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अदब और शख़्सियत

मुमताज़ हुसैन


Translated By: Rekhta Editor

मुमताज़ हुसैन

अदब और शख़्सियत

मुमताज़ हुसैन

MORE BYमुमताज़ हुसैन

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    (इस विषय पर कराची यूनिवर्सिटी में एक सिम्पोज़ियम आयोजित हुआ था। मैंने इस विषय पर जो भाषण दिया था उसे बाद में लिख लिया था।)

    इस विषय के दो विपरीत पहलू हैं। एक तो यह कि साहित्य या कला शख्सियत का इज़हार (अभिव्यक्ति) है और दूसरा यह कि साहित्य या कला शख्सियत से पलायन है। शायद शायरी से संबंधित वर्ड्सवर्थ के इस रूमानी बयान के खंडन में कि शायरी उमड़ते हुए जज़्बातों का बेसाख्ता इज़हार है, टी. एस. इलियट ने अपना यह बयान दिया कि शायरी शख्सियत से पलायन है न कि उसका इज़हार, और अपने इस विचार के समर्थन में 1921 ई. में रिवायत और इन्फ़िरादी सलाहियत (परंपरा और व्यक्तिगत प्रतिभा) के शीर्षक से एक विस्तृत लेख लिखा। चूँकि आलोचनात्मक साहित्य में यह विषय इसी लेख के बाद चर्चा में आया, इसलिए इस विषय को स्पष्ट करना ज़रूरी मालूम होता है। वह लिखते हैं कि,

    शायरी जज़्बातों का निकास नहीं बल्कि जज़्बातों से पलायन है। यह शख्सियत का इज़हार नहीं बल्कि शख्सियत से पलायन है। और अपने इस दृष्टिकोण को इन शब्दों में स्पष्ट करते हैं, शायर के पास इज़हार के लिए कोई शख्सियत नहीं हुआ करती बल्कि एक विशेष माध्यम (मीडियम) होता है जिसमें उसके अनुभव और प्रभाव अप्रत्याशित और नित नए अंदाज़ में आकार लेते रहते हैं। मुमकिन है कि वे अनुभव और प्रभाव जो एक आदमी या शख्सियत के दृष्टिकोण से अहम हों, उसकी शायरी में बिल्कुल ही जगह न पाएँ और इसी तरह वे अनुभव और प्रभाव जो उसकी शायरी में अहम हैं, वे शख्सियत के दृष्टिकोण से बिल्कुल ही उपेक्षा के योग्य माने जाएँ।

    इलियट का आख़िरी वाक्य इस बात की तरफ़ खुला इशारा करता है कि वह शायर के व्यावहारिक अस्तित्व को उसके रचनात्मक अस्तित्व से अलग करना चाहते हैं। इसलिए वह लिखते हैं कि जितना ज़्यादा एक कलाकार मुकम्मल होगा, उतना ही ज़्यादा उसका संवेदनशील मन या उसका प्रभाव ग्रहण करने वाला मस्तिष्क उसके रचनात्मक मस्तिष्क से पूरी तरह अलग होगा, और ऐसा इसलिए होता है कि उसी समय उसका रचनात्मक मस्तिष्क ज़्यादा मुकम्मल तरीक़े से मटेरियल (MATERIAL) यानी जज़्बातों को हज़्म कर सकेगा। अगर इलियट अपनी बात को यहीं ख़त्म कर देते तो इसे समझने में ज़्यादा कठिनाई नहीं होती, लेकिन जब वह अपने उपरोक्त वाक्य के साथ निम्नलिखित वाक्यों को भी जोड़ते हैं तो उनकी यह बात बड़ी पेचीदा सी हो जाती है।

    महान शायरी किसी भी जज़्बे के सीधे इस्तेमाल के बिना भी मुमकिन है। वह विशुद्ध रूप से एहसास (FEELING) की शायरी हो सकती है। शायर का काम नए जज़्बातों को पाना नहीं बल्कि किसी मामूली से जज़्बे को शायरी के ज़रिए इस्तेमाल करना है। दूसरे शब्दों में, ऐसे एहसासों का इज़हार करना जो प्रेरक जज़्बे से आज़ाद होते हैं।

    अब सवाल यह है कि अगर महान शायरी किसी भी जज़्बे के सीधे इस्तेमाल के बिना मुमकिन है, तो फिर किसी मामूली जज़्बे को बहाने के तौर पर ही सही, शायरी के ज़रिए इस्तेमाल करने की क्या ज़रूरत है। शायद इसका जवाब यह हो कि वह एक ऐसे लंगर का काम करता है जो शायर के भटकते हुए एहसासों और कल्पनाओं को फँसाने में मददगार होता है। मेरा ख़याल है कि इलियट के मारूज़ी तलाज़मात (OBJECTIVE CORRELATIVES) के सिद्धांत को यहाँ पर इसी तरह लागू किया जा सकता है। बहरहाल यह बात अपनी जगह स्पष्ट है कि वह शेर की रचना में जज़्बातों की तीव्रता को नहीं बल्कि रचनात्मक प्रेरणा के दबाव को अहम मानते हैं, और शायर को उसकी इस प्रक्रिया में रचना के मटेरियल से अप्रभावित और तटस्थ मानते हैं। ऐसी स्थिति में, जैसा कि वह ख़ुद भी कहते हैं, उनके यहाँ शायरी का असल मसला शायर के लिए अपनी ज़बान की ख़िदमत का है न कि किसी और चीज़ का।

