मोटरकार को यकजा (एक साथ) नहीं किया जा सकता। वजह यह है कि मोटर तेज़ चलती है और यह क़ायदा-ए-कुल्लिया (सार्वभौमिक नियम) है कि जब सवारी तेज़ चलती है तो अदब की गाड़ी रुक जाती है। मसलन जब से पाकिस्तान के अदीबों (साहित्यकारों) ने राइटर्स गिल्ड के तवस्सुत (माध्यम) से हवाई जहाज़ में सफ़र करना शुरू किया है, उन्होंने लिखना छोड़ दिया है और इब्न-ए-इंशा ने जितने अरसे में पूरे यूरोप का दौरा किया, उतने अरसे में मैं सिर्फ़ एक अफ़साना लिख सका।
मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद जब लाहौर के अकबरी दरवाज़े से गवर्नमेंट कॉलेज की तरफ़ चलते थे तो उनका घोड़ा बहुत सुस्त चलता था मगर उनकी नस्र (गद्य) सरपट दौड़ती है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कार बहुत तेज़ चलती है। अलबत्ता मिसरा (काव्य-पंक्ति) पोइयाँ चलता है (धीमे-धीमे चलता है)।
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चार आदमियों की सोहबत (संगत) अदीब के तख़्लीक़ी (रचनात्मक) काम में खण्डत (बाधा) डालती है: लड़ाका बीवी, बातूनी इंटलेक्चुअल (बुद्धिजीवी), लायक़ मुअल्लिम (शिक्षक), अदब की सरपरस्ती (संरक्षण) करने वाला अफ़सर।
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यह अम्र (बात) तयशुदा है कि अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद ने नज़्में उर्दू ही में लिखी हैं। जाफ़र ताहिर के कैंटो (Canto) में एक टेक्निकल ऐब (तकनीकी दोष) पाया जाता है, वो यह कि उसे शुरू कीजिए तो वो बिल-आख़िर (अंततः) ख़त्म हो जाता है।
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रंग-ए-मीर (मीर की शैली) में लिखने के तरीक़े तीन हैं। अव्वल यह कि छोटी बहर (छंद) में या ख़रामाँ-ख़रामाँ (धीमी गति वाली) बहर 'फ़अल फ़अल' में शेर लिखिए। तख़ल्लुस (उपनाम) के साथ 'जी' या 'साहब' का लाहक़ा (प्रत्यय) लगाइए। दोम (दूसरा) यह कि मीर के किसी एक शेर के मज़मून (विषय) को उलट कर रिवायत (परंपरा) में इज़ाफ़ा (वृद्धि) कर दीजिए। मसलन अगर मीर के शेर में सफ़र का अंजाम आबला (छाला) पर हो तो आप बे-अंदेशा (बिना किसी डर के) पैरवी-ए-मीर (मीर का अनुसरण) करते हुए सफ़र का आग़ाज़ आबला से बताइए। बाक़ी रहा तीसरा तरीक़ा तो वो फ़िराक़ साहब से पूछिए।
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तर्ज़-ए-ग़ालिब (ग़ालिब की शैली) में रेख़्ता (उर्दू कविता) यूँ लिखिए:
(1) फ़ारसी तरकीबें (शब्द-संयोजन) और इज़ाफ़तें (संबंध-सूचक चिह्न) बे-मुहाबा (बेझिझक) इस्तेमाल कीजिए।
(2) तफ़ल्सुफ़ (दार्शनिकता) शिआर कीजिए (अपनाइए)।
(3) तीसरा तरीक़ा मिर्ज़ा यगाना अपने साथ ले गए।
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इंटलेक्चुअल बनने के तरीक़े बहुत और रक़म में कसीर (संख्या में अधिक) हैं मगर उन्हें नज़रअंदाज़ करता हूँ कि रिसाला (लेख) लंबा न हो जाए। इजमालन (संक्षेप में) चंद तरीक़े दर्ज-ज़ैल (निम्नलिखित) हैं:
(1) रविश-ए-आम (आम चलन) से अलाहिदगी (अलगाव) यानी सिगरेट पीने वालों में पाइप पीजिए, पाइप पीने वालों की सोहबत में बगले के सिगरेट का रंज खींचिए, नीज़ (और) चाय में दूध और चीनी से इजतिनाब बरतिए (परहेज़ कीजिए) और कॉफ़ी ब्लैक पीजिए।
(2) मुख़्तलिफ़-उल-नौअ (विभिन्न प्रकार के) उलूम (विज्ञान/ज्ञान) की किताबें बग़ल में रखिए कि पाँव भारी हो जाए।
(3) किसी ग़ैर-मुल्की (विदेशी) कुतुबख़ाने (पुस्तकालय) का कार्ड जेब में रखिए।
(4) नए ISMS (वादों) से राब्ता (संपर्क) पैदा कीजिए और MYTH (मिथक) की जुस्तुजू (तलाश) में ग़लताँ (मग्न) रहिए।
(5) पाँचवाँ तरीक़ा क़ुर्रतुलऐन हैदर से पूछ कर बताऊँगा।
कल्चर्ड (सुसंस्कृत) बनने के आज़मूदा (आज़माए हुए) नुस्ख़े:
(1) तजरीदी मुसव्विरी (अमूर्त चित्रकला), क्लासिकी मौसीक़ी (शास्त्रीय संगीत), मग़रिबी सिम्फ़नीज़ (पश्चिमी सिम्फनी) व नीज़ (और साथ ही) तामीरात (वास्तुकला) से शग़फ़ (लगाव) रखिए।
(2) मुसव्विरी (चित्रकला) की नुमाइशों (प्रदर्शनियों), म्यूज़िक कॉन्फ़्रेंसों और अमेरिका से आए हुए ताइफ़ों (समूहों/मंडलियों) के एज़ाज़ (सम्मान) में होने वाली तक़रीबों (समारोहों) में शिरकत कीजिए।
(3) इस्लाम के बारे में ट्वायन्बी (Toynbee) का हवाला याद रखिए।
(4) पाकिस्तानी कल्चर पर बहस मुक़र्रर कीजिए। गांधार आर्ट, तक्षशिला और मोहनजोदड़ो के बारे में जानना लाज़िम (ज़रूरी) नहीं मगर हवाला देना न भूलिए।
(5) यूनेस्को और एजाज़ हुसैन बटालवी से INTOUCH (संपर्क में) रहिए।
- रचनाकार :इन्तिज़ार हुसैन
- प्रकाशन : डायरेक्टर क़ौमी कौंसिल बरा-ए-फ़रोग़-ए-उर्दू ज़बान, नई दिल्ली
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