मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल 47
अशआर 33
ख़ुदा का घर भी है दिल में बुतों की चाह भी है
सनम-कदा भी है दिल अपना ख़ानक़ाह भी है
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