    इलियट ने शायरी का यह शख्सियत से पलायन का सिद्धांत, जिसे उन्होंने कला के निर्वैयक्तिक सिद्धांत के नाम से भी याद किया है, केवल रूमानी या जोशीली जज़्बाती शायरी के खंडन में ही पेश नहीं किया है, बल्कि इसमें उन्होंने कुछ हद तक अपनी ठंडी शायरी का औचित्य भी पेश किया है। और यह महज़ उनकी विनम्रता है कि वह कला के इस पलायनवादी सिद्धांत की व्याख्या में कोई मिसाल अपनी शायरी से नहीं बल्कि दांते और कीट्स की शायरी से देते हैं। मिसाल के तौर पर वह कीट्स की नज़्म (NIGHTINGALE) को पेश करते हैं। जहाँ शायर, इलियट के अनुसार, बुलबुल के जज़्बातों को नहीं (मानो कोई शायर बुलबुल के जज़्बातों को भी नज़्म कर सकता है) बल्कि अपने भटकते हुए एहसासों और कल्पनाओं को 'मारूज़ी तलाज़मात' के आधार पर बुलबुल का सहारा लेकर नज़्म कर रहा है।

    अगर मेरा मक़सद यह होता कि मैं इलियट की इस मिसाल को ही अनुचित बताऊँ, तो बेशक इस नज़्म पर चर्चा करता, लेकिन मेरा यह मक़सद कहाँ है। मैं तो यह बताना चाहता हूँ कि एक-आध मिसाल से, चाहे वह दांते की नज़्म हो या कीट्स की नज़्म, उनका यह सामान्यीकरण स्थापित नहीं होता कि शायरी शख्सियत या जज़्बातों से पलायन है। कीट्स एक लिरिकल (प्रगीत) शायर है। उसने ऐसी नज़्में भी तो कही हैं जिनमें उसने अपने जज़्बातों का सीधा इज़हार किया है, और हमारे यहाँ तो मीर, ग़ालिब और इक़बाल सभी ने ज़्यादातर अपने भटके हुए एहसासों और कल्पनाओं का नहीं बल्कि अपने ठहरे हुए जज़्बातों का इज़हार किया है। ऐसी स्थिति में हम इलियट के इस शख्सियत से पलायन वाले कला-सिद्धांत को किसी सार्वभौमिक सत्य पर आधारित नहीं मान सकते, क्योंकि यह आमतौर पर न तो हमारी शायरी पर लागू होता है और न दुनिया की महान शायरी पर। क्या मीर इस वजह से एक छोटे शायर माने जाएँगे कि उनकी शायरी में उनकी शख्सियत झलकती हुई नज़र आती है?

    मुझ को शायर न कहो मीर कि साहब मैंने

    दर्द-ओ-ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया

    और क्या अल्लामा इक़बाल इस वजह से एक बड़े शायर नहीं माने जाएँगे कि उनकी शायरी जज़्बातों को जगाकर कर्म पर उकसाती है? ये सवाल प्रासंगिक हैं। लेकिन अगर यहाँ यह गुमान हो रहा हो कि मैं आपके राष्ट्रीय पक्षपात को उभार रहा हूँ, तो फ़िलहाल इन हज़रात के ज़िक्र को मुल्तवी रखता हूँ और उसी अंग्रेज़ी ज़बान के एक दूसरे शायर और आलोचक की राय को पेश करना चाहता हूँ जिसने इलियट के इस पलायनवादी कला-सिद्धांत का खंडन किया है। उनका नाम हर्बर्ट रीड है। उन्होंने अपने एक लेख शायर की शख्सियत में, जिसे उन्होंने इलियट के दृष्टिकोण के खंडन में लिखा है, यह दृष्टिकोण अपनाया है कि शायरी अपनी शख्सियत की जागरूकता है न कि उससे पलायन। हर्बर्ट रीड का यह लेख कुछ हद तक पेचीदा भी है, और यह पेचीदगी इसलिए पैदा हुई है कि उन्होंने टी. एस. इलियट की तरह शख्सियत के अर्थ को निर्धारित करने की ज़िम्मेदारी से अपना पीछा नहीं छुड़ाया है, लेकिन शख्सियत की बहस से संबंधित उनके लेख में बहुत से झोल (खाँचे) हैं।

    उन्होंने शख्सियत को जहाँ किरदार या कैरेक्टर के विपरीत माना है, वहाँ इलियट के शायरी के सिद्धांत से मतभेद रखते हुए कम-से-कम इस मसले पर उनके हमख़याल भी नज़र आते हैं कि शायर का अस्तित्व उसके व्यावहारिक अस्तित्व से अलग होता है। लेकिन इलियट से उनकी यह सहमति आंशिक है, वर्ना बुनियादी तौर पर उन्होंने इलियट के निर्वैयक्तिक कला-सिद्धांत की ज़ोर-शोर से मुख़ालफ़त ही की है और अपने लेख का मक़सद इसी मुख़ालफ़त को ठहराया है। वह लिखते हैं कि यह सिर्फ़ प्रेरणा (INSPIRATION) ही नहीं है जिससे कोई व्यक्ति शायर बनता है, बुनियादी ताक़त अपनी शख्सियत की जागरूकता है, और इस शख्सियत की रचनात्मक प्रक्रिया और गतिशीलता को अंदरूनी बग़ावत और बिखराव से बचाते हुए परवान चढ़ाने की क्षमता है।

