शायरी में सच्चाई और अस्लियत का सवाल हमेशा से एक दिलचस्प बहस रही है। दुनिया के बड़े शायर कभी एक-दूसरे की महज़ गूँज नहीं होते। फ़िराक़ गोरखपुरी इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि हर शायर के विज्दान (अंतर्ज्ञान) का अपना रूप-रंग, अपने नक़्श और अपनी एक अलग शख़्सियत होती है। हर एक का महसूस करने का अंदाज़ और बयान करने का तरीक़ा अलग होता है। तो फिर सवाल यह पैदा होता है कि जब शायर साझा विषयों पर क़लम उठाते हैं, तो उनकी शायरी एक ही वक़्त में सच्चाई और अस्लियत कैसे बयान कर सकती है?
इसका जवाब यह है कि हक़ीक़त और शायर की चेतना के मिलाप से ही शेर की तख़्लीक़ (रचना) होती है। हर शायर के मिज़ाज के अनोखेपन के आईने में हक़ीक़त की झलक बिगड़ती नहीं बल्कि और ज़्यादा संवर कर सामने आती है। शायरों की ये अलग-अलग आवाज़ें दरअस्ल सच्चाई के ही अलग-अलग पहलू हैं। लेकिन इस अनोखेपन के पीछे एक बहुत बड़ा कायनाती (सृष्टि से जुड़ा) सच छिपा है। फ़िराक़ साहब के मुताबिक़, शायराना शख़्सियत के बनने में दुनिया की शुरुआत से लेकर आज तक के तमाम ज़माने और इंसानी नस्ल का पूरा इतिहास शामिल होता है।
अगर गहराई से ग़ौर किया जाए तो शायर का अनोखापन पूरी तरह 'माँगे-ताँगे' की चीज़ है। हर शायर का 'मैं' दरअस्ल हज़ारों 'हम' से मिलकर बना है। उसकी शख़्सियत एक 'कंपोज़िट फ़ोटोग्राफ़' (मिली-जुली तस्वीर) की तरह है जिसमें नस्ल, मुल्क, ज़माना, और पूर्वजों के दिए गए साहित्य और कल्चर की विरासत की झलक शामिल होती है। यही वजह है कि जब दुनिया भर की शायरी अलग-अलग मिज़ाज की होने के बा-वुजूद हमारे सामने आती है, तो वह ज़बान, राष्ट्रीयता, और मज़हब की सरहदों को तोड़कर तमाम इंसानों की साझा विरासत बन जाती है।
जब हम किसी महान शायर का कलाम पढ़ते हैं, तो हमें उसमें शायर के दिल की जीवनी नज़र आती है। और सबसे बड़ा साहित्यिक चमत्कार यह है कि जितनी देर हम उस कलाम से प्रभावित रहते हैं, हमारी शख़्सियत उस शायर की शख़्सियत में विलीन हो जाती है। यह 'मन तू शुदम, तू मन शुदी' (मैं तू हो गया, तू मैं हो गया) वाला मामला है। हर इंसान के अंदर पूरी इंसानी दुनिया और कायनात जी रही होती है, और शायर का कलाम इस सोई हुई कायनात को जगाकर पढ़ने वाले को उसके अपने वुजूद से मिलवा देता है।
