मुसव्विरी (चित्रकारी) के किसी हसीन-शाहकार (सुंदर कलाकृति) या अदब की किसी बेहतरीन रचना का लुत्फ़ (आनंद) उठाने के लिए सबसे बुनियादी और नाज़ुक मरहला (चरण) एक 'मुनासिब फ़ासले' (Aesthetic Distance) की खोज है। अगर आप किसी तस्वीर के बहुत क़रीब खड़े हो जाएँ, तो आपको तस्वीर के हुस्न के बजाए सिर्फ़ कैनवस की सिलवटें, रंगों की बेतरतीब भीड़ और ब्रश के निशान ही दिखाई देंगे। इस नज़दीकी में तस्वीर की अस्ल रूह और उसकी मुकम्मल कंपोज़िशन निगाहों से ओझल हो जाती है। बिल्कुल इसी तरह, अगर दूरी बहुत ज़्यादा हो जाए, तो तस्वीर के रूप-रंग, उसकी लकीरों और घुमाव की बारीकियाँ नज़र नहीं आतीं। यानी हुस्न के एहसास के लिए न तो अंधा कर देने वाली नज़दीकी ज़रूरी है और न ही धुंधला कर देने वाली दूरी।
हालाँकि, इस मुनासिब-फ़ासले (उचित दूरी) का यह मतलब बिल्कुल भी नहीं कि हुस्न को मापने के लिए कोई एक अंतिम और तय-शुदा (निश्चित) फ़ासला तय कर दिया गया है। अस्ल में, हुस्न एक ऐसे समंदर की तरह है जो नाज़िर (देखने वाले) और मंज़ूर (जिसे देखा जा रहा हो), दोनों के बीच लहरें मारता रहता है। यह समंदर क़दम-ब-क़दम (धीरे-धीरे) और लम्हा-ब-लम्हा (हर पल) अपना रंग-रूप बदलता है। जिस तरह सूरज की किरणों के मामूली से बदलाव से समंदर का मंज़र (दृश्य) सुबह, दोपहर और शाम को अलग दिखाई देता है, उसी तरह कलाकृति के क़रीब जाने या उससे दूर हटने के हर पड़ाव पर हुस्न अपनी अनगिनत करवटों (रूपों) में से एक नया दृश्य पेश करता है।
इस संदर्भ में अगर हम एक सूफ़ी या आरिफ़ (ब्रह्मज्ञानी) और एक कलाकार के दृष्टिकोण की तुलना करें, तो एक दिलचस्प हक़ीक़त सामने आती है। शायर या चित्रकार हुस्न के कुछ पहलुओं (पक्षों) को अपनी पकड़ में लेता है, लेकिन वह हुस्न को उसके पूरे फैलाव के साथ क़ैद नहीं कर सकता। दूसरी तरफ़, एक आरिफ़ हुस्न की सबसे सूक्ष्म सूरत में, जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है, सफ़र (आध्यात्मिक यात्रा) तो कर सकता है, लेकिन मुनासिब-फ़ासले से महरूम (वंचित) होने के कारण वह उसकी पूरी कंपोज़िशन या उसके ‘कुल’ (समग्र रूप) को देख नहीं पाता। आरिफ़ हुस्न में डूब जाता है, जबकि कलाकार और पाठक फ़ासला बरक़रार रखकर उसका मुशाहिदा (अवलोकन) करते हैं।
फ़नून-ए-लतीफ़ा (ललित कलाओं) में यह जमालियाती (सौंदर्यपरक) फ़ासला पाठक या दर्शक पर बाहर से थोपा नहीं जाता, बल्कि ख़ुद फ़न-पारा (कलाकृति) इस फ़ासले को तय करता है। हर अज़ीम कलाकृति अपनी जगह एक मुकम्मल कायनात (ब्रह्मांड) होती है, और उसके अंदर ही यह माँग मौजूद होती है कि उसे किस फ़ासले से देखा या पढ़ा जाए। जब रचना और पाठक एक ऐसे अवचेतन रिश्ते में जुड़ जाएँ जहाँ पाठक को इस ख़ास फ़ासले का एहसास हो जाए, तब ही रचना का हुस्न पूरी तरह ज़ाहिर होता है।
यह उसूल ख़ास तौर पर काव्य रचना पर लागू होता है। काव्य रचना दरअस्ल वक़्त की निरंतरता और फ़ासलों के उतार-चढ़ाव से चुराया हुआ वह 'लम्हा' है जिसे शायर ने लफ़्ज़ों का लिबास पहना दिया है। अब यह पाठक की सूझ-बूझ पर निर्भर है कि वह इस क़ैद किए गए लम्हे का लुत्फ़ उठाने के लिए किस हद तक इस जमालियाती फ़ासले को खोज पाता है। अगर वह यह फ़ासला पा ले, तो कलाकृति उस पर अपने सारे रहस्य खोल देती है।