    उनका यह वाक्य साफ़ तौर से बता रहा है कि वह अदब या कला की बुनियादी ताक़त शख़्सियत की समझ को मानते हैं न कि उससे फ़रार को, और चूँकि कम-ओ-बेश मैं भी इसी ख़याल का समर्थक हूँ, इसलिए इसकी व्याख्या को उस वक़्त तक टाल देता हूँ जब तक कि उनके ज़िक्र किए गए लेख के उस हिस्से को बहस में न लाऊँ जहाँ वह शख़्सियत को किरदार (character) का विरोधी मानते हैं क्योंकि वहाँ मुझे उनके शख़्सियत के नज़रिए से सख़्त मतभेद है। शख़्सियत के बारे में हर्बर्ट रीड का यह कहना है कि कैरेक्टर या किरदार शख़्सियत का विरोधी होता है। किरदार एक ठोस और अटल चीज़ है, वह एक आइडियल अपने सामने रखता है जिसके लिए वह अपने जज़्बात का लगातार ख़ून करता रहता है। वह अपने को हालात के मुताबिक़ बदलता नहीं बल्कि अड़ा रहता है। किरदार की ये ख़ूबियाँ हर्बर्ट रीड के शब्दों में एक आज़ाद स्वभाव या शख़्सियत के ख़िलाफ़ हैं और वह इस आज़ाद स्वभाव या शख़्सियत की परिभाषा अपने शब्दों में नहीं बल्कि रेमंड फर्नांडीज़ के शब्दों में इस तरह करते हैं:

    एक आइडियल शख़्सियत उस शख़्स की होती है जो अपने वजूद को हमेशा अपने ख़यालात की गतिशीलता के मुताबिक़ बदलता रहता है। कैरेक्टर के सामने एक आइडियल होता है और वह इस आइडियल को पाने के लिए अपने जज़्बात का ख़ून करता रहता है। इसके बरअक्स शख़्सियत के सामने कोई ऐसा आइडियल नहीं होता है। यह सोचने का एक गतिशील तरीक़ा है जो हमारे बेशुमार जज़्बात और सेंटीमेंट्स के बीच एक संतुलन का रिश्ता क़ायम रखती है।

    अदब के नज़रिए से देखते हुए हर्बर्ट रीड, रेमंड फर्नांडीज़ के इस ख़याल के समर्थक इसलिए बने हैं कि एक आज़ाद स्वभाव या एक शख़्सियत अपने बे-रोक-टोक बहाव की वजह से शायरी की प्रेरणा के लिए हमेशा राह देखती रहती है और कैरेक्टर जिसे कि वह ठोस और अटल मानते हैं, जड़ और अड़ियल होने की वजह से शायरी की प्रेरणा से महरूम रहता है। लेकिन इससे पहले हम यह बता चुके हैं कि हर्बर्ट रीड किसी भी शख़्स के शायर बनने के लिए सिर्फ़ प्रेरणा को ज़रूरी नहीं समझते बल्कि इसके बरअक्स इसके लिए बुनियादी ताक़त, शख़्सियत की समझ को ठहराते हैं। क्या यह एक खुला हुआ विरोधाभास नहीं है। एक तरफ़ तो वह फ्रायड के ईगो (Ego) को शख़्सियत का केंद्रीय बिंदु मानते हैं जिसकी बुनियादी ख़ूबी उसकी वह प्रतिरोध की ताक़त है जिससे कि वह कैरेक्टर बनता है, तो दूसरी तरफ़ वह शख़्सियत को सिर्फ़ जज़्बात और सेंटीमेंट्स के एक संतुलन के रिश्ते का नाम देते हैं, यानी ईगो को छोड़ कर सिर्फ़ इड (ID) पर निगाह रखते हैं। शायद इसलिए कि वह जिस नतीजे पर पहुँचना चाहते हैं यानी शख़्सियत को कैरेक्टर का विरोधी मानना, इसमें फ्रायड का ईगो बड़ा अड़ंगा लगाता है।

