इक़बाल सफ़ीपूरी
ग़ज़ल 26
अशआर 26
मिरे लबों का तबस्सुम तो सब ने देख लिया
जो दिल पे बीत रही है वो कोई क्या जाने
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कौन जाने कि इक तबस्सुम से
कितने मफ़्हूम-ए-ग़म निकलते हैं
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'इक़बाल' हमारा जोश-ए-तलब क्या जाने किधर ले जाएगा
निकले हैं तलाश-ए-मंज़िल में और राहगुज़र मा'लूम नहीं
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