ज़किया ग़ज़ल
ग़ज़ल 29
अशआर 31
किसी के घर में लगाई है आग अपनों ने
तमाशा देख रही हैं तमाश-बीं आँखें
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आस है साँस के उखड़ने तक
आज की रात हम पे भारी है
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कैसे मुमकिन कि नींद आए 'ग़ज़ल'
याद और याद भी तुम्हारी है
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ये कैसा ऐब है मेरे नगर के लोगों में
दिए जला न सके तो बुझाने आए हैं
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