    हमें हर्बर्ट रीड की इस कोशिश से बड़ी हमदर्दी है लेकिन इसका क्या किया जाए कि क्या भौतिकी (physics) और क्या मनोविज्ञान (psychology), इन दोनों ही विज्ञानों में हरकत, प्रतिरोध के साथ जुड़ी हुई है और जो मतलब कि एक आइडियल शख़्सियत का हर्बर्ट रीड ने रेमंड फर्नांडीज़ के शब्दों में पेश किया है वह किसी आइडियल शख़्सियत का नहीं बल्कि बिना पेंदे की शख़्सियत का है। शख़्सियत बेशक गतिशील होती है लेकिन परिवर्तनशील होने और कोई कैरेक्टर न रखने में बड़ा फ़र्क़ है। एक समझदार और किरदार वाला आदमी भी अपने ख़यालात की गतिशीलता के मुताबिक़ बदलता रहता है। वह शख़्सियत ही क्या जो गतिशील और प्रगतिशील न हो। लेकिन उसे एक अवसरवादी या थाली के बैंगन का नाम नहीं दिया जा सकता है। इन दोनों के बीच बड़ा फ़र्क़ है। पहला रोशन ख़याल और दूसरा ज़मीर बेचने वाला हो सकता है। एक लचकना और अकड़ना दोनों ही जानता है और दूसरा सिर्फ़ लचकना और बहना। एक आग और पानी दोनों ही है और दूसरा पूरी तरह पानी। कभी इस क़दर सुध-बुध खोया हुआ कि,

    दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाए है

    पिंदार का सनम-कदा वीराँ किए हुए

    और कभी इस क़दर ख़ुद्दार कि

    उल्टे फिर आए दर-ए-काबा अगर वा न हुआ

    कभी इस क़दर बेसब्र कि हर तेज़ चलने वाले के साथ चल पड़े और कभी इस क़दर संतुलित कि जनाब-ए-ख़िज़्र को भी 'एक हमसफ़र' जाने। इंसान की जो आम फ़ितरत है उससे किसी शायर की फ़ितरत आज़ाद नहीं है। अगर दुनिया में ऐसे शायर गुज़रे हैं जो अपने जज़्बात के बहाव में बहते रहे हैं, तो ऐसे शायर भी रहे हैं जिन्होंने अपने जुनून या जज़्बात को समझ से लगाम भी दी है,

    क्या जुनूँ कर गया शऊर से वो

    शायरों की शख़्सियतों में समझ और जुनून की ये जो दो निशानियाँ हैं, इन्हीं के मुकम्मल मेल में एक शायर की आइडियल शख़्सियत का राज़ छिपा है। हमारी तार्किक (rational) तबीयत उतनी ही स्वाभाविक है जितनी कि हमारी अतार्किक तबीयत। ऐसी सूरत में शख़्सियत हमारे जज़्बात और सेंटीमेंट्स के बीच नहीं बल्कि हमारी तार्किक और अतार्किक तबीयत के बीच एक संतुलन का रिश्ता क़ायम रखती है। ज़ाहिर है कि इस तबीयत में जज़्बात और सेंटीमेंट्स के साथ-साथ समझ, प्रतिरोध की ताक़त, इरादे की ताक़त, काम करने की ताक़त और फिर इन सब में अनुशासन पैदा करने वाली समझदारी भी शामिल करे। हर्बर्ट रीड के यहाँ तो शख़्सियत सिर्फ़ जज़्बात और सेंटीमेंट्स ही तक महदूद है। ऐसी सूरत में अगर उन्होंने शख़्सियत को कैरेक्टर का विरोधी माना तो इसमें कोई हैरानी नहीं क्योंकि उनके यहाँ आइडियल शख़्सियत बिना किरदार के है और हमारी नज़र में आइडियल शख़्सियत वह है जिसमें किरदार भी हो।

    हर्बर्ट रीड ने शख़्सियत की इस परिभाषा से जहाँ एक तरफ़ इंक़लाबी जज़्बात या अमल में आने वाले जज़्बात को उभारने वाली शायरी को शायरी की दुनिया से बाहर किया है बल्कि जान-बूझ कर अदब से उसके आइडियलिटी (IDEALITY) के तत्व को भी बाहर कर दिया है। क्योंकि उनके यहाँ आइडियल शख़्सियत आइडियल से ख़ाली होती है। यह भी एक अजीब आइडियल है और क्या अचरज जो उनका यह आइडियल उनके इस अराजकतावाद (anarchism) के दर्शन का प्रतिनिधि हो कि इंसान हर क़िस्म की पाबंदियों से आज़ाद है। या शायद इस शायरी के नज़रिए का हिमायती हो कि शायरी में सिर्फ़ अवचेतन (unconscious) का इज़हार करना चाहिए जो कभी-कभी इंसानियत से नीचे (sub-human) या हैवानी क़दरों के प्रचार का रूप भी इख़्तियार कर लेती है। मुझे इससे इंकार नहीं कि आदमी एक हैवान है लेकिन इसी के साथ-साथ मुझे उसके इंसान होने पर भी यक़ीन है। मैंने हर्बर्ट रीड के शख़्सियत के नज़रिए को ख़ारिज करने की जो ज़रूरत महसूस की तो इसकी वजह यही है कि वह नज़रिया पूरी तरह मूल प्रवृत्तियों (instincts) की माँगों पर आधारित है।

    हर्बर्ट रीड का यह कहना ग़लत नहीं है कि शायरी की बुनियादी ताक़त अपनी शख़्सियत की समझ है। उनका तो सिर्फ़ यह कहना ग़लत है कि शायर की शख़्सियत में कैरेक्टर नहीं होता यानी उसकी शख़्सियत, प्रतिरोध की ताक़त, इरादे की ताक़त, काम करने की ताक़त यानी किसी आइडियल और समझ से आज़ाद होती है और हम अपने इस ख़याल की हिमायत में दुनिया के बहुत से ऐसे माने हुए शायरों की शख़्सियतें पेश कर सकते हैं जिनमें कैरेक्टर की कमी नहीं रही है और न ऐसा ही है कि उनके कैरेक्टर का दबाव उनकी शायरी में महसूस न किया जाता हो। पिछली सदी में जो एक नया मशरिक़ (पूर्व) अल्जीरिया से लेकर जापान तक उभरा है, मेरा मतलब उस मशरिक़ से है जो मग़रिब (पश्चिम) की सियासी ग़ुलामी से आज़ाद हुआ है या कि आज़ादी की जद्दोजहद में लगा हुआ है, इस नए मशरिक़ के अदीबों और शायरों की शख़्सियतें और उनका अदब हर्बर्ट रीड के किरदार को ख़त्म करने वाले शख़्सियत के नज़रिए और इलियट के शख़्सियत से भागने वाले कला के नज़रिए दोनों ही का खंडन कर रहा है। नाम गिनवाने से क्या फ़ायदा, क्यों न पाकिस्तान ही के दो नामवर शायर अल्लामा इक़बाल और क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम को ले लिया जाए।

    क्या नज़रुल इस्लाम का व्यक्तित्व इसलिए ग़ैर-शायराना है कि उसमें कैरेक्टर (चरित्र) पाया जाता है और क्या अल्लामा इक़बाल का कलाम इसलिए कविता की दुनिया से बाहर कर दिए जाने के लायक़ है कि उसमें कर्म को बढ़ावा देने वाली लय पाई जाती है? अगर ऐसा नहीं है और आप यह भी महसूस करते हैं कि मैं आपकी पक्षपात की भावना से नहीं खेल रहा हूँ, तो फिर आपको उनके सिद्धांतों के अंतर्निहित रुझानों का भी पता लगाना चाहिए। क्योंकि हमने शेरो-शायरी कुछ चंद सदियों में तो सीखी नहीं है कि इन सिद्धांतों की पृष्ठभूमि से अनजान हों। हमसे ज़्यादा शायरी के मज़े का चस्का किसे रहा होगा। इलियट अपने ज़िक्र किए गए लेख 'रिवायत और इन्फ़िरादी सलाहियत' (TRADITIONS & THE INDIVIDUAL TALENT) में लिखते हैं कि हम यह दावा कुछ हद तक भरोसे के साथ कर सकते हैं कि हमारा दौर पतन का है और हमारे यहाँ कल्चर का जो आज स्तर है, वह पिछले पचास बरस के कल्चर के मुक़ाबले में बहुत गिरा हुआ है और इस पतन के सुबूत हमारे अपने जीवन के सारे क्षेत्रों में पाए जाते हैं और कोई कारण नज़र नहीं आता कि हमारे इस पतन की रफ़्तार और भी ज़्यादा तेज़ क्यों न हो जाए और हम एक ऐसे दौर में न पहुँच जाएँ जब कुछ समय के लिए हमारे पास कोई कल्चर ही न रह जाए।

    अगर इलियट के इस मूल्यवान अवलोकन की रोशनी में हम यह नतीजा निकालने पर मजबूर होते हैं कि इलियट का व्यक्तित्व से बचने वाला कला का सिद्धांत और हर्बर्ट रीड का कैरेक्टर को ख़त्म करने वाला व्यक्तित्व का सिद्धांत, ये दोनों ही एक पतनशील समाज की पैदावार हैं, तो मुझे उम्मीद है कि इस सिलसिले में हम पर किसी पक्षपात का इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता। इस मूल्यवान अवलोकन की रोशनी में यह बात भी समझ में आती है कि क्यों वे दोनों ही क़ौम को जगाने वाली शायरी और व्यक्तित्व में कैरेक्टर के राज से डरे हुए हैं। बात यह है कि हमारा इब्न-उल-वक़्त (अवसरवादी) उनकी औपनिवेशिक व्यवस्था के लिए अनुकूल रहा है। लेकिन जब से औपनिवेशिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ आज़ादी का संघर्ष चला है, हमारा वह इब्न-उल-वक़्त अपनी सामाजिक अहमियत खोने लगा है। अब वह साम्राज्यवादी व्यवस्था को क़ायम रखने में मददगार नहीं है। मुमकिन है कि सर हर्बर्ट रीड के यहाँ कैरेक्टर से यह डर कुछ इसी वजह से हो या फिर इस वजह से हो कि वे अपने अराजकता के दर्शन में किसी क़िस्म के कंट्रोल को व्यक्तित्व के ख़िलाफ़ मानते हैं।

    रह गए जज़्बात और सेंटीमेंट्स, तो उनका भी क्या भरोसा, आख़िर हमारे यहाँ जज़्बात ही से तो एक इंक़लाबी शायरी की गई है। जज़्बात कुछ रोने-धोने और इश्क़-ओ-मोहब्बत ही के तो नहीं होते। वे कर्म और हरकत के भी तो होते हैं। फिर टी. एस. इलियट को इन जज़्बातों को उभारने से क्या मिलेगा, जबकि उनका पूरा संघर्ष शैतान को इंजील (बाइबल) पढ़ाने का रहा है। ज़ाहिर है कि शैतान ईसाइयत पर तो ईमान लाने से रहा। ऐसी सूरत में इससे बचाव तो उसे सिर्फ़ ठंडा ही रखने में है। यह है कारण उनके यहाँ जज़्बात से बचने और सूखी और ठंडी शायरी करने का।

    यह जो चंद बातें मैंने इलियट और हर्बर्ट रीड के सिद्धांतों के बारे में कही हैं, तो यह सब एक बहाना था अपने नज़रिए को स्पष्ट करने का और अगर कहीं कोई बात विषय से हटकर है, तो उसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ। बात यह है कि मैं कैरेक्टर को व्यक्तित्व का न सिर्फ़ एक अहम हिस्सा समझता हूँ, बल्कि व्यक्तित्व की पूर्णता का एक ज़रिया या साधन भी। किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व, जो शरीर और प्राण की तमाम ज़रूरतों की संतुष्टि और उसकी तमाम क्षमताओं के फलीभूत होने का नाम है, उस वक़्त तक अर्थहीन रहेगा जब तक एक भी व्यक्ति इस धरती के किसी कोने में अपने व्यक्तित्व की पूर्णता से वंचित रहेगा।

    अब जब कि हर व्यक्ति के व्यक्तित्व की पूर्णता समाज के दूसरे व्यक्तियों के व्यक्तित्व की पूर्णता पर निर्भर ठहरती है, तो फिर इसे पाने के लिए कैरेक्टर का पाया जाना ज़रूरी है। लेकिन चूँकि कैरेक्टर व्यक्तित्व के आज़ाद स्वभाव में रुकावट भी बनता है और इस तरह व्यक्तित्व में एक तनाव और टकराव पैदा होता है, इसलिए इस तनाव को भी दूर करते रहना चाहिए। मगर इसका यह हल नहीं है कि कैरेक्टर को व्यक्तित्व से बाहर कर दिया जाए, बल्कि यह है कि व्यक्तित्व कैरेक्टर को अपने अंदर इस तरह जज़्ब कर ले (समा ले) कि वह उसका अटूट अंग बन जाए, यानी वह जो व्यक्तित्व की पूर्णता का ज़रिया है, वह व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाए।

    यहाँ यह याद रखना चाहिए कि कैरेक्टर व्यक्तित्व का कोई बाहरी हिस्सा नहीं है जिसे बाहर से लाया गया हो कि उसे निकाल दिया जाए। कैरेक्टर तो व्यक्तित्व की पूर्णता की विकासवादी प्रक्रिया में पैदा होता है और जो कशमकश इन दोनों में पाई जाती है, वह असल में समाज और व्यक्ति के हितों के टकराव की होती है, इसे दूर किया जा सकता है। यह मानवीय व्यक्तित्व, जो एक ही समय में आज़ाद और पाबंद होता है, जो हमारे तर्कसंगत और अतार्किक स्वभावों के बीच एक संतुलित रिश्ता क़ायम रखता है, अपने आदर्श स्तर तक उसी दिन पहुँच सकेगा जब पब्लिक सेल्फ़ और प्राइवेट सेल्फ़, यानी सार्वजनिक और निजी हित एक हो सकेंगे।

    शायर चाहे वह जीनियस हो या किसी औसत दर्जे का आदमी, न तो इंसानी फ़ितरत के उस टकराव से आज़ाद होता है जो अनुशासन और स्वभाव की आज़ादी, सामाजिक हितों और व्यक्तिगत हित के बीच रहता है, और न वह उस स्वाभाविक अंतर्दृष्टि से वंचित होता है कि इंसान इन टकरावों का हल हमेशा एक आदर्श स्तर पर तलाश करता रहा है। इसलिए वह सिर्फ़ हक़ीक़त देखने वाला ही नहीं, बल्कि आदर्शवादी भी होता है। आर्ट (कला) हक़ीक़त में इसी कशमकश के इज़हार से पैदा होता है। कशमकश का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन वह इससे आज़ाद नहीं रहता है। इस रचनात्मक प्रक्रिया में न तो उसकी तार्किक आत्मा (नफ़्स-ए-नातिक़ा), उसकी संवेदनशील आत्मा (नफ़्स-ए-हासा) से अलग रहती है और न वह अपने जज़्बात के इज़हार से इसलिए बचता है कि कहीं वह उसमें बेनक़ाब न हो जाए,

    हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे

    जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

    आख़िर 'परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम' (साहित्य सृजन) का एक नज़रिया यह भी तो है, जो फ़ैज़ के ऊपर दिए गए शेर में है और एक वह भी जो ग़ालिब के इस शेर में है,

    लिखते रहे जुनूँ की हिकायत-ए-ख़ूँ-चकाँ

    हर-चंद इसमें हाथ हमारे क़लम हुए

    आज मानव जीवन का वजूद मौत के आमने-सामने है। मूल्यों के निर्धारण से ज़्यादा जीवन को बचाए रखने का मसला अहम है। जीवन-दर्शन की प्रतिस्पर्धा, जिसका एक ज़रिया आर्ट और अदब भी है, परमाणु हथियारों की दौड़ के सामने पीछे रह गई है। क्या इसमें हमारे अदीबों (साहित्यकारों) के पलायन का हाथ नहीं है? चाहे वह पलायन जज़्बे से हो या कैरेक्टर से। आर्ट हो या अदब, उसका वजूद जज़्बात और कैरेक्टर से बचने में नहीं, ज़िंदगी की ताक़तों को आगे बढ़ाने में है। गेटे कहता है, अदब ज़िंदगी की ताक़त में इज़ाफ़ा करता है। वह हमारे जज़्बात और एहसासात को और ज़्यादा पवित्र बनाता है। इंसान की इच्छा-शक्ति को मज़बूती पहुँचाता है और आदमी को इंसानियत के ज़ेवर से सजाता है।

    यहाँ जिस मसले को मैं बहस में लाया हूँ, वह मसला न तो साहित्यिक रचनाओं के मटेरियल का है और न साहित्यिक रचनाओं के मनोविज्ञान का, बल्कि शायर के ज़ेहन और साहित्यिक रचनाओं के मटेरियल के रिश्ते का मसला है। इलियट ने तो शायर के रचनात्मक ज़ेहन को उसके प्रभाव ग्रहण करने वाले ज़ेहन से अलग करके उसे ज़िंदगी की हलचल से बेपरवाह कर दिया। लेकिन हमारे शायर ऐसा नहीं सोचते हैं,

    मुझे इंतिआश-ए-ग़म ने पए-अर्ज़-ए-हाल बख़्शी

    हवस-ए-ग़ज़ल-सराई तपिश-ए-फ़साना-ख़्वानी

    - ग़ालिब

    ग़ालिब के यहाँ ग़म के उभार और अपना हाल बयां करने में न सिर्फ़ ज़ेहन की सक्रियता मौजूद है, जो इलियट के निष्क्रिय मीडियम में नहीं है, बल्कि उनकी क़िस्सागोई की तपिश में वह 'हुनर-ए-खूं' भी है जो मीर, ग़ालिब और फ़ैज़ की आवाज़ है। यहाँ शायर का बोलने वाला वजूद (नफ़्स-ए-नातिक़ा) उसके महसूस करने वाले वजूद से अलग नहीं है। ग़ालिब के यहाँ फ़नकाराना तख़्लीक़ (कलात्मक रचना) का जज़्बा अपना कोई ऐसा आज़ाद वजूद नहीं रखता जिसमें शख़्सियत के इज़हार या जज़्बात के इज़हार का कोई दख़ल न हो, और तक़रीबन यही नज़रिया मीर का भी है:

    मुझ को शायर न कहो मीर कि साहब मैंने

    दर्द ओ ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया

    इस मौक़े पर मैं जानबूझकर अल्लामा इक़बाल के उन अशआर को पेश नहीं कर रहा हूँ जिनमें उन्होंने शायर की उस हैसियत से इनकार करके जो एक तख़्लीक़ी फ़नकार की है, अपने सिर्फ़ प्रचारक होने का इक़रार किया है:

    नग़्मा कुजा ओ मन कुजा साज़-ए-सुख़न बहाना यस्त

    सू-ए-क़तार मी कशतम नाक़ा-ए-बे-ज़माम रा

    क्योंकि यह नज़रिया भी, अगर शायरी में इसका इज़हार सचेत (شعوری) रूप से हो, तो अतिवाद का है। शायरी में शायर, अचेतन (غیر شعوری) रूप से प्रचारक रहता है न कि सचेत रूप से। वह ख़्वाब के आलम में बेदार (जागृत) और पूरी तरह बेदारी के आलम में ख़्वाब में मगन होता है। कभी तो ख़्वाब के आलम में वह बेदारी कि अज़ शोला तराश करदा अम हर्फ़ (फ़ैज़ी) और कभी होश के आलम में वह बेख़ुदी कि ग़फ़लत जहाँ दर जहाँ है मुझे। (मीर) ख़ुदा मग़फ़िरत करे, पूरब को सलाम भेजने वाले वाइमर के शायर गेटे ने क्या ख़ूब कहा है, शायर ज़िंदगी के ख़्वाब से बेदार, होशमंद और बा-शऊर (सचेत) गुज़रता है और ज़िंदगी की जद्दोजहद में एक उस्ताद की हैसियत से अचेतन रूप से हिस्सा लेता है।

    शऊर (चेतन) और ला-शऊर (अचेतन) का यह रिश्ता ऐसा नहीं है कि हम इनमें से एक को दूसरे से अलग कर सकें। ये दोनों एक दूसरे में बहते और एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। शायर का ज़ेहन अपने इस मटीरियल को इस्तेमाल करने और ढालने में इतना निष्क्रिय नहीं रहता है कि उसे हम एक मीडियम (एक निष्क्रिय औज़ार) मान लें। शायर का ज़ेहन फ़ितरत (प्रकृति) से सिर्फ़ लेता ही नहीं बल्कि फ़ितरत को देता भी है। उसमें इज़ाफ़ा करता है या उसका सुधार करता है। वह हालात को बदलने की भी कोशिश करता है और अपने इस अमल की छाप, जिसमें वह अपनी इच्छाशक्ति, कर्मशक्ति, आइडियलिटी और ज़मीर-ओ-ख़मीर सभी से काम लेता है, अपनी अदबी तख़्लीक़ पर भी छोड़ता है। उसकी तख़्लीक़ आत्मपरक (subjective), वस्तुपरक (objective), शख़्सी और ग़ैर-शख़्सी, सामाजिक-ऐतिहासिक और अबदी (शाश्वत) एक ही वक़्त में होती है।

    मैं अपनी बात ख़त्म कर चुका हूँ, सिवाय एक बात के। शायर का ताल्लुक़ सिर्फ़ जज़्बात और एहसासात, शऊर और ला-शऊर और इस क़िस्म की दूसरी चीज़ों ही से नहीं होता, बल्कि ज़बान से भी होता है जो शऊर के इज़हार का बाहरी रूप है। शेरो-अदब की दुनिया में 'कैसे कहा गया है', इस बात से कम अहम नहीं है कि 'क्या कहा गया है'। चुनांचे इलियट का यह कहना ग़लत नहीं है कि किसी शायर की सामाजिक अहमियत उसकी शायराना अहमियत से अलग होती है। इलियट की ग़लती तो इस बात में है कि वह उसकी शख़्सियत के इन दोनों पहलुओं को एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग कर देते हैं। देखने में यह आया है कि एक बड़ा शायर कभी-कभी बहुत से मामलों में एक छोटा आदमी भी होता है, या यह कि उसकी शख़्सियत के बहुत से नाख़ुशगवार पहलू उसकी अपनी शायरी के पर्दे में छुप जाते हैं।

    शायर हो या कोई फ़नकार, जब तक कि उसे ज़िंदगी की ज़रूरतों के फ़ौरी दबाव से आज़ाद नहीं किया जाएगा, उसका तख़्लीक़ी अमल पूरी तरह हुस्न के क़ानूनों (सौंदर्य के नियमों) के अधीन नहीं हो सकता, और न वह उस वक़्त तक अपने तख़्लीक़ी अमल में पूरी तरह से आज़ाद हो सकता है। ऐसी सूरत में दुनिया के दूसरे सौंदर्यवादी (जमाल-परस्त) और क्या इलियट, उनका यह कहना ग़लत नहीं है कि किसी तख़्लीक़ में किसी जज़्बे की शिद्दत उतनी अहम नहीं है जितनी कि तख़्लीक़ की प्रेरणा का दबाव या उसका कलात्मक इज़हार। लेकिन जब इलियट तख़्लीक़ के मटीरियल पर अपनी पाबंदियों की छलनी लगा देते हैं और उससे शऊर और जज़्बे को निकलने नहीं देते और बेजान एहसास वाली शायरी का दावा करते हैं, तो वह फ़नकाराना बसीरत (कलात्मक अंतर्दृष्टि) के नहीं बल्कि एक मख़्सूस मटीरियल की शायरी के दावेदार बन जाते हैं, जो अपने छुपे हुए असरात में सियासी भी हो सकती है।

    शायरी ग़ैर-शख़्सी है या शख़्सी, यह सब कोई देखने नहीं जाता। देखा यह जाता है कि उसमें इंसानी जज़्बात और इंसानी शऊर का जमालियाती (सौंदर्यपरक) और बामानी इज़हार हुआ है कि नहीं। अगर आप बीती जग बीती नहीं और जग बीती आप बीती नहीं, तो वह असरदार नहीं हो सकती। असल मसला ख़ास और आम, या आप बीती और जग बीती के दरमियान जुड़ाव का बिंदु ढूँढने का है। इस संगम तक पहुँचने के लिए, जो आत्मपरकता (subjectivity) और वस्तुपरकता (objectivity) का एक मिलन बिंदु है, अपनी शख़्सियत की आगही (जागरूकता) हासिल करना ज़रूरी है। यहाँ न तो मैं यह कहता हूँ कि अदब पूरी तरह शख़्सियत का इज़हार है, और न यह कहता हूँ कि अदब पूरी तरह शख़्सियत से गुरेज़ (बचाव) है, बल्कि यह कहता हूँ कि अदब में आत्मपरकता और वस्तुपरकता, इन्फ़िरादियत और यूनिवर्सलिटी, ऐतिहासिकता और शाश्वतता—इन सबका इज़हार एक वहदत (इकाई) में होता है। लेकिन इसी के साथ-साथ यह भी कहना चाहूँगा कि जहाँ तक लिरिकल शायरी का ताल्लुक़ है, उसमें शायर की शख़्सियत का अक्स साफ़ तौर पर मिलता है। वह इससे गुरेज़ नहीं कर सकता है। हक़ीक़त तो यह है कि शायर के लिए जज़्बात से बचना नामुमकिन है:

    ब-क़द्र-ए-हौसला-ए-इश्क़ जल्वा-रेज़ी है

    वगर्ना ख़ाना-ए-आईना की फ़ज़ा मालूम

    यह है ग़ालिब का पैग़ाम इलियट के नाम। ख़ाना-ए-आईना यानी मीडियम की फ़ज़ा बेरंग होती है, उसमें जल्वा-रेज़ी शायरी के जज़्बात के इज़हार से होती है।

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